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🪔 व्रत-त्योहार

🐕 दत्तात्रेय जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) 2026

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

अगहन की पूर्णिमा — ब्रह्मा-विष्णु-महेश के संयुक्त अवतार भगवान दत्तात्रेय का जन्मदिन; गुरु-तत्व की पूजा, पूर्णिमा-व्रत और अन्नपूर्णा जयंती।

दत्तात्रेय जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) 2026 की तिथि
बुधवार, 23 दिसंबर 2026
मार्गशीर्ष · शुक्ल पक्ष · पूर्णिमा (विक्रम संवत 2083)
🌅 सूर्योदय7:10 AM
🪔 प्रदोष काल5:30 PM – 7:54 PM
🌙 चंद्रोदय4:37 PM
📿 तिथि-कालपूर्णिमा 23 दिसंबर, 10:47 AM → 24 दिसंबर, 6:58 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त
⛔ राहुकाल (टालें)12:20 PM – 01:37 PM
अगले वर्ष — 2027: सोमवार, 13 दिसंबर 2027
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

दत्तात्रेय जयंती मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है — मोक्षदा एकादशी के चार दिन बाद। इस दिन प्रदोष-काल में ऋषि अत्रि और माता अनसूया के घर भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ — तीन मुख, छह भुजाएँ, साथ में चार कुत्ते (चार वेद) और गाय (धरती)। वे आदि-गुरु माने जाते हैं, इसलिए यह गुरु-परंपरा का पर्व है।

इसी पूर्णिमा को उत्तर भारत में अन्नपूर्णा जयंती भी है — रसोई और अन्न की देवी की पूजा, जो घर की स्त्री का अपना पर्व है: चूल्हे-रसोई की सफ़ाई और पूजा, अन्न-दान। नीचे इस साल की तिथि, प्रदोष-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।

महत्व — यह व्रत क्यों

दत्तात्रेय तीनों देवों की एकता के प्रतीक हैं और 24 गुरुओं (धरती, वायु, जल, मधुमक्खी, हाथी…) से सीखने वाले «अवधूत» — इस दिन गुरु-स्मरण, सीखने की विनम्रता और अन्न के सम्मान का भाव है। महाराष्ट्र-कर्नाटक-गुजरात में दत्त-संप्रदाय का यह सबसे बड़ा दिन है।

अन्नपूर्णा जयंती — काशी की अन्नपूर्णा देवी, जिनसे शिव ने भिक्षा माँगी थी; घर की स्त्रियाँ इस दिन रसोई-चूल्हे की पूजा करके संकल्प लेती हैं कि घर से कोई भूखा न लौटे। अन्न-दान इस दिन सबसे बड़ा दान।

पूर्णिमा-व्रत, चंद्र-अर्घ्य और सत्यनारायण-कथा भी इसी दिन; मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को मृगशिरा नक्षत्र हो तो विशेष शुभ (महीने का नाम इसी नक्षत्र से है)।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

यह घरेलू विधि है — सुबह पूर्णिमा-स्नान व अन्नपूर्णा (रसोई) पूजा, शाम प्रदोष में दत्त-जन्मोत्सव।

  1. सुबह स्नान, संकल्प — «मैं मार्गशीर्ष पूर्णिमा का व्रत व दत्तात्रेय-अन्नपूर्णा पूजन परिवार-कल्याण हेतु करती हूँ।» दिन में फलाहार/एक समय भोजन।
  2. अन्नपूर्णा पूजा (सुबह): रसोई की सफ़ाई; चूल्हे/गैस को धोकर रोली-हल्दी से स्वस्तिक, अक्षत-फूल, दीप; अन्न-भंडार (आटा-चावल के डिब्बे) पर रोली-मौली; अन्नपूर्णा स्तोत्र या «ॐ अन्नपूर्णायै नमः» का जप; उस दिन पहली रोटी गाय को, और ज़रूरतमंद को अन्न-दान का संकल्प।
  3. दिन में गुरु-स्मरण — अपने गुरु/बड़ों को प्रणाम; दत्त-मंदिर हो तो दर्शन; «श्री गुरुदेव दत्त» / «दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा» का जप।
  4. शाम प्रदोष-काल (ऊपर समय — जन्म का समय) में दत्तात्रेय की मूर्ति/चित्र (तीन मुख, गाय-कुत्ते सहित) की पूजा — पंचामृत-स्नान, चंदन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य; दत्त-बावनी/गुरुचरित्र का अध्याय या दत्त-आरती «त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति दत्त हा जाणा»।
  5. कुत्ते और गाय को भोजन कराना इस दिन की विशेष रीत — दत्तात्रेय के साथी; ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को भोजन-दान।
  6. चंद्रोदय पर चंद्र-अर्घ्य; पूर्णिमा-व्रत खोलें; सत्यनारायण-कथा करवानी हो तो प्रदोष में उसी के साथ।
  7. रात में दत्त-भजन/गुरु-स्तुति; महाराष्ट्र की रीत में सात दिन पहले से गुरुचरित्र-पारायण का समापन आज।

पूजा-सामग्री की सूची

दत्त-चित्र न हो तो गुरु/इष्ट-चित्र से भी पूजा मान्य; अन्नपूर्णा के लिए रसोई ही मंदिर।

  • दत्तात्रेय की मूर्ति/चित्र (या गुरु/शिव-चित्र), चौकी, पीला-सफ़ेद कपड़ा
  • अन्नपूर्णा पूजा: रोली, हल्दी, अक्षत, मौली, फूल, दीप — चूल्हे व अन्न-भंडार पर
  • पंचामृत, गंगाजल, चंदन, तुलसी, बेलपत्र
  • फूल (सफ़ेद-पीले), फूल-माला, धूप, कपूर, आरती-थाली
  • नैवेद्य — खीर, पूरनपोली/लड्डू, फल, पान-सुपारी
  • गाय-कुत्ते के लिए रोटी-गुड़, दान का अन्न (आटा-चावल-दाल), कंबल
  • दत्त-बावनी/गुरुचरित्र/अन्नपूर्णा-स्तोत्र की पुस्तक
  • चंद्र-अर्घ्य को दूध-जल

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व्रत-कथा

ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया के पातिव्रत्य की चर्चा तीनों लोकों में थी। लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ईर्ष्या हुई; उन्होंने ब्रह्मा-विष्णु-महेश को भेजा कि अनसूया की परीक्षा लें। तीनों साधु-वेश में आश्रम आए और भिक्षा माँगी — शर्त यह कि अनसूया निर्वस्त्र होकर भोजन कराए।

अनसूया ने पति-चरणों के जल से तीनों को छह-छह महीने के शिशु बना दिया और माँ की तरह दूध पिलाया। देवियाँ पति लौटाने आईं, क्षमा माँगी; अनसूया के वर से तीनों देव एक होकर उनके पुत्र बने — तीन मुख, छह भुजा — यही दत्तात्रेय हैं («दत्त» = दिया हुआ, «आत्रेय» = अत्रि का पुत्र)। जन्म मार्गशीर्ष पूर्णिमा के प्रदोष-काल में हुआ।

दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए — धरती से सहनशीलता, वायु से अनासक्ति, जल से शीतलता, मधुमक्खी से संग्रह-दोष, हाथी से काम-दोष, अजगर से संतोष, समुद्र से गंभीरता, बालक से निश्छलता… — यह सीख कि गुरु हर जगह है, बस देखने वाला चाहिए। अन्नपूर्णा-कथा: काशी में शिव ने अन्न को माया कहा तो पार्वती ने सृष्टि से अन्न हटा लिया; भूख से व्याकुल शिव ने काशी में अन्नपूर्णा के रूप में पार्वती से भिक्षा माँगी — अन्न माया नहीं, ब्रह्म है।

पूर्णिमा-भोग और अन्नपूर्णा का अन्न-दान

इस दिन का भाव अन्न का सम्मान — भोग सादा, पर बाँटा हुआ। महाराष्ट्र में दत्त-जयंती की पूरनपोली और सुंठवड़ा (सोंठ-गुड़ का चूर्ण — प्रसाद), उत्तर भारत में खीर-पूड़ी।

  • भोग: खीर, पूरनपोली या बेसन-लड्डू, फल, पंचामृत; महाराष्ट्र में सुंठवड़ा (सोंठ-गुड़-घी) — जन्म का प्रसाद
  • व्रत: दिन में फल-दूध; प्रदोष-पूजा व चंद्र-अर्घ्य के बाद भोजन
  • अन्नपूर्णा: उस दिन घर में बना पहला भोजन गाय को, फिर ज़रूरतमंद/मंदिर को अन्न-दान (आटा-चावल-दाल-गुड़)
  • कुत्तों को रोटी-दूध — दत्त के चार साथी
  • सत्यनारायण-कथा हो तो पंजीरी-पंचामृत-केला

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

दत्त-संप्रदाय के प्रदेशों में यह बड़ा दिन है; उत्तर भारत में अन्नपूर्णा-पूर्णिमा के रूप में घरेलू।

महाराष्ट्र: «दत्त जयंती» — गाणगापुर, औदुंबर, नरसोबाची वाडी, माहुर के दत्त-क्षेत्रों में लाखों भक्त; सात दिन का गुरुचरित्र-पारायण आज पूरा; प्रदोष में जन्मोत्सव, पालने में दत्त-मूर्ति, सुंठवड़ा-प्रसाद, «दिगंबरा» का जयघोष; घरों में दत्त-बावनी।
कर्नाटक-आंध्र-तेलंगाना: दत्त-पीठ (मैसूर), बासर-आदि में उत्सव; कन्नड़ घरों में «दत्त जयंती» पर तिल-गुड़ का नैवेद्य और श्रीपाद श्रीवल्लभ, नृसिंह सरस्वती के गुरु-चरित्र का पाठ।
गुजरात: गिरनार (दत्तात्रेय शिखर) की परिक्रमा-यात्रा इसी के आस-पास; घरों में दत्त-बावनी (रंग अवधूत) का पाठ, «अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त»।
उत्तर प्रदेश-बिहार-मध्य प्रदेश: अन्नपूर्णा जयंती प्रमुख — काशी के अन्नपूर्णा मंदिर में खज़ाना-वितरण (धनतेरस से जुड़ा) व इस दिन विशेष भोग; घरों में रसोई-चूल्हे की पूजा, अन्न-दान, पूर्णिमा-व्रत, सत्यनारायण-कथा; अगहन की पूर्णिमा को «बटुक/दत्त पूर्णिमा» भी कहते हैं।
बंगाल-ओडिशा: मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर लक्ष्मी-नारायण पूजा; ओडिशा में «पंडु पूर्णिमा»/«मणबसा» का समापन-गुरुवार इसी के आस-पास, नई फ़सल के धान से लक्ष्मी-पूजा।
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दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • दत्त-पूजा प्रदोष-काल में (जन्म-समय) — ऊपर समय
  • रसोई-चूल्हे की पूजा और घर का पहला भोजन गाय को — अन्नपूर्णा का सार
  • अन्न-दान और कुत्ते-गाय को भोजन — इस दिन विशेष
  • गुरु/बड़ों को प्रणाम, उनसे आशीर्वाद
  • चंद्रोदय पर अर्घ्य, फिर व्रत खोलें

❌ क्या न करें

  • अन्न का अपमान — बचा खाना फेंकना — इस दिन विशेष रूप से वर्जित
  • कुत्ते को भगाना/मारना — दत्त के साथी
  • पूर्णिमा को मांस-मदिरा, कलह
  • रसोई गंदी न रहे — अन्नपूर्णा का वास वहीं
  • बुज़ुर्ग-रोगी निर्जला न रखें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दत्तात्रेय जयंती 2026 में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की मार्गशीर्ष पूर्णिमा है — पंचांग-गणना से; प्रदोष (जन्म-काल) व चंद्रोदय का दिल्ली-समय भी वहीं। पूर्णिमा तिथि जिस दिन प्रदोष में हो, वही दत्त-जयंती।

दत्तात्रेय कौन हैं और उनके साथ कुत्ते-गाय क्यों?

ब्रह्मा-विष्णु-महेश का संयुक्त रूप, अत्रि-अनसूया के पुत्र, आदि-गुरु/अवधूत; चार कुत्ते चार वेद और गाय धरती/धर्म का प्रतीक हैं — इसलिए इस दिन कुत्तों-गाय को भोजन।

अन्नपूर्णा जयंती क्या है?

इसी मार्गशीर्ष पूर्णिमा को माता अन्नपूर्णा (अन्न की देवी, काशी) का प्रकट-दिन; घर की स्त्रियाँ रसोई-चूल्हे की पूजा करती हैं, अन्न-दान करती हैं और संकल्प लेती हैं कि घर से कोई भूखा न जाए।

गुरुचरित्र-पारायण क्या है?

महाराष्ट्र-कर्नाटक में दत्त-भक्त दत्त जयंती से सात दिन पहले «श्री गुरुचरित्र» (52 अध्याय) का पाठ शुरू करके जयंती के दिन पूरा करते हैं; घर में एक अध्याय या दत्त-बावनी भी पर्याप्त।

क्या इस दिन सत्यनारायण कथा कर सकते हैं?

हाँ — हर पूर्णिमा की तरह; प्रदोष-काल में दत्त-पूजा के साथ या पहले। पंजीरी-पंचामृत-केले का प्रसाद।

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