🌙 सकट चौथ (तिलकुट चतुर्थी) 2027
माघ कृष्ण चतुर्थी — माताओं का संतान-रक्षा व्रत; गणेश जी और सकट माता की पूजा, तिलकुट का भोग और रात में चंद्रमा को अर्घ्य।
सकट चौथ माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाने वाला माताओं का व्रत है — मकर संक्रांति के कुछ दिन बाद। इसे तिलकुट चौथ, तिल-चौथ, संकटा चौथ, माघी चतुर्थी और लंबोदर संकष्टी चतुर्थी भी कहते हैं। माताएँ संतान की लंबी उम्र, आरोग्य और संकट-मुक्ति के लिए दिन-भर निर्जला/फलाहार व्रत रखती हैं और रात में चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर खोलती हैं।
साल की बारह संकष्टी चतुर्थियों में यह सबसे बड़ी मानी जाती है — उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली में इसकी सबसे ज़्यादा मान्यता है। नीचे इस साल की तिथि, चंद्रोदय का समय, विधि, सामग्री, कथा, तिलकुट बनाने का तरीक़ा और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
«सकट» = संकट — यह व्रत संतान पर आने वाले हर संकट को टालने वाला माना गया है; कथा में सकट माता ने साहूकारनी के बेटे को भट्टी से जीवित निकाला था। इसी दिन गणेश जी को संकट-हरण की शक्ति मिली — इसलिए गणेश + सकट (चौथ) माता दोनों की पूजा।
तिल का महीना है — तिल-गुड़ का तिलकुट इस व्रत का प्रसाद; कई घर तिलकुट का «बकरा» (तिलकुट की आकृति) बनाकर काटने की रीत निभाते हैं (बलि का प्रतीक)। व्रत चंद्रोदय (रात लगभग 8:30-9:30, ऊपर सटीक समय) तक चलता है, करवा चौथ की तरह।
अहोई और करवा चौथ के साथ यह माताओं के तीन बड़े व्रतों में है; पूर्वांचल में इसे «गणेश चौथ» भी कहते हैं और नई बहू का पहला सकट विशेष होता है।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह उत्तर-भारतीय घरेलू विधि है — दिन का व्रत, शाम को गणेश-सकट माता पूजा व कथा, चंद्रोदय पर अर्घ्य।
- सुबह स्नान करके संकल्प — «मैं संतान की दीर्घायु व संकट-मुक्ति हेतु सकट चौथ का व्रत करती हूँ।» दिन में अन्न नहीं; निर्जला या फल-दूध।
- दिन में तिलकुट बनाएँ — तिल भूनकर, गुड़/चीनी की चाशनी में कूटकर; कुछ घर तिलकुट का बकरा/पिंड बनाते हैं। कई घरों में पूजा में नई मिट्टी की चौथ-माता/गणेश की मूर्ति।
- शाम को (प्रदोष-काल में) पूजा-स्थान पर लकड़ी की चौकी, उस पर पीला कपड़ा; गणेश जी की मूर्ति/चित्र, सकट माता (चौथ माता) का चित्र या मिट्टी की आकृति; कलश में जल, ऊपर दीया।
- गणेश जी को दूर्वा, पीले फूल, सिंदूर, रोली-अक्षत, धूप-दीप; सकट माता को रोली-चुनरी; भोग — तिलकुट, तिल के लड्डू, गुड़, शकरकंद, मूली, गन्ना, सूखे मेवे; «ॐ गं गणपतये नमः» 21 बार।
- सकट चौथ की कथा (नीचे) घर की स्त्रियाँ मिलकर सुनें; कथा के समय हाथ में तिल-गुड़/गेहूँ के दाने; सास/बड़ी को बायना (तिलकुट, फल, दक्षिणा) देकर पैर छूएँ।
- चंद्रोदय (ऊपर समय) पर छत/आँगन में जल-दूध-तिल से चंद्रमा को अर्घ्य; गणेश-सकट माता को दिखाकर तिलकुट का भोग।
- अर्घ्य के बाद तिलकुट खाकर व्रत खोलें; पहले बच्चों को तिलकुट, फिर स्वयं; बकरा बनाया हो तो घर का बेटा उसे काटे और सब बाँटें।
- रात में गणेश-आरती; तिलकुट-प्रसाद पड़ोस में बाँटें।
पूजा-सामग्री की सूची
तिल-गुड़ और गणेश-सकट माता की आकृति — यही मुख्य; बाक़ी पूजा की सादी सामग्री।
- तिल (सफ़ेद), गुड़/चीनी — तिलकुट व लड्डू; कूटने को मूसल/ओखली
- गणेश जी की मूर्ति/चित्र, सकट (चौथ) माता का चित्र या मिट्टी की आकृति, चौकी, पीला कपड़ा
- कलश, दीपक (घी), धूप, कपूर, आरती-थाली
- दूर्वा (21 गाँठ), पीले फूल, सिंदूर, रोली, अक्षत, हल्दी, मौली, चुनरी (सकट माता को)
- भोग: तिलकुट, तिल-लड्डू, गुड़, शकरकंद, मूली, गन्ना, गाजर, बादाम-काजू
- चंद्र-अर्घ्य को ताँबे का लोटा, दूध-जल
- बायना: तिलकुट, फल, दक्षिणा, कपड़ा (सास के लिए)
- सकट चौथ की कथा-पुस्तक
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
एक नगर में कुम्हार ने भट्टी लगाई, पर बर्तन पकते ही नहीं थे। राजा ने पंडित से पूछा; उसने कहा — हर बार भट्टी में एक बच्चे की बलि दो तो बर्तन पकेंगे। नगर के हर घर से बारी-बारी बच्चे भट्टी में डाले जाने लगे। एक दिन बारी आई एक बुढ़िया के इकलौते बेटे की।
बुढ़िया सकट चौथ का व्रत रखती थी; उसने बेटे को दूर्वा और सुपारी देकर कहा — «सकट माता तेरी रक्षा करेंगी» और स्वयं भूखी रहकर रात-भर माता को पुकारती रही। सुबह भट्टी खुली — बर्तन तो पके ही, बुढ़िया का बेटा भी सही-सलामत बैठा था, और पिछले सब बच्चे भी जीवित लौट आए।
राजा-नगर ने सकट माता की महिमा मानी और बलि बंद हुई। तभी से माताएँ माघ कृष्ण चतुर्थी को संतान की रक्षा के लिए सकट चौथ रखती हैं। दूसरी कथा गणेश-चंद्र की — चंद्रमा ने लंबोदर गणेश का उपहास किया, गणेश ने शाप दिया कि उन्हें देखने वाला कलंकित होगा; क्षमा पर गणेश ने कहा — सिर्फ़ भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्र-दर्शन वर्जित रहेगा, और संकष्टी चतुर्थी को चंद्र-अर्घ्य से व्रत पूरा होगा।
तिलकुट — इस व्रत का प्रसाद (बनाने की विधि)
तिलकुट: 250 ग्राम सफ़ेद तिल धीमी आँच पर हल्के भूरे भूनें; 200 ग्राम गुड़ (या चीनी) थोड़े पानी में पिघलाकर एक-तार की चाशनी बनाएँ; तिल मिलाकर ओखली में हल्का कूटें (इसीलिए «तिलकुट»); हाथ पर घी लगाकर लड्डू या चपटे टुकड़े बनाएँ। बिहार-गया का तिलकुट प्रसिद्ध है — वहाँ चीनी-तिल को कूटकर खस्ता बनाते हैं।
- भोग: तिलकुट, तिल-गुड़ के लड्डू, गुड़, शकरकंद (उबली), मूली, गन्ना, गाजर, मेवे
- व्रत के दिन: निर्जला या फल-दूध; बुज़ुर्ग/गर्भवती फल-दूध ज़रूर
- व्रत खोलने पर: पहले तिलकुट-जल, फिर हल्का भोजन — खिचड़ी/दाल-चावल या पूड़ी-सब्ज़ी
- तिलकुट का बकरा (राजस्थान-मप्र-यूपी के कई घर): तिलकुट की आकृति, घर का बेटा काटे, सब बाँटें — बलि का प्रतीक
- अगले दिन तिलकुट पड़ोस-रिश्तेदारों में — «सकट का प्रसाद» लौटाया नहीं जाता
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
सकट उत्तर-मध्य भारत का व्रत है; पूर्व में तिलकुट, पश्चिम में तिळ-चतुर्थी, दक्षिण में संकष्टी।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- चंद्रोदय के बाद ही व्रत खोलें — ऊपर दिल्ली का समय, अपने शहर का पंचांग से मिलाएँ
- तिलकुट घर पर बनाएँ, गणेश-सकट माता को भोग लगाकर पहले बच्चों को
- गणेश जी को दूर्वा ज़रूर — 21 गाँठ
- कथा सुहागिनें मिलकर सुनें; बायना सास/बड़ी को
- गर्भवती/बीमार फल-दूध के साथ रखें
❌ क्या न करें
- दिन में सोना, बच्चों को डाँटना, काले कपड़े — वर्जित
- चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले भोजन नहीं
- गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएँ (पौराणिक कारण) — दूर्वा और शमी-पत्र चढ़ाएँ
- तिलकुट-प्रसाद लौटाना/फेंकना नहीं
- अस्वस्थ निर्जला की ज़िद नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सकट चौथ 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की माघ कृष्ण चतुर्थी है — पंचांग-गणना से, चंद्रोदय-आधारित नियम (जिस रात चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो); दिल्ली का चंद्रोदय-समय भी वहीं।
सकट चौथ पर चाँद कितने बजे निकलेगा?
ऊपर «चंद्रोदय» देखें (दिल्ली) — माघ की चौथ का चाँद रात लगभग 8:30-9:30 के बीच निकलता है; पूर्वी शहरों में कुछ मिनट पहले, पश्चिमी में बाद। अपने शहर का समय पंचांग-पन्ने पर।
सकट चौथ और संकष्टी चतुर्थी में क्या अंतर है?
हर महीने की कृष्ण चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी है (गणेश-व्रत, चंद्र-अर्घ्य); माघ की संकष्टी ही «सकट चौथ/तिलकुट चौथ» — साल की सबसे बड़ी, विशेषकर माताओं के लिए।
तिलकुट का बकरा क्या है?
कई घरों (राजस्थान-मप्र-यूपी) में तिलकुट की बकरे-सी आकृति बनाकर पूजा के बाद घर का बेटा उसे चाकू से काटता है — यह कथा की बलि का प्रतीक है; फिर वही प्रसाद सबमें बँटता है।
कुँवारी/निःसंतान स्त्री यह व्रत रख सकती है?
हाँ — संतान-कामना से भी रखा जाता है; व्रत-विधि वही, संकल्प में कामना बोलें।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
यह भी पढ़ें: मकर संक्रांति (कुछ दिन पहले) · अहोई अष्टमी (माताओं का दूसरा व्रत) · मौनी अमावस्या · गणेश-आरती
⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। स्वास्थ्य-संबंधी स्थिति में चिकित्सक की सलाह लें।
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