केतु की दृष्टि — किन भावों पर पड़ती है और क्या फल देती है
दृष्टि का नियम
वैदिक ज्योतिष में हर ग्रह अपने से सातवीं राशि/भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है — केतु भी। दृष्टि का अर्थ है: ग्रह अपनी ऊर्जा उस भाव पर बिना वहाँ बैठे डालता है, इसलिए फलादेश में युति के बाद दृष्टि ही सबसे बड़ा प्रभाव-माध्यम है। केतु को इसके अतिरिक्त (परम्परा-भेद: पाँचवीं-नौवीं) दृष्टियाँ भी प्राप्त हैं — यही उसे विशेष बनाती हैं।
केतु की दृष्टि का फल-स्वभाव
केतु जिस भाव को देखता है वहाँ वैराग्य, सूक्ष्मता और कटाव का रंग चढ़ता है — शुभ-स्थित केतु उस क्षेत्र को सँवारता है, पीड़ित केतु वहीं चुनौती जोड़ता है। दृष्ट भाव के कारक, भावेश और वहाँ बैठे ग्रहों से मिलाकर ही अंतिम फल कहा जाता है।
विशेष दृष्टियों का फल
राहु-केतु की दृष्टि पर परम्पराएँ बँटी हैं — कई आचार्य इन्हें केवल युति-प्रभावी मानते हैं, जबकि कुछ परम्पराएँ गुरु की तरह पाँचवीं-नौवीं दृष्टि देती हैं। हमारा इंजन मुख्य फल युति व भाव-स्थिति से कहता है और दृष्टि-मत को सहायक रखता है — यही सतर्क शास्त्रीय मार्ग है।
व्यावहारिक सूत्र
दृष्टि सदैव राशि-चक्र में गिनी जाती है और अंश जितने निकट, प्रभाव उतना सघन। अपनी कुंडली में देखिए केतु किन भावों को देख रहा है — वही क्षेत्र उसकी दशा-अंतर्दशा में सबसे पहले हिलते हैं। केतु के भाव-फल कोश के केतु-भाव पन्नों में विस्तार से हैं।
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