🌗 एकादशी व्रत 2026
अगली एकादशी कब है — हर महीने दो एकादशी — कृष्ण व शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि; विष्णु का व्रत, चावल-अनाज वर्जित, अगले दिन द्वादशी में पारण; 24 एकादशियों के नाम-फल, ऊपर आने वाली 12 तिथियाँ।
- परिवर्तिनी एकादशी — मंगलवार, 22 सितंबर 2026
- इंदिरा एकादशी — मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026
- पापांकुशा एकादशी — गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
- रमा एकादशी — गुरुवार, 5 नवंबर 2026
- देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी — शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
- उत्पन्ना एकादशी — शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026
- मोक्षदा एकादशी — रविवार, 20 दिसंबर 2026
- सफला एकादशी — रविवार, 3 जनवरी 2027
- पौष पुत्रदा एकादशी — मंगलवार, 19 जनवरी 2027
- षट्तिला एकादशी — मंगलवार, 2 फ़रवरी 2027
- जया एकादशी — बुधवार, 17 फ़रवरी 2027
- विजया एकादशी — बुधवार, 3 मार्च 2027
एकादशी हर चंद्र-मास में दो बार आती है — कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि; साल में 24 (अधिक मास में 26)। यह भगवान विष्णु का सबसे बड़ा व्रत है — पद्म-पुराण में इसे «व्रतों की माता» कहा गया; इस दिन चावल व अनाज नहीं खाया जाता, फलाहार या निर्जला रहकर विष्णु-पूजा, रात्रि-जागरण और अगले दिन द्वादशी में पारण किया जाता है।
हर एकादशी का अपना नाम व कथा है — निर्जला, देवशयनी, कामिका, देवउठनी, मोक्षदा, षट्तिला, आमलकी… ऊपर इस महीने की और आने वाली 12 एकादशियों की तिथियाँ नाम-सहित (दिल्ली के सूर्योदय-तिथि से); घर की स्त्रियाँ प्रायः दोनों या केवल शुक्ल-पक्ष की एकादशी रखती हैं। नीचे व्रत-विधि, क्या खाएँ-क्या नहीं, पारण-नियम, 24 एकादशियों की सूची, कथा और इलाक़ों की रीत।
महत्व — यह व्रत क्यों
पद्म-पुराण: एकादशी के दिन अन्न (विशेषतः चावल) में पाप का वास; व्रत से पाप-नाश, विष्णु-लोक, मनोकामना-पूर्ति; निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल) अकेली 24 का फल देती है; देवशयनी से देवउठनी तक चातुर्मास की एकादशियाँ विशेष; मोक्षदा (गीता-जयंती), पुत्रदा (संतान), जया-विजया (सफलता), आमलकी (आँवला), पापमोचनी।
व्रत का समय-नियम: उदया-तिथि (सूर्योदय के समय एकादशी) वाला दिन व्रत का; एकादशी दो सूर्योदय छुए (तिथि-वृद्धि) तो स्मार्त पहले दिन, वैष्णव दूसरे दिन; दशमी-विद्धा (सूर्योदय से पहले दशमी का अंश) होने पर वैष्णव अगला दिन लेते हैं — इसीलिए कभी पंचांगों में «स्मार्त/वैष्णव एकादशी» अलग लिखी होती है; ऊपर की तिथियाँ स्मार्त (गृहस्थ) नियम से।
पारण द्वादशी में सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीत जाने पर, द्वादशी समाप्त होने से पहले — द्वादशी छोड़कर त्रयोदशी में पारण दोष माना गया; पारण में चावल शुभ। आयुर्वेद-दृष्टि: पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार — पाचन-विश्राम, चंद्र-प्रभाव (एकादशी को चंद्र-बल मन पर तीव्र — संयम का दिन)।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह गृहस्थ की सरल एकादशी-विधि है — दशमी की शाम से द्वादशी के पारण तक; किसी भी एकादशी पर वही, नामी एकादशियों की अपनी विशेष रीत उनके पन्नों पर।
- दशमी की शाम: सात्विक भोजन (चावल-मसूर-लहसुन-प्याज़ नहीं — कई घर), सूर्यास्त के बाद कुछ नहीं; ब्रह्मचर्य; तुलसी-पत्ते आज ही तोड़ लें (एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित)।
- एकादशी सुबह: ब्रह्म-मुहूर्त/सूर्योदय पर स्नान, पीले वस्त्र; संकल्प — «(नाम) एकादशी का व्रत, निर्जला/फलाहार, द्वादशी में पारण»; विष्णु/लक्ष्मी-नारायण/शालिग्राम की पूजा — पंचामृत, पीला चंदन, तुलसी-दल (अनिवार्य), पीले फूल, धूप-दीप, नैवेद्य (फल-पंजीरी-मखाना-खीर), «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» 108, विष्णु-सहस्रनाम/उस एकादशी की कथा।
- दिन में: निर्जला (सामर्थ्य) या फलाहार — फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू-सिंघाड़ा, आलू, सेंधा नमक; चावल-गेहूँ-दाल-बैंगन-मसूर-तेल-मसाला नहीं; दिन में सोना नहीं, झूठ-कलह-क्रोध नहीं; गीता/भागवत-पाठ, विष्णु-नाम जप।
- शाम (प्रदोष): विष्णु-आरती, तुलसी-दीप, «ॐ जय जगदीश हरे»; रात्रि-जागरण — भजन-कीर्तन/विष्णु-सहस्रनाम (हो सके तो; न हो तो जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठें)।
- दान: एकादशी को अन्न-वस्त्र-जल-छाता (ऋतु से), पीली वस्तु, गाय-चारा; ब्राह्मण/ग़रीब को द्वादशी को भोजन कराकर तब स्वयं पारण।
- द्वादशी — पारण (ऊपर तिथि-खिड़की देखें): सूर्योदय के बाद, हरि-वासर टालकर, द्वादशी रहते; पहले तुलसी-जल/चरणामृत, फिर चावल-युक्त सात्विक भोजन (चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर); द्वादशी दोपहर से पहले समाप्त हो तो सुबह-सवेरे पारण — पंचांग पर सटीक समय।
- स्त्रियों की रीत: मासिक-धर्म में पूजा नहीं, व्रत का फलाहार-रूप रख सकती हैं (कई परंपराएँ); गर्भवती/स्तनपान-काल में फलाहार-दूध; पति-पत्नी दोनों रखें तो पारण साथ।
- उद्यापन: लगातार वर्ष-भर/चातुर्मास की एकादशियाँ रखकर देवउठनी या उत्पन्ना एकादशी पर उद्यापन — विष्णु-पूजा, हवन, 12 ब्राह्मण-भोजन, दान; फिर व्रत चलता रहे।
पूजा-सामग्री की सूची
विष्णु-पूजा की सामग्री + फलाहार का सामान — हर एकादशी की सूची।
- विष्णु/लक्ष्मी-नारायण चित्र या शालिग्राम, पीला कपड़ा, चौकी, कलश, आम के पत्ते, नारियल
- तुलसी-दल (दशमी को तोड़े), पंचामृत, गंगाजल, पीला चंदन, अक्षत (तिल/जौ — चावल नहीं), पीले फूल-माला
- धूप, घी-दीपक, कपूर, आरती-थाली, मौली, पान-सुपारी, दक्षिणा
- नैवेद्य: फल (केला-सेब-अनार), पंजीरी, मखाना-खीर, पेड़ा, मिश्री, केसर-दूध
- फलाहार: साबूदाना, कुट्टू/सिंघाड़े का आटा, आलू-शकरकंद, समा (वरई) चावल, मूँगफली, सेंधा नमक, दही, फल, मेवे
- पाठ: विष्णु-सहस्रनाम, गीता, उस एकादशी की कथा (एकादशी-महात्म्य पुस्तक)
- दान: अन्न, वस्त्र, जल-पात्र, छाता/कंबल (ऋतु), पीले वस्त्र-चना
- पारण: चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर, तुलसी-जल
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
एकादशी-देवी की उत्पत्ति (उत्पन्ना एकादशी — मार्गशीर्ष कृष्ण): मुर नामक दैत्य ने देवताओं को हराकर स्वर्ग जीत लिया; विष्णु ने उससे युद्ध कर थककर बद्रिकाश्रम की गुफ़ा में योग-निद्रा ली; मुर ने सोए विष्णु पर वार करना चाहा तो विष्णु के शरीर से एक तेजस्वी कन्या प्रकट हुई जिसने मुर का वध किया — विष्णु ने उसे «एकादशी» नाम व वर दिया: «जो तुम्हारी तिथि पर व्रत करेगा, उसके पाप नष्ट, मुझे प्रिय होगा»। इसी से एकादशी विष्णु-प्रिया, अन्न-त्याग (मुर का वास अन्न में — लोक-मान्यता)।
अंबरीष-दुर्वासा: राजा अंबरीष द्वादशी के पारण-समय दुर्वासा ऋषि के लौटने की प्रतीक्षा में जल पीकर (पारण-मर्यादा रखने) पारण करने लगे; क्रोधित दुर्वासा ने कृत्या भेजी, विष्णु के सुदर्शन ने ऋषि का पीछा किया — अंत में अंबरीष की क्षमा से बचे; सीख — पारण द्वादशी में ही, जल से भी पारण मान्य, भक्त की रक्षा विष्णु करते हैं।
रुक्मांगद-मोहिनी (नारद-पुराण): राजा रुक्मांगद ने राज्य-भर में एकादशी-व्रत अनिवार्य किया — यमलोक खाली; ब्रह्मा ने मोहिनी भेजी, उसने राजा से एकादशी तोड़ने या पुत्र धर्मांगद का सिर माँगा — राजा ने व्रत नहीं तोड़ा, विष्णु प्रकट हुए, पुत्र-राजा सबको वैकुंठ। हर एकादशी की अपनी कथा (पद्म/भविष्य/स्कंद-पुराण) व्रत-दिन पढ़ी जाती है — नामी एकादशियों के पन्नों पर।
फलाहार — साबूदाना, कुट्टू, समा, फल, दूध; पारण चावल से
एकादशी को अन्न वर्जित — विशेषतः चावल, गेहूँ, दाल, बैंगन, मसूर, प्याज़-लहसुन; फलाहार में साबूदाना-कुट्टू-सिंघाड़ा-समा-आलू-फल-दूध-मेवे, सेंधा नमक; विष्णु का भोग तुलसी-सहित; द्वादशी का पारण चावल-दाल से; क्षेत्र-अनुसार फराळ (महाराष्ट्र-गुजरात), उपवास-सद्य (दक्षिण), निर्जला (बिहार-यूपी कठोर रीत)।
- साबूदाना खिचड़ी/वड़ा/खीर (मूँगफली-आलू-सेंधा नमक), समा (वरई/भगर) का भात-खीर, राजगिरा-लड्डू/पराठा
- कुट्टू/सिंघाड़े की पूड़ी-पकौड़ी-चीला, आलू-जीरा, शकरकंद, अरबी, लौकी-कद्दू की सब्ज़ी, दही-रायता (सेंधा नमक)
- फल (केला-सेब-पपीता-अनार-अंगूर), नारियल-पानी, दूध, छाछ, मखाना, मेवे, खजूर; निर्जला वाले — कुछ नहीं
- विष्णु-भोग: पंजीरी, मखाना-खीर, केसर-दूध, फल, पेड़ा — तुलसी-दल के बिना भोग अधूरा
- महाराष्ट्र/गुजरात फराळ: साबूदाणा-वड़ा, मोरैयो-खिचड़ी, रताळे-कीस, फराळी चेवड़ा; दक्षिण: वरगु-अरिसी (समा) पोंगल, फल; बंगाल-ओडिशा: फल-दूध-लुची (कुछ घर), ओडिशा में «एकादशी-अभड़ा» नहीं (चावल-रहित)
- पारण (द्वादशी): चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर, तुलसी-जल पहले; कई रीत में कद्दू/तोरई; ब्राह्मण/ग़रीब को भोजन कराकर
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
पंढरपुर की एकादशी, गुजरात की अग्यारस, दक्षिण की उपवास-द्वादशी पारण, ओडिशा की जगन्नाथ-एकादशी — एक तिथि, अनेक रूप।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- उदया-तिथि (ऊपर सूची) पर व्रत; पारण द्वादशी में हरि-वासर टालकर — पंचांग से सटीक समय
- विष्णु-पूजा में तुलसी-दल अनिवार्य (दशमी को तोड़ा); पीले वस्त्र-फूल
- चावल-अनाज त्याग, फलाहार सात्विक; दिन में न सोएँ, नाम-जप/पाठ
- दान — अन्न-जल-वस्त्र; ब्राह्मण/ग़रीब को द्वादशी को भोजन
- गर्भवती/रोगी/बुज़ुर्ग फलाहार-दूध; स्वास्थ्य पहले
❌ क्या न करें
- चावल व चावल से बनी चीज़ें, गेहूँ-दाल-बैंगन-मसूर-प्याज़-लहसुन, बासी/बाहर का भोजन
- एकादशी को तुलसी तोड़ना, बाल-नाख़ून, तेल-मालिश (कुछ रीत), दिन में सोना
- पारण त्रयोदशी तक खींचना, हरि-वासर में पारण, या द्वादशी में पारण छोड़ देना
- झूठ, निंदा, क्रोध, कलह, तामसिक मनोरंजन — व्रत का सार संयम है
- जबरन निर्जला — कमज़ोरी/चक्कर में जल-फल लें; बच्चों पर व्रत नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अगली एकादशी कब है? 2026 की एकादशी-तिथियाँ?
ऊपर हीरो में अगली एकादशी की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) और नीचे आने वाली 12 एकादशियाँ नाम-सहित दी हैं — स्मार्त (गृहस्थ) उदया-तिथि नियम से; अपने शहर व वैष्णव-संप्रदाय के अनुसार कभी एक दिन का अंतर हो सकता है — पंचांग/मंदिर से मिला लें।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी में अंतर क्या है?
जब एकादशी दशमी-विद्धा हो (सूर्योदय से ठीक पहले दशमी का अंश) या दो सूर्योदय छुए, वैष्णव (इस्कॉन, श्रीवैष्णव, माध्व) अगला दिन (शुद्ध एकादशी) व्रत रखते हैं, स्मार्त-गृहस्थ पहला दिन; पंचांग में दोनों लिखी होती हैं; अपने संप्रदाय की मानें — ऊपर की सूची स्मार्त है।
पारण का सही समय?
द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीतने पर, और द्वादशी समाप्त होने से पहले — प्रायः सुबह 6:30-9 के बीच; द्वादशी दोपहर से पहले ख़त्म हो तो सूर्योदय के तुरंत बाद; ऊपर तिथि-खिड़की से द्वादशी-समाप्ति देखें, पंचांग पर सटीक पारण-समय।
क्या स्त्रियाँ हर एकादशी रख सकती हैं? मासिक-धर्म में?
हाँ — बहुत-सी स्त्रियाँ दोनों एकादशी रखती हैं; मासिक-धर्म में पूजा-स्पर्श नहीं पर फलाहार-नियम रखा जा सकता है (परंपरा-भेद); गर्भावस्था-स्तनपान में फलाहार-दूध-फल; निर्जला केवल स्वस्थ व्यक्ति के लिए; व्रत का सार संयम व स्मरण है, कष्ट नहीं।
24 एकादशियों के नाम?
चैत्र: पापमोचनी (कृ), कामदा (शु); वैशाख: वरूथिनी, मोहिनी; ज्येष्ठ: अपरा, निर्जला; आषाढ़: योगिनी, देवशयनी; श्रावण: कामिका, पुत्रदा; भाद्रपद: अजा, परिवर्तिनी; आश्विन: इंदिरा, पापांकुशा; कार्तिक: रमा, देवउठनी; मार्गशीर्ष: उत्पन्ना, मोक्षदा; पौष: सफला, पुत्रदा; माघ: षट्तिला, जया; फाल्गुन: विजया, आमलकी; अधिक मास: परमा (कृ), पद्मिनी (शु) — अमांत माह-गणना; ऊपर सूची में हर तिथि का नाम है।
एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते?
पद्म-पुराण में एकादशी को अन्न (चावल) में पाप-वास; लोक-कथा में महर्षि मेधा का अंश/मुर दैत्य का वास चावल में; आयुर्वेद में पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार से पाचन-विश्राम व चंद्र-प्रभाव में संयम; द्वादशी को चावल से पारण शुभ — इसलिए वर्जन एक दिन का ही।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व संप्रदाय (स्मार्त/वैष्णव) की रीत सर्वोपरि है। तिथियाँ दिल्ली के सूर्योदय-तिथि से — अपने शहर का पंचांग व पारण-समय मिला लें; स्वास्थ्य-स्थिति में निर्जला न रखें।
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