🌳 करमा / करम पर्व (करमा एकादशी) 2026
भाद्रपद शुक्ल एकादशी — झारखंड-छत्तीसगढ़-ओडिशा-बिहार-बंगाल के आदिवासी-ग्रामीण समाज का भाई-बहन व फ़सल पर्व; बहनें भाई के लिए उपवास, जावा (जवारे) उगाना, करम-डाली की पूजा, रात-भर करमा-नृत्य-गीत; धर्मा-करमा भाइयों की कथा।
करमा (करम) पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है — गणेश चतुर्थी के एक सप्ताह बाद, जिउतिया से पहले। यह झारखंड (राजकीय पर्व), छत्तीसगढ़ (सरगुजा-जशपुर), ओडिशा (मयूरभंज-सुंदरगढ़), बिहार (सिंहभूम-संथाल परगना सीमा), बंगाल (पुरुलिया-बांकुड़ा) और असम के चाय-बाग़ानों के मुंडा, उराँव, संथाल, हो, खड़िया, कुड़मी (महतो), भूमिज, बैगा — और गाँव के सभी समाजों का पर्व है; करम-देवता (करम वृक्ष — *Adina cordifolia*, हल्दू) की डाली अखड़ा (आँगन) में रोपकर पूजा और रात-भर मांदर-नगाड़े पर करमा-नृत्य।
यह मूलतः बहन-भाई का पर्व है — कुँवारी कन्याएँ व स्त्रियाँ भाई की दीर्घायु-समृद्धि के लिए उपवास रखती हैं, सात-नौ दिन पहले जावा (बाँस की टोकरी में जौ-गेहूँ-मक्का-उड़द के अंकुर) उगाती हैं, करमा की रात करम-डाली व जावा की पूजा, पाहन (पुजारी) से धर्मा-करमा की कथा, अगली सुबह जावा-डाली का विसर्जन और भाई को जावा का अंकुर कान में खोंसना। ऊपर इस साल की तिथि व मुहूर्त (चंद्रोदय — रात-जागरण); नीचे विधि, सामग्री, कथा, पकवान और इलाक़ों की रीत।
महत्व — यह व्रत क्यों
करम = कर्म (भाग्य/परिश्रम) व करम-वृक्ष — करम-राजा (करम-देवता) फ़सल, संतान, समृद्धि व भाग्य के देवता; धर्मा-करमा कथा (नीचे) कर्म-श्रद्धा की सीख — जो करम-डाली/कर्म का अनादर करे, उसका सब नष्ट; भाद्रपद में खेतों में धान बढ़ रहा — अच्छी फ़सल की कामना, «जावा» (नए अंकुर) = उर्वरता का प्रतीक।
स्त्री-पर्व: बहनें भाई के लिए दिन-भर उपवास (कई निर्जला), जावा-टोकरी की नौ दिन सेवा (जल-दीप-गीत), करम-डाली के चारों ओर रात-भर नृत्य; अगली सुबह जावा के अंकुर भाई के कान/सिर पर खोंसना = रक्षा-आशीर्वाद — रक्षाबंधन का आदिवासी समकक्ष; विवाहिता बहनें मायके आतीं।
करमा के रूप: भाद्रपद शुक्ल एकादशी को «भादो करम/इंद-करम» (मुख्य), कुछ इलाक़ों में «जितिया करम» (आश्विन कृष्ण अष्टमी — जिउतिया के साथ), «दशहरा करम», «राजी करम» (आदिवासी राजाओं का) — झारखंड-सरकार की छुट्टी भादो करम पर; झारखंड-छत्तीसगढ़ में करमा-नृत्य लोक-धरोहर (मांदर, नगाड़ा, झूमर-गीत)।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह करमा की गाँव-घर की विधि है — जावा उगाने से करम-डाली की पूजा व विसर्जन तक; पाहन/बड़े-बुज़ुर्ग की अगुवाई में, हर गाँव की अपनी छटा।
- जावा उगाना (7-9 दिन पहले — प्रायः भाद्रपद शुक्ल तृतीया/पंचमी): कुँवारी कन्याएँ/स्त्रियाँ नदी-तालाब से बालू-मिट्टी लाकर बाँस की नई टोकरी (डलिया) में जौ-गेहूँ-मक्का-उड़द-चना-सरसों के बीज बोतीं; रोज़ सुबह-शाम स्नान कर जल-हल्दी-दीप, जावा-गीत («जावा उठाना»), टोकरी ऊँचे-पवित्र स्थान पर; अंकुर पीले-हरे निकलें।
- करमा की सुबह (एकादशी): बहनें उपवास (निर्जला/फलाहार), स्नान, नए/साफ़ वस्त्र, घर-आँगन (अखड़ा) की लिपाई-सजावट; भाई/युवक जंगल से करम-वृक्ष की डाली काटकर (बिना ज़मीन छुए, गीत-नगाड़े के साथ) लाते हैं — डाली को पीछे मुड़कर नहीं देखते।
- शाम (प्रदोष — ऊपर समय): अखड़ा के बीच करम-डाली रोपना (तीन डालियाँ भी), चारों ओर जावा-टोकरियाँ, दीप, फूल-अक्षत-हल्दी-सिंदूर-दूब, खीरा-ककड़ी-फल-मुरही (लाई)-गुड़, नारियल; कन्याएँ करम-डाली को सिंदूर-फूल, अपने जावा को डाली पर अर्पित; उपवास वाली बहनें हाथ में जावा लेकर बैठतीं।
- करम-कथा: पाहन/बुज़ुर्ग धर्मा-करमा की कथा (नीचे) सुनाते हैं, कन्याएँ हुँकारी भरतीं; कथा के बाद उपवास खोलना — खीरा, फल, लाई-गुड़, चावल-दूध (कई इलाक़े रात में पूरा भोजन बाद में)।
- रात-भर: करम-डाली के चारों ओर मांदर-नगाड़े-झाँझ पर करमा-नृत्य (गोल घेरा — स्त्री-पुरुष हाथ जोड़े), करमा-गीत (झूमर, डमकच, «करम राजा…»), हँड़िया (कुछ समाज); पूरा गाँव, बहन-भाई-भाभी; नए कपड़े-गहने।
- अगली सुबह (द्वादशी — विसर्जन): करम-डाली उखाड़कर गीत-नृत्य के साथ नदी-तालाब में विसर्जन; जावा के अंकुर तोड़कर बहनें भाइयों के कान/पगड़ी में खोंसतीं (रक्षा-आशीर्वाद), भाई बहन को उपहार-भेंट; जावा का अंश खेत-खलिहान व घर के मंदिर में — फ़सल-समृद्धि; बचे अंकुर गाय को।
- घर-रीत (गैर-आदिवासी ग्रामीण परिवार): करम-डाली न मिले तो शमी/पीपल-डाली या करम-चित्र; तुलसी-चौरा पर जावा; कथा-गीत; बहनें भाई की आरती-तिलक; इस दिन झारखंड में सब समाज नाचते हैं — «करम-अखड़ा» में जाना।
- जितिया-करम (आश्विन कृष्ण अष्टमी — कुछ इलाक़े): जिउतिया के साथ करम-डाली; उपवास वही; दशहरा-करम आश्विन शुक्ल दशमी; पंचांग/गाँव-पाहन से तिथि मिलाएँ।
पूजा-सामग्री की सूची
जावा की टोकरी-बीज, करम-डाली, सिंदूर-हल्दू-दूब, खीरा-लाई-गुड़, मांदर-नगाड़ा — करमा की सूची।
- जावा: बाँस की नई टोकरी (डलिया) 1-3, नदी की बालू-मिट्टी, बीज — जौ, गेहूँ, मक्का, उड़द, चना, सरसों, धान; हल्दी-जल, दीप
- करम-डाली (करम/हल्दू वृक्ष — *Adina cordifolia*; न मिले तो शमी/पीपल की), अखड़ा में गड्ढा, गोबर-लिपाई
- पूजा: सिंदूर, हल्दी, अक्षत (अरवा चावल), दूब, फूल (गेंदा-कमल), धूप-दीप (सरसों-तेल), नारियल, सुपारी-पान, मौली
- नैवेद्य/उपवास-भोजन: खीरा-ककड़ी (मुख्य), फल (केला-अमरूद), मुरही/लाई (खील), गुड़, चूड़ा-दही, चावल-दूध, तिल; रात्रि-भोज — चावल-दाल-सब्ज़ी, पीठा
- करमा-नृत्य: मांदर, नगाड़ा, ढोल, झाँझ, बाँसुरी; नए कपड़े (साड़ी — लाल-पीली पाड़), गहने, फूल-मुकुट (कन्याएँ)
- भाई के लिए: जावा के अंकुर (कान में खोंसने को), तिलक-आरती की थाली; भाई से बहन को भेंट
- कथा-गीत: धर्मा-करमा कथा (पाहन/पुस्तक), करमा-झूमर गीत; हुँकारी
- विसर्जन: नदी-तालाब तक गीत-नृत्य, खेत के लिए जावा का अंश
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
धर्मा और करमा दो भाई थे — करमा व्यापार के लिए परदेस गया, धर्मा घर पर खेती करता और करम-देवता की पूजा करता। करमा कमाकर लौटा तो देखा घर में करमा-पर्व की तैयारी — सब लोग करम-डाली के चारों ओर नाच रहे, कोई उसकी अगवानी को न आया; क्रोध में करमा ने करम-डाली उखाड़कर नदी में फेंक दी, जावा रौंद दिया। उसी क्षण उसका सब वैभव नष्ट — व्यापार डूबा, घर उजड़ा, रोग-दरिद्रता; पत्नी ने कहा «तुमने करम-देवता का अपमान किया»।
करमा पछताया और करम-देवता की खोज में निकला — रास्ते में सूखे कुएँ, फल-हीन वृक्ष, कोढ़ी, अकेली स्त्री मिलीं — सबने पूछा «करम-देवता से हमारा दुःख भी पूछना»; अंत में नदी में बहती करम-डाली मिली, करमा ने उसे थामकर क्षमा माँगी, विधि से पूजा की — करम-देवता प्रसन्न हुए, वैभव लौटा; लौटते हुए रास्ते के प्रश्नों के उत्तर भी मिले — जिसने दान न किया उसका कुआँ सूखा, जिसने फल न बाँटा वह वृक्ष निष्फल… सीख — कर्म (करम) व करम-देवता का अनादर नहीं, श्रम-दान-श्रद्धा से समृद्धि; इसीलिए करमा पर करम-डाली की पूजा और बहनें भाई के भाग्य के लिए उपवास।
लोक-रूप: कहीं सात भाइयों और उनकी बहन की कथा (बहन ने भाइयों के लिए करमा-व्रत किया, भाभियों ने जावा फेंका → विपत्ति → बहन के व्रत से लौटी); उराँव-मुंडा में «करम-राजा» फ़सल-देवता, संथाल में «करम-गोसाईं»; करमा-गीत («करम राजा आयो रे…») इन्हीं कथाओं की धुनें; झारखंड में भादो करम पर मुख्यमंत्री-स्तर का राजकीय आयोजन।
खीरा, लाई-गुड़, चूड़ा-दही, पीठा — करमा की उपवास-थाली व रात्रि-भोज
करमा को बहनें दिन-भर उपवास (निर्जला/फलाहार), कथा के बाद खीरा-फल-लाई-गुड़ से व्रत खोलतीं; करम-डाली को खीरा-ककड़ी-लाई-गुड़-नारियल-फल; रात के भोज में चावल-दाल-सब्ज़ी, पीठा (चावल-आटे के), खीर; ग्रामीण-आदिवासी घरों में हँड़िया (चावल-मद्य) परंपरा में, पर व्रत-पूजा में नहीं।
- उपवास-पारण: खीरा (मुख्य — करम-प्रसाद), ककड़ी, केला-अमरूद-सेब, मुरही/लाई-गुड़, चूड़ा-दही, चावल-दूध (कुछ इलाक़े), तिल-गुड़
- करम-डाली का नैवेद्य: खीरा, लाई, गुड़, नारियल, फल, अरवा चावल; जावा के अंकुर
- रात्रि-भोज: अरवा चावल-भात, दाल (अरहर/मूँग), सब्ज़ी (कद्दू-भिंडी-बरबट्टी), साग, पीठा (चावल-आटा, नारियल-गुड़/उड़द भरावन — भाप/तवा), खीर, दही
- झारखंड-छत्तीसगढ़: धुस्का (चावल-दाल का तला), आरसा (चावल-गुड़), ठेकुआ, मड़ुआ-रोटी, चीला; ओडिशा (सुंदरगढ़-मयूरभंज): पीठा-अरिसा-मंडा, चकुली; बंगाल (पुरुलिया): पीठे, मुरी-गुड़; असम (चाय-बाग़ान): पीठा, चावल-मांस (उत्सव-भोज)
- भाई को: बहन के हाथ का पीठा-खीर, जावा-अंकुर; भाई से बहन को भेंट
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
झारखंड का राजकीय करम, छत्तीसगढ़ का सरगुजिया करमा-नाच, ओडिशा का करम-पूजा, असम के बाग़ानों का झुमुर, बंगाल-बिहार की सीमा — मांदर की एक थाप।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- जावा 7-9 दिन पहले उगाएँ (कन्याएँ), रोज़ जल-दीप-गीत; करमा को उपवास व करम-डाली की पूजा
- करम-डाली सम्मान से — पीछे मुड़कर न देखें, ज़मीन न छूने दें; न मिले तो शमी/पीपल
- धर्मा-करमा कथा सुनें, हुँकारी; रात नृत्य-गीत में परिवार; अगली सुबह विसर्जन व जावा भाई के कान में
- भाई बहन को भेंट, बहन भाई को आरती-तिलक-जावा; खेत में जावा का अंश
- गैर-आदिवासी भी अखड़ा में सादर — करमा झारखंड का साझा पर्व
❌ क्या न करें
- करम-डाली/जावा का अनादर, फेंकना, रौंदना (कथा की सीख — विपत्ति); डाली काटते समय वृक्ष को नुक़सान (एक डाली)
- पूजा-उपवास में मद्य-माँस; रात्रि-नृत्य में नशा-झगड़ा
- जावा की टोकरी में झूठे हाथ, मासिक-धर्म में जावा-स्पर्श (लोक-नियम — किसी और कन्या से)
- निर्जला बीमार/गर्भवती को — फलाहार; रात-भर जागरण स्वास्थ्य से
- करमा-नृत्य का उपहास/व्यावसायीकरण — यह श्रद्धा-पर्व है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
करमा 2026 में कब है?
ऊपर इस साल की भाद्रपद शुक्ल एकादशी (भादो करम) की तिथि है — उत्तर-भारतीय पंचांग में यही परिवर्तिनी (जलझूलनी) एकादशी; जावा इससे 7-9 दिन पहले (शुक्ल तृतीया-पंचमी) बोया जाता है; विसर्जन अगली सुबह (द्वादशी); कुछ इलाक़ों के जितिया-करम/दशहरा-करम की तिथियाँ अलग — गाँव के पाहन/पंचांग से मिलाएँ।
करमा किसका पर्व है — सिर्फ़ आदिवासियों का?
मूलतः झारखंड-छत्तीसगढ़-ओडिशा के आदिवासी (मुंडा-उराँव-संथाल-हो-खड़िया-बैगा-गोंड) व कुड़मी-महतो समाज का, पर गाँव के सभी समाज (ग्रामीण हिंदू) साथ मनाते हैं; झारखंड में राजकीय पर्व — शहरों में सब नाचते हैं; बहन-भाई व फ़सल का पर्व होने से रक्षाबंधन-सा भाव, सबके लिए खुला।
जावा क्या है और कैसे उगाएँ?
बाँस की नई टोकरी में नदी की बालू-मिट्टी भरकर जौ-गेहूँ-मक्का-उड़द-चना के बीज बोना — करमा से 7-9 दिन पहले; कुँवारी कन्याएँ रोज़ स्नान कर जल-हल्दी देतीं, जावा-गीत गातीं, टोकरी पवित्र ऊँचे स्थान पर; करमा की रात जावा करम-डाली के पास, अगली सुबह अंकुर भाई के कान में व खेत में — उर्वरता-समृद्धि-भाई-रक्षा का प्रतीक (नवरात्रि के जवारे-सा)।
करम-वृक्ष कौन-सा है? डाली न मिले तो?
करम = हल्दू/कदंब-परिवार का *Adina cordifolia* (कर्म/करम-गाछ) — झारखंड-छत्तीसगढ़ के जंगलों का वृक्ष; डाली युवक बिना ज़मीन छुए लाते हैं; न मिले तो शमी, पीपल, बेल या कदंब की डाली, या करम-देवता का चित्र — भाव वही; शहरों में प्रवासी समाज प्रायः शमी-डाली रोपते हैं।
बहनें क्या व्रत रखती हैं और भाई क्या करता है?
बहनें (कुँवारी-विवाहिता) भाई की दीर्घायु-सौभाग्य के लिए दिन-भर निर्जला/फलाहार उपवास, जावा की सेवा, करम-डाली की पूजा-कथा, रात नृत्य; भाई डाली लाता है, अगली सुबह बहन से जावा का अंकुर कान में लेता है व बहन को भेंट देता है — रक्षाबंधन-जैसा; विवाहिता बहनें मायके आतीं।
करमा-नृत्य क्या है?
करम-डाली के चारों ओर रात-भर गोल घेरे में स्त्री-पुरुषों का सामूहिक नृत्य — मांदर, नगाड़ा, झाँझ, बाँसुरी; करमा-झूमर गीत («करम राजा…», डमकच); छत्तीसगढ़ का राजकीय लोक-नृत्य, झारखंड-ओडिशा-असम के चाय-बाग़ानों की धरोहर; पहनावा — लाल-पाड़ साड़ी, फूल-मुकुट, पुरुष धोती-पगड़ी।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण झारखंड-छत्तीसगढ़-ओडिशा की पारंपरिक लोक-रीत व कथाओं पर आधारित है; हर गाँव-समाज (मुंडा/उराँव/संथाल/कुड़मी…) की अपनी रीत सर्वोपरि है — अपने पाहन/बड़े-बुज़ुर्ग की मानें। तिथि पंचांग से मिला लें; स्वास्थ्य-स्थिति में निर्जला न रखें।
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