Nakshtra Takकुंडलीराशिफलपंचांगमिलानज्ञानग्रह-फलज्योतिषीStore
🪔 व्रत-त्योहार

🌸 शुक्रवार व्रत (संतोषी माता) 2026

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

अगला शुक्रवार — संतोषी माता का 16 शुक्रवार व्रत: गुड़-चने का प्रसाद, कथा, खट्टा वर्जित; घर में सुख-संतोष, विवाह, संतान व धन-हानि की पूर्ति के लिए; ऊपर आने वाले शुक्रवार, नीचे पूरी विधि-कथा-उद्यापन।

अगली शुक्रवार व्रत (संतोषी माता)
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026
शुक्रवार (भाद्रपद शुक्ल पक्ष)
भाद्रपद · शुक्ल पक्ष · चतुर्दशी (विक्रम संवत 2083)
🌅 सूर्योदय6:11 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:48 AM – 12:36 PM
🪔 प्रदोष काल6:14 PM – 8:38 PM
⛔ राहुकाल (टालें)10:42 AM – 12:12 PM
आने वाली तिथियाँ
  • शुक्रवार (भाद्रपद शुक्ल पक्ष) — शुक्रवार, 25 सितंबर 2026
  • शुक्रवार (आश्विन कृष्ण पक्ष) — शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026
  • शुक्रवार (आश्विन कृष्ण पक्ष) — शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026
  • शुक्रवार (आश्विन शुक्ल पक्ष) — शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
  • शुक्रवार (आश्विन शुक्ल पक्ष) — शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
  • शुक्रवार (कार्तिक कृष्ण पक्ष) — शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
  • शुक्रवार (कार्तिक कृष्ण पक्ष) — शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
  • शुक्रवार (कार्तिक शुक्ल पक्ष) — शुक्रवार, 13 नवंबर 2026
  • शुक्रवार (कार्तिक शुक्ल पक्ष) — शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
  • शुक्रवार (मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष) — शुक्रवार, 27 नवंबर 2026
  • शुक्रवार (मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष) — शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026
  • शुक्रवार (मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष) — शुक्रवार, 11 दिसंबर 2026
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

शुक्रवार माँ लक्ष्मी, संतोषी माता और शुक्र-ग्रह का वार है। उत्तर भारत के घरों में स्त्रियों का सबसे प्रचलित साप्ताहिक व्रत **संतोषी माता का शुक्रवार व्रत** है — लगातार 16 शुक्रवार, गुड़ और भुने चने का प्रसाद, व्रत-कथा, और सबसे कड़ा नियम: व्रत के दिन घर में कोई भी खट्टा (नींबू, इमली, अचार, दही, टमाटर) न खाए, न किसी को खिलाए। संतोषी माता गणेशजी की पुत्री मानी जाती हैं — «संतोष» की देवी, जो थोड़े में बरकत और कलह में शांति देती हैं।

इसी वार पर **वैभव लक्ष्मी व्रत** (गुजरात-महाराष्ट्र से चला, अब सब जगह) भी रखा जाता है — वह अलग पन्ने पर है। ऊपर आने वाले शुक्रवार की सूची है (माह-पक्ष सहित); नीचे संतोषी माता व्रत की पूरी विधि, सामग्री, कथा, प्रसाद, उद्यापन, इलाक़ों की रीत और सवाल-जवाब।

महत्व — यह व्रत क्यों

संतोषी माता: गणेशजी और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री — नाम ही «संतोष» का; मान्यता है कि इनका व्रत घर में सुख-शांति, पति-पत्नी में मेल, रुका धन, विवाह और संतान का मार्ग खोलता है। यह व्रत 1975 की फ़िल्म «जय संतोषी माँ» के बाद घर-घर पहुँचा, पर इसकी रीत — गुड़-चना, खट्टे का त्याग, 16 शुक्रवार — पुरानी लोक-परंपरा की है।

शुक्र-ग्रह: सौंदर्य, विवाह, दांपत्य-सुख, वैभव, वाहन और कला का कारक; कुंडली में शुक्र कमज़ोर हो तो शुक्रवार व्रत, सफ़ेद वस्तु (चावल, दूध, चीनी, सफ़ेद वस्त्र) का दान, «ॐ शुं शुक्राय नमः» जप और लक्ष्मी-पूजा शांति-उपाय माने जाते हैं।

लक्ष्मी-वार: शुक्रवार को शाम की लक्ष्मी-आरती, घर की सफ़ाई, तुलसी-दीप और धन-धान्य की प्रार्थना — इसलिए घर की महिलाएँ शुक्रवार को नए काम, ख़रीद और मीठा बनाना शुभ मानती हैं।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

संतोषी माता के शुक्रवार व्रत की घरेलू विधि — किसी भी शुक्रवार (शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ) से आरंभ, 16 शुक्रवार लगातार, 16वें पर उद्यापन।

  1. सुबह: स्नान, स्वच्छ (हो सके तो लाल/पीले) वस्त्र; घर के पूजा-स्थान या ईशान कोण में चौकी पर लाल कपड़ा, संतोषी माता का चित्र; सामने जल-भरा कलश और उस पर गुड़-चने से भरा कटोरा (यही मुख्य प्रसाद)।
  2. संकल्प: हाथ में जल-अक्षत-फूल लेकर — «मैं (नाम) 16 शुक्रवार संतोषी माता का व्रत (कामना) हेतु रखूँगी/रखूँगा; खट्टा न खाऊँगी, न खिलाऊँगी» — जल भूमि पर छोड़ें।
  3. पूजा: घी का दीपक, धूप, रोली-अक्षत, लाल फूल (गुड़हल/गुलाब), लाल चुनरी, गुड़-चना, केला; «ॐ श्री संतोषी महामाये गजानंदं दायिनी। शुक्रवारं प्रियं देवी नारायणी नमोऽस्तुते॥» या «जय संतोषी माता» 11/21 बार।
  4. कथा: संतोषी माता की व्रत-कथा (नीचे) स्वयं पढ़ें या सुनें — कथा के समय हाथ में गुड़-चना रखें और अंत में «संतोषी माता की जय» बोलकर कलश का जल घर में छिड़कें।
  5. आरती: «जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता…» — कपूर-आरती के बाद प्रसाद (गुड़-चना) घर के सबको दें; एक हिस्सा गाय/पक्षियों को।
  6. व्रत-भोजन: दिन में एक समय — फलाहार या सादा भोजन (बिना खट्टे के: नींबू, इमली, अचार, दही, छाछ, टमाटर, आँवला, कच्चा आम — कुछ भी नहीं); घर के बाक़ी लोग भी उस दिन खट्टा न खाएँ — यही इस व्रत का मूल नियम है।
  7. शाम: लक्ष्मी-दीप, तुलसी पर दीपक, मीठा भोग; रात में कड़वा-खट्टा-तीखा नहीं।
  8. उद्यापन (16वाँ शुक्रवार): 8 बालकों (या जितने संभव) को खीर-पूरी-चने की सब्ज़ी का भोजन (खट्टा बिल्कुल नहीं, नमक भी सीमित — कई घर नमक-रहित), दक्षिणा-केला; बच्चों को उस दिन खट्टा न खाने की विनती; कथा, आरती, गुड़-चना, माता को लाल चुनरी-श्रृंगार; ब्राह्मण/कन्या-भोजन जिनके यहाँ रीत हो।

पूजा-सामग्री की सूची

गुड़-चना ही मुख्य है — बाक़ी घर में होता है; उद्यापन की सूची अलग।

  • संतोषी माता का चित्र/मूर्ति, चौकी, लाल कपड़ा, लाल चुनरी, कलश (जल), कटोरा (गुड़ + भुना चना)
  • गुड़ (साबुत/छोटे टुकड़े) व भुना चना — हर शुक्रवार नया; केला, नारियल, पान-सुपारी
  • घी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप-अगरबत्ती, कपूर, आरती-थाली, रोली, अक्षत, मौली, हल्दी
  • लाल फूल (गुड़हल, गुलाब, गेंदा), माला; इत्र/गुलाब-जल; सिंदूर (सुहागिनें)
  • कथा-पुस्तक (संतोषी माता व्रत-कथा व आरती), घंटी, शंख (हो तो)
  • उद्यापन: 8 बालक — खीर (चावल-दूध-चीनी), पूरी, काले चने की सब्ज़ी (बिना खट्टे), केला, दक्षिणा; 16 गुड़-चने की पुड़िया, माता की चुनरी-श्रृंगार, नए वस्त्र (श्रद्धानुसार)
  • शुक्र-शांति (वैकल्पिक): सफ़ेद वस्त्र, चावल, दूध, चीनी, दही (व्रत-दिन के बाहर) दान; सफ़ेद फूल

🛍 पूजा-सामग्री व यंत्र देखें 🙏 पूजा बुक करें

📅 अपने शहर का पंचांग

सूर्योदय, चंद्रोदय, राहुकाल व चौघड़िया — आपके शहर के सटीक समय से, निःशुल्क।

पंचांग देखें →

व्रत-कथा

संतोषी माता की कथा: एक बुढ़िया के सात बेटे थे — छह कमाते, सातवाँ निकम्मा। बुढ़िया छहों को स्वादिष्ट भोजन देती और सातवें को उनकी जूठन। सातवें की पत्नी ने यह देख पति से कहा; उसने माँ के प्रेम पर विश्वास न किया, फिर एक दिन आँखों से देखा — दुखी होकर परदेस कमाने चला गया। वहाँ सेठ के यहाँ बारह वर्ष में धन-धान्य कमा लिया, पर घर की सुध न ली। इधर पत्नी को सास-जेठानियों ने जंगल से लकड़ी लाने, भूसी की रोटी और नारियल के खोल में पानी देने का कष्ट दिया।

एक दिन लकड़ी लाते उसने स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा — विधि पूछी: «शुक्रवार को नहा-धोकर सवा आने का गुड़-चना लो, कथा सुनो, खट्टा मत खाओ-खिलाओ, 16 शुक्रवार करो।» उसने लकड़ी बेचकर गुड़-चना लिया, व्रत किया। माता प्रसन्न हुईं — दो शुक्रवार बाद पति को स्वप्न में घर की याद दिलाई, सेठ से हिसाब दिलाकर धन सहित लौटाया। पत्नी ने उद्यापन किया — पर जेठानियों ने बहकाकर बच्चों को उद्यापन के भोजन में खटाई खिला दी (इमली/खटाई माँगी और दी गई)। माता रुष्ट हुईं — पति को राजा के सिपाही पकड़ ले गए।

पत्नी ने भूल समझी, माता से क्षमा माँगी और फिर विधिपूर्वक 8 ब्राह्मण-बालकों को बिना खटाई भोजन कराया — पति छूटकर लौटा, पुत्र हुआ। माता स्वयं वृद्धा-रूप में घर आईं; सास-जेठानियों ने द्वार बंद किया तो माता ने अपना रूप दिखाया, सबने क्षमा माँगी और घर में सुख-संतोष लौटा। सीख — व्रत श्रद्धा से, खट्टे का पूरा परहेज़, और उद्यापन में बच्चों को खटाई न खिलाना — यही इस कथा की आत्मा है।

गुड़-चना, खीर-पूरी-चना; खट्टा पूरी तरह वर्जित

संतोषी माता का प्रसाद सबसे सादा है — गुड़ और भुना चना। व्रत-भोजन एक समय, बिना खट्टे के: सादी सब्ज़ी-रोटी, खीर, हलवा, फल, दूध; दही-छाछ-नींबू-अचार-टमाटर-इमली-आँवला बिल्कुल नहीं। उद्यापन में खीर-पूरी-काले चने की सब्ज़ी (कई घर नमक-रहित या सेंधा नमक से) — 8 बालकों को।

  • प्रसाद: गुड़ (साबुत) + भुना चना — छिलके सहित या बिना; कुछ घर गुड़-चने के लड्डू बनाते हैं
  • व्रत-भोजन: लौकी/आलू की सादी सब्ज़ी (बिना टमाटर), रोटी/पूरी, चावल-खीर, सूजी-हलवा, फल (केला, सेब, अनार — खट्टे फल नहीं), दूध
  • उद्यापन-थाली: चावल की खीर, पूरी, काले चने की सूखी सब्ज़ी (जीरा-हल्दी-धनिया; अमचूर/टमाटर नहीं), केला, गुड़-चना — 8 बालकों को; बड़ों को भी वही
  • वर्जित (व्रत-दिन पूरे घर में): नींबू, इमली, आँवला, अचार, दही-छाछ-रायता, टमाटर, कच्चा आम, चटनी, टमाटर-सॉस, संतरा-मौसमी, कढ़ी

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

यह व्रत लगभग पूरे उत्तर-मध्य भारत में एक-सा है — फ़र्क़ प्रसाद व उद्यापन के ब्योरे में।

उत्तर प्रदेश-बिहार-दिल्ली-हरियाणा: 16 शुक्रवार, गुड़-चना, कथा-पाठ घर की बहू-बेटियाँ; उद्यापन पर 8 लड़कों को खीर-पूरी-चना (कई घर नमक-रहित), बच्चों से «खट्टा मत खाना» का वचन; शुक्रवार को घर की महिलाएँ खट्टा नहीं बनातीं।
राजस्थान-मध्य प्रदेश: «संतोषी माता की कहानी» के साथ शुक्रवार की और कहानियाँ (लक्ष्मी-जी) भी; प्रसाद में गुड़-चने के साथ केला; उद्यापन में कन्या-भोजन की रीत; शुक्रवार को नई वस्तु न ख़रीदने का लोक-नियम कुछ घरों में (मत भिन्न)।
पंजाब-हिमाचल: संतोषी माता के मंदिरों में शुक्रवार की भीड़, चुनरी-नारियल चढ़ाना; व्रत 16 के बदले कभी 21 शुक्रवार; लंगर में खीर-पूरी।
महाराष्ट्र-गुजरात: यहाँ शुक्रवार पर संतोषी माँ के साथ-साथ वैभव लक्ष्मी व्रत (श्रीयंत्र, सोने-चाँदी की वस्तु की पूजा, 11/21 शुक्रवार) अधिक प्रचलित — अलग पन्ना; संतोषी-व्रत में पुरण-पोळी/खीर का उद्यापन।
दक्षिण भारत: शुक्रवार लक्ष्मी/देवी-वार — घर की महिलाएँ शुक्रवार को कोलम, दीप, वरलक्ष्मी (श्रावण-शुक्रवार) व्रत; संतोषी-व्रत वहाँ कम, पर हिन्दी-भाषी घरों में वही 16 शुक्रवार।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • किसी भी शुक्रवार (शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ) से आरंभ, 16 लगातार; बीच में छूटे तो अगले शुक्रवार फिर गिनना
  • हर शुक्रवार नया गुड़-चना; कथा स्वयं पढ़ें/सुनें, आरती, प्रसाद पूरे घर व गाय-पक्षियों को
  • व्रत-दिन पूरे घर में खट्टा नहीं — यही मूल नियम; बच्चों-मेहमानों को भी न परोसें
  • उद्यापन 16वें शुक्रवार: 8 बालकों को खीर-पूरी-चना (बिना खटाई), दक्षिणा, बच्चों से खट्टा न खाने की विनती
  • गर्भवती/बीमार/बुज़ुर्ग: सामान्य भोजन कर केवल गुड़-चना-कथा-आरती करें — व्रत का फल श्रद्धा से

❌ क्या न करें

  • खट्टा (नींबू-इमली-अचार-दही-टमाटर) खाना/खिलाना — कथा में यही भूल दंड देती है
  • उद्यापन के भोजन में नमक-खटाई की माँग पर बच्चों को देना; अधूरी 16 गिनती पर उद्यापन
  • व्रत के नाम पर बच्चों/बीमार को भूखा रखना; शुक्रवार को कलह-कड़वे वचन (संतोष का व्रत है)
  • प्रसाद का गुड़-चना फेंकना — गाय/पक्षियों को दें; पुराना बासी प्रसाद अगले हफ़्ते
  • माता के चित्र के सामने जूठा, चमड़ा; व्रत-दिन बाल-नाख़ून (कुछ घरों की रीत)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगला शुक्रवार व्रत कब है और 2026 में शुक्रवार कब-कब पड़ेंगे?

ऊपर सूची में आने वाले 12 शुक्रवार माह-पक्ष सहित हैं; 16-शुक्रवार व्रत किसी भी शुक्रवार से शुरू कर सकते हैं — शुक्ल पक्ष का पहला शुक्रवार श्रेष्ठ; अधिक मास/पितृपक्ष में आरंभ न करें (चलता व्रत जारी रखें)।

संतोषी माता व्रत के दिन क्या-क्या नहीं खाना चाहिए?

कोई भी खट्टी चीज़ — नींबू, इमली, आँवला, अचार, दही-छाछ, टमाटर, कच्चा आम, चटनी, खट्टे फल (संतरा-मौसमी); और यह नियम व्रत-दिन पूरे घर (बच्चों-मेहमानों) पर लागू है। नमक चलता है (उद्यापन में कई घर सेंधा/कम)।

व्रत में कितनी बार भोजन और क्या?

एक समय सादा भोजन या फलाहार — सब्ज़ी-रोटी/पूरी, खीर, हलवा, फल, दूध; सुबह प्रसाद गुड़-चना। बाक़ी दिन जल-चाय-दूध ले सकते हैं।

16 शुक्रवार के बीच एक छूट जाए तो?

गिनती जहाँ छूटी वहीं से अगले शुक्रवार आगे बढ़ाएँ (दोबारा 1 से नहीं); मासिक-धर्म के शुक्रवार पूजा न करें, गिनती में जोड़ लें — यही लोक-रीत है, कुल-रीत अलग हो तो वही।

उद्यापन कैसे करें, कितने बच्चे?

16वें शुक्रवार को 8 बालक (न मिलें तो जितने हों, या कन्याएँ) — खीर-पूरी-काले चने की सब्ज़ी, केला, दक्षिणा; भोजन में खटाई बिल्कुल नहीं; माता की पूजा-कथा-आरती; कुछ घर उसी दिन ब्राह्मण-भोजन।

पुरुष या अविवाहित कन्या रख सकते हैं?

हाँ — व्रत सबके लिए है; कन्याएँ अच्छे वर, पुरुष धन-कार्य-संतोष के लिए रखते हैं; नियम वही 16 शुक्रवार व खट्टा-त्याग।

संतोषी माता और वैभव लक्ष्मी व्रत में क्या अंतर?

दोनों शुक्रवार के; संतोषी माता — गुड़-चना, खट्टा-त्याग, 16 शुक्रवार, 8 बालक; वैभव लक्ष्मी — श्रीयंत्र व सोने/चाँदी की वस्तु की पूजा, खीर-भोग, 11/21 शुक्रवार, 7 सुहागिनों को कुंकुम-प्रसाद (अलग पन्ना)। दोनों साथ नहीं रखने चाहिए — एक चुनें।

🔔 याद दिलाएँ — हर व्रत से एक दिन पहले

अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।

संदेश Nakshtra Tak की ओर से आएगा; नंबर किसी और को नहीं दिया जाता।

📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें

यह भी पढ़ें: वैभव लक्ष्मी व्रत (शुक्रवार) · सोमवार व्रत · बृहस्पतिवार व्रत · शनिवार व्रत · सकट चौथ

⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता (व्रत-कथा) पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। गर्भावस्था, मधुमेह या अन्य रोग में व्रत/खट्टे-त्याग की कठोरता न रखें — पूजा-कथा भर करें।

🌐 Read this page in English · ← सभी व्रत-त्योहार · पूरा पर्व-कैलेंडर