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🌳 ग्रह-फल

गुरु की दृष्टि — किन भावों पर पड़ती है और क्या फल देती है

दृष्टि का नियम

वैदिक ज्योतिष में हर ग्रह अपने से सातवीं राशि/भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है — गुरु भी। दृष्टि का अर्थ है: ग्रह अपनी ऊर्जा उस भाव पर बिना वहाँ बैठे डालता है, इसलिए फलादेश में युति के बाद दृष्टि ही सबसे बड़ा प्रभाव-माध्यम है। गुरु को इसके अतिरिक्त पाँचवीं व नौवीं दृष्टियाँ भी प्राप्त हैं — यही उसे विशेष बनाती हैं।

गुरु की दृष्टि का फल-स्वभाव

गुरु जिस भाव को देखता है वहाँ विस्तार, ज्ञान और शुभता का रंग चढ़ता है — शुभ-स्थित गुरु उस क्षेत्र को सँवारता है, पीड़ित गुरु वहीं चुनौती जोड़ता है। दृष्ट भाव के कारक, भावेश और वहाँ बैठे ग्रहों से मिलाकर ही अंतिम फल कहा जाता है।

विशेष दृष्टियों का फल

गुरु की पाँचवीं-नौवीं दृष्टियाँ त्रिकोण-दृष्टियाँ हैं — अमृत-वर्षा मानी जाती हैं: संतान-विद्या और भाग्य-धर्म के भाव इनसे सींचे जाते हैं। कुंडली में गुरु जिस भाव को देखे, वहाँ की हानि प्रायः घटकर रह जाती है — इसीलिए कहा गया: गुरु की दृष्टि लाख दोष हरती है।

व्यावहारिक सूत्र

दृष्टि सदैव राशि-चक्र में गिनी जाती है और अंश जितने निकट, प्रभाव उतना सघन। अपनी कुंडली में देखिए गुरु किन भावों को देख रहा है — वही क्षेत्र उसकी दशा-अंतर्दशा में सबसे पहले हिलते हैं। गुरु के भाव-फल कोश के गुरु-भाव पन्नों में विस्तार से हैं।

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