गुरु महादशा (16 वर्ष) — फल, अंतर्दशा-क्रम व उपाय
महादशा का फल-स्वभाव
विंशोत्तरी-क्रम में गुरु की महादशा 16 वर्ष चलती है। इस काल में जीवन पर विस्तार, ज्ञान और शुभता का रंग चढ़ता है — गुरु कुंडली में जिन भावों का स्वामी है और जहाँ बैठा है, वही विषय इन वर्षों के मुख्य अध्याय बनते हैं। दशा-आरंभ की पहली अंतर्दशा (स्वयं गुरु की) में यह रंग धीरे-धीरे खुलता है।
शुभ-स्थित बनाम पीड़ित
केंद्र-त्रिकोण का स्वामी होकर बलवान बैठा गुरु अपनी दशा में उन्नति-काल देता है; त्रिक (6-8-12) से जुड़ा या अस्त-नीच-पीड़ित गुरु उन्हीं वर्षों को परीक्षा-काल बना देता है। इसीलिए दशा का फल ग्रह के नाम से नहीं, आपकी कुंडली में उसकी स्थिति से पढ़ा जाता है — निःशुल्क कुंडली में अपनी दशा-तालिका और गुरु की स्थिति एक साथ देखिए।
अंतर्दशा-क्रम व अवधि
महादशा के भीतर नौ अंतर्दशाएँ इसी क्रम से चलती हैं (अवधि = महादशा-वर्ष × अंतर्दशा-वर्ष ÷ 120):
गुरु-गुरु अंतर्दशा: 2 वर्ष 2 माह
गुरु-शनि अंतर्दशा: 2 वर्ष 6 माह
गुरु-बुध अंतर्दशा: 2 वर्ष 3 माह
गुरु-केतु अंतर्दशा: 11 माह
गुरु-शुक्र अंतर्दशा: 2 वर्ष 8 माह
गुरु-सूर्य अंतर्दशा: 10 माह
गुरु-चंद्र अंतर्दशा: 1 वर्ष 4 माह
गुरु-मंगल अंतर्दशा: 11 माह
गुरु-राहु अंतर्दशा: 2 वर्ष 5 माह
हर जोड़ी का विस्तृत फल कोश के दशा-जोड़ी पन्नों (गुरु-अंतर्दशा शृंखला) में अलग से दिया है।
उपाय व आराधना
गुरु-दशा में परम्परागत उपाय: «ॐ बृं बृहस्पतये नमः», गुरुवार को चना-दाल व पीत-वस्त्र, गुरु-सेवा। रत्न-विचार सदा कुंडली दिखाकर — गुरु शुभ-कारक हो तभी उसका रत्न धारण करें।
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