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फ़िजी में देवशयनी एकादशी 2027: बुधवार, 14 जुलाई — शहर-वार पूजा-समय

फ़िजी में देवशयनी एकादशी 2027: बुधवार, 14 जुलाई 2027 (सुवा)
भारत के दिन ही। 2027 में देवशयनी एकादशी भारत और सुवा में बुधवार, 14 जुलाई 2027 को है।

देवशयनी एकादशी 2027 — सुवा

शहरतारीखपूजा-समयतिथि (स्थानीय)
सुवा
Fiji Time (FJT)
बुधवार, 14 जुलाई 2027—
पारण 6:38 AM–8:52 AM FJT
13 जुलाई, 6:39 PM → 14 जुलाई, 7:41 PM FJT

समय स्थानीय। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।

देवशयनी एकादशी की तारीख कैसे तय होती है

स्थानीय सूर्योदय पर एकादशी (उदया) — स्मार्त नियम; दशमी अरुणोदय (सूर्योदय से 96 मिनट पहले) को छुए तो वैष्णव अगले दिन। पारण अगली सुबह सूर्योदय के बाद, हरि-वासर के बाद व द्वादशी-अंत से पहले।

महत्व

पद्म-पुराण: आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विष्णु ने बलि के द्वार पर (या क्षीरसागर में) शयन किया, कार्तिक में जागे — बीच के चार मास शिव सृष्टि-संचालन करते हैं (सावन शिव का); भागवत-लोक में «देव सोए, मंगल रुके» — इसलिए विवाह-मुंडन-गृह-प्रवेश आदि देवउठनी के बाद; पर व्रत-जप-दान-कथा-तीर्थ का फल इन चार महीनों में कई गुना।

एकादशी-व्रत: दशमी की रात से द्वादशी के पारण तक — चावल-अनाज वर्जित, फलाहार/निर्जला; देवशयनी से चातुर्मास-नियम — एक वस्तु का त्याग (श्रावण में साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल), भूमि-शयन, ब्रह्मचर्य, रोज़ कथा — पूरे चार मास; देवउठनी पर समापन।

महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी = पंढरपुर की वारी — आळंदी (ज्ञानेश्वर) व देहू (तुकाराम) से पालखी पैदल 21 दिन, लाखों वारकरी «विठ्ठल-विठ्ठल» — भारत की सबसे बड़ी पैदल-यात्राओं में; गुजरात में «देवपोढ़ी अग्यारस», ओडिशा में रथयात्रा के बाद «हरिशयन», बंगाल में «शयन एकादशी» — जगन्नाथ का शयन।

पूजा-विधि (संक्षेप)

  1. दशमी (एक दिन पहले): शाम सात्विक भोजन (चावल नहीं — कई घर), रात ब्रह्मचर्य; घर की सफ़ाई, विष्णु-शय्या की तैयारी (छोटा पलंग/चौकी, पीला-सफ़ेद कपड़ा, तकिया)।
  2. एकादशी सुबह: स्नान, पीले वस्त्र; संकल्प — «देवशयनी एकादशी का व्रत, चातुर्मास में (नियम) का पालन»; विष्णु-लक्ष्मी की पूजा — पंचामृत-स्नान, पीले वस्त्र, चंदन-अक्षत (चावल नहीं — तिल/जौ), तुलसी-दल (आवश्यक), पीले फूल, धूप-दीप, नैवेद्य (फल-पंजीरी-खीर)।
  3. मंत्र: «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» 108, विष्णु-सहस्रनाम/एकादशी-कथा (नीचे), «सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्, विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम्» — शयन-प्रार्थना।
  4. विष्णु-शयन (शाम/प्रदोष): विष्णु-प्रतिमा/शालिग्राम को पीले वस्त्र, पान-सुपारी-लौंग-इलायची, शय्या पर शयन कराना, चादर ओढ़ाना, दीप, आरती — «अब आप शयन करें, कार्तिक में जगाएँगे»; लक्ष्मी-पूजन साथ; कहीं इस दिन से विष्णु का चित्र ढँक देते हैं (देवउठनी तक)।
  5. चातुर्मास-संकल्प: विष्णु के आगे एक नियम — प्याज़-लहसुन/साग/दही/दूध का त्याग, रोज़ गीता-पाठ, तुलसी-दीप, ब्रह्मचर्य, भूमि-शयन, दान, मौन-घंटा — जो निभ सके; परिवार में एक-एक नियम बाँटें।
  6. तुलसी: चातुर्मास तुलसी-सेवा का काल — रोज़ जल-दीप, तुलसी-विवाह की तैयारी (कार्तिक); आज तुलसी को चुनरी, «तुलसी माता की जय»।
  7. व्रत-दिन: फलाहार (कुट्टू-सिंघाड़ा-साबूदाना-फल-दूध) या निर्जला; चावल-गेहूँ-दाल नहीं; दिन में सोना नहीं, रात जागरण/कीर्तन (हो सके तो); दान — अन्न-वस्त्र-छाता-जूता (वर्षा-ऋतु का दान)।
  8. द्वादशी (अगले दिन) पारण: ऊपर पारण-समय (द्वादशी में, हरि-वासर टालकर, सूर्योदय के बाद) — पहले तुलसी-जल, फिर ब्राह्मण/ग़रीब को भोजन, फिर स्वयं; चावल से पारण शुभ (एकादशी को चावल त्यागे, द्वादशी को ग्रहण)।

प्रश्नोत्तर

क्या देवशयनी एकादशी 2027 फ़िजी और भारत में एक ही दिन है?

हाँ — बुधवार, 14 जुलाई 2027।

ये समय किस समय-क्षेत्र में हैं?

हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में (सुवा के लिए Fiji Time (FJT))।

चातुर्मास में क्या-क्या नहीं होता?

विवाह, सगाई (कुछ), मुंडन, यज्ञोपवीत, गृह-प्रवेश, नया व्यापार-आरंभ (कुछ) — देवउठनी एकादशी तक; पर नामकरण-अन्नप्राशन-वाहन-खरीद कुछ पंडित करने देते हैं; व्रत-जप-दान-तीर्थ-कथा-सत्संग के लिए चातुर्मास सबसे शुभ।

चातुर्मास का कौन-सा नियम लूँ?

जो निभ सके — श्रावण में पत्तेदार साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल का त्याग (परंपरा); या प्याज़-लहसुन-त्याग, रोज़ गीता का एक अध्याय, तुलसी-दीप, एक घंटा मौन, रोज़ कुछ दान, भूमि-शयन — एक भी सच्चे मन से पूरा करें; देवउठनी पर समापन-दान।

एकादशी को चावल क्यों नहीं?

पद्म-पुराण में एकादशी को अन्न (विशेषतः चावल) में पाप का वास; लोक-मान्यता — महर्षि मेधा का अंश चावल में (एकादशी के दिन); आयुर्वेद — पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार से पाचन-विश्राम; द्वादशी को चावल से पारण शुभ।

पंढरपुर की वारी क्या है?

महाराष्ट्र के वारकरी आळंदी (संत ज्ञानेश्वर) व देहू (संत तुकाराम) से पालखी लेकर 21 दिन पैदल (250 किमी) पंढरपुर पहुँचते हैं — आषाढ़ी एकादशी को विठ्ठल-दर्शन, चंद्रभागा-स्नान; लाखों लोग, दिंडियाँ, अभंग-कीर्तन — 700 साल पुरानी परंपरा; कार्तिकी एकादशी पर दूसरी वारी।

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