🌕 माघ पूर्णिमा (माघी पूर्णिमा) 2027
माघ मास की पूर्णिमा — माघ-स्नान व कल्पवास का समापन, संत रविदास जयंती, गंगा-स्नान और तिल-कंबल-अन्न का दान; प्रयाग में देवता उतरते हैं।
माघ पूर्णिमा (माघी पूर्णिमा) माघ मास की पूर्णिमा है — वसंत पंचमी के दस दिन बाद, महाशिवरात्रि से पंद्रह दिन पहले। पौष पूर्णिमा से शुरू हुआ माघ-स्नान और प्रयाग का कल्पवास इसी दिन पूरा होता है; मान्यता है कि इस दिन देवता स्वयं मनुष्य-रूप में प्रयाग-संगम में स्नान करने उतरते हैं।
यह संत रविदास जी की जयंती (पंजाब-उप्र में बड़ा पर्व) और बौद्ध परंपरा में «माघ पूजा» का दिन भी है। घर की स्त्रियाँ इस दिन स्नान-व्रत, सत्यनारायण-कथा, तिल-दान और चंद्र-अर्घ्य करती हैं। नीचे इस साल की तिथि, स्नान-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
माघ-स्नान का समापन — जिसने महीना-भर किया उसका फल आज पूरा; जो न कर सका, उसके लिए माघ पूर्णिमा का एक स्नान पूरे माघ के बराबर कहा गया (पद्म-पुराण)। संगम पर कल्पवासी आज कुटिया छोड़कर लौटते हैं।
माघ में सूर्य कुंभ-राशि और चंद्रमा मघा नक्षत्र में (इसी से माघ) — इस पूर्णिमा को दान (तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र, कंबल, घी) का फल हज़ार गुना कहा गया; पितरों के लिए तर्पण-श्राद्ध भी।
रविदास जयंती — संत रविदास (रैदास) का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा को; «मन चंगा तो कठौती में गंगा» — भक्ति-समानता का पर्व; पंजाब-उप्र-मप्र में शोभा-यात्रा, लंगर।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — भोर में स्नान (माघ-स्नान का समापन), दान, पूर्णिमा-व्रत, शाम को चंद्र-अर्घ्य।
- ब्रह्म-मुहूर्त (ऊपर समय) में नदी/तालाब या घर में गंगाजल-तिल मिले जल से स्नान — माघ-स्नान का अंतिम दिन; सूर्य को अर्घ्य, «ॐ नमो नारायणाय»।
- माघ-स्नान का समापन-संकल्प — «पौष पूर्णिमा से आज तक का स्नान-व्रत पूर्ण हुआ, इसका फल परिवार-कल्याण व पितरों को» — जल हाथ में लेकर छोड़ें।
- पूर्णिमा-व्रत: दिन में फलाहार/एक समय; विष्णु-लक्ष्मी की पूजा — पीले फूल, तुलसी, पंचामृत; सत्यनारायण-कथा (माघी पूर्णिमा की कथा विशेष मानी जाती है)।
- दान (सूर्योदय से दोपहर): काले तिल, गुड़, अन्न (सीधा), कंबल/ऊनी वस्त्र, घी, तेल, जूते — ब्राह्मण/ज़रूरतमंद/गौशाला; पितरों के नाम से तर्पण व पंच-बलि (गाय-कौआ-कुत्ता)।
- रविदास जयंती (जहाँ रीत): संत रविदास का चित्र, दीप, उनके पद — «प्रभु जी तुम चंदन हम पानी»; लंगर/भोजन-दान।
- चंद्रोदय (ऊपर समय) पर चंद्रमा को दूध-जल का अर्घ्य; खीर का भोग; व्रत खोलें।
- शाम को तुलसी-चौरे और द्वार पर दीप; रात में विष्णु/शिव-भजन; अगले दिन से फाल्गुन — होली की तैयारी (होलाष्टक शुरू होने से पहले)।
पूजा-सामग्री की सूची
स्नान-दान की सादी सामग्री — तिल और कंबल इस पूर्णिमा की पहचान।
- गंगाजल, काले तिल, ताँबे का लोटा
- विष्णु-लक्ष्मी का चित्र, पीले फूल, तुलसी, पंचामृत, रोली, अक्षत
- दान: तिल, गुड़, अन्न-सीधा, कंबल/ऊनी वस्त्र, घी, तेल, दक्षिणा
- सत्यनारायण-कथा: पंजीरी, केला, पंचामृत, केले के पत्ते, सुपारी
- चंद्र-अर्घ्य को दूध-जल, खीर
- दीपक, धूप, कपूर, आरती-थाली
- पितृ-तर्पण को कुश (हो तो), तिल, अक्षत
- रविदास-चित्र/पद-पुस्तक (जहाँ रीत)
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पद्म-पुराण की कथा — कांतिका नगर के धनेश्वर ब्राह्मण की पत्नी को संतान न थी; ब्राह्मण ने भिक्षा में मिले संदेश पर पत्नी से माघ-मास में सुबह स्नान और चंद्रमा को अर्घ्य का व्रत कराया। 32 पूर्णिमाओं के व्रत से पुत्र हुआ, पर वह अल्पायु था; पत्नी ने माघ पूर्णिमा के व्रत का पुण्य पुत्र को दिया, और जब यम-दूत उसे लेने आए तो व्रत-बल से वे लौट गए — पुत्र दीर्घायु हुआ। तभी से माघ पूर्णिमा का स्नान-व्रत संतान-रक्षा व आयु का व्रत माना गया।
प्रयाग-मान्यता — माघ में तीनों लोकों के देवता, गंधर्व, ऋषि प्रयाग-संगम में मनुष्य-रूप में स्नान करने आते हैं; माघ पूर्णिमा को यह «देव-स्नान» पूर्ण होता है — इसलिए कल्पवासी इस दिन अंतिम स्नान करके त्रिवेणी को प्रणाम कर लौटते हैं।
संत रविदास — काशी के चर्मकार-कुल में माघ पूर्णिमा (1377 ई. के आस-पास) को जन्म; मीराबाई के गुरु, «बेगमपुरा» (दुःख-रहित नगर) के कवि; गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 40 पद — भक्ति में ऊँच-नीच नहीं, यही उनका संदेश।
माघी पूर्णिमा का भोजन — तिल, खीर, खिचड़ी
माघ की आख़िरी ठंड — तिल-गुड़ और घी वाले पकवान; भोग खीर; कल्पवासी आज एक समय भोजन के नियम से मुक्त होकर भरपेट खाते हैं।
- खीर (चंद्र-भोग), तिल-लड्डू, तिल-गुड़ की पट्टी, गाजर का हलवा
- खिचड़ी + घी + दही (माघ-स्नान का अंतिम भोजन), पूड़ी-आलू
- सत्यनारायण-प्रसाद: पंजीरी, पंचामृत, केला
- रविदास-जयंती लंगर: दाल-रोटी-खीर (पंजाब-उप्र)
- व्रत: फल-दूध, साबूदाना; पारण अर्घ्य के बाद
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
प्रयाग का अंतिम शाही-स्नान, पंजाब-उप्र का रविदास-जयंती, दक्षिण का माघ-पूर्णिमा स्नान।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- भोर में स्नान — माघ-स्नान का समापन-संकल्प ज़रूर
- तिल-गुड़-अन्न-कंबल का दान; पितरों को तर्पण
- पूर्णिमा-व्रत, सत्यनारायण-कथा, चंद्रोदय पर अर्घ्य
- रविदास जी के पद/लंगर — समानता का संदेश
- कल्पवासियों/स्नानार्थियों की सेवा (भोजन-कंबल) — इस दिन विशेष पुण्य
❌ क्या न करें
- ठंड में बुज़ुर्ग-रोगी नदी-स्नान न करें — घर में गंगाजल
- मांस-मदिरा, कलह, बाल-नाख़ून — पूर्णिमा पर वर्जित
- मेले की भीड़ में बच्चों-बुज़ुर्गों को अकेला नहीं
- दान का अन्न ख़राब नहीं — जो खाएँ वही दें
- तुलसी-दल शाम को नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
माघ पूर्णिमा 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की माघ पूर्णिमा है — पंचांग-गणना से; ब्रह्म-मुहूर्त (स्नान) व चंद्रोदय का दिल्ली-समय भी वहीं।
माघ-स्नान पूरा न कर पाए तो?
पद्म-पुराण के अनुसार माघ पूर्णिमा का एक स्नान पूरे माघ के बराबर — आज भोर में स्नान, दान और चंद्र-अर्घ्य कर लें; या माघ की तीन तिथियाँ (पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, माघ पूर्णिमा) पर।
इस दिन क्या दान करें?
काले तिल, गुड़, अन्न-सीधा, कंबल/ऊनी वस्त्र, घी, तेल, जूते-छाता — सर्दी के अंत में कंबल-वस्त्र सबसे उपयोगी; गौशाला को चारा।
रविदास जयंती और माघ पूर्णिमा एक ही दिन क्यों?
संत रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा को माना गया — इसलिए हर साल इसी तिथि पर जयंती; पंजाब-उप्र में सरकारी अवकाश और शोभा-यात्रा।
माघी पूर्णिमा के बाद क्या?
अगले दिन से फाल्गुन — पंद्रह दिन बाद महाशिवरात्रि, फिर होलाष्टक (होली से आठ दिन पहले) और फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका-दहन।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
यह भी पढ़ें: पौष पूर्णिमा (माघ-स्नान आरंभ) · मौनी अमावस्या · महाशिवरात्रि (15 दिन बाद) · पूर्णिमा-सूची
⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। ठंड में स्नान-स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
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