गुरु महादशा में गुरु अंतर्दशा: फल, अवधि व उपाय
गुरु महादशा में गुरु अंतर्दशा — अवधि व स्वरूप
विंशोत्तरी क्रम में गुरु की महादशा 16 वर्ष चलती है — यह काल ज्ञान, धर्म, गुरु, संतान, धन, भाग्य, विवेक के विषयों का अध्याय है। इसके भीतर गुरु की अंतर्दशा 2 वर्ष 1 माह 18 दिन की होती है (सूत्र: 16×16÷120 वर्ष) — इस अवधि में अध्याय वही रहता है, पर विषय गुरु (ज्ञान, धर्म, गुरु, संतान, धन, भाग्य, विवेक) तय करता है।
यह महादशा की पहली अंतर्दशा है — गुरु की अपनी अंतर्दशा: नई दशा का रंग यहीं चढ़ता है और ग्रह अपना शुद्धतम फल देता है। जन्म-कुंडली में गुरु जैसा है (भाव, राशि, दृष्टि), वह इसी काल में सबसे साफ़ दिखता है।
फल कैसे पढ़ें — असली नियम
फल ग्रह के नाम से नहीं, आपकी कुंडली में उसकी स्थिति से तय होता है: गुरु जिन भावों का स्वामी है, जहाँ बैठा है और जिस नक्षत्र में है — अंतर्दशा उन्हीं विषयों को छूती है; गुरु की महादशा उसे अपना संदर्भ (अध्याय) देती है।
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इस अवधि के सामान्य उपाय
गुरु (अंतर्दशा-स्वामी): गुरु को बल देने हेतु गुरुवार व्रत, 'ॐ गुरवे नमः' या बृहस्पति-स्तोत्र, विष्णु-पूजन तथा गुरुजनों-ब्राह्मणों का सम्मान श्रेष्ठ है। रत्न पुखराज (Yellow Sapphire) सोने में, तर्जनी में, गुरुवार धारण किया जाता है। पीली वस्तुएँ (चना-दाल, हल्दी, केसर) का दान, ज्ञान-दान तथा धर्म-ग्रंथों का अध्ययन विशेष लाभकारी है।
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