💚 हरियाली तीज (श्रावणी / छोटी तीज) 2027
श्रावण शुक्ल तृतीया — सावन की हरी तीज: हरी चूड़ी-लहरिया, मेहंदी, झूले, सिंजारा, शिव-पार्वती पूजा और घेवर; सुहागिनों व कन्याओं का सौभाग्य-व्रत।
हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है — नाग पंचमी से दो दिन पहले, सावन के बीच में जब चारों ओर हरियाली होती है; इसीलिए «हरियाली» — हरी साड़ी, हरी चूड़ियाँ, हरा लहरिया, मेहंदी, आम-नीम के पेड़ों पर झूले और सावन के गीत (कजरी)। यह सावन की तीन तीजों (हरियाली, कजरी, हरतालिका) में पहली और सबसे उत्सवमय है।
मान्यता है कि इसी तृतीया को पार्वती की 108 जन्मों की तपस्या के बाद शिव ने उन्हें स्वीकार किया — इसलिए सुहागिनें पति की दीर्घायु व कन्याएँ मनचाहे वर के लिए व्रत रखती हैं; एक दिन पहले «सिंजारा» — मायके से बेटी को मेहंदी-चूड़ी-लहरिया-घेवर। नीचे इस साल की तिथि, पूजा-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, घेवर-भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
तीज = तृतीया — गौरी की तिथि; हरियाली तीज पार्वती (तीज माता) की पूजा का दिन है: शिव-पार्वती के मिलन का पर्व, इसलिए नई विवाहिता का पहला सावन मायके में और तीज पर ससुराल से «सिंधारा/सिंजारा» (वस्त्र-मिठाई-श्रृंगार) आना — मायके-ससुराल का प्रेम-सूत्र।
हरा रंग सावन-समृद्धि-सुहाग का — हरी चूड़ियाँ इस दिन बदली जाती हैं, मेहंदी जितनी गहरी उतना पति का प्रेम (लोक-विश्वास); झूला — कृष्ण-राधा/शिव-पार्वती का झूला, नीम-आम पर रस्सी-पटरे का झूला; सावन के गीत — कजरी, झूला, «झूला पड़ गयो अम्बुआ की डार»।
व्रत निर्जला/फलाहार (कई घर सिर्फ़ पूजा-उत्सव); जयपुर की तीज-सवारी (तीज माता की शाही सवारी), बनारस-मिर्ज़ापुर की कजरी, हरियाणा-पंजाब की «तीयाँ» (झूले-गिद्दा) — पूरा सावन इसी के इर्द-गिर्द।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह उत्तर-भारतीय घरेलू विधि है — एक दिन पहले सिंजारा-मेहंदी, तीज को हरा श्रृंगार, शिव-पार्वती पूजा, झूला-गीत।
- एक दिन पहले (द्वितीया — सिंजारा): मायके से बेटी (नई विवाहिता) को मेहंदी, हरी चूड़ी, लहरिया साड़ी, घेवर-फीणी, श्रृंगार; शाम को हाथों-पैरों में मेहंदी, सहेलियों के साथ गीत।
- तीज की सुबह: स्नान, हरी/लहरिया साड़ी, सोलह श्रृंगार, हरी चूड़ियाँ (पुरानी उतारकर नई), बिंदी-सिंदूर; संकल्प — «मैं पति की दीर्घायु/उत्तम वर व सौभाग्य हेतु हरियाली तीज का व्रत करती हूँ» — निर्जला/फलाहार।
- पूजा (दिन में या प्रदोष — ऊपर समय): चौकी पर हरा/लाल कपड़ा, मिट्टी/रेत या चित्र की शिव-पार्वती-गणेश की प्रतिमा (कई घर तीज माता की मिट्टी की मूर्ति); कलश; पार्वती को सोलह श्रृंगार — चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, चुनरी, कंघी, शीशा, फूल-माला (हरे बेल-आम के पत्ते); शिव को बेलपत्र-धतूरा-जल।
- मंत्र — «ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः»; तीज की कथा (नीचे) सुहागिनें मिलकर सुनें; आरती; घेवर-मालपुआ-खीर का भोग।
- बाया/सिंधारा: कथा के बाद सास (या घर की बड़ी) को श्रृंगार-वस्त्र-घेवर देकर पैर छूना; सुहागिनों को हरी चूड़ी-मेहंदी बाँटना; कन्याएँ बड़ी स्त्रियों से आशीर्वाद।
- झूला: घर/मोहल्ले में आम-नीम पर झूला, सावन-गीत (कजरी/झूला/मल्हार), बच्चियाँ-सहेलियाँ; शाम को तीज माता की सवारी/मेला (जयपुर-आगरा-बनारस)।
- व्रत खोलना: प्रदोष-पूजा के बाद (चंद्र-अर्घ्य की रीत नहीं — यह चतुर्थी/चौथ नहीं); पति के हाथ से जल-मिठाई; नई बहू मायके से लौटे तो सिंधारे के साथ।
- दो दिन बाद नाग पंचमी, पंद्रह दिन बाद कजरी तीज (भाद्रपद कृष्ण तृतीया) और एक महीने बाद हरतालिका (भाद्रपद शुक्ल तृतीया) — तीज-त्रयी।
पूजा-सामग्री की सूची
हरी चूड़ी-मेहंदी-लहरिया-घेवर सिंजारे में; पूजा में शिव-पार्वती व सुहाग की 16 वस्तुएँ।
- शिव-पार्वती-गणेश की प्रतिमा (मिट्टी/रेत/चित्र) या तीज माता की मूर्ति, चौकी, हरा-लाल कपड़ा, कलश
- पार्वती का सोलह श्रृंगार: हरी चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, चुनरी (हरी/लाल), कंघी, शीशा, आलता, पायल/बिछिया (प्रतीक), फूल-माला
- शिव को: बेलपत्र, धतूरा, आक, जल-दूध, चंदन, भस्म; गणेश को दूर्वा
- रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, मौली, हरे पत्ते (बेल-आम-नीम), फूल (गेंदा-गुलाब-मोगरा)
- भोग: घेवर, फीणी, मालपुआ, खीर, पूड़ी, हलवा, फल (जामुन-आम-खीरा)
- सिंजारा/बाया: मेहंदी, हरी चूड़ी, लहरिया/हरी साड़ी, घेवर, मिठाई, श्रृंगार-सामान, दक्षिणा
- झूला: रस्सी, पटरा; कजरी/झूला-गीत
- दीपक, धूप, कपूर, आरती-थाली; तीज-कथा पुस्तक
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पार्वती हिमालय की पुत्री थीं; बचपन से शिव को पति मानतीं। पिता हिमवान ने नारद के कहने पर विष्णु से विवाह तय किया; पार्वती ने सखी की सहायता से वन (हरित) में जाकर गुफा में रेत का शिवलिंग बनाया और घोर तप किया — इसी सखी-हरण से बाद की तीज «हरतालिका» कहलाई; पर श्रावण शुक्ल तृतीया को शिव ने प्रकट होकर पार्वती को पत्नी-रूप में स्वीकार किया — हरियाली में मिलन, इसलिए «हरियाली तीज»।
शिव ने पार्वती को उनके 107 पूर्व-जन्मों की तपस्या याद दिलाई — 108वें जन्म में वर मिला; इसलिए इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करने वाली स्त्री को अखंड सौभाग्य और कन्या को मनचाहा वर — शिव का वर। कथा के अंत में तीज माता (पार्वती) की जय।
लोक-कथा (राजस्थान-हरियाणा) — एक साहूकार की बेटी ने तीज का व्रत श्रद्धा से रखा, पर उसकी सास ने बिना श्रृंगार-झूले के रखने को कहा; तीज माता ने स्वप्न में कहा — «तीज पर श्रृंगार, हरी चूड़ी, झूला और गीत भी व्रत का अंग हैं — उत्सव में ही मेरा वास है»; तभी से हरियाली तीज व्रत के साथ उत्सव है, तप नहीं।
घेवर, फीणी, मालपुआ — सावन की तीज-रसोई
हरियाली तीज का पर्याय है घेवर — मैदा-घी की जालीदार मिठाई, चाशनी में, ऊपर रबड़ी-मेवा; सिंजारे में घेवर-फीणी मायके से; व्रत फलाहार/निर्जला, पूजा के बाद पूड़ी-खीर।
- घेवर (मालवा/रबड़ी घेवर): मैदा-घी-ठंडे पानी का पतला घोल, गर्म घी में गोल साँचे में धार से डालकर जाली बनाना, चाशनी में डुबोना, रबड़ी-पिस्ता — बाज़ार से भी (सावन में हर हलवाई)
- फीणी (सूत की-सी मीठी), मालपुआ, खीर, बालूशाही, गुझिया (कुछ इलाक़े)
- व्रत-दिन: फल (आम-जामुन-केला), दूध, नारियल-पानी; निर्जला वाली प्रदोष-पूजा के बाद
- पूजा के बाद: पूड़ी-आलू-कद्दू, खीर, हलवा, खीरा; पंजाब-हरियाणा की तीयाँ में खीर-पूड़ी-मालपुए; बिहार-यूपी में ठेकुआ-खीर (कजरी-तीज तक)
- सुहागिनों को बाँटना: घेवर + हरी चूड़ी + मेहंदी — तीज का «बायना»
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
जयपुर की तीज-सवारी से बनारस की कजरी और पंजाब की तीयाँ तक — सावन की हरी तीज।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- हरा — साड़ी, चूड़ी, मेहंदी: तीज की पहचान; नई चूड़ियाँ इसी दिन
- शिव-पार्वती को सोलह श्रृंगार, कथा सुहागिनों के साथ; सास को बाया
- झूला, कजरी-गीत, सहेलियों-बहनों के साथ उत्सव — व्रत का अंग
- नई बहू मायके में, ससुराल से सिंधारा — दोनों ओर उपहार
- कन्याएँ भी व्रत रखें — मनचाहे वर के लिए
❌ क्या न करें
- काले-सफ़ेद वस्त्र, टूटी चूड़ियाँ — तीज पर नहीं
- झूले की रस्सी-डाल पुरानी/कमज़ोर नहीं — बच्चियों के लिए सुरक्षा
- निर्जला की ज़िद गर्भवती/रोगी नहीं — फलाहार
- कलह, बड़ों का अनादर — सौभाग्य का पर्व है
- सावन की बारिश में मेहंदी/चूड़ी के बाज़ार में बच्चों को अकेला नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
हरियाली तीज 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की श्रावण शुक्ल तृतीया है — पंचांग-गणना से; पूजा का अभिजित/प्रदोष-समय (दिल्ली) भी वहीं। तृतीया किसी सूर्योदय को न छुए (तिथि-क्षय) तो जिस दिन तृतीया रहे, वही दिन।
हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज में क्या अंतर?
तीनों गौरी-तृतीया व्रत — हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया (सावन, झूले-मेहंदी, उत्सव-प्रधान); कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया (15 दिन बाद — नीम-पूजा, चंद्र-अर्घ्य, बुंदेलखंड-राजस्थान); हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया (एक महीने बाद — निर्जला, सबसे कठोर, यूपी-बिहार-महाराष्ट्र)।
सिंजारा/सिंधारा क्या है?
तीज से एक दिन पहले (या तीज पर) मायके से बेटी/बहू को भेजा जाने वाला उपहार — मेहंदी, हरी चूड़ी, लहरिया, घेवर-फीणी, श्रृंगार; ससुराल से नई बहू को «सिंधारा» — दोनों ओर से प्रेम का सूत्र।
क्या तीज पर चाँद को अर्घ्य देते हैं?
हरियाली तीज पर नहीं — यह चौथ नहीं है; प्रदोष-पूजा के बाद व्रत खुलता है। कजरी तीज पर चंद्र-अर्घ्य की रीत है (कृष्ण तृतीया — चाँद देर से)।
हरी चूड़ी ही क्यों?
हरा सावन-हरियाली, समृद्धि और सुहाग का रंग — इस दिन पुरानी चूड़ियाँ उतारकर नई हरी पहनना पार्वती का श्रृंगार दोहराना है; मेहंदी जितनी रचे, उतना प्रेम — लोक-विश्वास।
मंगलागौर और हरियाली तीज एक ही?
भाव एक — नई विवाहिता का सावन-व्रत; महाराष्ट्र में श्रावण के हर मंगलवार मंगलागौर (गौरी-पूजा, रात-भर फुगड़ी-झिम्मा), उत्तर में तृतीया की तीज; मराठी घर तीज की जगह मंगलागौर मानते हैं।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
यह भी पढ़ें: नाग पंचमी (2 दिन बाद) · कजरी तीज (15 दिन बाद) · हरतालिका तीज (एक महीने बाद) · गणगौर (गौरी का चैत्र-व्रत)
⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है।
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