| शहर | तारीख | पूजा-समय | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| कुआलालंपुर Malaysia Time (MYT) | मंगलवार, 13 जनवरी 2026 | — | 12 जनवरी, 3:13 PM → 13 जनवरी, 5:48 PM MYT |
समय स्थानीय। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
लोहड़ी नई फ़सल (गन्ना, सरसों, मूँगफली) और रबी की बुआई के लिए धरती-सूर्य-अग्नि का धन्यवाद है; तिल-गुड़ (तिलोड़ी → लोहड़ी) आग में अर्पित कर कहा जाता है — «आदर आए, दलिद्दर जाए»।
अग्नि को साक्षी मानकर परिक्रमा और अर्पण — घर में नए सदस्य (बहू या शिशु) का समुदाय में स्वागत इसी रीति से होता है; इसीलिए «पहली लोहड़ी» बड़ी मानी जाती है।
दुल्ला भट्टी की कथा — एक पंजाबी नायक जिसने ग़रीब लड़कियों (सुंदरी-मुंदरी) को बचाकर उनका विवाह कराया — लोहड़ी के गीतों («सुंदर मुंदरिये… हो!») में हर साल दोहराई जाती है; यह बेटियों के सम्मान का पर्व भी है।
हाँ — मंगलवार, 13 जनवरी 2026।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में (कुआलालंपुर के लिए Malaysia Time (MYT))।
लोहड़ी पौष का अंतिम दिन है और अगली सुबह सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है — मकर संक्रांति/माघी। एक रात का अग्नि-उत्सव, अगला दिन स्नान-दान और तिल-गुड़ का।
विवाह के बाद पहली या शिशु-जन्म के बाद पहली लोहड़ी — उस घर में समुदाय बड़ा उत्सव करता है, जोड़ा/शिशु परिक्रमा में आगे रहता है और शगुन बँटता है। आज बेटी की पहली लोहड़ी भी उतनी ही धूम से मनाई जाती है।
मूलतः पंजाब-हरियाणा का, पर अब पूरे उत्तर भारत और प्रवासी समुदायों में सब मनाते हैं; उसी दिन तमिलनाडु में भोगी, असम में माघ बिहू की पूर्व-संध्या होती है।
पिछवाड़े के फ़ायर-पिट या सामुदायिक हॉल/गुरुद्वारे के आयोजन में; कई शहरों में खुली आग की अनुमति चाहिए — स्थानीय नियम देखें। आग न हो तो मोमबत्ती/दीप के साथ प्रतीकात्मक अर्पण भी किया जाता है।
🙏 गुरुजी (आचार्य आदित्य धर द्विवेदी) से सीधी बात