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🪔 व्रत-त्योहार

🌺 राधाष्टमी 2026

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी — जन्माष्टमी के 15 दिन बाद राधारानी का जन्मोत्सव (बरसाना): मध्याह्न अभिषेक, राधा-कृष्ण की युगल-पूजा, अरबी की सब्ज़ी-पूरी का भोग, सुहागिनों का व्रत (दांपत्य-सुख, प्रेम, संतान); तिथि, मुहूर्त, विधि, कथा व बरसाने की रीत।

राधाष्टमी 2026 की तिथि
शनिवार, 19 सितंबर 2026
भाद्रपद · शुक्ल पक्ष · अष्टमी (विक्रम संवत 2083)
🌅 सूर्योदय6:08 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:51 AM – 12:39 PM
📿 तिथि-कालअष्टमी 18 सितंबर, 1:01 PM → 19 सितंबर, 3:27 PM
🕉 ब्रह्म मुहूर्त04:32 AM – 05:20 AM
🪔 प्रदोष काल6:22 PM – 8:46 PM
⛔ राहुकाल (टालें)09:11 AM – 10:43 AM
अगले वर्ष — 2027: मंगलवार, 7 सितंबर 2027
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

**राधाष्टमी** भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को — कृष्ण-जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद — श्री **राधारानी** (वृषभानु-नंदिनी, कीर्ति-कुमारी) के जन्म का उत्सव है। बरसाना (मथुरा) में यह जन्माष्टमी से भी बड़ा पर्व है — मध्याह्न में लाड़लीजी का पंचामृत-अभिषेक, «राधे-राधे» की गूँज, लड्डू-लुटाना; वृंदावन, नाथद्वारा, वैष्णव मंदिरों और घरों में राधा-कृष्ण की युगल-पूजा। मान्यता है कि जन्माष्टमी का व्रत राधाष्टमी के बिना अधूरा है — जो कृष्ण को पाना चाहे, पहले राधा को पूजे।

घर की स्त्रियाँ (विशेषकर सुहागिनें) इस दिन व्रत रखती हैं — दांपत्य-प्रेम, पति-सुख, संतान और घर में लक्ष्मी (राधा = महालक्ष्मी-स्वरूपा) के लिए; अरबी (घुइयाँ) की सब्ज़ी-पूरी और खीर का भोग इस दिन की पहचान है। ऊपर तिथि व मध्याह्न-मुहूर्त; नीचे विधि, सामग्री, जन्म-कथा, भोग, बरसाना-वृंदावन-बंगाल की रीत और सवाल।

महत्व — यह व्रत क्यों

राधा-जन्म: पद्म-पुराण/ब्रह्मवैवर्त-पुराण के अनुसार वृषभानु गोप व कीर्ति की पुत्री राधा भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, मध्याह्न में प्रकट हुईं (बरसाना/रावल); कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति — जहाँ कृष्ण, वहाँ राधा; कृष्ण-नाम से पहले राधा-नाम («राधे-कृष्ण», «राधे-श्याम»)।

जन्माष्टमी की पूरक: शास्त्र-वचन — जो जन्माष्टमी का व्रत करके राधाष्टमी का न करे, उसे जन्माष्टमी का पूरा फल नहीं; राधाष्टमी का व्रत सब पापों का नाश, ब्रज-वास का फल; इसीलिए वैष्णव दोनों अष्टमियाँ मानते हैं।

सुहागिनों का व्रत: राधा प्रेम-भक्ति की देवी — व्रत से दांपत्य में प्रेम-सामंजस्य, पति-सुख, संतान; कन्याएँ मनचाहे वर हेतु; राधा महालक्ष्मी की स्वरूपा — घर में धन-धान्य; निःसंतान दंपति की संतान-कामना (राधा-कुंड की रीत)।

मध्याह्न-व्यापिनी: राधा का जन्म दोपहर में — इसलिए पूजा-अभिषेक मध्याह्न (अभिजित) में, व्रत का पारण अगले दिन; कुछ घर शाम को युगल-आरती-भोग के बाद फलाहार।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

राधाष्टमी की घरेलू विधि — सुबह संकल्प, मध्याह्न में राधा-कृष्ण का अभिषेक-श्रृंगार-भोग (ऊपर अभिजित), शाम आरती-कीर्तन; पारण अगले दिन (या रात फलाहार — घर की रीत)।

  1. सुबह: स्नान, स्वच्छ/नए वस्त्र (गुलाबी-पीला-लाल — राधा के रंग); पूजा-स्थान पर चौकी, गुलाबी/पीला कपड़ा, राधा-कृष्ण की युगल मूर्ति या चित्र (राधा को दाएँ — वाम-भाग की रीत मंदिरों में; घर में जैसा हो), फूलों की बंदनवार, कलश-स्थापना।
  2. संकल्प: «मैं (नाम) श्री राधारानी के जन्मोत्सव का व्रत (दांपत्य-सुख/संतान/भक्ति) हेतु रखती हूँ; मध्याह्न में पूजा, कल पारण» — जल छोड़ें; व्रत निर्जला/फलाहार/एक समय — सामर्थ्य से।
  3. मध्याह्न अभिषेक (अभिजित — ऊपर समय): राधा-कृष्ण की मूर्ति को पंचामृत (दूध-दही-घी-शहद-चीनी), फिर केसर-जल/गुलाब-जल, फिर शुद्ध जल से स्नान; «ॐ ह्रीं श्री राधिकायै नमः» / «ॐ श्री राधाकृष्णाभ्यां नमः» / राधा-गायत्री; शंख-घंटी, «राधे-राधे» का जयघोष।
  4. श्रृंगार: राधा को नए वस्त्र (लहँगा-चुनरी — गुलाबी/लाल), आभूषण, फूलों की माला (गुलाब-चमेली-कमल), मुकुट, नथ-बिंदी-सिंदूर-मेहँदी (सुहागिनें — सुहाग-सामग्री राधारानी को), कृष्ण को पीतांबर-मोरपंख-वंशी; चंदन-केसर तिलक; इत्र-गुलाब-जल।
  5. पूजन: धूप, घी-दीप, फूल, अक्षत-रोली, पान-सुपारी, तुलसी-दल (कृष्ण को; राधा को नहीं — कुछ रीत), 16 वस्तुओं का श्रृंगार (कुछ घर); राधा-सहस्रनाम/राधा-कृपा-कटाक्ष स्तोत्र/राधा-चालीसा पाठ; «राधा-नाम» की माला (108)।
  6. भोग: अरबी (घुइयाँ) की सब्ज़ी + पूरी, खीर, मालपुआ, रबड़ी, माखन-मिश्री, फल, पंचामृत, लड्डू (बूँदी), पेड़ा — राधा-कृष्ण को; तुलसी-दल कृष्ण के भोग में; भोग के बाद युगल-आरती (कपूर) — «आरती श्री राधा-कृष्ण की» / «श्री राधा-कृपा-कटाक्ष»।
  7. कथा-कीर्तन: राधा-जन्म की कथा (नीचे), राधा-कृष्ण के भजन-कीर्तन («राधे-राधे», «श्री राधे गोविंदा»), राधा-नाम-संकीर्तन; झूला/पालना (लाड़लीजी को पालने में झुलाना — कुछ घर, जन्माष्टमी की तरह)।
  8. शाम-रात: संध्या-आरती, दीप-दान, कीर्तन; फलाहार (व्रती) या अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण — अरबी-पूरी/खीर से; प्रसाद (लड्डू) बाँटना; सुहागिनों को सुहाग-सामग्री/दक्षिणा (श्रद्धानुसार)।

पूजा-सामग्री की सूची

राधा-कृष्ण की युगल-पूजा, राधा का श्रृंगार, अरबी-पूरी-खीर का भोग — राधाष्टमी की सूची।

  • राधा-कृष्ण की युगल मूर्ति/चित्र, चौकी, गुलाबी-पीला कपड़ा, कलश (जल-आम-पत्ते-नारियल), फूलों की बंदनवार, झूला/पालना (वैकल्पिक)
  • अभिषेक: पंचामृत (दूध-दही-घी-शहद-चीनी), केसर-जल, गुलाब-जल, गंगाजल, शंख, कपड़ा (पोंछने को)
  • राधा-श्रृंगार: लहँगा-चुनरी/नए वस्त्र (गुलाबी-लाल), आभूषण, मुकुट, नथ-बिंदी-सिंदूर-मेहँदी-चूड़ी (सुहाग-सामग्री), फूल-माला (गुलाब-चमेली-कमल), इत्र; कृष्ण को पीतांबर-मोरपंख-वंशी-माला
  • पूजन: चंदन-केसर, रोली, अक्षत, धूप, घी-दीप, कपूर, आरती-थाली, घंटी, पान-सुपारी-लौंग-इलायची, तुलसी-दल (कृष्ण), 16 श्रृंगार-वस्तुएँ (कुछ घर)
  • भोग: अरबी (घुइयाँ), पूरी का आटा, खीर (चावल-दूध), मालपुआ, रबड़ी, माखन-मिश्री, बूँदी-लड्डू, पेड़ा, फल (केला-सेब-अनार), मेवा
  • पाठ: राधा-सहस्रनाम, राधा-कृपा-कटाक्ष स्तोत्र, राधा-चालीसा, राधाष्टमी-कथा, भजन-पुस्तिका; माला (तुलसी/चंदन)
  • दान: सुहागिनों को सुहाग-सामग्री, कन्या/ब्राह्मण-दक्षिणा, गोशाला-दान, वस्त्र (श्रद्धानुसार)

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व्रत-कथा

राधा-जन्म की कथा: वृषभानु गोप (बरसाना/रावल के राजा) व उनकी पत्नी कीर्ति निःसंतान थे; एक दिन यमुना में स्नान करते वृषभानु को कमल-पुष्प पर तेजोमयी कन्या मिली — पर उसकी आँखें बंद थीं। नारद मुनि ने बताया — «यह साक्षात् लक्ष्मी-स्वरूपा, श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है; जब तक अपने प्रियतम को न देखेगी, आँखें न खोलेगी।» वर्षों बाद नंदबाबा-यशोदा बालक कृष्ण को लेकर वृषभानु-घर आए — शिशु कृष्ण के सामने आते ही राधा ने पहली बार आँखें खोलीं, कृष्ण को देखा। तभी से राधा-कृष्ण अभिन्न; राधा का यह प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, मध्याह्न — राधाष्टमी।

ब्रह्मवैवर्त-पुराण: गोलोक में राधा कृष्ण की सहचरी — श्रीदामा के शाप से पृथ्वी पर वृषभानु-पुत्री रूप में अवतार; रावल में जन्म, बरसाना में लीला; कृष्ण से आयु में बड़ी (लोक-मान्यता 11 माह); उनका विवाह भांडीर-वन में ब्रह्मा द्वारा (राधा-कृष्ण की गुप्त परिणय-कथा) — इसलिए दांपत्य-प्रेम की देवी।

व्रत-माहात्म्य: नारद-पुराण/पद्म-पुराण में राधाष्टमी-व्रत — «जो राधाष्टमी का व्रत करता है, वह ब्रज के रहस्य को जानता है, उसके सब पाप नष्ट होते हैं»; जन्माष्टमी व राधाष्टमी दोनों करने से पूर्ण फल; बरसाना में इस दिन लाड़लीजी के दर्शन-मात्र से मनोकामना-पूर्ति की मान्यता।

अरबी की सब्ज़ी-पूरी, खीर, मालपुआ-रबड़ी, माखन-मिश्री; व्रत फलाहार/निर्जला

राधाष्टमी का भोग जन्माष्टमी जैसा ही समृद्ध — पर अरबी (घुइयाँ) की सब्ज़ी-पूरी इस दिन की विशेष रीत (ब्रज-मथुरा); खीर, मालपुआ, रबड़ी, माखन-मिश्री, बूँदी-लड्डू; बरसाना में छप्पन-भोग व लड्डू-लुटाई। व्रती दिन में फलाहार/निर्जला, पारण अगले दिन अरबी-पूरी/खीर से; प्याज़-लहसुन-माँस नहीं।

  • भोग: अरबी (घुइयाँ) की सूखी/रसेदार सब्ज़ी (अजवाइन-हींग — बिना प्याज़), पूरी, चावल की खीर, मालपुआ, रबड़ी, माखन-मिश्री, बूँदी-लड्डू, पेड़ा, पंचामृत, फल, मेवा
  • फलाहार (व्रती): फल, दूध, साबूदाना-खीर/खिचड़ी, सिंघाड़े-कुट्टू की पूरी, आलू-अरबी (सेंधा नमक), मखाना-खीर, पंचामृत
  • पारण (अगले दिन): अरबी-पूरी, खीर, दही — सूर्योदय के बाद; प्रसाद घर-पड़ोस को
  • बरसाना-वृंदावन: छप्पन-भोग, लड्डू-लुटाई (मंदिर की छत से), राधा-कुंड में मालपुआ-खीर का भोग, बंगाल में «राधाष्टमी की खिचड़ी» व पायेस (खीर)
  • वर्जित: प्याज़-लहसुन-माँस-मद्य, अन्न (व्रती — फलाहार), कृष्ण-भोग बिना तुलसी

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

बरसाना-वृंदावन-नाथद्वारा का उत्सव-रूप, बंगाल-ओडिशा का वैष्णव-रूप, उत्तर के घरों का सुहागिन-व्रत — राधाष्टमी की रीतें।

बरसाना-मथुरा-वृंदावन (ब्रज): लाड़लीजी मंदिर (बरसाना) में मध्याह्न अभिषेक, राधा के जन्मोत्सव पर छत से लड्डू-लुटाई, «राधे-राधे» का मेला, बधाई-गान; रावल (राधा-जन्मस्थान) में उत्सव; वृंदावन में बाँके-बिहारी/राधावल्लभ/राधारमण में दर्शन, राधा-कुंड की परिक्रमा (निःसंतान दंपति की अहोई-अष्टमी की रीत यहीं); अरबी-पूरी का भोग; जन्माष्टमी से बड़ा उत्सव — पूरा ब्रज।
उत्तर प्रदेश-दिल्ली-हरियाणा-राजस्थान (घर): सुहागिनों का व्रत — राधा-कृष्ण की युगल-पूजा, राधा को सुहाग-सामग्री, अरबी-पूरी-खीर; कन्याएँ मनचाहे वर हेतु; नाथद्वारा (राजस्थान) में श्रीनाथजी-राधा का मनोरथ, गुलाबी पोशाक; जयपुर गोविंददेवजी में राधाष्टमी-झाँकी।
बंगाल-ओडिशा (वैष्णव): गौड़ीय मठों में «राधाष्टमी» — राधारानी का अभिषेक, कीर्तन-नगर-संकीर्तन, खिचड़ी-पायेस का भोग; इस्कॉन (मायापुर) में महोत्सव; ओडिशा में जगन्नाथ-मंदिर की राधाष्टमी-सेवा, «राधा-दामोदर» पूजा; बंगाल में व्रत-कथा «राधाष्टमी ब्रत»।
महाराष्ट्र-गुजरात-दक्षिण: पंढरपुर-द्वारका के मंदिरों में राधा-कृष्ण श्रृंगार; इस्कॉन/हरे-कृष्ण मंदिरों (बेंगलुरु, चेन्नई, मुंबई) में राधाष्टमी-महोत्सव — अभिषेक, 108 व्यंजन-भोग, कीर्तन; घरों में गुजराती-मारवाड़ी वैष्णव परिवार व्रत-पूजा।
बिहार-झारखंड: राधाष्टमी को राधा-कृष्ण की पूजा, मिथिला में सुहागिनों का व्रत व «राधा-अष्टमी» गीत; अरबी की सब्ज़ी, खीर-पूरी; वैष्णव परंपरा में जन्माष्टमी-राधाष्टमी दोनों का उपवास।
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दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • मध्याह्न (अभिजित — ऊपर समय) में राधा-कृष्ण का पंचामृत-अभिषेक, नए वस्त्र-श्रृंगार, «राधे-राधे» जयघोष
  • अरबी-पूरी, खीर, मालपुआ, माखन-मिश्री का भोग; तुलसी कृष्ण को; युगल-आरती; राधा-नाम/स्तोत्र पाठ, कीर्तन
  • सुहागिनें: राधा को सुहाग-सामग्री, दांपत्य-प्रेम की प्रार्थना; कन्याएँ वर-कामना; निःसंतान: राधा-कुंड/राधा-पूजा
  • जन्माष्टमी किया हो तो राधाष्टमी अवश्य — फल पूर्ण; व्रत सामर्थ्य से (फलाहार/एक समय), पारण अगले दिन
  • बीमार/गर्भवती: व्रत की जगह पूजा-भोग-कीर्तन; दान-दक्षिणा (सुहागिन/कन्या/गोशाला)

❌ क्या न करें

  • राधा को केवल कृष्ण की सहचरी मानकर उपेक्षा — वैष्णव-मत में राधा प्रधान (राधा-कृष्ण, कृष्ण-राधा नहीं)
  • प्याज़-लहसुन-माँस-मद्य; राधा-कृष्ण को बासी/जूठा भोग; कृष्ण-भोग बिना तुलसी (राधा को तुलसी न चढ़ाने की कुछ रीत — मत भिन्न)
  • व्रत के नाम पर निर्जला की कठोरता बीमार/गर्भवती पर; बच्चों को भूखा रखना
  • राधा-नाम बिना कृष्ण-पूजा (लोक-नियम «राधे-कृष्ण»), श्रृंगार में चमड़ा, पूजा में क्रोध-कलह (प्रेम की देवी)
  • राधाष्टमी को जन्माष्टमी की जगह मानना — दोनों अलग; राधाष्टमी 15 दिन बाद

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

राधाष्टमी 2026 में कब है?

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी — ऊपर तिथि (दिल्ली), जन्माष्टमी के 15 दिन बाद; मध्याह्न-व्यापिनी अष्टमी मान्य; अभिजित-मुहूर्त में अभिषेक; तिथि-खिड़की ऊपर।

राधाष्टमी का व्रत कैसे रखें?

सुबह संकल्प, दिन में फलाहार/निर्जला (सामर्थ्य), मध्याह्न में राधा-कृष्ण का अभिषेक-श्रृंगार-भोग (अरबी-पूरी-खीर), राधा-स्तोत्र/नाम-जप, शाम आरती-कीर्तन; पारण अगले दिन सूर्योदय बाद (कुछ घर उसी रात फलाहार)।

अरबी की सब्ज़ी क्यों?

ब्रज-मथुरा की रीत — राधाष्टमी पर अरबी (घुइयाँ) की सब्ज़ी-पूरी का भोग व पारण; लोक-कारण: भाद्रपद में अरबी की नई फ़सल, व्रत-अन्न (कंद) के रूप में मान्य; कुछ घर खीर-मालपुआ मुख्य रखते हैं।

राधाष्टमी और जन्माष्टमी में अंतर व संबंध?

जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (कृष्ण-जन्म, मध्यरात्रि); राधाष्टमी भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (राधा-जन्म, मध्याह्न) — 15 दिन बाद; शास्त्र-मत: जन्माष्टमी का व्रत राधाष्टमी के व्रत से पूर्ण होता है।

सुहागिनें/कन्याएँ यह व्रत क्यों?

राधा प्रेम व दांपत्य-सामंजस्य की देवी — सुहागिनें पति-प्रेम, घर की लक्ष्मी व संतान हेतु; कन्याएँ मनचाहे वर हेतु; राधा को सुहाग-सामग्री (चूड़ी-सिंदूर-चुनरी) चढ़ाने की रीत।

राधा को तुलसी चढ़ाते हैं या नहीं?

तुलसी कृष्ण (विष्णु) के भोग में; कुछ वैष्णव-रीत में राधा-कृष्ण दोनों के भोग में तुलसी, कुछ में राधा को नहीं (तुलसी-वृंदा प्रसंग) — कुल/मंदिर की रीत मानें; फूल-माला (गुलाब-कमल) राधा को अवश्य।

बरसाना में राधाष्टमी कैसे मनती है?

लाड़लीजी मंदिर में मध्याह्न अभिषेक, बधाई-गान, छत से लड्डू-लुटाई, «राधे-राधे» का मेला, रावल-जन्मस्थान पर उत्सव, राधा-कुंड की परिक्रमा; भक्त पूरे ब्रज से आते हैं — जन्माष्टमी से बड़ा पर्व; घर से जाना संभव न हो तो घर पर वही भाव से युगल-पूजा।

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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व पुराण/लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार, संप्रदाय व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। तिथि दिल्ली (IST) की मध्याह्न-व्यापिनी अष्टमी से; स्वास्थ्य-स्थिति में निर्जला न रखें।

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