मूल ज्योतिष

कुंडली का छठा भाव (रोग/रिपु भाव): रोग, ऋण, शत्रु और सेवा

छठा भाव रोग-रिपु भाव है — रोग, ऋण, शत्रु, मुक़दमे और प्रतिस्पर्धा का घर। त्रिक (दुःस्थान) होते हुए भी यह उपचय भाव है — यहाँ के ग्रह लड़ना सिखाते हैं और समय के साथ जिताते हैं।

आधुनिक अर्थ में यह नौकरी-सेवा, दिनचर्या, स्वास्थ्य-प्रबंधन और workplace का भाव है — छठा बली हो तो जातक प्रतिस्पर्धा में खिलता है।

छठा भाव क्या-क्या देखता है

रिपु भाव के मुख्य विषय:

  • रोग और रोग-प्रतिरोधक क्षमता
  • ऋण — लेना, चुकाना, फँसना
  • शत्रु, प्रतिद्वंद्वी, मुक़दमे
  • नौकरी-सेवा और अधीनस्थ कर्मचारी
  • मामा-पक्ष (ननिहाल)
  • पालतू पशु; आँत-पाचन (शरीर-अंग)
  • प्रतियोगी परीक्षाएँ — छठे का बल यहाँ निर्णायक

छठे भाव में नौ ग्रहों का फल

उपचय होने से पाप-ग्रह यहाँ प्रायः विजय दिलाते हैं:

  • सूर्य: शत्रु-हंता, प्रशासनिक विजय; पित्त-रोग सावधानी
  • चंद्र: मन में चिंता-प्रवृत्ति; जल/कफ-विकार — मन का उपचार ज़रूरी
  • मंगल: शत्रुओं पर निर्णायक विजय, ऋण जल्दी चुकता — police/सेना हेतु उत्तम
  • बुध: तर्क से मुक़दमे जीतता; स्नायु-त्वचा सावधानी
  • गुरु: शत्रु भी सम्मान करें; पर 'कारको भाव' नियम से यकृत-वज़न सावधानी
  • शुक्र: सेवा-क्षेत्र में कला; मधुमेह-मूत्र विकार से बचाव करें
  • शनि: रोग-ऋण-शत्रु तीनों को धीरे-धीरे पीसकर हराता — दीर्घ सेवा-करियर
  • राहु: विषम शत्रुओं से भी जीत; रहस्यमय रोग — निदान में धैर्य
  • केतु: गुप्त शत्रुओं का नाश; सूक्ष्म रोगों में वैकल्पिक चिकित्सा लाभ
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षष्ठेश की स्थिति का फल

छठे का स्वामी जहाँ बैठता है, वहाँ संघर्ष-प्रतिस्पर्धा ले जाता है — षष्ठेश लग्न में स्वास्थ्य-चुनौती, सातवें में दांपत्य-टकराव, दसवें में प्रतिस्पर्धी करियर (जो जीत भी दिलाता है)।

विपरीत-राजयोग भी यहीं से बनता है: षष्ठेश छठे, आठवें या बारहवें में ही चला जाए तो दुःस्थानों का आपसी नाश होकर अचानक उत्थान देता है — कठिन दिखती कुंडलियों में यह छिपा वरदान होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रतियोगी परीक्षा कब निकलेगी? — छठे भाव व षष्ठेश का बल + पंचम (बुद्धि) + दशा-गोचर की खिड़की मिलाकर; छठे-दसवें के बली सम्बन्ध वाले जातक प्रतिस्पर्धा में आगे रहते हैं।

ऋण कब उतरेगा? — मंगल व षष्ठेश की शुभ दशा-अवधियों में; परंपरा में मंगलवार का ऋण-मोचन मंगल-स्तोत्र प्रसिद्ध उपाय है।

क्या छठा भाव ख़ाली होना अच्छा है? — प्रायः हाँ-जैसा ही — पर असली निर्णय षष्ठेश की स्थिति से होता है; ख़ाली भाव का फल उसका स्वामी देता है।

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