केतु महादशा (7 वर्ष) — फल, अंतर्दशा-क्रम व उपाय
महादशा का फल-स्वभाव
विंशोत्तरी-क्रम में केतु की महादशा 7 वर्ष चलती है। इस काल में जीवन पर वैराग्य, सूक्ष्मता और कटाव का रंग चढ़ता है — केतु कुंडली में जिन भावों का स्वामी है और जहाँ बैठा है, वही विषय इन वर्षों के मुख्य अध्याय बनते हैं। दशा-आरंभ की पहली अंतर्दशा (स्वयं केतु की) में यह रंग धीरे-धीरे खुलता है।
शुभ-स्थित बनाम पीड़ित
केंद्र-त्रिकोण का स्वामी होकर बलवान बैठा केतु अपनी दशा में उन्नति-काल देता है; त्रिक (6-8-12) से जुड़ा या अस्त-नीच-पीड़ित केतु उन्हीं वर्षों को परीक्षा-काल बना देता है। इसीलिए दशा का फल ग्रह के नाम से नहीं, आपकी कुंडली में उसकी स्थिति से पढ़ा जाता है — निःशुल्क कुंडली में अपनी दशा-तालिका और केतु की स्थिति एक साथ देखिए।
अंतर्दशा-क्रम व अवधि
महादशा के भीतर नौ अंतर्दशाएँ इसी क्रम से चलती हैं (अवधि = महादशा-वर्ष × अंतर्दशा-वर्ष ÷ 120):
केतु-केतु अंतर्दशा: 5 माह
केतु-शुक्र अंतर्दशा: 1 वर्ष 2 माह
केतु-सूर्य अंतर्दशा: 4 माह
केतु-चंद्र अंतर्दशा: 7 माह
केतु-मंगल अंतर्दशा: 5 माह
केतु-राहु अंतर्दशा: 1 वर्ष 1 माह
केतु-गुरु अंतर्दशा: 11 माह
केतु-शनि अंतर्दशा: 1 वर्ष 1 माह
केतु-बुध अंतर्दशा: 1 वर्ष
हर जोड़ी का विस्तृत फल कोश के दशा-जोड़ी पन्नों (केतु-अंतर्दशा शृंखला) में अलग से दिया है।
उपाय व आराधना
केतु-दशा में परम्परागत उपाय: «ॐ कें केतवे नमः», कुश-तिल-कंबल का दान, गणेश-आराधना। रत्न-विचार सदा कुंडली दिखाकर — केतु शुभ-कारक हो तभी उसका रत्न धारण करें।
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