🤫 मौनी अमावस्या 2027
माघ अमावस्या — मौन रहकर गंगा-स्नान, पितरों का तर्पण, तिल-दान; प्रयाग के माघ-मेले/कुंभ का सबसे बड़ा स्नान-दिन।
मौनी अमावस्या माघ मास की अमावस्या है — मकर संक्रांति के लगभग तीन सप्ताह बाद, वसंत पंचमी से पाँच दिन पहले। नाम «मौनी» इसलिए कि इस दिन मौन रहकर स्नान-दान करने का विधान है — मौन से मन शुद्ध और वाणी का तप। माना जाता है कि इस दिन गंगा-जल अमृत हो जाता है; प्रयागराज के माघ-मेले (और कुंभ) का यह सबसे बड़ा शाही-स्नान है।
घर की स्त्रियों के लिए यह पितरों का दिन है — तर्पण, तिल-दान, पीपल-पूजा, और «मौन-व्रत» जितनी देर संभव हो; नीचे इस साल की तिथि, स्नान का ब्रह्म-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, भोजन और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
माघ-स्नान (पूरे माघ भोर में स्नान) का सबसे फलदायी दिन; शास्त्रों में मौनी अमावस्या के स्नान को हज़ार गंगा-स्नान के बराबर कहा गया। इसी दिन मनु ऋषि का जन्म माना जाता है — «मनु» से «मौनी»।
अमावस्या पितरों की तिथि है — तर्पण, पिंडदान/अन्न-दान से पितर तृप्त होते हैं; कालसर्प/पितृ-दोष के उपाय इस दिन विशेष; शनि-संबंधी दान (तिल, काला कपड़ा, तेल) भी।
मौन का नियम: कम-से-कम स्नान-पूजा-दान तक न बोलें (मन में जप); पूरा दिन मौन रख सकें तो उत्तम — यह घर की स्त्री के लिए दुर्लभ शांति का दिन भी है।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — भोर में मौन-स्नान, पितृ-तर्पण, दान, पीपल-तुलसी पूजा; शाम को दीप।
- ब्रह्म-मुहूर्त (ऊपर समय) में उठकर मौन रहें; नदी/तालाब (या घर में गंगाजल-तिल मिले जल) से स्नान — «ॐ नमो नारायणाय» मन में; सूर्य को अर्घ्य।
- संकल्प (मन में) — «मैं मौनी अमावस्या का स्नान-दान-तर्पण पितरों की तृप्ति व परिवार-कल्याण हेतु करती हूँ।»
- पितृ-तर्पण: दक्षिण मुख, ताँबे के लोटे में जल-काले तिल-कुश-अक्षत, पितरों के नाम ले-लेकर तीन-तीन बार जल — घर का पुरुष करे, स्त्रियाँ भी कर सकती हैं (माँ/दादी के लिए); पीपल के पेड़ को जल-तिल और परिक्रमा।
- दान (सूर्योदय के बाद, दोपहर तक): काले तिल, तिल के लड्डू, गुड़, कंबल/ऊनी वस्त्र, घी, अन्न, तेल, जूते-छाता (शनि) — ब्राह्मण/ज़रूरतमंद/गौशाला; गाय को हरा चारा, कौवे-कुत्ते को रोटी (पंच-बलि)।
- घर में विष्णु-लक्ष्मी और शिव की पूजा; तुलसी को जल; अमावस्या को व्रत रखने वाली स्त्रियाँ दिन में फलाहार/एक समय भोजन।
- दिन-भर (या जितना संभव) मौन — पढ़ना-जप-भजन मन में; क्रोध-कलह नहीं; मौन तोड़ना हो तो पहले प्रभु-नाम।
- शाम को तुलसी-चौरे, पीपल के नीचे और मुख्य द्वार पर सरसों-तेल का दीपक (पितरों व शनि के लिए); अमावस्या की रात हनुमान-चालीसा या शिव-मंत्र।
- अगले दिन (प्रतिपदा) सुबह सामान्य दिनचर्या; माघ-स्नान का नियम पूर्णिमा तक जारी।
पूजा-सामग्री की सूची
मुख्य सामग्री तिल और दान की वस्तुएँ — पूजा सादी है।
- गंगाजल, काले तिल, ताँबे का लोटा, कुश (हो तो), अक्षत
- दान: तिल, तिल-लड्डू, गुड़, कंबल/ऊनी वस्त्र, घी, तेल, अन्न, दक्षिणा
- पीपल-पूजा को जल, तिल, रोली, मौली, दीपक
- विष्णु-लक्ष्मी व शिव का चित्र, बेलपत्र, तुलसी, फूल, धूप-दीप
- सरसों का तेल व मिट्टी के दीये (शाम को)
- पंच-बलि हेतु रोटी-गुड़ (गाय-कौआ-कुत्ता-चींटी-देव)
- फलाहार का सामान, सेंधा नमक
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
कांचीपुरी के देवस्वामी ब्राह्मण की बेटी गुणवती का विवाह तय हुआ; पर ज्योतिषी ने कहा — सप्तपदी के बाद ही उसका पति मर जाएगा। भाई सोमा नाम की धोबिन के पास गया, जो सोमवार-व्रत और पीपल-पूजा से पतिव्रता-शक्ति रखती थी। सोमा ने विवाह में आकर वर की मृत्यु पर अपना पुण्य देकर उसे जिला दिया।
अपना पुण्य देने से सोमा के घर उसका पति-पुत्र मर गए; वह रास्ते में मौन रहकर पीपल की 108 परिक्रमा करती, तिल-जल चढ़ाती लौटी — तब तक माघ अमावस्या थी। उसके मौन-व्रत और पीपल-पूजा से पति-पुत्र जीवित हो उठे। तभी से माघ अमावस्या को मौन रहकर स्नान, पीपल-पूजा और तर्पण का व्रत — मौनी अमावस्या।
एक और मान्यता — इसी दिन आदि-मनु (मानव-सृष्टि के प्रथम) का जन्म हुआ, और द्वापर युग का आरंभ; इसीलिए प्रयाग-संगम पर इस दिन का स्नान कुंभ-मेले का सबसे बड़ा स्नान है।
अमावस्या का भोजन और दान का अन्न
मौनी अमावस्या का भोजन सात्विक — तिल-गुड़, खिचड़ी; पहले पितरों/पंच-बलि के लिए निकालें, फिर परिवार। जो व्रत रखें वे फलाहार या एक समय।
- तिल-गुड़ के लड्डू, तिल-चावल की खिचड़ी (उड़द दाल के साथ), घी
- पंच-बलि: पहली रोटी गाय को, कौवे-कुत्ते को, चींटियों को आटा-शक्कर — पितरों के नाम से
- दान का अन्न: कच्चा चावल-दाल-आटा-गुड़-घी-नमक की पोटली (सीधा) ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को
- व्रत: फल, दूध, सिंघाड़े का हलवा; अमावस्या को चावल-अनाज वर्जित नहीं, पर तामसिक नहीं
- शाम को पीपल-दीप के बाद परिवार का भोजन
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
मौनी अमावस्या मुख्यतः उत्तर भारत की; दक्षिण-पश्चिम में माघ अमावस्या के अपने रूप।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- स्नान ब्रह्म-मुहूर्त में, कम-से-कम स्नान-दान तक मौन
- पितरों का तर्पण और तिल-दान — इस दिन का मूल
- पीपल को जल-तिल और परिक्रमा; शाम को सरसों-तेल का दीप
- कंबल/ऊनी दान — माघ की ठंड
- क्रोध-कलह से दूर, मन में जप
❌ क्या न करें
- अमावस्या को नया काम/ख़रीद, यात्रा — परंपरा में वर्जित
- मांस-मदिरा, तामसिक भोजन, बाल-नाख़ून
- तुलसी-दल न तोड़ें
- मौन के नाम पर घर के बुज़ुर्ग/बच्चे की ज़रूरत न टालें — मौन मन का है
- घाट पर भीड़ में बच्चों-बुज़ुर्गों को अकेला नहीं; गहरे पानी में नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मौनी अमावस्या 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की माघ अमावस्या है — पंचांग-गणना से; स्नान का ब्रह्म-मुहूर्त व अमावस्या तिथि की अवधि भी वहीं।
मौन कितनी देर रखें?
शास्त्र-विधान पूरे दिन का है; व्यवहार में सुबह उठने से स्नान-पूजा-दान पूरा होने तक (कम-से-कम 2-3 घंटे) मौन; मन में जप। जो पूरा दिन रख सकें, उत्तम।
स्त्रियाँ तर्पण कर सकती हैं?
हाँ — जिनके घर में पुरुष न हों या अपने माता-पिता के लिए, स्त्रियाँ तर्पण कर सकती हैं (कुश की जगह अक्षत-तिल-जल); पीपल-पूजा और दान तो मुख्य रूप से स्त्रियाँ ही करती हैं।
क्या इस दिन शनि का दान भी करते हैं?
अमावस्या शनि-प्रिय तिथि है — काले तिल, सरसों तेल, काला वस्त्र, जूते-छाता, लोहा का दान; शनिवार को पड़े (शनि-अमावस्या) तो विशेष।
मौनी अमावस्या और कुंभ का क्या संबंध?
प्रयाग के माघ-मेले/कुंभ/अर्धकुंभ में मौनी अमावस्या मुख्य शाही-स्नान है — मान्यता है कि इस दिन संगम में अमृत-बूँदें उतरती हैं; 2025 महाकुंभ में इसी दिन सबसे बड़ा स्नान था।
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। घाट-मेले में सुरक्षा सर्वोपरि।
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