📖 मोक्षदा एकादशी (गीता जयंती) 2026
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी — पितरों को मोक्ष देने वाला व्रत; इसी दिन कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया।
- मोक्षदा एकादशी / गीता जयंती — व्रत — रविवार, 20 दिसंबर 2026
- द्वादशी — पारण — सोमवार, 21 दिसंबर 2026
मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। नाम ही बताता है — «मोक्ष देने वाली»; मान्यता है कि इस व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करने से उन्हें मुक्ति मिलती है। इसी दिन महाभारत-युद्ध के पहले दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता सुनाई थी — इसलिए यह गीता जयंती भी है।
घर में स्त्रियाँ व्रत रखती हैं, विष्णु-पूजा करती हैं और गीता का पाठ (कम-से-कम एक अध्याय) करती-सुनती हैं; पितरों के लिए दान-तर्पण किया जाता है। नीचे इस साल की तिथि, पारण, विधि, सामग्री, कथा, फलाहार और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
पद्म-पुराण में इसे सब एकादशियों में «मोक्ष-प्रदायिनी» कहा गया — व्रती के साथ उसके पितरों तक को गति। जिनके पितर अशांत लगें, या श्राद्ध छूट गया हो, वे इस दिन का व्रत विशेष रूप से रखते हैं।
गीता जयंती — कुरुक्षेत्र में विशाल उत्सव, गीता-पाठ, «श्रीमद्भगवद्गीता की जय»; घर में गीता के 18 अध्यायों में से एक (प्रायः 12वाँ भक्ति-योग या 15वाँ पुरुषोत्तम-योग) पढ़ना पर्याप्त माना गया।
मार्गशीर्ष को कृष्ण ने «मासानां मार्गशीर्षोऽहम्» कहा है — यह उनका अपना महीना है; इसकी शुक्ल एकादशी विशेष फलदायी। एकादशी-व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी में — ऊपर तिथि दी है।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह एकादशी की सामान्य घरेलू विधि है — दशमी की शाम से संयम, एकादशी व्रत-पूजा-गीता, द्वादशी में पारण।
- दशमी की रात सात्विक भोजन और ब्रह्मचर्य; एकादशी को सूर्योदय से पहले स्नान, पीले वस्त्र, संकल्प — «मैं मोक्षदा एकादशी का व्रत अपने और पितरों के कल्याण हेतु करती हूँ।»
- विष्णु/लक्ष्मी-नारायण की पूजा — पंचामृत-स्नान, पीले फूल, तुलसी-दल, चंदन, धूप-दीप, नैवेद्य (फल-मिठाई); «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय» का 108 जप।
- गीता का पाठ — एक अध्याय (12वाँ/15वाँ) या पूरी गीता, परिवार बैठकर; गीता की पुस्तक को फूल-चंदन से पूजें, «गीता-आरती»।
- पितरों के लिए: दक्षिण मुख करके जल-तिल का तर्पण, ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को अन्न-वस्त्र-कंबल दान, गाय को चारा — व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करने का संकल्प बोलें।
- दिन-भर फलाहार/निर्जला (सामर्थ्य से); दिन में सोना नहीं, भजन-कीर्तन; शाम को तुलसी-चौरे पर दीप और विष्णु-आरती।
- रात्रि-जागरण (कर सकें तो) — गीता/विष्णु-सहस्रनाम; न हो सके तो कम-से-कम आधी रात तक भजन।
- पारण: द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि-वासर बीतने पर, द्वादशी समाप्ति से पहले — पहले ब्राह्मण-भोजन/दान, फिर तुलसी-दल के साथ स्वयं।
पूजा-सामग्री की सूची
सामग्री सादी है — गीता की पुस्तक और पीली वस्तुएँ मुख्य।
- विष्णु/लक्ष्मी-नारायण का चित्र या शालिग्राम, पीला कपड़ा, चौकी
- श्रीमद्भगवद्गीता की पुस्तक
- पंचामृत (दूध-दही-घी-शहद-शक्कर), गंगाजल, तुलसी-दल
- पीले फूल (गेंदा), चंदन, रोली, अक्षत, मौली
- दीपक (घी), धूप, कपूर, आरती-थाली
- फल, पीली मिठाई (बेसन-लड्डू/केसर-खीर), पान-सुपारी
- तर्पण को ताँबे का लोटा, काले तिल, कुश (हो तो)
- दान: अन्न, कंबल/ऊनी वस्त्र, गुड़-तिल, दक्षिणा
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गोकुल नगर के राजा वैखानस धर्मात्मा थे। एक रात स्वप्न में उन्होंने अपने पिता को नरक में यातना सहते देखा। व्याकुल राजा ने ब्राह्मणों से पूछा; उन्होंने पर्वत मुनि के आश्रम भेजा। मुनि ने ध्यान से देखा — राजा के पिता ने पूर्वजन्म में पत्नी के प्रति अपराध किया था, उसी का फल भोग रहे थे।
मुनि ने कहा — «मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (मोक्षदा) का व्रत विधि से करो और उसका पुण्य पिता को अर्पित कर दो।» राजा ने परिवार-सहित व्रत किया, रात जागरण किया और पुण्य पिता को दिया; पिता नरक से मुक्त होकर स्वर्ग गए और आकाश से आशीर्वाद दिया। तभी से यह एकादशी «मोक्षदा» कहलाई — जो व्रती के पितरों को मुक्ति देती है।
गीता जयंती — इसी तिथि को कुरुक्षेत्र में, युद्ध से ठीक पहले, मोह में डूबे अर्जुन को श्रीकृष्ण ने 700 श्लोकों में कर्म-भक्ति-ज्ञान का वह उपदेश दिया जो गीता है — «कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन»।
एकादशी का फलाहार और भोग
एकादशी को चावल-अनाज वर्जित; भोग पीला-सात्विक। मार्गशीर्ष की ठंड में सूखे मेवे, तिल और गुड़ की चीज़ें फलाहार में उत्तम।
- भोग: केसर-खीर (द्वादशी को) या दूध-मखाना, बेसन/बूंदी के लड्डू, फल, पंचामृत, तुलसी
- फलाहार: साबूदाना खीर/खिचड़ी, सिंघाड़े की पूड़ी, आलू, मूँगफली, बादाम-अखरोट, दूध, फल — सेंधा नमक
- पारण: तुलसी-जल, फिर दलिया/खिचड़ी या दाल-चावल (द्वादशी को अन्न ज़रूरी)
- पितरों के नाम का भोजन गाय-कौआ-कुत्ते को (पंच-बलि जैसा) और ब्राह्मण को
- बुज़ुर्ग-रोगी फल-दूध के साथ, निर्जला नहीं
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
गीता जयंती और मोक्षदा — कुरुक्षेत्र से लेकर ब्रज-ओडिशा तक अलग-अलग रंग।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
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✅ क्या करें
- व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करने का संकल्प ज़रूर बोलें — यही इस एकादशी का विशेष फल
- गीता का कम-से-कम एक अध्याय पूरे परिवार के साथ
- कंबल/ऊनी वस्त्र-दान — मार्गशीर्ष की ठंड में सबसे उपयोगी
- पारण द्वादशी के भीतर, हरि-वासर के बाद
- तुलसी-दल एक दिन पहले तोड़कर रखें
❌ क्या न करें
- एकादशी को चावल/अनाज, दिन में सोना, क्रोध — वर्जित
- तुलसी-दल एकादशी को न तोड़ें
- द्वादशी बीतने के बाद पारण नहीं
- गीता की पुस्तक ज़मीन पर न रखें, चौकी/आसन पर
- अस्वस्थ निर्जला न रखें
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोक्षदा एकादशी 2026 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी है — पंचांग-गणना से; पारण की द्वादशी भी वहीं है।
मोक्षदा एकादशी और वैकुंठ एकादशी एक ही हैं?
दक्षिण भारत की वैकुंठ एकादशी धनुर्मास (सौर-मार्गशीर्ष) की शुक्ल एकादशी है — कई वर्षों में यही तिथि होती है, कुछ वर्षों में पौष की। उत्तर भारत में मोक्षदा नाम चलता है।
पितरों को व्रत का पुण्य कैसे अर्पित करें?
पूजा के अंत में हाथ में जल-तिल लेकर बोलें — «मेरे इस व्रत का पुण्य मेरे पितरों (नाम) को प्राप्त हो, उन्हें मोक्ष मिले» — और जल दक्षिण दिशा में छोड़ दें; साथ में उनके नाम से अन्न-वस्त्र दान।
गीता का कौन-सा अध्याय पढ़ें?
पूरी न हो सके तो 12वाँ (भक्ति-योग, 20 श्लोक) या 15वाँ (पुरुषोत्तम-योग, 20 श्लोक) — छोटे और सार-रूप; या 2रा अध्याय (सांख्य-योग)। बच्चों से 47वाँ श्लोक (कर्मण्येवाधिकारस्ते) कंठस्थ कराना अच्छी रीत है।
एकादशी का पारण कब करें?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि-वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीत जाने पर और द्वादशी समाप्त होने से पहले; प्रायः सुबह 7-9 के बीच।
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है।
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