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🪔 व्रत-त्योहार

🔱 प्रदोष व्रत 2026

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

अगला प्रदोष कब है — हर पक्ष की त्रयोदशी को सूर्यास्त के बाद प्रदोष-काल में शिव-पार्वती की पूजा; सोम प्रदोष, भौम प्रदोष, शनि प्रदोष का अलग फल; दिन-भर व्रत, शाम आरती के बाद भोजन; ऊपर आने वाली तिथियाँ व प्रदोष-समय।

अगली प्रदोष व्रत
गुरुवार, 24 सितंबर 2026
गुरु प्रदोष (भाद्रपद शुक्ल)
भाद्रपद · शुक्ल पक्ष · त्रयोदशी (विक्रम संवत 2083)
🪔 प्रदोष काल6:16 PM – 8:40 PM
🌇 सूर्यास्त6:16 PM
📿 तिथि-कालत्रयोदशी 23 सितंबर, 10:51 PM → 24 सितंबर, 11:18 PM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:49 AM – 12:37 PM
⛔ राहुकाल (टालें)01:43 PM – 03:14 PM
आने वाली तिथियाँ
  • गुरु प्रदोष (भाद्रपद शुक्ल) — गुरुवार, 24 सितंबर 2026
  • गुरु प्रदोष (आश्विन कृष्ण) — गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026
  • शुक्र प्रदोष (आश्विन शुक्ल) — शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
  • शुक्र प्रदोष (कार्तिक कृष्ण) — शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
  • रवि प्रदोष (कार्तिक शुक्ल) — रविवार, 22 नवंबर 2026
  • रवि प्रदोष (मार्गशीर्ष कृष्ण) — रविवार, 6 दिसंबर 2026
  • सोम प्रदोष (मार्गशीर्ष शुक्ल) — सोमवार, 21 दिसंबर 2026
  • भौम प्रदोष (पौष कृष्ण) — मंगलवार, 5 जनवरी 2027
  • बुध प्रदोष (पौष शुक्ल) — बुधवार, 20 जनवरी 2027
  • बुध प्रदोष (माघ कृष्ण) — बुधवार, 3 फ़रवरी 2027
  • गुरु प्रदोष (माघ शुक्ल) — गुरुवार, 18 फ़रवरी 2027
  • शुक्र प्रदोष (फाल्गुन कृष्ण) — शुक्रवार, 5 मार्च 2027
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

प्रदोष व्रत हर चंद्र-मास में दो बार आता है — कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को; पूजा का समय «प्रदोष-काल» है — सूर्यास्त से लगभग 2 घंटे 24 मिनट (6 घटी) तक, जब त्रयोदशी तिथि उस काल में व्याप्त हो। स्कंद-पुराण के अनुसार इस काल में शिव कैलाश पर आनंद-नृत्य करते हैं और सब देवता उनकी स्तुति करते हैं — इसलिए यह शिव-पूजा का सबसे फलदायी मुहूर्त है।

जिस वार को प्रदोष पड़े उसका अलग नाम-फल — सोमवार को सोम प्रदोष (मनोकामना, चंद्र-शांति), मंगलवार को भौम प्रदोष (रोग-ऋण-मुक्ति), शनिवार को शनि प्रदोष (संतान, शनि-शांति), रविवार को रवि प्रदोष (आयु-आरोग्य); स्त्रियाँ सुहाग-संतान-स्वास्थ्य के लिए, पुरुष ऋण-रोग-मुक्ति के लिए रखते हैं। ऊपर अगले प्रदोष की तिथि, प्रदोष-काल का समय (दिल्ली) और आने वाली 12 तिथियाँ; नीचे विधि, सामग्री, कथा, भोजन व इलाक़ों की रीत।

महत्व — यह व्रत क्यों

प्रदोष-काल का महत्त्व: समुद्र-मंथन में विष पीकर शिव त्रयोदशी के प्रदोष में स्वस्थ हुए/देवताओं ने इसी काल में शिव की स्तुति की (स्कंद-पुराण); त्रयोदशी में प्रदोष-व्यापिनी तिथि का दिन व्रत का — यदि त्रयोदशी शाम को शुरू हो तो वही दिन, सुबह से हो पर सूर्यास्त से पहले ख़त्म तो पिछला दिन; ऊपर की तिथियाँ प्रदोष-नियम से।

वार-भेद: रवि प्रदोष — आयु-आरोग्य; सोम — इच्छा-पूर्ति, मन-शांति; भौम — ऋण-रोग-मुक्ति, मंगल-दोष; बुध — विद्या-बुद्धि; गुरु — शत्रु-नाश, पितृ-कृपा; शुक्र — सौभाग्य-धन; शनि प्रदोष — संतान-प्राप्ति, शनि-साढ़ेसाती-शांति (सबसे प्रसिद्ध — शनिवार का प्रदोष)।

व्रत-फल: दो गायों के दान के बराबर (लोक-मान्यता), शिव-कृपा से पाप-नाश, ऋण-रोग-दरिद्रता से मुक्ति, संतान-सौभाग्य; लगातार 11 या 26 प्रदोष रखकर उद्यापन; महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी-चतुर्दशी) भी प्रदोष का ही महारूप; सावन के प्रदोष विशेष।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

यह प्रदोष की घरेलू विधि है — दिन का व्रत, प्रदोष-काल की शिव-पार्वती पूजा, कथा, आरती के बाद भोजन।

  1. सुबह स्नान, शिव-स्मरण, संकल्प — «(वार) प्रदोष व्रत, (कामना) हेतु, प्रदोष-काल में पूजा के बाद भोजन»; दिन-भर फलाहार/निराहार (सामर्थ्य), जल ले सकते हैं (कठोर रूप निर्जला); दिन में सोना नहीं।
  2. शाम, सूर्यास्त से पहले: फिर स्नान (हो सके तो), सफ़ेद/हल्के वस्त्र; पूजा-स्थान/शिवालय — शिवलिंग या शिव-पार्वती चित्र, पाँच रंगों की रंगोली (कुछ रीत), कुशा-आसन, उत्तर-पूर्व मुख।
  3. प्रदोष-काल (ऊपर समय) में पूजा: शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत), फिर गंगाजल; बेलपत्र (3 पत्ती, उल्टा), धतूरा, आक, शमी, भाँग, सफ़ेद फूल, चंदन-भस्म, अक्षत, जनेऊ; पार्वती को सुहाग-सामग्री, लाल फूल; «ॐ नमः शिवाय» 108, शिव-चालीसा/रुद्राष्टक, महामृत्युंजय (रोग-मुक्ति हेतु)।
  4. प्रदोष-कथा (नीचे — वार-अनुसार कथा भी) सुनना; दीप-धूप, नैवेद्य (खीर, फल, हलवा, मिठाई), शिव-आरती «ॐ जय शिव ओंकारा», कपूर-आरती; नंदी को हरा चारा/गुड़।
  5. पूजा के बाद: प्रसाद, फिर व्रत खोलना — सात्विक भोजन (नमक-रहित/एक बार — कुछ रीत), कई घर रात में केवल फलाहार; अगली सुबह सामान्य।
  6. वार-विशेष: सोम प्रदोष पर चंद्र-अर्घ्य/सफ़ेद वस्तु दान; भौम प्रदोष पर मसूर-गुड़ दान, हनुमान-दर्शन; शनि प्रदोष पर काले तिल-तेल-उड़द दान, शनि-मंत्र, पीपल-दीप; शुक्र प्रदोष पर सुहाग-सामग्री दान।
  7. स्त्रियाँ: पार्वती-पूजन विशेष — सुहाग-सामग्री (चूड़ी-बिंदी-सिंदूर) अर्पित कर बाद में स्वयं धारण/दान; संतान-हेतु शनि प्रदोष 11 बार; मासिक-धर्म में केवल स्मरण।
  8. उद्यापन: 11/26 प्रदोष पूरे होने पर — शिव-पूजा, हवन (महामृत्युंजय/ॐ नमः शिवाय), ब्राह्मण/दंपति-भोजन, दान; फिर व्रत स्वेच्छा से।

पूजा-सामग्री की सूची

शिव-अभिषेक + पार्वती-सुहाग + प्रदोष-कथा — हर प्रदोष की सूची।

  • शिवलिंग (पारद/नर्मदेश्वर/मिट्टी) या शिव-पार्वती चित्र, चौकी, सफ़ेद कपड़ा, कुशा-आसन
  • अभिषेक: जल, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, गन्ने का रस (हो सके तो), नारियल-पानी
  • बेलपत्र (3-पत्ती), धतूरा, आक (मदार) के फूल, शमी-पत्र, भाँग, दूब, सफ़ेद फूल (चमेली-कनेर), लाल फूल (पार्वती)
  • चंदन, भस्म, अक्षत, जनेऊ, मौली, रोली-हल्दी-कुमकुम, इत्र, पान-सुपारी-लौंग-इलायची
  • पार्वती को सुहाग-सामग्री: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहँदी, चुनरी
  • दीपक (घी/तिल-तेल), धूप, कपूर, आरती-थाली, घंटी-शंख
  • नैवेद्य: खीर, हलवा, फल (केला-सेब), मिठाई, पंचमेवा; नंदी को गुड़-चारा
  • प्रदोष-कथा/शिव-चालीसा पुस्तक, रुद्राक्ष-माला; वार-अनुसार दान-सामग्री (तिल-तेल-उड़द/मसूर-गुड़/सफ़ेद वस्तु)

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व्रत-कथा

समुद्र-मंथन में हलाहल विष निकला; शिव ने उसे कंठ में धारण किया — नीलकंठ; विष की ज्वाला त्रयोदशी के प्रदोष-काल में शांत हुई और देवताओं ने कैलाश पर शिव की स्तुति की, शिव ने आनंद-नृत्य किया — तभी से त्रयोदशी का प्रदोष-काल शिव-पूजा का सर्वोत्तम समय; इस काल में जो शिव को पूजे, उस पर शिव विशेष प्रसन्न (स्कंद-पुराण)।

ब्राह्मणी और राजकुमार (प्रदोष-कथा): एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा माँगकर जीती थी, प्रदोष-व्रत रखती थी; उसे एक अनाथ राजकुमार (विदर्भ का — जिसका राज्य शत्रु ने छीना) मिला, उसे भी पुत्र-सा पाला। गंधर्व-कन्या अंशुमती ने राजकुमार को देखा, उसके पिता ने शिव-आदेश से विवाह किया; गंधर्व-सेना से राजकुमार ने अपना राज्य वापस लिया और ब्राह्मणी के पुत्र को मंत्री बनाया — ब्राह्मणी के प्रदोष-व्रत का फल। ऐसे ही सोम/भौम/शनि-प्रदोष की अपनी कथाएँ — वार-अनुसार पढ़ी जाती हैं।

शनि प्रदोष-कथा: एक निःसंतान सेठ-दंपति तीर्थ पर एक साधु से मिले, साधु ने शनि प्रदोष व्रत बताया; दंपति ने विधि से व्रत किए और शिव-कृपा से सुंदर पुत्र हुआ — शनि प्रदोष संतान-हेतु प्रसिद्ध। चंद्रमा को क्षय-रोग से मुक्ति भी सोम प्रदोष के व्रत से (दक्ष-शाप की कथा) — इसलिए सोम प्रदोष चंद्र-दोष-शांति का।

खीर, हलवा, फल — शिव का सात्विक नैवेद्य; व्रत-दिन फलाहार

प्रदोष को दिन-भर फलाहार/निराहार, प्रदोष-पूजा के बाद भोजन — कई घर बिना नमक या एक बार; शिव को खीर-हलवा-फल-मिठाई-पंचमेवा, भाँग-दूध (कुछ रीत), नंदी को गुड़; वार-अनुसार दान — सोम को सफ़ेद, भौम को मसूर-गुड़, शनि को तिल-उड़द-तेल।

  • नैवेद्य: चावल/साबूदाना/मखाना-खीर, सूजी-हलवा, फल (केला-सेब-अमरूद), पेड़ा-बर्फ़ी, पंचमेवा, ठंडाई/भाँग-दूध (कुछ रीत — सावन)
  • व्रत-फलाहार: फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना-खिचड़ी, कुट्टू, सेंधा नमक (या बिना नमक)
  • पूजा के बाद भोजन: सात्विक — दाल-चावल-रोटी-सब्ज़ी (प्याज़-लहसुन नहीं), कई घर एकभुक्त (एक बार) या केवल फलाहार रात में
  • सोम प्रदोष: सफ़ेद वस्तु (दूध-चावल-मिश्री) भोग व दान; भौम प्रदोष: गुड़-चना, मसूर-दान; शनि प्रदोष: तिल-लड्डू, उड़द-खिचड़ी दान; रवि प्रदोष: गुड़-गेहूँ दान
  • दक्षिण (प्रदोषम्): नंदी-अभिषेक, पायसम-वड़ा, नेय-अप्पम; महाराष्ट्र: शिवामूठ (सावन-सोमवार) की मूठ, प्रदोष को उपवास-भोजन साबूदाणा; बंगाल: शिव को दूध-बताशा

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

तमिलनाडु का प्रदोषम्-नंदी-अभिषेक, उत्तर का शनि प्रदोष, महाराष्ट्र का सावन-प्रदोष — शिव के प्रिय काल की रीतें।

उत्तर प्रदेश-बिहार-मध्य प्रदेश-राजस्थान: «प्रदोष/तेरस» — शिवालयों में शाम का जलाभिषेक, सोम-शनि प्रदोष पर भीड़ (काशी-विश्वनाथ, उज्जैन-महाकाल की प्रदोष-आरती); स्त्रियाँ सुहाग-संतान हेतु, पुरुष ऋण-रोग हेतु; सावन के प्रदोष व महाशिवरात्रि से पहले का प्रदोष विशेष; राजस्थान में «प्रदोष» पर एकभुक्त, बिहार में «त्रयोदशी-व्रत» शिवालय-जागरण।
तमिलनाडु-कर्नाटक-आंध्र-केरल (प्रदोषम्): दक्षिण में «प्रदोषम्» सबसे जीवंत — हर त्रयोदशी की शाम शिव-मंदिरों में नंदी-अभिषेक (दूध-दही-पंचामृत-विभूति), «प्रदोष नंदी» पूजा, दीप-दर्शन; «शनि प्रदोषम्» व «महा-प्रदोषम्» (महाशिवरात्रि से पहले) बड़े; तंजावुर-चिदंबरम-मदुरै; भक्त 24 प्रदोष का व्रत करते हैं; कर्नाटक-आंध्र में भी प्रदोष-पूजा, केरल में «प्रदोष-व्रतम्» व्रत-मंदिर-दर्शन।
महाराष्ट्र-गुजरात-गोवा: «प्रदोष» — श्रावण में विशेष (श्रावणी सोमवार + प्रदोष), शिवामूठ, त्र्यंबकेश्वर-भीमाशंकर-घृष्णेश्वर के प्रदोष-अभिषेक; गुजरात में «प्रदोष/तेरस» — सोमनाथ-नागेश्वर में प्रदोष-आरती, सौराष्ट्र में शनि-प्रदोष का व्रत; गोवा के शिव-मंदिरों (मंगेशी) में प्रदोष-पूजा।
बंगाल-ओडिशा-असम: बंगाल में «प्रदोष» कम-प्रचलित, पर शिवरात्रि-चतुर्दशी व सोमवार-शिव-पूजा; तारकेश्वर-वैद्यनाथ (देवघर) में सावन-प्रदोष; ओडिशा में लिंगराज (भुवनेश्वर) की प्रदोष-आरती, «प्रदोष-ओसा»; असम में शिवसागर-शिवडोल में प्रदोष।
पंजाब-हरियाणा-दिल्ली-हिमाचल-उत्तराखंड: दिल्ली-हरियाणा के शिवालयों में सोम-शनि प्रदोष पर संध्या-अभिषेक; हिमाचल-उत्तराखंड के ज्योतिर्लिंग/शिव-मंदिर (केदारनाथ-बैजनाथ-जागेश्वर) में प्रदोष; पंजाब में «तेरस» का व्रत स्त्रियाँ; ऋषिकेश-हरिद्वार में गंगा-आरती के साथ प्रदोष-पूजा।
नेपाल व अन्य: पशुपतिनाथ (काठमांडू) में प्रदोष-संध्या-आरती; नेपाल में «त्रयोदशी-व्रत»; प्रवासी परिवारों में घर पर शिवलिंग-अभिषेक — ऊपर के प्रदोष-समय अपने शहर के सूर्यास्त से 2h24m तक समझें।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • पूजा प्रदोष-काल (सूर्यास्त से ~2h24m — ऊपर समय) में ही; त्रयोदशी प्रदोष-व्यापिनी हो — ऊपर सूची
  • शिव को बेलपत्र-जल-पंचामृत, पार्वती को सुहाग-सामग्री; «ॐ नमः शिवाय»; वार-कथा
  • वार-अनुसार दान — सोम सफ़ेद, भौम मसूर-गुड़, शनि तिल-उड़द-तेल
  • व्रत दिन-भर, आरती के बाद सात्विक भोजन; 11/26 प्रदोष पर उद्यापन
  • रोगी/गर्भवती फलाहार-दूध; शिवालय न जा सकें तो घर पर ही

❌ क्या न करें

  • प्रदोष-काल छोड़कर सुबह/रात देर से पूजा (फल-हानि माना गया); पूजा से पहले भोजन
  • शिवलिंग पर तुलसी, केतकी, हल्दी, सिंदूर, नारियल-पानी (कुछ रीत), शंख से जल (शिव पर वर्जित)
  • बेलपत्र की कटी-फटी पत्ती, चातुर्मास के बाहर अनावश्यक; बेलपत्र उल्टा (चिकनी सतह नीचे) रखें
  • काले वस्त्र, तामसिक भोजन, क्रोध-कलह, दिन में सोना
  • व्रत बीच में छोड़ना; कठोर निर्जला स्वास्थ्य-विरुद्ध

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगला प्रदोष व्रत कब है? 2026 की तिथियाँ?

ऊपर अगले प्रदोष की तिथि, प्रदोष-काल का समय (दिल्ली — सूर्यास्त से ~2h24m) और आने वाली 12 प्रदोष-तिथियाँ वार-नाम (सोम/भौम/शनि…) सहित हैं; अपने शहर का सूर्यास्त कुछ मिनट आगे-पीछे — पंचांग से मिला लें।

प्रदोष-काल क्या है और कितनी देर?

सूर्यास्त से 6 घटी (2 घंटे 24 मिनट) — दिन-रात का संधि-काल; इसी में शिव का आनंद-नृत्य (स्कंद-पुराण); कुछ ग्रंथ सूर्यास्त से 3 घटी पहले-बाद (कुल 6 घटी) मानते हैं — व्यवहार में सूर्यास्त के बाद का 1-2 घंटा उत्तम; ऊपर समय दिया है।

सोम, भौम और शनि प्रदोष में क्या अंतर?

वार से फल: सोम (सोमवार) — मनोकामना व चंद्र-शांति; भौम (मंगलवार) — ऋण-रोग-मुक्ति, मंगल-दोष; शनि (शनिवार) — संतान, शनि-साढ़ेसाती-शांति; रवि — आयु; बुध — विद्या; गुरु — शत्रु-नाश; शुक्र — धन-सौभाग्य; विधि वही, दान वार-अनुसार; ऊपर सूची में हर तिथि का वार-नाम।

त्रयोदशी दो दिन हो तो प्रदोष किस दिन?

जिस दिन प्रदोष-काल (सूर्यास्त के बाद) में त्रयोदशी तिथि हो — प्रदोष-व्यापिनी; दोनों दिन हो तो पहला दिन; न किसी दिन हो (त्रयोदशी दोपहर में ख़त्म) तो जिस दिन अधिक — ऊपर सूची इसी नियम से बनी है।

क्या स्त्रियाँ प्रदोष रख सकती हैं? किस कामना से?

हाँ — सुहाग-रक्षा, संतान (शनि प्रदोष 11 बार), पति-स्वास्थ्य, मन-शांति (सोम प्रदोष); पार्वती-पूजन विशेष; मासिक-धर्म में पूजा नहीं, स्मरण-जप; गर्भवती फलाहार; कन्याएँ मनचाहे वर हेतु सोम प्रदोष व सावन-सोमवार।

कितने प्रदोष रखें और उद्यापन कब?

संकल्प से — 11 प्रदोष (लगभग साढ़े पाँच महीने) या 26 (एक साल); पूरे होने पर उद्यापन — शिव-पूजा, हवन, ब्राह्मण/दंपति-भोजन, दान; फिर स्वेच्छा से जारी; बीच में छूटे तो उसी वार का अगला प्रदोष जोड़ लें।

🔔 याद दिलाएँ — हर व्रत से एक दिन पहले

अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।

संदेश Nakshtra Tak की ओर से आएगा; नंबर किसी और को नहीं दिया जाता।

📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें

यह भी पढ़ें: महाशिवरात्रि · सोमवार / सावन-सोमवार व्रत · मासिक शिवरात्रि · एकादशी व्रत

⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। प्रदोष-काल दिल्ली के सूर्यास्त से — अपने शहर का समय पंचांग से लें; स्वास्थ्य-स्थिति में निर्जला न रखें।

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