🛌 देवशयनी एकादशी (हरिशयनी / आषाढ़ी एकादशी) 2027
आषाढ़ शुक्ल एकादशी — भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन को जाते हैं, चातुर्मास आरंभ (देवउठनी तक विवाह-मुंडन आदि बंद); पंढरपुर की आषाढ़ी वारी; एकादशी-व्रत, अगले दिन द्वादशी को पारण।
देवशयनी (हरिशयनी/पद्मा) एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को होती है — जगन्नाथ रथयात्रा के नौ दिन बाद, गुरु पूर्णिमा से चार दिन पहले। इस दिन से भगवान विष्णु चार मास (कार्तिक शुक्ल एकादशी — देवउठनी तक) क्षीरसागर में शेषनाग पर योग-निद्रा में रहते हैं — इसे चातुर्मास कहते हैं; इस अवधि में विवाह, मुंडन, गृह-प्रवेश, यज्ञोपवीत आदि मांगलिक कार्य नहीं होते (नियम-व्रत-दान-कथा होते हैं)।
स्त्रियाँ घर में विष्णु-लक्ष्मी की पूजा, तुलसी-सेवा, एकादशी-व्रत (चावल-वर्जित, फलाहार) रखती हैं, विष्णु को पीले वस्त्र पहनाकर शयन कराती हैं (पान-सुपारी-शय्या), चातुर्मास का कोई एक नियम-संकल्प लेती हैं; महाराष्ट्र में यह «आषाढ़ी एकादशी» — पंढरपुर की विठोबा-वारी का सबसे बड़ा दिन (लाखों वारकरी)। नीचे इस साल की तिथि, पारण-समय, विधि, सामग्री, कथा, फलाहार और इलाक़ों की रीत।
महत्व — यह व्रत क्यों
पद्म-पुराण: आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विष्णु ने बलि के द्वार पर (या क्षीरसागर में) शयन किया, कार्तिक में जागे — बीच के चार मास शिव सृष्टि-संचालन करते हैं (सावन शिव का); भागवत-लोक में «देव सोए, मंगल रुके» — इसलिए विवाह-मुंडन-गृह-प्रवेश आदि देवउठनी के बाद; पर व्रत-जप-दान-कथा-तीर्थ का फल इन चार महीनों में कई गुना।
एकादशी-व्रत: दशमी की रात से द्वादशी के पारण तक — चावल-अनाज वर्जित, फलाहार/निर्जला; देवशयनी से चातुर्मास-नियम — एक वस्तु का त्याग (श्रावण में साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल), भूमि-शयन, ब्रह्मचर्य, रोज़ कथा — पूरे चार मास; देवउठनी पर समापन।
महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी = पंढरपुर की वारी — आळंदी (ज्ञानेश्वर) व देहू (तुकाराम) से पालखी पैदल 21 दिन, लाखों वारकरी «विठ्ठल-विठ्ठल» — भारत की सबसे बड़ी पैदल-यात्राओं में; गुजरात में «देवपोढ़ी अग्यारस», ओडिशा में रथयात्रा के बाद «हरिशयन», बंगाल में «शयन एकादशी» — जगन्नाथ का शयन।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — दशमी की तैयारी, एकादशी-व्रत व विष्णु-शयन, चातुर्मास-संकल्प, द्वादशी को पारण।
- दशमी (एक दिन पहले): शाम सात्विक भोजन (चावल नहीं — कई घर), रात ब्रह्मचर्य; घर की सफ़ाई, विष्णु-शय्या की तैयारी (छोटा पलंग/चौकी, पीला-सफ़ेद कपड़ा, तकिया)।
- एकादशी सुबह: स्नान, पीले वस्त्र; संकल्प — «देवशयनी एकादशी का व्रत, चातुर्मास में (नियम) का पालन»; विष्णु-लक्ष्मी की पूजा — पंचामृत-स्नान, पीले वस्त्र, चंदन-अक्षत (चावल नहीं — तिल/जौ), तुलसी-दल (आवश्यक), पीले फूल, धूप-दीप, नैवेद्य (फल-पंजीरी-खीर)।
- मंत्र: «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» 108, विष्णु-सहस्रनाम/एकादशी-कथा (नीचे), «सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्, विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम्» — शयन-प्रार्थना।
- विष्णु-शयन (शाम/प्रदोष): विष्णु-प्रतिमा/शालिग्राम को पीले वस्त्र, पान-सुपारी-लौंग-इलायची, शय्या पर शयन कराना, चादर ओढ़ाना, दीप, आरती — «अब आप शयन करें, कार्तिक में जगाएँगे»; लक्ष्मी-पूजन साथ; कहीं इस दिन से विष्णु का चित्र ढँक देते हैं (देवउठनी तक)।
- चातुर्मास-संकल्प: विष्णु के आगे एक नियम — प्याज़-लहसुन/साग/दही/दूध का त्याग, रोज़ गीता-पाठ, तुलसी-दीप, ब्रह्मचर्य, भूमि-शयन, दान, मौन-घंटा — जो निभ सके; परिवार में एक-एक नियम बाँटें।
- तुलसी: चातुर्मास तुलसी-सेवा का काल — रोज़ जल-दीप, तुलसी-विवाह की तैयारी (कार्तिक); आज तुलसी को चुनरी, «तुलसी माता की जय»।
- व्रत-दिन: फलाहार (कुट्टू-सिंघाड़ा-साबूदाना-फल-दूध) या निर्जला; चावल-गेहूँ-दाल नहीं; दिन में सोना नहीं, रात जागरण/कीर्तन (हो सके तो); दान — अन्न-वस्त्र-छाता-जूता (वर्षा-ऋतु का दान)।
- द्वादशी (अगले दिन) पारण: ऊपर पारण-समय (द्वादशी में, हरि-वासर टालकर, सूर्योदय के बाद) — पहले तुलसी-जल, फिर ब्राह्मण/ग़रीब को भोजन, फिर स्वयं; चावल से पारण शुभ (एकादशी को चावल त्यागे, द्वादशी को ग्रहण)।
पूजा-सामग्री की सूची
विष्णु-शय्या, पीले वस्त्र, तुलसी, पान-सुपारी, फलाहार — देवशयनी की सूची।
- विष्णु-लक्ष्मी प्रतिमा/चित्र/शालिग्राम, शय्या (छोटा पलंग/चौकी), पीला-सफ़ेद कपड़ा, तकिया, चादर
- पीले वस्त्र (विष्णु के लिए), पीला चंदन, तिल/जौ (अक्षत की जगह — चावल नहीं), तुलसी-दल, पीले फूल (गेंदा-कनेर-कमल), माला
- पान, सुपारी, लौंग, इलायची (शयन-सामग्री), पंचामृत, गंगाजल, केसर
- धूप, दीपक, घी, कपूर, आरती-थाली, कलश, नारियल, आम के पत्ते
- नैवेद्य: फल (केला-आम-सेब), पंजीरी, साबूदाना-खीर, मखाना, मिठाई (चावल-रहित)
- तुलसी-चुनरी, तुलसी-दीप; एकादशी-कथा/विष्णु-सहस्रनाम पुस्तक
- दान: अन्न, वस्त्र, छाता, जूते (वर्षा), पीले वस्त्र-चना
- फलाहार: कुट्टू-सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, आलू, सेंधा नमक, फल, दूध
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
राजा मांधाता के राज्य में तीन वर्ष अकाल पड़ा; ऋषि अंगिरा ने बताया — «आषाढ़ शुक्ल पद्मा (देवशयनी) एकादशी का व्रत करो, विष्णु प्रसन्न होंगे»; राजा-प्रजा ने व्रत किया, वर्षा हुई, राज्य हरा-भरा — व्रत का फल राज्य-सुख, वर्षा, पाप-नाश। (भविष्योत्तर-पुराण — युधिष्ठिर को कृष्ण ने सुनाई)।
वामन-कथा: वामन ने बलि से तीन पग भूमि माँगी, दो पग में त्रिलोक; बलि ने सिर दिया — विष्णु ने उसे पाताल दिया और वचन के अनुसार उसके द्वार पर चार मास रहे (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी) — इसी को «विष्णु का शयन» कहते हैं; लक्ष्मी ने रक्षाबंधन पर बलि को राखी बाँधकर विष्णु को छुड़ाया (राखी-कथा में)।
शंखासुर-कथा: शंखासुर से युद्ध कर थके विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को क्षीरसागर में शेष-शय्या पर सोए, कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागे — इसीलिए चातुर्मास; सृष्टि इस अवधि में शिव-शक्ति (सावन-नवरात्र) के हाथ; देवउठनी पर विष्णु जागकर तुलसी-विवाह करते हैं।
फलाहार, साबूदाना-खिचड़ी, कुट्टू, पंजीरी — एकादशी की रसोई
एकादशी को चावल-गेहूँ-दाल वर्जित — फलाहार: साबूदाना, कुट्टू-सिंघाड़ा, आलू, मखाना, फल-दूध, सेंधा नमक; विष्णु का भोग पंजीरी-फल-साबूदाना-खीर (तुलसी सहित); द्वादशी का पारण चावल-दाल-सब्ज़ी से; महाराष्ट्र (आषाढ़ी) में साबूदाणा-खिचड़ी, वरीचे तांदूळ (समा-चावल), रताळे-कीस।
- साबूदाना-खिचड़ी (मूँगफली-आलू-सेंधा नमक), साबूदाना-वड़ा/खीर, समा (वरई) का भात-खीर
- कुट्टू/सिंघाड़े की पूड़ी-पकौड़ी, आलू-जीरा, अरबी, लौकी की सब्ज़ी (सेंधा नमक), दही
- फल (केला-सेब-आम-पपीता), दूध, मखाना-खीर, मेवे, नारियल-पानी; निर्जला रखने वाले — कुछ नहीं
- विष्णु-भोग: पंजीरी (धनिया/सूजी), फल, पेड़ा, केसर-दूध — तुलसी-दल के बिना विष्णु-भोग अधूरा
- महाराष्ट्र (आषाढ़ी): साबूदाणा-खिचड़ी, वरी-आमटी, रताळे (शकरकंद) का कीस, भगर; गुजरात (देवपोढ़ी): फराळी — साबूदाणा-वड़ा, मोरैयो, सिंगोड़ा-लोट; बंगाल (शयन): फल-दूध-लुची (कुछ घर)
- द्वादशी-पारण: चावल-दाल-सब्ज़ी, तुलसी-जल पहले; कद्दू/तोरई की सब्ज़ी (पारण में शुभ — कुछ रीत)
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
पंढरपुर की वारी, गुजरात की देवपोढ़ी, ओडिशा का हरिशयन, उत्तर की शयन-शय्या — चार मास की नींद के रूप।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- एकादशी-व्रत (चावल-अनाज नहीं), तुलसी-दल के साथ विष्णु-पूजा, शयन-विधि व प्रार्थना
- चातुर्मास का एक नियम-संकल्प — त्याग/पाठ/दान — देवउठनी तक निभाएँ
- पारण द्वादशी में ऊपर के समय पर (हरि-वासर टालकर), तुलसी-जल पहले
- वर्षा-ऋतु का दान — छाता, जूते, अन्न, वस्त्र; ब्राह्मण/ग़रीब-भोजन
- आज से विवाह-मुंडन-गृह-प्रवेश न रखें — देवउठनी के बाद; नियम-व्रत-कथा करते रहें
❌ क्या न करें
- एकादशी को चावल (और चावल से बनी चीज़ें), गेहूँ-दाल-बैंगन-मसूर; तामसिक भोजन
- एकादशी को तुलसी-पत्ता तोड़ना (दशमी को तोड़ लें); बाल-नाख़ून
- द्वादशी का पारण छोड़ना/त्रयोदशी तक खींचना; हरि-वासर में पारण
- चातुर्मास में विवाह-मुंडन-गृह-प्रवेश (अपवाद — पंडित की सलाह); नियम लेकर तोड़ना
- दिन में सोना, कलह, झूठ, दूसरों की निंदा — एकादशी को विशेष वर्जित
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
देवशयनी एकादशी 2027 में कब है और पारण कब?
ऊपर इस साल की आषाढ़ शुक्ल एकादशी की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) है; पारण अगले दिन द्वादशी में सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) टालकर — पंचांग पर सटीक पारण-समय मिला लें; द्वादशी दोपहर से पहले समाप्त हो तो सुबह जल्दी पारण।
चातुर्मास में क्या-क्या नहीं होता?
विवाह, सगाई (कुछ), मुंडन, यज्ञोपवीत, गृह-प्रवेश, नया व्यापार-आरंभ (कुछ) — देवउठनी एकादशी तक; पर नामकरण-अन्नप्राशन-वाहन-खरीद कुछ पंडित करने देते हैं; व्रत-जप-दान-तीर्थ-कथा-सत्संग के लिए चातुर्मास सबसे शुभ।
चातुर्मास का कौन-सा नियम लूँ?
जो निभ सके — श्रावण में पत्तेदार साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल का त्याग (परंपरा); या प्याज़-लहसुन-त्याग, रोज़ गीता का एक अध्याय, तुलसी-दीप, एक घंटा मौन, रोज़ कुछ दान, भूमि-शयन — एक भी सच्चे मन से पूरा करें; देवउठनी पर समापन-दान।
एकादशी को चावल क्यों नहीं?
पद्म-पुराण में एकादशी को अन्न (विशेषतः चावल) में पाप का वास; लोक-मान्यता — महर्षि मेधा का अंश चावल में (एकादशी के दिन); आयुर्वेद — पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार से पाचन-विश्राम; द्वादशी को चावल से पारण शुभ।
पंढरपुर की वारी क्या है?
महाराष्ट्र के वारकरी आळंदी (संत ज्ञानेश्वर) व देहू (संत तुकाराम) से पालखी लेकर 21 दिन पैदल (250 किमी) पंढरपुर पहुँचते हैं — आषाढ़ी एकादशी को विठ्ठल-दर्शन, चंद्रभागा-स्नान; लाखों लोग, दिंडियाँ, अभंग-कीर्तन — 700 साल पुरानी परंपरा; कार्तिकी एकादशी पर दूसरी वारी।
क्या स्त्रियाँ निर्जला रखें?
फलाहार पर्याप्त — शास्त्र में एकादशी फलाहार-व्रत; निर्जला केवल ज्येष्ठ की निर्जला एकादशी पर विशेष; गर्भवती, रोगी, बुज़ुर्ग फल-दूध लें; व्रत का सार चावल-त्याग, विष्णु-स्मरण व संयम है — भूख से कष्ट नहीं।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व संप्रदाय (स्मार्त/वैष्णव) की रीत सर्वोपरि है। पारण-समय पंचांग से मिला लें; स्वास्थ्य-स्थिति में निर्जला न रखें।
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