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🪔 व्रत-त्योहार

🌗 एकादशी व्रत 2026

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

अगली एकादशी कब है — हर महीने दो एकादशी — कृष्ण व शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि; विष्णु का व्रत, चावल-अनाज वर्जित, अगले दिन द्वादशी में पारण; 24 एकादशियों के नाम-फल, ऊपर आने वाली 12 तिथियाँ।

अगली एकादशी व्रत
मंगलवार, 22 सितंबर 2026
परिवर्तिनी एकादशी
भाद्रपद · शुक्ल पक्ष · एकादशी (विक्रम संवत 2083)
🌅 सूर्योदय6:09 AM
📿 तिथि-कालएकादशी 21 सितंबर, 8:01 PM → 22 सितंबर, 9:43 PM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:49 AM – 12:37 PM
🪔 प्रदोष काल6:18 PM – 8:42 PM
⛔ राहुकाल (टालें)03:15 PM – 04:46 PM
आने वाली तिथियाँ
  • परिवर्तिनी एकादशी — मंगलवार, 22 सितंबर 2026
  • इंदिरा एकादशी — मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026
  • पापांकुशा एकादशी — गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
  • रमा एकादशी — गुरुवार, 5 नवंबर 2026
  • देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी — शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
  • उत्पन्ना एकादशी — शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026
  • मोक्षदा एकादशी — रविवार, 20 दिसंबर 2026
  • सफला एकादशी — रविवार, 3 जनवरी 2027
  • पौष पुत्रदा एकादशी — मंगलवार, 19 जनवरी 2027
  • षट्तिला एकादशी — मंगलवार, 2 फ़रवरी 2027
  • जया एकादशी — बुधवार, 17 फ़रवरी 2027
  • विजया एकादशी — बुधवार, 3 मार्च 2027
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

एकादशी हर चंद्र-मास में दो बार आती है — कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि; साल में 24 (अधिक मास में 26)। यह भगवान विष्णु का सबसे बड़ा व्रत है — पद्म-पुराण में इसे «व्रतों की माता» कहा गया; इस दिन चावल व अनाज नहीं खाया जाता, फलाहार या निर्जला रहकर विष्णु-पूजा, रात्रि-जागरण और अगले दिन द्वादशी में पारण किया जाता है।

हर एकादशी का अपना नाम व कथा है — निर्जला, देवशयनी, कामिका, देवउठनी, मोक्षदा, षट्तिला, आमलकी… ऊपर इस महीने की और आने वाली 12 एकादशियों की तिथियाँ नाम-सहित (दिल्ली के सूर्योदय-तिथि से); घर की स्त्रियाँ प्रायः दोनों या केवल शुक्ल-पक्ष की एकादशी रखती हैं। नीचे व्रत-विधि, क्या खाएँ-क्या नहीं, पारण-नियम, 24 एकादशियों की सूची, कथा और इलाक़ों की रीत।

महत्व — यह व्रत क्यों

पद्म-पुराण: एकादशी के दिन अन्न (विशेषतः चावल) में पाप का वास; व्रत से पाप-नाश, विष्णु-लोक, मनोकामना-पूर्ति; निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल) अकेली 24 का फल देती है; देवशयनी से देवउठनी तक चातुर्मास की एकादशियाँ विशेष; मोक्षदा (गीता-जयंती), पुत्रदा (संतान), जया-विजया (सफलता), आमलकी (आँवला), पापमोचनी।

व्रत का समय-नियम: उदया-तिथि (सूर्योदय के समय एकादशी) वाला दिन व्रत का; एकादशी दो सूर्योदय छुए (तिथि-वृद्धि) तो स्मार्त पहले दिन, वैष्णव दूसरे दिन; दशमी-विद्धा (सूर्योदय से पहले दशमी का अंश) होने पर वैष्णव अगला दिन लेते हैं — इसीलिए कभी पंचांगों में «स्मार्त/वैष्णव एकादशी» अलग लिखी होती है; ऊपर की तिथियाँ स्मार्त (गृहस्थ) नियम से।

पारण द्वादशी में सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीत जाने पर, द्वादशी समाप्त होने से पहले — द्वादशी छोड़कर त्रयोदशी में पारण दोष माना गया; पारण में चावल शुभ। आयुर्वेद-दृष्टि: पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार — पाचन-विश्राम, चंद्र-प्रभाव (एकादशी को चंद्र-बल मन पर तीव्र — संयम का दिन)।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

यह गृहस्थ की सरल एकादशी-विधि है — दशमी की शाम से द्वादशी के पारण तक; किसी भी एकादशी पर वही, नामी एकादशियों की अपनी विशेष रीत उनके पन्नों पर।

  1. दशमी की शाम: सात्विक भोजन (चावल-मसूर-लहसुन-प्याज़ नहीं — कई घर), सूर्यास्त के बाद कुछ नहीं; ब्रह्मचर्य; तुलसी-पत्ते आज ही तोड़ लें (एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित)।
  2. एकादशी सुबह: ब्रह्म-मुहूर्त/सूर्योदय पर स्नान, पीले वस्त्र; संकल्प — «(नाम) एकादशी का व्रत, निर्जला/फलाहार, द्वादशी में पारण»; विष्णु/लक्ष्मी-नारायण/शालिग्राम की पूजा — पंचामृत, पीला चंदन, तुलसी-दल (अनिवार्य), पीले फूल, धूप-दीप, नैवेद्य (फल-पंजीरी-मखाना-खीर), «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» 108, विष्णु-सहस्रनाम/उस एकादशी की कथा।
  3. दिन में: निर्जला (सामर्थ्य) या फलाहार — फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू-सिंघाड़ा, आलू, सेंधा नमक; चावल-गेहूँ-दाल-बैंगन-मसूर-तेल-मसाला नहीं; दिन में सोना नहीं, झूठ-कलह-क्रोध नहीं; गीता/भागवत-पाठ, विष्णु-नाम जप।
  4. शाम (प्रदोष): विष्णु-आरती, तुलसी-दीप, «ॐ जय जगदीश हरे»; रात्रि-जागरण — भजन-कीर्तन/विष्णु-सहस्रनाम (हो सके तो; न हो तो जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठें)।
  5. दान: एकादशी को अन्न-वस्त्र-जल-छाता (ऋतु से), पीली वस्तु, गाय-चारा; ब्राह्मण/ग़रीब को द्वादशी को भोजन कराकर तब स्वयं पारण।
  6. द्वादशी — पारण (ऊपर तिथि-खिड़की देखें): सूर्योदय के बाद, हरि-वासर टालकर, द्वादशी रहते; पहले तुलसी-जल/चरणामृत, फिर चावल-युक्त सात्विक भोजन (चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर); द्वादशी दोपहर से पहले समाप्त हो तो सुबह-सवेरे पारण — पंचांग पर सटीक समय।
  7. स्त्रियों की रीत: मासिक-धर्म में पूजा नहीं, व्रत का फलाहार-रूप रख सकती हैं (कई परंपराएँ); गर्भवती/स्तनपान-काल में फलाहार-दूध; पति-पत्नी दोनों रखें तो पारण साथ।
  8. उद्यापन: लगातार वर्ष-भर/चातुर्मास की एकादशियाँ रखकर देवउठनी या उत्पन्ना एकादशी पर उद्यापन — विष्णु-पूजा, हवन, 12 ब्राह्मण-भोजन, दान; फिर व्रत चलता रहे।

पूजा-सामग्री की सूची

विष्णु-पूजा की सामग्री + फलाहार का सामान — हर एकादशी की सूची।

  • विष्णु/लक्ष्मी-नारायण चित्र या शालिग्राम, पीला कपड़ा, चौकी, कलश, आम के पत्ते, नारियल
  • तुलसी-दल (दशमी को तोड़े), पंचामृत, गंगाजल, पीला चंदन, अक्षत (तिल/जौ — चावल नहीं), पीले फूल-माला
  • धूप, घी-दीपक, कपूर, आरती-थाली, मौली, पान-सुपारी, दक्षिणा
  • नैवेद्य: फल (केला-सेब-अनार), पंजीरी, मखाना-खीर, पेड़ा, मिश्री, केसर-दूध
  • फलाहार: साबूदाना, कुट्टू/सिंघाड़े का आटा, आलू-शकरकंद, समा (वरई) चावल, मूँगफली, सेंधा नमक, दही, फल, मेवे
  • पाठ: विष्णु-सहस्रनाम, गीता, उस एकादशी की कथा (एकादशी-महात्म्य पुस्तक)
  • दान: अन्न, वस्त्र, जल-पात्र, छाता/कंबल (ऋतु), पीले वस्त्र-चना
  • पारण: चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर, तुलसी-जल

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व्रत-कथा

एकादशी-देवी की उत्पत्ति (उत्पन्ना एकादशी — मार्गशीर्ष कृष्ण): मुर नामक दैत्य ने देवताओं को हराकर स्वर्ग जीत लिया; विष्णु ने उससे युद्ध कर थककर बद्रिकाश्रम की गुफ़ा में योग-निद्रा ली; मुर ने सोए विष्णु पर वार करना चाहा तो विष्णु के शरीर से एक तेजस्वी कन्या प्रकट हुई जिसने मुर का वध किया — विष्णु ने उसे «एकादशी» नाम व वर दिया: «जो तुम्हारी तिथि पर व्रत करेगा, उसके पाप नष्ट, मुझे प्रिय होगा»। इसी से एकादशी विष्णु-प्रिया, अन्न-त्याग (मुर का वास अन्न में — लोक-मान्यता)।

अंबरीष-दुर्वासा: राजा अंबरीष द्वादशी के पारण-समय दुर्वासा ऋषि के लौटने की प्रतीक्षा में जल पीकर (पारण-मर्यादा रखने) पारण करने लगे; क्रोधित दुर्वासा ने कृत्या भेजी, विष्णु के सुदर्शन ने ऋषि का पीछा किया — अंत में अंबरीष की क्षमा से बचे; सीख — पारण द्वादशी में ही, जल से भी पारण मान्य, भक्त की रक्षा विष्णु करते हैं।

रुक्मांगद-मोहिनी (नारद-पुराण): राजा रुक्मांगद ने राज्य-भर में एकादशी-व्रत अनिवार्य किया — यमलोक खाली; ब्रह्मा ने मोहिनी भेजी, उसने राजा से एकादशी तोड़ने या पुत्र धर्मांगद का सिर माँगा — राजा ने व्रत नहीं तोड़ा, विष्णु प्रकट हुए, पुत्र-राजा सबको वैकुंठ। हर एकादशी की अपनी कथा (पद्म/भविष्य/स्कंद-पुराण) व्रत-दिन पढ़ी जाती है — नामी एकादशियों के पन्नों पर।

फलाहार — साबूदाना, कुट्टू, समा, फल, दूध; पारण चावल से

एकादशी को अन्न वर्जित — विशेषतः चावल, गेहूँ, दाल, बैंगन, मसूर, प्याज़-लहसुन; फलाहार में साबूदाना-कुट्टू-सिंघाड़ा-समा-आलू-फल-दूध-मेवे, सेंधा नमक; विष्णु का भोग तुलसी-सहित; द्वादशी का पारण चावल-दाल से; क्षेत्र-अनुसार फराळ (महाराष्ट्र-गुजरात), उपवास-सद्य (दक्षिण), निर्जला (बिहार-यूपी कठोर रीत)।

  • साबूदाना खिचड़ी/वड़ा/खीर (मूँगफली-आलू-सेंधा नमक), समा (वरई/भगर) का भात-खीर, राजगिरा-लड्डू/पराठा
  • कुट्टू/सिंघाड़े की पूड़ी-पकौड़ी-चीला, आलू-जीरा, शकरकंद, अरबी, लौकी-कद्दू की सब्ज़ी, दही-रायता (सेंधा नमक)
  • फल (केला-सेब-पपीता-अनार-अंगूर), नारियल-पानी, दूध, छाछ, मखाना, मेवे, खजूर; निर्जला वाले — कुछ नहीं
  • विष्णु-भोग: पंजीरी, मखाना-खीर, केसर-दूध, फल, पेड़ा — तुलसी-दल के बिना भोग अधूरा
  • महाराष्ट्र/गुजरात फराळ: साबूदाणा-वड़ा, मोरैयो-खिचड़ी, रताळे-कीस, फराळी चेवड़ा; दक्षिण: वरगु-अरिसी (समा) पोंगल, फल; बंगाल-ओडिशा: फल-दूध-लुची (कुछ घर), ओडिशा में «एकादशी-अभड़ा» नहीं (चावल-रहित)
  • पारण (द्वादशी): चावल-दाल-सब्ज़ी-खीर, तुलसी-जल पहले; कई रीत में कद्दू/तोरई; ब्राह्मण/ग़रीब को भोजन कराकर

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

पंढरपुर की एकादशी, गुजरात की अग्यारस, दक्षिण की उपवास-द्वादशी पारण, ओडिशा की जगन्नाथ-एकादशी — एक तिथि, अनेक रूप।

उत्तर प्रदेश-बिहार-मध्य प्रदेश-राजस्थान: «एकादशी/ग्यारस» — प्रायः स्त्रियाँ दोनों एकादशी, कई घर सिर्फ़ शुक्ल/या निर्जला-देवशयनी-देवउठनी जैसी बड़ी; निर्जला (ज्येष्ठ) पर जल-कलश-पंखा-दान, देवउठनी पर तुलसी-विवाह, मोक्षदा पर गीता-पाठ; बिहार में «एकादशी» पर चावल-त्याग कठोर, बुज़ुर्ग स्त्रियाँ 24 की 24; मप्र-राजस्थान में «ग्यारस» — मंदिर-जागरण, मालवा में «कार्तिक-ग्यारस» का मेला।
महाराष्ट्र-गोवा (आषाढ़ी-कार्तिकी): आषाढ़ी (देवशयनी) व कार्तिकी (देवउठनी) एकादशी सबसे बड़ी — पंढरपुर वारी, लाखों वारकरी; हर एकादशी को उपवास (साबूदाणा-खिचड़ी, वरी), विठोबा-भजन; «एकादशी दुप्पट खाशी» (लोकोक्ति — फराळ में ज़्यादा न खाएँ); स्मार्त-भागवत (वैष्णव) एकादशी अलग-अलग पंचांग में लिखी होती है; गोवा में «एकादशी» पर मंदिरों में भजन।
गुजरात-सौराष्ट्र: «अग्यारस» — देवपोढ़ी (देवशयनी) व देवउठी (प्रबोधिनी) अग्यारस मुख्य, चातुर्मास की सब अग्यारस स्त्रियाँ रखतीं; फराळ (मोरैयो, साबूदाणा-वड़ा, फराळी चेवड़ा, सिंगोड़ा-लोट); स्वामिनारायण-वल्लभ-संप्रदाय में निर्जला-एकादशी कठोर (जल भी नहीं); डाकोर-द्वारका में एकादशी-दर्शन।
तमिलनाडु-कर्नाटक-आंध्र-केरल: «एकादशी उपवास» — श्रीवैष्णव (अय्यंगार)-माध्व परंपरा में हर एकादशी अनिवार्य निर्जला/फलाहार, अगली सुबह द्वादशी-पारण «भोजन» निश्चित समय पर (अगत्ती-कीरै-सुंडक्काई — पारण के तीन पदार्थ, तमिल); वैकुंठ एकादशी (मार्गशीर्ष शुक्ल — श्रीरंगम-तिरुपति का स्वर्ग-द्वार) सबसे बड़ी; कर्नाटक-उडुपी में «एकादशी» पर माध्व-मठों का उपवास; केरल में गुरुवायूर एकादशी (वृश्चिक/मार्गशीर्ष)।
बंगाल-ओडिशा-असम: बंगाल में «एकादशी» — वैष्णव व विधवा-स्त्रियों की परंपरा में निर्जला (आज कम), गौड़ीय-वैष्णव (इस्कॉन-मायापुर) में हर एकादशी अनाज-त्याग व नाम-कीर्तन, «भीमा एकादशी» (निर्जला); ओडिशा में जगन्नाथ-परंपरा — «एकादशी-ओसा», देवशयनी-प्रबोधिनी-बकुला-अमला; असम के सत्रों में एकादशी-भाओना।
पंजाब-हरियाणा-दिल्ली-हिमाचल: «एकादशी» — वैष्णव-मंदिरों में जागरण, निर्जला व देवउठनी पर बड़ी भीड़; पंजाब में «निर्जला ग्यारस» पर छबील (मीठा जल) — सिख-हिंदू दोनों; दिल्ली में इस्कॉन-बिड़ला-मंदिर के एकादशी-कार्यक्रम; हिमाचल में «एकादशी» पर देव-मंदिरों में उपवास, कुल्लू में «गुरु-एकादशी»।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • उदया-तिथि (ऊपर सूची) पर व्रत; पारण द्वादशी में हरि-वासर टालकर — पंचांग से सटीक समय
  • विष्णु-पूजा में तुलसी-दल अनिवार्य (दशमी को तोड़ा); पीले वस्त्र-फूल
  • चावल-अनाज त्याग, फलाहार सात्विक; दिन में न सोएँ, नाम-जप/पाठ
  • दान — अन्न-जल-वस्त्र; ब्राह्मण/ग़रीब को द्वादशी को भोजन
  • गर्भवती/रोगी/बुज़ुर्ग फलाहार-दूध; स्वास्थ्य पहले

❌ क्या न करें

  • चावल व चावल से बनी चीज़ें, गेहूँ-दाल-बैंगन-मसूर-प्याज़-लहसुन, बासी/बाहर का भोजन
  • एकादशी को तुलसी तोड़ना, बाल-नाख़ून, तेल-मालिश (कुछ रीत), दिन में सोना
  • पारण त्रयोदशी तक खींचना, हरि-वासर में पारण, या द्वादशी में पारण छोड़ देना
  • झूठ, निंदा, क्रोध, कलह, तामसिक मनोरंजन — व्रत का सार संयम है
  • जबरन निर्जला — कमज़ोरी/चक्कर में जल-फल लें; बच्चों पर व्रत नहीं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगली एकादशी कब है? 2026 की एकादशी-तिथियाँ?

ऊपर हीरो में अगली एकादशी की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) और नीचे आने वाली 12 एकादशियाँ नाम-सहित दी हैं — स्मार्त (गृहस्थ) उदया-तिथि नियम से; अपने शहर व वैष्णव-संप्रदाय के अनुसार कभी एक दिन का अंतर हो सकता है — पंचांग/मंदिर से मिला लें।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में अंतर क्या है?

जब एकादशी दशमी-विद्धा हो (सूर्योदय से ठीक पहले दशमी का अंश) या दो सूर्योदय छुए, वैष्णव (इस्कॉन, श्रीवैष्णव, माध्व) अगला दिन (शुद्ध एकादशी) व्रत रखते हैं, स्मार्त-गृहस्थ पहला दिन; पंचांग में दोनों लिखी होती हैं; अपने संप्रदाय की मानें — ऊपर की सूची स्मार्त है।

पारण का सही समय?

द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीतने पर, और द्वादशी समाप्त होने से पहले — प्रायः सुबह 6:30-9 के बीच; द्वादशी दोपहर से पहले ख़त्म हो तो सूर्योदय के तुरंत बाद; ऊपर तिथि-खिड़की से द्वादशी-समाप्ति देखें, पंचांग पर सटीक पारण-समय।

क्या स्त्रियाँ हर एकादशी रख सकती हैं? मासिक-धर्म में?

हाँ — बहुत-सी स्त्रियाँ दोनों एकादशी रखती हैं; मासिक-धर्म में पूजा-स्पर्श नहीं पर फलाहार-नियम रखा जा सकता है (परंपरा-भेद); गर्भावस्था-स्तनपान में फलाहार-दूध-फल; निर्जला केवल स्वस्थ व्यक्ति के लिए; व्रत का सार संयम व स्मरण है, कष्ट नहीं।

24 एकादशियों के नाम?

चैत्र: पापमोचनी (कृ), कामदा (शु); वैशाख: वरूथिनी, मोहिनी; ज्येष्ठ: अपरा, निर्जला; आषाढ़: योगिनी, देवशयनी; श्रावण: कामिका, पुत्रदा; भाद्रपद: अजा, परिवर्तिनी; आश्विन: इंदिरा, पापांकुशा; कार्तिक: रमा, देवउठनी; मार्गशीर्ष: उत्पन्ना, मोक्षदा; पौष: सफला, पुत्रदा; माघ: षट्तिला, जया; फाल्गुन: विजया, आमलकी; अधिक मास: परमा (कृ), पद्मिनी (शु) — अमांत माह-गणना; ऊपर सूची में हर तिथि का नाम है।

एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते?

पद्म-पुराण में एकादशी को अन्न (चावल) में पाप-वास; लोक-कथा में महर्षि मेधा का अंश/मुर दैत्य का वास चावल में; आयुर्वेद में पखवाड़े में एक दिन लघु-आहार से पाचन-विश्राम व चंद्र-प्रभाव में संयम; द्वादशी को चावल से पारण शुभ — इसलिए वर्जन एक दिन का ही।

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संदेश Nakshtra Tak की ओर से आएगा; नंबर किसी और को नहीं दिया जाता।

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यह भी पढ़ें: देवशयनी एकादशी · देवउठनी एकादशी · मोक्षदा एकादशी · प्रदोष व्रत (त्रयोदशी)

⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व संप्रदाय (स्मार्त/वैष्णव) की रीत सर्वोपरि है। तिथियाँ दिल्ली के सूर्योदय-तिथि से — अपने शहर का पंचांग व पारण-समय मिला लें; स्वास्थ्य-स्थिति में निर्जला न रखें।

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