🙏 हरतालिका तीज (बड़ी तीज) 2027
भाद्रपद शुक्ल तृतीया — साल का सबसे कठोर सुहाग-व्रत: 24 घंटे निर्जला, रेत/मिट्टी के शिव-पार्वती, चार प्रहर की पूजा-जागरण, अगली सुबह पारण; गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले।
हरतालिका तीज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखी जाती है — गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले, हरियाली तीज के एक महीने बाद। यह तीजों में सबसे बड़ी और कठोर है — सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक निर्जला (जल भी नहीं), रात-भर जागरण, हर प्रहर शिव-पार्वती की पूजा। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र (हरतालिका) और नेपाल (तीज) में स्त्रियों का प्रमुख व्रत।
«हरत» + «आलिका» = सखी द्वारा हरण — पार्वती को उनकी सखियाँ पिता के घर से हरकर वन में ले गईं ताकि विष्णु से विवाह न हो और वे शिव-तप कर सकें; इसीलिए यह पार्वती के तप और मनचाहे वर का व्रत — सुहागिनें अखंड सौभाग्य, कन्याएँ शिव-जैसे वर के लिए। नीचे इस साल की तिथि, पूजा-प्रहर, विधि, सामग्री, कथा, पारण-भोजन और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
निर्जला व्रत का नियम — दिन-रात जल तक नहीं (कुछ परंपराएँ आचमन मानती हैं); एक बार रखा तो हर साल रखना पड़ता है (छोड़ना अशुभ माना गया — बीमार हों तो किसी और से उद्यापन/या फलाहार से); इसलिए पहला व्रत सोच-समझकर। पार्वती ने यही तप किया था।
पूजा शाम/प्रदोष में मुख्य और फिर रात के चारों प्रहर — शिव-पार्वती-गणेश की मिट्टी/रेत/काली मिट्टी की प्रतिमाएँ (हाथ से बनाई — «पार्थिव»), फुलेरा (फूलों की छत), सुहाग की 16 वस्तुएँ; कथा तीन बार; अगली सुबह प्रतिमाएँ जल में विसर्जित कर पारण।
छत्तीसगढ़ में «तीजा» — बेटियाँ मायके बुलाई जाती हैं, एक दिन पहले «करू भात» (करेले की सब्ज़ी-भात); बिहार-यूपी में नई बहू का पहला तीज मायके में; महाराष्ट्र में «हरतालिका» की एक-दिवसीय रात-पूजा; नेपाल में तीन दिन का «तीज» — दर, निर्जला, ऋषि पंचमी।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह उत्तर-भारतीय घरेलू विधि है — द्वितीया की रात भोजन (सरगी-सी), तृतीया को निर्जला, प्रदोष-पूजा व चार प्रहर, चतुर्थी की सुबह पारण।
- द्वितीया (एक दिन पहले): शाम/रात को भरपेट सात्विक भोजन — «सरगी/दर/करू भात» की तरह (छत्तीसगढ़ में करेला-भात, बिहार में दही-चूड़ा-फल, नेपाल में «दर» की दावत); मेहंदी; आधी रात के बाद कुछ नहीं।
- तृतीया: सूर्योदय से पहले स्नान, संकल्प — «मैं अखंड सौभाग्य/मनचाहे वर हेतु हरतालिका तीज का निर्जला व्रत करती हूँ, कल सूर्योदय के बाद पारण करूँगी»; सोलह श्रृंगार, लाल/हरी साड़ी, नई चूड़ियाँ, सिंदूर; दिन में जल नहीं, आराम-भजन, कम बोलना।
- दिन में तैयारी: फुलेरा — बाँस/लकड़ी की चौकी के ऊपर केले के खंभे व फूलों-पत्तियों की छत; हाथ से मिट्टी/काली मिट्टी/रेत के शिव, पार्वती (गौरी), गणेश और (कई घर) रिद्धि-सिद्धि की छोटी प्रतिमाएँ (या बाज़ार की मिट्टी की); केले के पत्ते पर स्थापना; कलश।
- प्रदोष-पूजा (सूर्यास्त के बाद — ऊपर समय — पहला प्रहर): गणेश-पूजन; शिव को जल-दूध-बेलपत्र-धतूरा-भस्म-सफ़ेद फूल; पार्वती को सुहाग की 16 वस्तुएँ (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, कंघी, शीशा, चुनरी, बिछिया, आलता, इत्र, फूल-माला…); «ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः»; हरतालिका व्रत-कथा (नीचे) — 3 बार/हर प्रहर; आरती «जय पार्वती माता»।
- चार प्रहर की पूजा (रात ~9, ~12, ~3 बजे): हर प्रहर में प्रतिमाओं पर फूल-अक्षत, नया दीप, मंत्र, आरती; बीच में भजन-गीत (तीज के लोकगीत), सहेलियों-सुहागिनों का सामूहिक जागरण; सोना नहीं।
- बाया: पूजा के बाद सास/जेठानी को सुहाग-सामग्री, मिठाई, फल, दक्षिणा — पैर छूकर; कन्याएँ बड़ी सुहागिनों से आशीर्वाद।
- चतुर्थी की सुबह (सूर्योदय के बाद): अंतिम पूजा-आरती, पार्वती को चढ़ा सिंदूर अपनी माँग में, प्रतिमाओं व पूजा-सामग्री का विसर्जन (नदी-तालाब या घर के गमले/जल-पात्र में), फुलेरा उतारना; फिर पारण — पहले पूजा का जल/तुलसी-जल, दही-चूड़ा/फल, फिर भोजन (कई घर पारण पति के हाथ से)।
- नई बहू का पहला तीज मायके में (बिहार-यूपी-छत्तीसगढ़) या ससुराल में सास के साथ — रीत से; एक बार शुरू किया व्रत हर साल; बीमार/गर्भवती हों तो फल-जल से या घर की दूसरी स्त्री द्वारा पूजा — भाव अखंड रहे।
पूजा-सामग्री की सूची
फुलेरा, मिट्टी की शिव-पार्वती-गणेश प्रतिमाएँ और सुहाग की 16 वस्तुएँ — हरतालिका की पहचान।
- मिट्टी/काली मिट्टी/रेत (शिव-पार्वती-गणेश की हाथ की प्रतिमाएँ) या बाज़ार की मिट्टी की प्रतिमाएँ; केले के पत्ते, चौकी, लाल कपड़ा
- फुलेरा: केले के खंभे/बाँस, फूल-माला (गेंदा-मोगरा-गुलाब), आम-बेल-अशोक के पत्ते, पत्तों की छत
- पार्वती की 16 सुहाग-वस्तुएँ: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, कंघी, शीशा, चुनरी, बिछिया, पायल (प्रतीक), आलता/महावर, इत्र, नथ, कर्णफूल, गजरा, फूल-माला
- शिव को: बेलपत्र, धतूरा, आक, शमी-पत्र, भस्म, जनेऊ, सफ़ेद फूल, जल-दूध-पंचामृत; गणेश को दूर्वा-मोदक
- कलश, नारियल, आम के पत्ते, रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, चंदन, मौली
- दीपक (चार प्रहर के लिए 4+), घी, धूप, कपूर, अगरबत्ती, आरती-थाली, घंटी
- भोग: फल (केला-सेब-अनार-नारियल), मिठाई (लड्डू-पेड़ा), खीर, पंचामृत, पान-सुपारी-लौंग-इलायची
- बाया: सुहाग-सामग्री, मिठाई, फल, वस्त्र, दक्षिणा (सास/जेठानी)
- हरतालिका व्रत-कथा पुस्तक, तीज-गीत
- पारण: दही-चूड़ा/फल, तुलसी-जल; एक दिन पहले «करू भात/दर» का भोजन
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
हिमालय-पुत्री पार्वती ने बाल्यकाल से शिव को पति चाहा और घोर तप किया — बारह वर्ष, पत्ते तक छोड़ दिए (अपर्णा)। नारद ने हिमवान से कहा — कन्या विष्णु के योग्य है; हिमवान ने विष्णु से विवाह तय कर दिया। पार्वती व्याकुल हुईं; उनकी सखी ने कहा — «चलो, मैं तुम्हें यहाँ से हर ले चलती हूँ» — सखियाँ पार्वती को घने वन की गुफा में ले गईं (हरत = हरण, आलिका = सखी: हरतालिका)।
वन में भाद्रपद शुक्ल तृतीया, हस्त नक्षत्र को पार्वती ने रेत का शिवलिंग बनाकर निर्जला-निराहार रहकर रात-भर पूजा-जागरण किया। शिव प्रकट हुए — «माँगो» — पार्वती ने कहा «आप ही मेरे पति हों»; शिव ने «तथास्तु» कहा। हिमवान वन में पहुँचे, पार्वती के संकल्प को मानकर शिव से विवाह किया। शिव ने कहा — जो स्त्री इस तिथि को निर्जला रहकर इस व्रत-कथा को सुने, उसे अखंड सौभाग्य और कन्या को मनचाहा वर।
यह कथा शिव ने स्वयं पार्वती को सुनाई (लिंग-पुराण के अनुसार) — «जिस तप से तुमने मुझे पाया, वही व्रत स्त्रियाँ करें»; इसीलिए कथा तीन बार/हर प्रहर सुनने का विधान, और व्रत को «शिव-पार्वती के विवाह की पूर्व-रात्रि» का तप माना गया। अगले दिन गणेश चतुर्थी — विवाह के मंगल-देवता का जन्म।
एक दिन पहले की दावत, व्रत में कुछ नहीं, पारण का दही-चूड़ा
हरतालिका में तृतीया को कुछ नहीं — भोग सिर्फ़ पार्वती-शिव को (फल-मिठाई-खीर); द्वितीया की रात भरपेट (छत्तीसगढ़ का करू भात, नेपाल का दर, बिहार का दही-चूड़ा); पारण चतुर्थी की सुबह हल्का-मीठा।
- द्वितीया की दावत: छत्तीसगढ़ «करू भात» — करेले की सब्ज़ी-भात (कड़वे से शुरू, ताकि व्रत आसान); बिहार-यूपी — दही-चूड़ा-गुड़, पूड़ी-खीर, फल; नेपाल «दर» — खीर-सेल रोटी-मांस (कुल-रीत); महाराष्ट्र — साबूदाना/फलाहार
- तृतीया: निर्जला — कुछ नहीं (आचमन कुल-रीत से); भोग शिव-पार्वती को — केला, नारियल, सेब, खीर, लड्डू, पंचामृत
- पारण (चतुर्थी सुबह): पहले तुलसी/पूजा-जल, फिर दही-चूड़ा या फल-दूध, फिर हल्का भोजन — खीर-पूड़ी/खिचड़ी; भारी-तला नहीं (24 घंटे बाद पेट)
- छत्तीसगढ़ पारण: ठेठरी-खुरमी-अरसा (तीजा के पकवान), मायके का भोज; महाराष्ट्र: पंचखाद्य/नारियल-खोबरे; बिहार: ठेकुआ-खीर
- गणेश चतुर्थी (अगले दिन) का मोदक-प्रसाद पारण के साथ
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
हरतालिका/तीजा/तीज — उत्तर-मध्य भारत और नेपाल की स्त्रियों का सबसे बड़ा तप-व्रत।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- द्वितीया को भरपेट सात्विक भोजन, आधी रात के बाद कुछ नहीं — व्रत सूर्योदय से
- पूजा प्रदोष में, फिर चारों प्रहर — प्रतिमाएँ मिट्टी की, हाथ से; फुलेरा
- कथा हर प्रहर/तीन बार; सुहाग की 16 वस्तुएँ पार्वती को; बाया सास को
- पारण चतुर्थी को सूर्योदय के बाद, प्रतिमा-विसर्जन के बाद — धीरे-धीरे भोजन
- एक बार व्रत लिया तो हर साल — न हो सके तो फलाहार/किसी और से पूजा, भाव न टूटे
❌ क्या न करें
- निर्जला में गर्भवती/रोगी/दूध पिलाने वाली/किशोरियाँ नहीं — फल-जल से; चक्कर-उल्टी पर जल लें (प्राण-रक्षा धर्म)
- रात में सोना नहीं (जागरण) — पर बीमार हों तो विश्राम; व्रत में क्रोध-कलह-चुगली नहीं
- प्रतिमाएँ प्लास्टर-रंग वाली नहीं — मिट्टी की; विसर्जन घर के गमले/जल-कुंड में, नाली में नहीं
- बिना पारण अगला दिन (गणेश चतुर्थी) व्रत बढ़ाना नहीं — 24 घंटे पर पारण
- व्रत को छोड़ने का डर नहीं — बीमारी में छूटे तो उद्यापन/क्षमा-प्रार्थना, अशुभ कुछ नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
हरतालिका तीज 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की भाद्रपद शुक्ल तृतीया है — पंचांग-गणना से; प्रदोष (मुख्य पूजा) व सूर्योदय (व्रत-आरंभ/पारण) का दिल्ली-समय भी वहीं; अगला दिन गणेश चतुर्थी।
हरतालिका और हरियाली तीज में क्या अंतर?
हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया (सावन — हरी चूड़ी, झूले, उत्सव, फलाहार); हरतालिका भाद्रपद शुक्ल तृतीया (एक महीने बाद — 24 घंटे निर्जला, रात-जागरण, मिट्टी की प्रतिमाएँ, सबसे कठोर); कजरी तीज बीच में (भाद्रपद कृष्ण तृतीया)।
क्या सचमुच पानी भी नहीं पी सकते?
शास्त्रीय विधान निर्जला (आचमन कुल-रीत से मान्य); सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक। यह कठोर है — स्वस्थ स्त्रियाँ ही; गर्भवती, रोगी, दूध पिलाने वाली फल-जल से रखें; तबीयत बिगड़े तो जल-भोजन लें — व्रत पार्वती का तप है, प्राण-संकट नहीं।
एक बार शुरू किया तो हर साल ज़रूरी?
लोक-परंपरा में हाँ — इसलिए पहला व्रत सोचकर; पर बीमारी/गर्भावस्था/शोक में छूट जाए तो फलाहार से रखें या घर की दूसरी स्त्री पूजा करे, बाद में उद्यापन — अशुभ कुछ नहीं होता, भाव मुख्य है।
चार प्रहर की पूजा कैसे?
सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक रात के चार बराबर भाग (~3 घंटे) — पहला प्रहर प्रदोष (मुख्य पूजा-कथा), फिर ~9, ~12, ~3 बजे — हर बार फूल-अक्षत-दीप-मंत्र-आरती-कथा; सहेलियों के साथ गीत-भजन से जागरण आसान; एक प्रहर भी न हो सके तो प्रदोष-पूजा और सुबह की पूजा पर्याप्त।
मिट्टी की प्रतिमा न बना सकें तो?
बाज़ार की मिट्टी की शिव-पार्वती-गणेश या शालिग्राम/शिवलिंग व गौरी-चित्र भी मान्य; रेत/हल्दी की छोटी पिंडी सबसे सरल; प्लास्टर-रंग वाली मूर्ति नहीं (विसर्जन)।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। निर्जला व्रत केवल स्वस्थ स्त्रियाँ — स्वास्थ्य पहले।
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