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| शहर | तारीख | पूर्वाह्न पूजा-समय | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| सुवा Fiji Time (FJT) | मंगलवार, 6 जुलाई 2027 | 6:39 AM – 11:05 AM FJT | 5 जुलाई, 11:21 AM → 6 जुलाई, 7:44 AM FJT |
समय स्थानीय। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
स्थानीय सूर्योदय पर तिथि (उदया तिथि)।
स्कंद-पुराण (उत्कल-खंड): «रथे तु वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते» — रथ पर वामन (जगन्नाथ) के दर्शन से पुनर्जन्म नहीं; रथ खींचने से सौ यज्ञों का फल; रथयात्रा में भगवान स्वयं जनता के बीच आते हैं — जाति-धर्म-भेद के बिना सबको दर्शन (मंदिर में प्रवेश-नियम, रथ पर नहीं)।
पुरी की रथयात्रा का क्रम: स्नान-पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा — 108 घड़े स्नान, फिर देव «बीमार» — अनवसर 15 दिन), नव-यौवन दर्शन, रथयात्रा (द्वितीया — पहंडी, छेरा-पहँरा — गजपति राजा सोने की झाड़ू से रथ बुहारते हैं), गुंडिचा में 7 दिन (हेरा-पंचमी — लक्ष्मी रूठकर आतीं), बाहुड़ा (दशमी), सुना-वेश (एकादशी), अधर-पणा (द्वादशी), नीलाद्रि-बिजे (त्रयोदशी — जगन्नाथ को रसगुल्ले से लक्ष्मी मनातीं)।
रथ हर साल नए — फासी-धौरा की लकड़ी, नंदीघोष (जगन्नाथ — 16 पहिए, लाल-पीला), तालध्वज (बलभद्र — 14 पहिए, लाल-हरा), दर्पदलन/देवदलन (सुभद्रा — 12 पहिए, लाल-काला); 12 या 19 साल में नवकलेवर (नई मूर्ति — नीम की दारु); जगन्नाथ = कृष्ण का दारु-ब्रह्म रूप, बिना हाथ-पैर, बड़ी आँखें — «जगत् के नाथ», सुभद्रा बहन बीच में, रथ बहन-भाई का भी पर्व।
नहीं। भारत: सोमवार, 5 जुलाई 2027; सुवा (फ़िजी): मंगलवार, 6 जुलाई 2027। तिथि स्थानीय निर्णायक क्षण पर देखी जाती है, जो यहाँ दूसरे दिन पड़ता है।
पूर्वाह्न पूजा-समय: 6:39 AM से 11:05 AM (FJT)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में (सुवा के लिए Fiji Time (FJT))।
कथा में रानी गुंडिचा ने 21 दिन से पहले द्वार खोल दिया, बढ़ई (विश्वकर्मा) मूर्तियाँ अधूरी छोड़कर अदृश्य हुए; नारद ने कहा यही रूप पूज्य; दार्शनिक अर्थ — ब्रह्म का रूप अपूर्ण-असीम, बड़ी आँखें = सब देखते «जगन्नाथ»; नीम की दारु से, 12-19 साल में नवकलेवर।
स्कंद-पुराण: रथ खींचने/रस्सी छूने से सौ यज्ञों का फल, रथ पर वामन-दर्शन से पुनर्जन्म नहीं; भाव — भगवान को अपने हाथों खींचना, सेवा; न पहुँच सकें तो घर के रथ की रस्सी या शहर की रथयात्रा — भाव वही।
हेरा-पंचमी — रथयात्रा के पाँचवें दिन लक्ष्मी पालकी में गुंडिचा आकर रूठकर जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) का एक टुकड़ा तुड़वाकर लौटतीं (नाटक-लीला); सुना-वेश — बाहुड़ा के अगले दिन (एकादशी) तीनों देव रथ पर स्वर्ण-हाथ-पैर-मुकुट में — लाखों दर्शन; नीलाद्रि-बिजे — रसगुल्ले से लक्ष्मी को मनाकर मंदिर-प्रवेश।
त्रिमूर्ति-चित्र/मूर्ति की सुबह पूजा (फूल-तुलसी-दीप), खिचड़ी-दालमा-रसगुल्ला भोग, जगन्नाथ-अष्टकम, बच्चों के साथ छोटा रथ खींचना, शहर की रथयात्रा/इस्कॉन या लाइव-दर्शन; नौ दिन रोज़ आरती, बाहुड़ा पर वापसी-भोग — पूरा फल माना जाता है।