🐕 दत्तात्रेय जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) 2026
अगहन की पूर्णिमा — ब्रह्मा-विष्णु-महेश के संयुक्त अवतार भगवान दत्तात्रेय का जन्मदिन; गुरु-तत्व की पूजा, पूर्णिमा-व्रत और अन्नपूर्णा जयंती।
दत्तात्रेय जयंती मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है — मोक्षदा एकादशी के चार दिन बाद। इस दिन प्रदोष-काल में ऋषि अत्रि और माता अनसूया के घर भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ — तीन मुख, छह भुजाएँ, साथ में चार कुत्ते (चार वेद) और गाय (धरती)। वे आदि-गुरु माने जाते हैं, इसलिए यह गुरु-परंपरा का पर्व है।
इसी पूर्णिमा को उत्तर भारत में अन्नपूर्णा जयंती भी है — रसोई और अन्न की देवी की पूजा, जो घर की स्त्री का अपना पर्व है: चूल्हे-रसोई की सफ़ाई और पूजा, अन्न-दान। नीचे इस साल की तिथि, प्रदोष-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
दत्तात्रेय तीनों देवों की एकता के प्रतीक हैं और 24 गुरुओं (धरती, वायु, जल, मधुमक्खी, हाथी…) से सीखने वाले «अवधूत» — इस दिन गुरु-स्मरण, सीखने की विनम्रता और अन्न के सम्मान का भाव है। महाराष्ट्र-कर्नाटक-गुजरात में दत्त-संप्रदाय का यह सबसे बड़ा दिन है।
अन्नपूर्णा जयंती — काशी की अन्नपूर्णा देवी, जिनसे शिव ने भिक्षा माँगी थी; घर की स्त्रियाँ इस दिन रसोई-चूल्हे की पूजा करके संकल्प लेती हैं कि घर से कोई भूखा न लौटे। अन्न-दान इस दिन सबसे बड़ा दान।
पूर्णिमा-व्रत, चंद्र-अर्घ्य और सत्यनारायण-कथा भी इसी दिन; मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को मृगशिरा नक्षत्र हो तो विशेष शुभ (महीने का नाम इसी नक्षत्र से है)।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — सुबह पूर्णिमा-स्नान व अन्नपूर्णा (रसोई) पूजा, शाम प्रदोष में दत्त-जन्मोत्सव।
- सुबह स्नान, संकल्प — «मैं मार्गशीर्ष पूर्णिमा का व्रत व दत्तात्रेय-अन्नपूर्णा पूजन परिवार-कल्याण हेतु करती हूँ।» दिन में फलाहार/एक समय भोजन।
- अन्नपूर्णा पूजा (सुबह): रसोई की सफ़ाई; चूल्हे/गैस को धोकर रोली-हल्दी से स्वस्तिक, अक्षत-फूल, दीप; अन्न-भंडार (आटा-चावल के डिब्बे) पर रोली-मौली; अन्नपूर्णा स्तोत्र या «ॐ अन्नपूर्णायै नमः» का जप; उस दिन पहली रोटी गाय को, और ज़रूरतमंद को अन्न-दान का संकल्प।
- दिन में गुरु-स्मरण — अपने गुरु/बड़ों को प्रणाम; दत्त-मंदिर हो तो दर्शन; «श्री गुरुदेव दत्त» / «दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा» का जप।
- शाम प्रदोष-काल (ऊपर समय — जन्म का समय) में दत्तात्रेय की मूर्ति/चित्र (तीन मुख, गाय-कुत्ते सहित) की पूजा — पंचामृत-स्नान, चंदन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य; दत्त-बावनी/गुरुचरित्र का अध्याय या दत्त-आरती «त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति दत्त हा जाणा»।
- कुत्ते और गाय को भोजन कराना इस दिन की विशेष रीत — दत्तात्रेय के साथी; ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को भोजन-दान।
- चंद्रोदय पर चंद्र-अर्घ्य; पूर्णिमा-व्रत खोलें; सत्यनारायण-कथा करवानी हो तो प्रदोष में उसी के साथ।
- रात में दत्त-भजन/गुरु-स्तुति; महाराष्ट्र की रीत में सात दिन पहले से गुरुचरित्र-पारायण का समापन आज।
पूजा-सामग्री की सूची
दत्त-चित्र न हो तो गुरु/इष्ट-चित्र से भी पूजा मान्य; अन्नपूर्णा के लिए रसोई ही मंदिर।
- दत्तात्रेय की मूर्ति/चित्र (या गुरु/शिव-चित्र), चौकी, पीला-सफ़ेद कपड़ा
- अन्नपूर्णा पूजा: रोली, हल्दी, अक्षत, मौली, फूल, दीप — चूल्हे व अन्न-भंडार पर
- पंचामृत, गंगाजल, चंदन, तुलसी, बेलपत्र
- फूल (सफ़ेद-पीले), फूल-माला, धूप, कपूर, आरती-थाली
- नैवेद्य — खीर, पूरनपोली/लड्डू, फल, पान-सुपारी
- गाय-कुत्ते के लिए रोटी-गुड़, दान का अन्न (आटा-चावल-दाल), कंबल
- दत्त-बावनी/गुरुचरित्र/अन्नपूर्णा-स्तोत्र की पुस्तक
- चंद्र-अर्घ्य को दूध-जल
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया के पातिव्रत्य की चर्चा तीनों लोकों में थी। लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ईर्ष्या हुई; उन्होंने ब्रह्मा-विष्णु-महेश को भेजा कि अनसूया की परीक्षा लें। तीनों साधु-वेश में आश्रम आए और भिक्षा माँगी — शर्त यह कि अनसूया निर्वस्त्र होकर भोजन कराए।
अनसूया ने पति-चरणों के जल से तीनों को छह-छह महीने के शिशु बना दिया और माँ की तरह दूध पिलाया। देवियाँ पति लौटाने आईं, क्षमा माँगी; अनसूया के वर से तीनों देव एक होकर उनके पुत्र बने — तीन मुख, छह भुजा — यही दत्तात्रेय हैं («दत्त» = दिया हुआ, «आत्रेय» = अत्रि का पुत्र)। जन्म मार्गशीर्ष पूर्णिमा के प्रदोष-काल में हुआ।
दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए — धरती से सहनशीलता, वायु से अनासक्ति, जल से शीतलता, मधुमक्खी से संग्रह-दोष, हाथी से काम-दोष, अजगर से संतोष, समुद्र से गंभीरता, बालक से निश्छलता… — यह सीख कि गुरु हर जगह है, बस देखने वाला चाहिए। अन्नपूर्णा-कथा: काशी में शिव ने अन्न को माया कहा तो पार्वती ने सृष्टि से अन्न हटा लिया; भूख से व्याकुल शिव ने काशी में अन्नपूर्णा के रूप में पार्वती से भिक्षा माँगी — अन्न माया नहीं, ब्रह्म है।
पूर्णिमा-भोग और अन्नपूर्णा का अन्न-दान
इस दिन का भाव अन्न का सम्मान — भोग सादा, पर बाँटा हुआ। महाराष्ट्र में दत्त-जयंती की पूरनपोली और सुंठवड़ा (सोंठ-गुड़ का चूर्ण — प्रसाद), उत्तर भारत में खीर-पूड़ी।
- भोग: खीर, पूरनपोली या बेसन-लड्डू, फल, पंचामृत; महाराष्ट्र में सुंठवड़ा (सोंठ-गुड़-घी) — जन्म का प्रसाद
- व्रत: दिन में फल-दूध; प्रदोष-पूजा व चंद्र-अर्घ्य के बाद भोजन
- अन्नपूर्णा: उस दिन घर में बना पहला भोजन गाय को, फिर ज़रूरतमंद/मंदिर को अन्न-दान (आटा-चावल-दाल-गुड़)
- कुत्तों को रोटी-दूध — दत्त के चार साथी
- सत्यनारायण-कथा हो तो पंजीरी-पंचामृत-केला
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
दत्त-संप्रदाय के प्रदेशों में यह बड़ा दिन है; उत्तर भारत में अन्नपूर्णा-पूर्णिमा के रूप में घरेलू।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- दत्त-पूजा प्रदोष-काल में (जन्म-समय) — ऊपर समय
- रसोई-चूल्हे की पूजा और घर का पहला भोजन गाय को — अन्नपूर्णा का सार
- अन्न-दान और कुत्ते-गाय को भोजन — इस दिन विशेष
- गुरु/बड़ों को प्रणाम, उनसे आशीर्वाद
- चंद्रोदय पर अर्घ्य, फिर व्रत खोलें
❌ क्या न करें
- अन्न का अपमान — बचा खाना फेंकना — इस दिन विशेष रूप से वर्जित
- कुत्ते को भगाना/मारना — दत्त के साथी
- पूर्णिमा को मांस-मदिरा, कलह
- रसोई गंदी न रहे — अन्नपूर्णा का वास वहीं
- बुज़ुर्ग-रोगी निर्जला न रखें
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दत्तात्रेय जयंती 2026 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की मार्गशीर्ष पूर्णिमा है — पंचांग-गणना से; प्रदोष (जन्म-काल) व चंद्रोदय का दिल्ली-समय भी वहीं। पूर्णिमा तिथि जिस दिन प्रदोष में हो, वही दत्त-जयंती।
दत्तात्रेय कौन हैं और उनके साथ कुत्ते-गाय क्यों?
ब्रह्मा-विष्णु-महेश का संयुक्त रूप, अत्रि-अनसूया के पुत्र, आदि-गुरु/अवधूत; चार कुत्ते चार वेद और गाय धरती/धर्म का प्रतीक हैं — इसलिए इस दिन कुत्तों-गाय को भोजन।
अन्नपूर्णा जयंती क्या है?
इसी मार्गशीर्ष पूर्णिमा को माता अन्नपूर्णा (अन्न की देवी, काशी) का प्रकट-दिन; घर की स्त्रियाँ रसोई-चूल्हे की पूजा करती हैं, अन्न-दान करती हैं और संकल्प लेती हैं कि घर से कोई भूखा न जाए।
गुरुचरित्र-पारायण क्या है?
महाराष्ट्र-कर्नाटक में दत्त-भक्त दत्त जयंती से सात दिन पहले «श्री गुरुचरित्र» (52 अध्याय) का पाठ शुरू करके जयंती के दिन पूरा करते हैं; घर में एक अध्याय या दत्त-बावनी भी पर्याप्त।
क्या इस दिन सत्यनारायण कथा कर सकते हैं?
हाँ — हर पूर्णिमा की तरह; प्रदोष-काल में दत्त-पूजा के साथ या पहले। पंजीरी-पंचामृत-केले का प्रसाद।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है।
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