🖤 शनिवार व्रत (शनि देव) 2026
अगला शनिवार — शनि देव व हनुमानजी का वार: शाम को पीपल पर सरसों-तेल का दीप, शनि-मंदिर में तेल-काले तिल-उड़द, 7/11/19 शनिवार का व्रत; साढ़ेसाती, ढैया, शनि-दोष, रोग-ऋण-कोर्ट-कचहरी की शांति के लिए; विधि, कथा (राजा विक्रमादित्य), दान व नियम नीचे।
- शनिवार (भाद्रपद शुक्ल पक्ष) — शनिवार, 19 सितंबर 2026
- शनिवार (भाद्रपद शुक्ल पक्ष) — शनिवार, 26 सितंबर 2026
- शनिवार (आश्विन कृष्ण पक्ष) — शनिवार, 3 अक्टूबर 2026
- शनिवार (आश्विन कृष्ण पक्ष) — शनिवार, 10 अक्टूबर 2026
- शनिवार (आश्विन शुक्ल पक्ष) — शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
- शनिवार (आश्विन शुक्ल पक्ष) — शनिवार, 24 अक्टूबर 2026
- शनिवार (कार्तिक कृष्ण पक्ष) — शनिवार, 31 अक्टूबर 2026
- शनिवार (कार्तिक कृष्ण पक्ष) — शनिवार, 7 नवंबर 2026
- शनिवार (कार्तिक शुक्ल पक्ष) — शनिवार, 14 नवंबर 2026
- शनिवार (कार्तिक शुक्ल पक्ष) — शनिवार, 21 नवंबर 2026
- शनिवार (मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष) — शनिवार, 28 नवंबर 2026
- शनिवार (मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष) — शनिवार, 5 दिसंबर 2026
शनिवार **शनि देव** (सूर्य-पुत्र, कर्म-फलदाता) का वार है — और हनुमानजी का भी, जिनकी शरण में शनि पीड़ा नहीं देते। शनिवार व्रत मुख्यतः साढ़ेसाती (चंद्र-राशि से शनि का साढ़े सात वर्ष का गोचर), ढैया, कुंडली में शनि-दोष, लंबी बीमारी, ऋण, नौकरी-बाधा और कोर्ट-कचहरी की शांति के लिए रखा जाता है — 7, 11 या 19 शनिवार (कुछ जीवन-भर), काले/नीले वस्त्र, शाम को पीपल के नीचे सरसों-तेल का दीप, शनि-मंदिर में तेल-तिल-उड़द, शनि-स्तोत्र और हनुमान-चालीसा।
शनि न्याय के देवता हैं — डराने वाले नहीं; मान्यता है कि श्रम, सत्य, सेवा और दान से वे प्रसन्न होते हैं। ऊपर आने वाले शनिवार (माह-पक्ष सहित); नीचे विधि, सामग्री, कथा (राजा विक्रमादित्य), भोग, दान, इलाक़ों की रीत और सवाल-जवाब। शनिवार को हनुमान-पूजा की रीत मंगलवार-पन्ने पर भी है।
महत्व — यह व्रत क्यों
शनि: सूर्य व छाया के पुत्र, कर्म-फल के दाता, धैर्य-श्रम-सेवा-न्याय-आयु-दुःख के कारक; काला/नीला रंग, लोहा, तेल, तिल, उड़द, कंबल, नीलम इनके; शनि की दृष्टि व गोचर (साढ़ेसाती/ढैया) जीवन में परीक्षा लाते हैं — पर शास्त्र कहता है शनि निष्पक्ष हैं, सत्कर्मी को उठाते हैं।
साढ़ेसाती: चंद्र-राशि से 12वें, 1ले, 2रे भाव में शनि का गोचर (लगभग साढ़े सात वर्ष) — तीन चरण; ढैया: चंद्र से 4थे/8वें में (ढाई वर्ष)। इनमें शनिवार व्रत, तेल-दान, शनि-स्तोत्र, हनुमान-सेवा, ग़रीब-सेवक-मज़दूर की सहायता — शांति-उपाय; अपनी राशि की साढ़ेसाती-स्थिति कुंडली से जाँचें।
हनुमान व पीपल: शनि ने हनुमानजी को वचन दिया कि उनके भक्तों को नहीं सताएँगे — इसलिए शनिवार को हनुमान-चालीसा/सुंदरकांड; पीपल में विष्णु-वास व शनि की प्रियता — शनिवार शाम पीपल पर सरसों-तेल का दीप और जल-परिक्रमा शनि-शांति का सबसे प्रचलित उपाय।
शनि-मंदिर व शनिश्चरी अमावस्या: शिंगणापुर (महाराष्ट्र), कोकिलावन (मथुरा), तिरुनल्लार (तमिलनाडु), शनि-धाम दिल्ली; शनिवार की अमावस्या «शनिश्चरी अमावस्या» विशेष — तेल-अभिषेक, तिल-दान।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
शनिवार व्रत की घरेलू विधि — शुक्ल पक्ष के शनिवार (या शनिश्चरी अमावस्या/श्रावण) से आरंभ, 7/11/19 शनिवार; पूजा सुबह घर पर, शाम पीपल/शनि-मंदिर।
- सुबह: स्नान (जल में काले तिल), काले/नीले/गहरे वस्त्र; पूजा-स्थान पर काला कपड़ा, शनि देव का चित्र या लोहे/काले पत्थर की प्रतिमा (या शनि-यंत्र); हनुमानजी का चित्र साथ।
- संकल्प: «मैं (नाम) 7/11/19 शनिवार शनि देव का व्रत (साढ़ेसाती-शांति/रोग-ऋण-मुक्ति/कार्य-सिद्धि) हेतु रखूँगा/रखूँगी; एक समय भोजन, तेल-तिल दान» — जल छोड़ें।
- पूजन: सरसों-तेल का दीपक (लोहे/मिट्टी के दीये में), काले तिल, उड़द, काला वस्त्र, नीले/काले फूल (नीला अपराजिता/काला गुलाब न हो तो कोई गहरा फूल), लोहे की कील/छल्ला, काला चना; शनि-चित्र पर तेल का तिलक (मूर्ति हो तो तेल-अभिषेक); «ॐ शं शनैश्चराय नमः» 108 बार या «ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः»; शनि-स्तोत्र (दशरथ-कृत) / शनि-चालीसा।
- हनुमान: हनुमान-चालीसा (1/7/11), सुंदरकांड (हो सके तो), «ॐ हं हनुमते नमः»; हनुमानजी को सिंदूर-चमेली, गुड़-चना, बूँदी-लड्डू।
- दिन में: एक समय भोजन — काली उड़द की खिचड़ी/दाल, काले तिल-गुड़ के लड्डू, सरसों-तेल में बनी वस्तु (कुछ घर), या फलाहार; मौन/संयम, किसी सेवक-मज़दूर-ग़रीब को कष्ट नहीं, दान का संकल्प।
- शाम (सूर्यास्त — प्रदोष): पीपल के नीचे सरसों-तेल का दीप (काले तिल डालकर), जल चढ़ाना (दूध-जल — कुछ रीत), 7 परिक्रमा, «शनि-शांति» प्रार्थना; शनि-मंदिर में तेल (लोहे के पात्र से), काले तिल, उड़द, काला वस्त्र, लोहा, कंबल, छाता, जूते (ज़रूरतमंद को) दान; शनि की मूर्ति के सामने खड़े होकर (आमने-सामने दृष्टि से बचने की परंपरा — तिरछे/चरण देखें) प्रणाम।
- दान (व्रत का प्राण): सरसों-तेल, काले तिल, उड़द, काला कंबल/वस्त्र, लोहा, जूते-चप्पल, छाता, काली गाय/कुत्ते-कौवे को रोटी, मज़दूर-सफ़ाईकर्मी-सेवक को भोजन/धन — शनिवार को; शनि-शांति के लिए «श्रम व सेवा» ही सच्चा दान।
- उद्यापन (7/11/19वाँ शनिवार): शनि-हनुमान पूजा, तेल-तिल-उड़द-कंबल-लोहे का दान, ग़रीब/श्रमिकों को भोजन, शनि-स्तोत्र/चालीसा-पाठ, पीपल पर दीप-वस्त्र; ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को दक्षिणा; कुंडली से शनि-स्थिति देख तिल-हवन (पंडित से) वैकल्पिक।
पूजा-सामग्री की सूची
सरसों-तेल, काले तिल, उड़द, लोहा, काला वस्त्र — शनि की सादी सूची; दान की सामग्री ही असली पूजा।
- शनि देव का चित्र/लोहे-काले पत्थर की प्रतिमा/शनि-यंत्र, हनुमान-चित्र, काला-नीला कपड़ा, चौकी
- सरसों-तेल (पूजा, दीप, अभिषेक, दान), लोहे/मिट्टी का दीया, काले तिल, साबुत उड़द, काला चना, लोहे की कील/छल्ला
- काला/नीला वस्त्र, नीले-गहरे फूल (अपराजिता), धूप-गुग्गुल, कपूर, अक्षत (काले तिल मिले), रोली (हनुमान हेतु सिंदूर)
- भोग: उड़द-दाल की खिचड़ी, काले तिल-गुड़ के लड्डू, तिल की रेवड़ी, इमरती (हनुमान), गुड़-चना, केला
- पाठ: शनि-स्तोत्र (दशरथ-कृत), शनि-चालीसा, हनुमान-चालीसा, सुंदरकांड; शनि-मंत्र-माला (काला हकीक/लोहा — पंडित से)
- दान: सरसों-तेल (लोहे/मिट्टी के पात्र में), काले तिल, उड़द, काला कंबल, काला वस्त्र, लोहे की वस्तु, जूते-चप्पल, छाता, कोयला (कुछ रीत), कुत्ते-कौवे-काली गाय को रोटी
- पीपल-पूजा: सरसों-तेल का दीप, काले तिल, जल (दूध मिला — कुछ रीत), कच्चा सूत; शनि-मंदिर हेतु लोहे का पात्र
- उद्यापन: शनि-हनुमान पूजा-सामग्री, ब्राह्मण/ज़रूरतमंद दक्षिणा, श्रमिकों का भोजन, तिल-हवन-सामग्री (वैकल्पिक)
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राजा विक्रमादित्य और शनि की कथा: उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की सभा में एक बार नवग्रहों में «सबसे बड़ा कौन» पर बहस हुई; पंडितों ने शनि को छोड़ सबकी प्रशंसा की — राजा ने भी शनि को क्रूर व छोटा कहा। शनि देव रुष्ट हुए — «विक्रम, तुम मेरा प्रभाव नहीं जानते; जब मैं तुम्हारी राशि पर आऊँगा (साढ़ेसाती) तब देखना।» समय आया — शनि घोड़े-व्यापारी बनकर आए; राजा ने एक सुंदर घोड़ा ख़रीदा, उस पर बैठते ही घोड़ा उसे घने वन में उड़ा ले गया और ग़ायब हो गया। भूखा-प्यासा राजा भटका, एक व्यापारी ने सहारा दिया — पर उसी के घर सोने का हार खूँटी (चित्र में बनी) निगलती दिखी और राजा चोर ठहरा; राजा के हाथ-पैर कटवा दिए गए।
एक तेली ने दया कर उसे कोल्हू पर बैठाया — अपंग राजा बैलों को हाँकता, रात में मेघ-मल्हार गाता; उस नगर की राजकुमारी उस गीत पर मोहित हुई और हठ कर अपंग तेली-सेवक से विवाह किया। साढ़े सात वर्ष पूरे हुए — शनि देव स्वप्न में प्रकट हुए: «विक्रम, यह मेरे अपमान का फल था; अब तेरी परीक्षा पूरी।» राजा ने क्षमा माँगी और प्रार्थना की — «जैसा कष्ट मुझे दिया, वैसा किसी और को न देना।» शनि बोले — «जो शनिवार को मेरा व्रत रखे, तेल-तिल-उड़द दान करे, पीपल पर दीप जलाए, मेरी कथा सुने — उसे मैं पीड़ा नहीं दूँगा।» राजा के हाथ-पैर लौट आए, खूँटी ने हार उगल दिया, सत्य प्रकट हुआ, राजकुमारी सहित विक्रमादित्य उज्जैन लौटे और सबने शनिवार-व्रत अपनाया। सीख — शनि किसी को नहीं छोड़ते, पर श्रद्धा-दान-सेवा से कष्ट सह्य हो जाता है; किसी ग्रह/व्यक्ति का उपहास न करें।
दूसरी कथा (पिप्पलाद/हनुमान-वचन): ऋषि पिप्पलाद ने शनि से पिता की मृत्यु का बदला लेने को ब्रह्मदंड उठाया — शनि लँगड़ाए; ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने वचन दिया कि वे 16 वर्ष से कम आयु व पिप्पलाद (पीपल) के भक्तों को नहीं सताएँगे — इसलिए पीपल-पूजा; और हनुमानजी से लंका में हारकर शनि ने वचन दिया कि हनुमान-भक्तों को नहीं सताएँगे — इसलिए शनिवार को हनुमान-चालीसा।
उड़द-खिचड़ी, तिल-गुड़, सरसों-तेल; एक समय सादा भोजन
शनि को काली उड़द, काले तिल, गुड़ और सरसों-तेल प्रिय — भोग व दान दोनों में। व्रत-भोजन एक समय: उड़द की खिचड़ी/दाल, तिल-गुड़ के लड्डू, सरसों-तेल में बनी सब्ज़ी (कुछ घर), या फलाहार; लहसुन-प्याज़-माँस-मद्य नहीं; शाम को पीपल-दीप के बाद भोजन (कुछ रीत)।
- भोग: उड़द-दाल की खिचड़ी (काली उड़द-चावल, हल्दी कम, घी), काले तिल-गुड़ के लड्डू, तिल की रेवड़ी-गजक, गुड़; हनुमानजी को इमरती/बूँदी-लड्डू, गुड़-चना
- व्रत-थाली: उड़द-खिचड़ी या उड़द-दाल-रोटी, सरसों-तेल में बनी आलू/बैंगन की सब्ज़ी (कुछ घर), तिल-गुड़, दही (चलता है — शनि-व्रत में खट्टे की मनाही नहीं)
- फलाहार: केला, सेब, दूध, तिल-लड्डू, मूँगफली-गुड़; काली किशमिश (कुछ)
- दान-भोजन: श्रमिक/सफ़ाईकर्मी/ज़रूरतमंद को पूरा भोजन (दाल-रोटी-सब्ज़ी-खिचड़ी); कुत्ते-कौवे-काली गाय को तेल-चुपड़ी रोटी
- वर्जित: माँस-मद्य-लहसुन-प्याज़; शनिवार को तेल-लोहा-काला वस्त्र-नमक ख़रीदना (लोक-मान्यता — दान करें, ख़रीदें नहीं; मत भिन्न), दक्षिण-यात्रा (कुछ रीत)
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
पूरे भारत में शनिवार शनि का — पीपल-दीप, तेल-दान, हनुमान-चालीसा सब जगह; शनि-मंदिरों और रीत के ब्योरे इलाक़े-इलाक़े अलग।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- 7/11/19 शनिवार — शुक्ल पक्ष/श्रावण/शनि-अमावस्या से आरंभ; शनि-मंत्र 108, शनि-स्तोत्र, हनुमान-चालीसा
- शाम को पीपल पर सरसों-तेल का दीप + जल + 7 परिक्रमा; शनि-मंदिर में तेल-तिल-उड़द (लोहे के पात्र से)
- दान ही शनि-पूजा: तेल, तिल, उड़द, कंबल, लोहा, जूते-छाता; श्रमिक-सेवक-ग़रीब को भोजन-धन; कुत्ते-कौवे को रोटी
- श्रम-सत्य-सेवा-विनम्रता का नियम; बुज़ुर्ग/सेवक का सम्मान — शनि न्याय के देवता
- साढ़ेसाती/ढैया कुंडली से जाँचें (राशि व चरण) — व्रत के साथ कर्म-सुधार; बीमार/गर्भवती व्रत की जगह दान-पाठ
❌ क्या न करें
- शनि-प्रतिमा के आमने-सामने खड़े होकर दृष्टि मिलाना (लोक-परंपरा — तिरछे/चरण देखें), उनकी मूर्ति घर के भीतर (मंदिर में ही — मत भिन्न)
- शनिवार को तेल-लोहा-काला वस्त्र-नमक-कंबल-चप्पल ख़रीदना (लोक-मान्यता — दान करें); बाल-नाख़ून (कुछ रीत)
- सेवक-मज़दूर-ग़रीब-अपंग-बुज़ुर्ग का अपमान, ऋण देना (शनिवार), माँस-मद्य-लहसुन-प्याज़
- नीलम बिना कुंडली-जाँच (शनि-रत्न सबसे संवेदनशील); शनि से भय/तंत्र-टोटके, डराने वाले «शनि-दोष निवारण» वाले ठगों पर पैसा
- पीपल को रात में छूना/तोड़ना (लोक-नियम — दीप सूर्यास्त के आसपास), दीप जलाकर छोड़ना — देखरेख
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अगला शनिवार व्रत कब और 2026 में शनिवार/शनिश्चरी अमावस्या कब?
ऊपर सूची में आने वाले 12 शनिवार माह-पक्ष सहित; अमावस्या-पन्ने पर शनिवार वाली अमावस्या «(शनिश्चरी)» लिखी मिलेगी। आरंभ शुक्ल पक्ष के शनिवार, श्रावण-शनिवार या शनिश्चरी अमावस्या से श्रेष्ठ।
साढ़ेसाती में शनिवार व्रत कैसे करें?
पहले कुंडली से चंद्र-राशि और साढ़ेसाती का चरण देखें; फिर 7/11/19 शनिवार — सुबह शनि-हनुमान पूजा, शनि-मंत्र/स्तोत्र, हनुमान-चालीसा, एक समय भोजन, शाम पीपल-दीप, तेल-तिल-उड़द-कंबल दान, ग़रीब-सेवा; साढ़ेसाती-भर हर शनिवार पीपल-दीप व दान चलता रहे।
पीपल पर दीप कब और कैसे?
शनिवार शाम सूर्यास्त के आसपास (प्रदोष — ऊपर समय) पीपल की जड़ में सरसों-तेल का दीप (काले तिल डालकर), जल चढ़ाकर 7 परिक्रमा, शनि-शांति प्रार्थना; रात में पीपल छूने की लोक-मनाही है, इसलिए सूर्यास्त के साथ।
शनि-मूर्ति के सामने क्यों नहीं खड़े होते?
लोक-परंपरा — शनि की दृष्टि (क्रूर-दृष्टि की ज्योतिष-मान्यता) से बचने को भक्त तिरछे खड़े होकर चरण देखते हैं; शिंगणापुर में चबूतरे पर भक्त पीठ नहीं करते पर सीधा नहीं देखते; भाव श्रद्धा का है, भय का नहीं।
व्रत में क्या खाएँ?
एक समय — उड़द-खिचड़ी/दाल, तिल-गुड़, सरसों-तेल की सब्ज़ी (कुछ घर), दही चल सकता है; या फलाहार; लहसुन-प्याज़-माँस-मद्य नहीं; कई घर शाम पीपल-दीप के बाद भोजन।
शनिवार को तेल-लोहा क्यों नहीं ख़रीदते?
लोक-मान्यता — शनिवार शनि की वस्तुएँ (तेल, लोहा, काला वस्त्र, नमक, कंबल, जूते) ख़रीदने से शनि-कोप, दान से कृपा; शास्त्रीय विधान नहीं, पर घर-घर मानी जाती है — दान करें, ख़रीद टालें।
कितने शनिवार, उद्यापन कैसे, नीलम पहनें?
7, 11 या 19 (साढ़ेसाती में लगातार); उद्यापन — शनि-हनुमान पूजा, तेल-तिल-उड़द-कंबल-लोहे का दान, श्रमिकों का भोजन, स्तोत्र-पाठ, दक्षिणा; नीलम केवल कुंडली-जाँच व पंडित/ज्योतिषी की सलाह से — ग़लत नीलम हानि की मान्यता।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता (शनि-कथा) पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। साढ़ेसाती/शनि-दोष/नीलम ज्योतिष-मान्यता है — कुंडली-जाँच व पंडित-सलाह के बिना रत्न न पहनें; भय-आधारित टोटकों व ठगी से बचें; स्वास्थ्य-स्थिति में व्रत न रखें।
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