💛 बृहस्पतिवार (गुरुवार) व्रत 2026
अगला गुरुवार — बृहस्पति देव व भगवान विष्णु का वार: 16 गुरुवार का व्रत, पीले वस्त्र-पीला भोजन, केले के पेड़ की पूजा, चने की दाल-गुड़; विवाह, संतान, विद्या, गुरु-दोष व धन के लिए; केला-पूजा और बाल न धोने की रीत नीचे।
- गुरुवार (भाद्रपद शुक्ल पक्ष) — गुरुवार, 24 सितंबर 2026
- गुरुवार (आश्विन कृष्ण पक्ष) — गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026
- गुरुवार (आश्विन कृष्ण पक्ष) — गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026
- गुरुवार (आश्विन शुक्ल पक्ष) — गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
- गुरुवार (आश्विन शुक्ल पक्ष) — गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
- गुरुवार (कार्तिक कृष्ण पक्ष) — गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
- गुरुवार (कार्तिक कृष्ण पक्ष) — गुरुवार, 5 नवंबर 2026
- गुरुवार (कार्तिक शुक्ल पक्ष) — गुरुवार, 12 नवंबर 2026
- गुरुवार (कार्तिक शुक्ल पक्ष) — गुरुवार, 19 नवंबर 2026
- गुरुवार (मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष) — गुरुवार, 26 नवंबर 2026
- गुरुवार (मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष) — गुरुवार, 3 दिसंबर 2026
- गुरुवार (मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष) — गुरुवार, 10 दिसंबर 2026
गुरुवार देवगुरु **बृहस्पति** और भगवान विष्णु का वार है। स्त्रियों में यह व्रत विवाह में विलंब, अच्छे वर, संतान-सुख, पति की उन्नति और घर में गुरु-कृपा (विद्या-विवेक-धन) के लिए रखा जाता है — 16 गुरुवार (कुछ घर 7 या 21), पीले वस्त्र, पीले फूल, चने की दाल और गुड़ का भोग, केले के पेड़ की जड़ में जल-हल्दी और बृहस्पति-कथा। इस दिन बाल न धोने, न कटवाने, पीला ही खाने और नमक-रहित/एक समय भोजन की लोक-रीत है।
कुंडली में गुरु कमज़ोर हो (विवाह-बाधा, संतान-विलंब, शिक्षा में रुकावट) तो ज्योतिष में गुरुवार-व्रत, पीले दान, «ॐ बृं बृहस्पतये नमः» और केला-पूजन उपाय माने जाते हैं। ऊपर आने वाले गुरुवार (माह-पक्ष सहित); नीचे पूरी विधि, सामग्री, कथा, भोग, रीत और सवाल।
महत्व — यह व्रत क्यों
बृहस्पति: देवताओं के गुरु, ज्ञान-धर्म-न्याय-संतान-विवाह-धन के कारक, पीला रंग, स्वर्ण, चना, हल्दी, केसर इनके प्रिय; ज्योतिष में गुरु शुभ हो तो शिक्षा-विवाह-संतान-मान सहज, निर्बल/पीड़ित हो तो इन्हीं में बाधा — गुरुवार-व्रत, पीली वस्तुएँ, गुरु-मंत्र, केले की पूजा व ब्राह्मण/गुरु-सेवा शांति-उपाय।
विष्णु-वार: गुरुवार भगवान विष्णु (नारायण) का दिन — पीले वस्त्र, पीतांबर, केसर-हल्दी का तिलक, «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय»; दक्षिण भारत व महाराष्ट्र में गुरुवार साईं-बाबा व दत्तात्रेय का भी वार।
केला: बृहस्पति का वृक्ष (विष्णु-प्रिय) — केले के पेड़ में जल-हल्दी-चने की दाल चढ़ाकर उसकी परिक्रमा; घर में केले का पेड़ न हो तो मंदिर/पड़ोस का; गमले में लगाने का चलन बढ़ा है।
कन्याओं का व्रत: विवाह-विलंब में 16 गुरुवार का यह व्रत उत्तर भारत में सबसे प्रचलित उपाय — पीले वस्त्र में पूजा, बृहस्पति-कथा, चने की दाल-गुड़ का प्रसाद, बाल न धोना — मान्यता है कि गुरु-कृपा से योग्य वर मिलता है।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
बृहस्पतिवार व्रत की घरेलू विधि — शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से आरंभ, 16 (या 7/21) गुरुवार, अंत में उद्यापन; पूजा सुबह, फिर केले के पेड़ पर।
- सुबह: स्नान (बाल न धोएँ — व्रत-दिन), पीले वस्त्र; पूजा-स्थान पर पीला कपड़ा, बृहस्पति देव/विष्णु का चित्र (पीले फूल-हल्दी से सजाकर); कलश में जल।
- संकल्प: «मैं (नाम) 16 गुरुवार बृहस्पति देव का व्रत (कामना: विवाह/संतान/विद्या/धन) हेतु रखूँगी; एक समय पीला भोजन, बाल नहीं धोऊँगी» — जल छोड़ें।
- पूजन: हल्दी-केसर का तिलक, पीले फूल (गेंदा/चंपा/पीला गुलाब), पीला चंदन, अक्षत (हल्दी-रँगे), पीला वस्त्र; भोग — भीगी/उबली चने की दाल, गुड़, केला, बेसन-लड्डू/पीली मिठाई; घी का दीपक, धूप; «ॐ बृं बृहस्पतये नमः» 108 बार या «ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः»; विष्णु-सहस्रनाम/«ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» (हो सके तो)।
- केले के पेड़ की पूजा: जड़ में जल (कलश का), हल्दी, चने की दाल, गुड़, पीला फूल, कच्चा सूत (मौली) लपेटना, घी का दीपक; 3/7 परिक्रमा, बृहस्पति देव से प्रार्थना; केले का पेड़ घर में न हो तो मंदिर का, या गमले का — या केवल केले के फल की पूजा।
- कथा: बृहस्पतिवार व्रत-कथा (नीचे — राजा और रानी/साहूकार की कथा) पढ़ें-सुनें; कथा के बाद आरती «ॐ जय बृहस्पति देवा…» व विष्णु-आरती; प्रसाद (चना-दाल-गुड़-केला) बाँटें।
- व्रत-भोजन: एक समय — पीला भोजन: चने की दाल, बेसन की रोटी/पूड़ी, पीले चावल (हल्दी/केसर), बेसन-लड्डू, केला, आम-पपीता; कई घर नमक-रहित, कई सेंधा नमक; फलाहार भी चलता है (केला मुख्य)।
- दान: पीली वस्तुएँ — चने की दाल, हल्दी, गुड़, केला, पीला वस्त्र, पीतल, पुस्तक-कलम (विद्यार्थियों को), केसर; ब्राह्मण/गुरु/शिक्षक को भोजन-दक्षिणा।
- उद्यापन (16वाँ गुरुवार): वही पूजा; 16 केले, 16 लड्डू, पीला वस्त्र, चने की दाल-गुड़ ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को; 3/5/7 कन्याओं या ब्राह्मणों को पीला भोजन (चना-दाल, बेसन-पूड़ी, पीले चावल, केला-लड्डू); कथा-आरती; केले के पेड़ पर पीला वस्त्र-सूत।
पूजा-सामग्री की सूची
पीला ही पीला — चने की दाल, गुड़, केला, हल्दी, पीले फूल-वस्त्र; केले के पेड़ की पूजा की अलग सूची।
- बृहस्पति देव/भगवान विष्णु का चित्र, पीला कपड़ा, चौकी, कलश (जल), पीले वस्त्र (व्रत रखने वाले के)
- चने की दाल (भीगी/उबली), गुड़, केला (5/11), बेसन-लड्डू/पीली मिठाई (केसर-पेड़ा), आम-पपीता (ऋतु से)
- हल्दी, केसर, पीला चंदन, हल्दी-रँगे अक्षत, कच्चा सूत/मौली, पीले फूल (गेंदा, चंपा, पीला गुलाब), माला
- घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर, आरती-थाली, घंटी; बृहस्पति-कथा व आरती की पुस्तक
- केले के पेड़ की पूजा: कलश-जल, हल्दी, चना-दाल, गुड़, पीला फूल, मौली, दीपक; गमले का केला (न हो तो मंदिर)
- दान: चने की दाल, हल्दी, गुड़, केला, पीला वस्त्र, पीतल का बर्तन, केसर, पुस्तक-कलम; पुखराज (केवल कुंडली-जाँच से)
- उद्यापन: 16 केले, 16 लड्डू, पीला वस्त्र, चना-दाल-गुड़; 3/5/7 ब्राह्मण/कन्याओं का पीला भोजन, दक्षिणा
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बृहस्पतिवार व्रत-कथा: एक राजा दानी-धर्मात्मा था — हर गुरुवार व्रत रखता, दान करता; पर रानी को दान से चिढ़ थी — «राजा सब लुटा देंगे»। एक गुरुवार राजा शिकार गया, बृहस्पति देव साधु-रूप में रानी से भिक्षा माँगने आए; रानी बोली — «मुझे दान-पुण्य से घृणा है, कोई उपाय बताइए जिससे यह धन नष्ट हो जाए।» साधु ने समझाया — «संतान, धन, सुख — सब दान-पुण्य से मिलता है», पर रानी न मानी। तब साधु बोले — «गुरुवार को घर लीपना, बाल धोना, पीला वस्त्र न पहनना, चने की दाल न खाना — सात गुरुवार ऐसा करो, धन नष्ट हो जाएगा।»
रानी ने वही किया — तीसरे गुरुवार तक राज-लक्ष्मी चली गई; राजा-रानी दरिद्र हुए, अन्न को तरसे; राजा परदेस में लकड़ी काटकर पेट भरने लगा। दासी के कहने पर रानी ने पड़ोस से चने की दाल माँगी, बृहस्पति-कथा सुनी, पर विधि में फिर भूल हुई। अंत में साधु-रूप में बृहस्पति देव फिर आए; रानी ने क्षमा माँगी, विधिवत गुरुवार-व्रत आरंभ किया — पीले वस्त्र, चने की दाल-गुड़, केले की पूजा, कथा, दान। परदेस में राजा को भी स्वप्न से व्रत की प्रेरणा हुई; उसने व्रत किया — लकड़ी बेचते समय एक दिन उसे भरा हुआ ख़ज़ाना मिला, राज्य लौटा, रानी ने दान-धर्म का व्रत अपनाया और घर में बृहस्पति-कृपा स्थायी हुई। सीख — गुरुवार व्रत, पीला दान और बाल न धोना/घर न लीपना का नियम इसी कथा से है; दान-धर्म से ही लक्ष्मी टिकती है।
दूसरी कथा (साहूकार-पुत्र): एक साहूकार का पुत्र गुरुवार-व्रत छोड़ने से विपत्ति में पड़ा, पत्नी ने 16 गुरुवार व्रत कर केले की पूजा की — पति जेल से छूटा, व्यापार लौटा। इसे भी घरों में सुनाया जाता है।
चने की दाल-गुड़, केला, बेसन-लड्डू; एक समय पीला भोजन
बृहस्पति को पीला प्रिय — भोग में भीगी/उबली चने की दाल, गुड़, केला, बेसन-लड्डू या केसर-पेड़ा। व्रत-भोजन एक समय पीला: चने की दाल, बेसन-पूड़ी/रोटी, हल्दी-केसर के चावल, केला-आम-पपीता; कई घर नमक-रहित (गुड़-मीठा), कई सेंधा नमक; लहसुन-प्याज़-माँस नहीं।
- भोग: भीगी चने की दाल + गुड़ (या उबली दाल में गुड़-घी), केला, बेसन-लड्डू, केसर-पेड़ा/बूँदी, पीली बर्फ़ी, पंचमेवा; केले के पेड़ को चना-दाल-गुड़
- व्रत-थाली: चने की दाल (बिना प्याज़-लहसुन, हल्दी), बेसन की पूड़ी/मिस्सी रोटी, पीले चावल (हल्दी/केसर), आलू-हल्दी सब्ज़ी (कुछ), कढ़ी (बिना दही — कुछ घर नहीं), खीर-केसर
- फलाहार: केला, आम, पपीता, चीकू, दूध-केसर, बेसन-लड्डू; बिना नमक/सेंधा — घर की रीत
- उद्यापन-भोजन (3/5/7 ब्राह्मण/कन्याएँ): चना-दाल, बेसन-पूड़ी, पीले चावल, केला, लड्डू, केसर-खीर
- वर्जित: बाल धोना/कटवाना, घर लीपना-पोंछना (कथा-नियम), खिचड़ी/केला खाना (केवल पूजा-भोग — कुछ घर), माँस-मद्य-लहसुन-प्याज़
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
उत्तर-मध्य भारत का घर-घर का व्रत — केला-पूजा, पीला भोजन, बाल न धोना लगभग सब जगह; दक्षिण-महाराष्ट्र में गुरुवार साईं/दत्त का।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से 16 (या 7/21) गुरुवार; पीले वस्त्र, पीला भोजन, केले की पूजा, कथा-आरती
- «ॐ बृं बृहस्पतये नमः» 108; चना-दाल, हल्दी, गुड़, केला, पीला वस्त्र, पुस्तक-कलम का दान; गुरु/शिक्षक/बुज़ुर्ग की सेवा
- उद्यापन 16वें गुरुवार: 16 केले-लड्डू, ब्राह्मण/कन्या पीला भोजन; केले पर पीला वस्त्र-सूत
- विवाह-कामना: कथा + केला-पूजा + पीला दान — साथ में कुंडली से गुरु की स्थिति जँचवाएँ
- बीमार/गर्भवती: व्रत की जगह पूजा-कथा-दान; बाल-धोने का नियम स्वास्थ्य से ऊपर नहीं
❌ क्या न करें
- गुरुवार को बाल धोना/कटवाना, नाख़ून, घर लीपना-झाड़ू (कथा-नियम — लोक-मान्यता), कपड़े धोना (कुछ घर)
- केला खाना (व्रत-दिन — कुछ घर केवल भोग; मत भिन्न), खिचड़ी, माँस-मद्य-लहसुन-प्याज़
- पुखराज/गुरु-रत्न बिना कुंडली-जाँच; गुरु-निंदा, बुज़ुर्ग-शिक्षक का अपमान (गुरु-दोष)
- 16 गुरुवार अधूरे पर उद्यापन; व्रत के नाम पर कन्या/बीमार को कष्ट
- केले के पेड़ को काटना/जड़ में गंदा जल; पूजा के बाद केला फेंकना — गाय को दें
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अगला गुरुवार व्रत कब और 2026 में गुरुवार कब-कब?
ऊपर सूची में आने वाले 12 गुरुवार माह-पक्ष सहित; आरंभ शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से (पौष-मास में आरंभ न करें — लोक-नियम; अधिक मास/पितृपक्ष में भी नहीं; चलता व्रत जारी)।
गुरुवार को बाल क्यों नहीं धोते?
बृहस्पति-कथा में रानी को धन-नाश के लिए यही बताया गया — गुरुवार को बाल धोना, घर लीपना, पीला त्यागना; इसलिए लोक-मान्यता में गुरुवार को बाल धोना/कटवाना और घर लीपना वर्जित है (विशेषकर व्रत-दिन)। ज्योतिष-शास्त्र में यह विधान नहीं, लोक-रीत है — कुल-रीत मानें।
व्रत में क्या खाएँ — नमक चलता है?
एक समय पीला भोजन — चने की दाल, बेसन-पूड़ी, पीले चावल, केला-आम; कई घर नमक-रहित (गुड़-मीठा), कई सेंधा — कुल-रीत; फलाहार भी। केला भोग का है — कुछ घर व्रत-दिन स्वयं नहीं खाते।
केले का पेड़ न हो तो पूजा कैसे?
मंदिर/पड़ोस के केले पर, या गमले में केला लगाकर (शुभ माना जाता है); न हो तो केले के फल व बृहस्पति-चित्र की पूजा — जल-हल्दी-चना-दाल चढ़ाएँ।
विवाह में देरी — यह व्रत कैसे करें?
कन्या 16 गुरुवार पीले वस्त्र में बृहस्पति-पूजा, केला-पूजा, चना-दाल-गुड़ भोग, कथा, पीला दान; साथ में कुंडली में गुरु/सप्तम भाव की जाँच (मांगलिक/गुरु-दोष) — केवल व्रत पर निर्भर न रहें।
कितने गुरुवार, उद्यापन कब?
16 सामान्य (कुछ 7 या 21); 16वें गुरुवार उद्यापन — 16 केले-लड्डू, पीला वस्त्र, चना-दाल-गुड़ दान, 3/5/7 ब्राह्मण/कन्या पीला भोजन, कथा-आरती।
पुरुष रख सकते हैं? गुरु-दोष क्या?
हाँ — विद्या-नौकरी-धन-संतान हेतु पुरुष भी; गुरु-दोष = कुंडली में गुरु नीच/अस्त/6-8-12 भाव या पीड़ित — विवाह-शिक्षा-संतान में बाधा की मान्यता; उपाय गुरुवार-व्रत, पीला दान, गुरु-मंत्र, गुरु-सेवा; रत्न पंडित-सलाह से।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता (बृहस्पति-कथा) पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। गुरु-दोष/रत्न ज्योतिष-मान्यता है — कुंडली-जाँच व पंडित-सलाह के बिना रत्न न पहनें; स्वास्थ्य-स्थिति में व्रत न रखें।
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