| शहर | तारीख | पूर्वाह्न पूजा-समय | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| एम्स्टर्डम CET/CEST | सोमवार, 5 जुलाई 2027 | 5:26 AM – 12:05 PM CEST | 5 जुलाई, 1:21 AM → 5 जुलाई, 9:44 PM CEST |
| द हेग CET/CEST | सोमवार, 5 जुलाई 2027 | 5:30 AM – 12:08 PM CEST | 5 जुलाई, 1:21 AM → 5 जुलाई, 9:44 PM CEST |
समय स्थानीय (DST-सहित)। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
स्थानीय सूर्योदय पर तिथि (उदया तिथि)।
स्कंद-पुराण (उत्कल-खंड): «रथे तु वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते» — रथ पर वामन (जगन्नाथ) के दर्शन से पुनर्जन्म नहीं; रथ खींचने से सौ यज्ञों का फल; रथयात्रा में भगवान स्वयं जनता के बीच आते हैं — जाति-धर्म-भेद के बिना सबको दर्शन (मंदिर में प्रवेश-नियम, रथ पर नहीं)।
पुरी की रथयात्रा का क्रम: स्नान-पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा — 108 घड़े स्नान, फिर देव «बीमार» — अनवसर 15 दिन), नव-यौवन दर्शन, रथयात्रा (द्वितीया — पहंडी, छेरा-पहँरा — गजपति राजा सोने की झाड़ू से रथ बुहारते हैं), गुंडिचा में 7 दिन (हेरा-पंचमी — लक्ष्मी रूठकर आतीं), बाहुड़ा (दशमी), सुना-वेश (एकादशी), अधर-पणा (द्वादशी), नीलाद्रि-बिजे (त्रयोदशी — जगन्नाथ को रसगुल्ले से लक्ष्मी मनातीं)।
रथ हर साल नए — फासी-धौरा की लकड़ी, नंदीघोष (जगन्नाथ — 16 पहिए, लाल-पीला), तालध्वज (बलभद्र — 14 पहिए, लाल-हरा), दर्पदलन/देवदलन (सुभद्रा — 12 पहिए, लाल-काला); 12 या 19 साल में नवकलेवर (नई मूर्ति — नीम की दारु); जगन्नाथ = कृष्ण का दारु-ब्रह्म रूप, बिना हाथ-पैर, बड़ी आँखें — «जगत् के नाथ», सुभद्रा बहन बीच में, रथ बहन-भाई का भी पर्व।
हाँ — सोमवार, 5 जुलाई 2027।
पूर्वाह्न पूजा-समय: 5:26 AM से 12:05 PM (CEST)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में, DST-सहित (एम्स्टर्डम के लिए CET/CEST)।
कथा में रानी गुंडिचा ने 21 दिन से पहले द्वार खोल दिया, बढ़ई (विश्वकर्मा) मूर्तियाँ अधूरी छोड़कर अदृश्य हुए; नारद ने कहा यही रूप पूज्य; दार्शनिक अर्थ — ब्रह्म का रूप अपूर्ण-असीम, बड़ी आँखें = सब देखते «जगन्नाथ»; नीम की दारु से, 12-19 साल में नवकलेवर।
स्कंद-पुराण: रथ खींचने/रस्सी छूने से सौ यज्ञों का फल, रथ पर वामन-दर्शन से पुनर्जन्म नहीं; भाव — भगवान को अपने हाथों खींचना, सेवा; न पहुँच सकें तो घर के रथ की रस्सी या शहर की रथयात्रा — भाव वही।
हेरा-पंचमी — रथयात्रा के पाँचवें दिन लक्ष्मी पालकी में गुंडिचा आकर रूठकर जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) का एक टुकड़ा तुड़वाकर लौटतीं (नाटक-लीला); सुना-वेश — बाहुड़ा के अगले दिन (एकादशी) तीनों देव रथ पर स्वर्ण-हाथ-पैर-मुकुट में — लाखों दर्शन; नीलाद्रि-बिजे — रसगुल्ले से लक्ष्मी को मनाकर मंदिर-प्रवेश।
त्रिमूर्ति-चित्र/मूर्ति की सुबह पूजा (फूल-तुलसी-दीप), खिचड़ी-दालमा-रसगुल्ला भोग, जगन्नाथ-अष्टकम, बच्चों के साथ छोटा रथ खींचना, शहर की रथयात्रा/इस्कॉन या लाइव-दर्शन; नौ दिन रोज़ आरती, बाहुड़ा पर वापसी-भोग — पूरा फल माना जाता है।