सूर्य-मंगल युति: फल, प्रभाव व उपाय
सूर्य-मंगल युति का मुख्य फल
सूर्य अग्नि-तत्व का क्रूर (तेजस्वी) ग्रह है (आत्मा, पिता, राजा/सरकार, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, नेतृत्व का कारक), मंगल अग्नि-तत्व का क्रूर ग्रह (भाई, साहस, ऊर्जा, भूमि, रक्त, पराक्रम, विवाद का कारक) — युति में दोनों के कारकत्व घुल-मिलकर एक ही भाव के विषयों पर लगते हैं।
संक्षेप-सूत्र: तेज दुगना — प्रचंड साहस, नेतृत्व और प्रतिस्पर्धा-विजय; पर क्रोध व रक्त-पित्त की अधिकता से संयम आवश्यक।
मैत्री और युति का भीतरी रसायन
नैसर्गिक मैत्री-विचार: सूर्य मंगल को मित्र मानता है और मंगल सूर्य को मित्र। दोनों ओर मैत्री होने से यह युति सहज-सहयोगी है।
अस्त (combust) का विचार
सूर्य के अति-निकट (कुछ अंशों के भीतर) आने पर मंगल अस्त हो जाता है — उसका फल क्षीण/भीतरी हो जाता है। युति पढ़ते समय अंश-दूरी अवश्य देखें: दूर की युति और निकट-अस्त युति के फल में बड़ा अंतर है।
किस भाव में हो — यही निर्णायक
युति का असली रंग भाव तय करता है — यही सूर्य-मंगल केंद्र-त्रिकोण में वरदान-रूप, त्रिक (6, 8, 12) में परीक्षा-रूप हो जाती है। अंश-निकटता जितनी अधिक, फल उतना गुँथा हुआ; और दोनों में जो ग्रह अंशों में आगे (बली) है, युति का नेतृत्व उसी के पास रहता है।
फल का समय: सूर्य या मंगल — किसी की भी महादशा-अंतर्दशा में युति सक्रिय होती है; दोनों की दशाएँ परस्पर अंतर्दशा में मिलें, तब इसका फल शिखर पर होता है।
सामान्य उपाय
सूर्य: सूर्य को बल देने हेतु प्रातः सूर्योदय पर जल-अर्घ्य (ताँबे के लोटे से), 'ॐ सूर्याय नमः' या आदित्य-हृदय-स्तोत्र का पाठ, रविवार व्रत तथा पिता व गुरुजनों का सम्मान श्रेष्ठ उपाय हैं। रत्न माणिक्य (Ruby) सोने में, अनामिका में, रविवार प्रातः धारण किया जाता है — पर कुंडली-परीक्षण के बाद ही। गुड़-गेहूँ का दान व सूर्य-नमस्कार भी लाभकारी है।
मंगल: मंगल को बल/शांति देने हेतु मंगलवार व्रत, हनुमान-चालीसा पाठ, 'ॐ अंगारकाय नमः' जप तथा हनुमान-पूजन श्रेष्ठ है। रत्न मूँगा (Red Coral) ताँबे/सोने में, अनामिका में, मंगलवार धारण किया जाता है। मसूर-दाल, लाल वस्त्र व गुड़ का दान तथा क्रोध-प्रबंधन विशेष लाभकारी है; मांगलिक-दोष हेतु कुंभ-विवाह आदि परिहार शास्त्र-सम्मत हैं।
रत्न-निर्णय युति में विशेष सावधानी माँगता है — दोनों ग्रहों के रत्न एक साथ प्रायः नहीं पहने जाते; कुंडली-परामर्श अनिवार्य।
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