शनि महादशा में गुरु अंतर्दशा: फल, अवधि व उपाय
शनि महादशा में गुरु अंतर्दशा — अवधि व स्वरूप
विंशोत्तरी क्रम में शनि की महादशा 19 वर्ष चलती है — यह काल कर्म, न्याय, आयु, अनुशासन, सेवक, दुःख, तेल-लोहा के विषयों का अध्याय है। इसके भीतर गुरु की अंतर्दशा 2 वर्ष 6 माह 12 दिन की होती है (सूत्र: 19×16÷120 वर्ष) — इस अवधि में अध्याय वही रहता है, पर विषय गुरु (ज्ञान, धर्म, गुरु, संतान, धन, भाग्य, विवेक) तय करता है।
महादशा-स्वामी शनि के अध्याय में गुरु अपने कारकत्व — ज्ञान, धर्म, गुरु, संतान, धन, भाग्य, विवेक — के विषय सामने लाता है। सम-सम्बन्ध से फल मिश्रित रहता है — निर्णायक भूमिका कुंडली में दोनों की स्थिति की है।
दशा-संधि की अंतिम अंतर्दशा
गुरु की यह अंतर्दशा शनि-महादशा की अंतिम अंतर्दशा है — इसके बाद महादशा ही बदल जाती है। परंपरा दशा-संधि को संवेदनशील काल मानती है: पुराना अध्याय समेटने और नए की तैयारी का समय — बड़े जोखिम टालें, लंबित काम निपटाएँ।
फल कैसे पढ़ें — असली नियम
फल ग्रह के नाम से नहीं, आपकी कुंडली में उसकी स्थिति से तय होता है: गुरु जिन भावों का स्वामी है, जहाँ बैठा है और जिस नक्षत्र में है — अंतर्दशा उन्हीं विषयों को छूती है; शनि की महादशा उसे अपना संदर्भ (अध्याय) देती है।
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इस अवधि के सामान्य उपाय
गुरु (अंतर्दशा-स्वामी): गुरु को बल देने हेतु गुरुवार व्रत, 'ॐ गुरवे नमः' या बृहस्पति-स्तोत्र, विष्णु-पूजन तथा गुरुजनों-ब्राह्मणों का सम्मान श्रेष्ठ है। रत्न पुखराज (Yellow Sapphire) सोने में, तर्जनी में, गुरुवार धारण किया जाता है। पीली वस्तुएँ (चना-दाल, हल्दी, केसर) का दान, ज्ञान-दान तथा धर्म-ग्रंथों का अध्ययन विशेष लाभकारी है।
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