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🪔 व्रत-त्योहार

👑 गणगौर (गौरी तृतीया) 2027

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

चैत्र शुक्ल तृतीया — राजस्थान-मालवा की सुहागिनों व कन्याओं का 16-18 दिन का गौरी-व्रत; होली की राख से ईसर-गौर, दूब-जल पूजा, घुड़ला, अंतिम दिन गणगौर की विदाई।

गणगौर (गौरी तृतीया) 2027 की तिथि
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2027
चैत्र · शुक्ल पक्ष · तृतीया (विक्रम संवत 2084)
🌅 सूर्योदय6:03 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:59 AM – 12:47 PM
📿 तिथि-कालतृतीया 9 अप्रैल, 3:10 AM → 10 अप्रैल, 1:32 AM
🐄 गोधूलि बेला6:17 PM – 7:08 PM
🌇 सूर्यास्त6:43 PM
⛔ राहुकाल (टालें)10:48 AM – 12:23 PM
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

गणगौर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है — होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से शुरू होकर 16-18 दिन चलने वाले गौरी-व्रत का समापन-दिन। «गण» = शिव (ईसर), «गौर» = पार्वती (गौरी) — यह शिव-पार्वती के दांपत्य का पर्व है: विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु व सौभाग्य के लिए, कुँवारी कन्याएँ मनचाहे वर के लिए व्रत रखती हैं।

राजस्थान (जयपुर-उदयपुर-जोधपुर-बीकानेर), मध्य प्रदेश (मालवा-निमाड़), गुजरात के कुछ भाग, हरियाणा-उत्तर प्रदेश की राजस्थानी परिवारों में यह स्त्रियों का सबसे बड़ा पर्व है — होली की राख के ईसर-गौर, मिट्टी/लकड़ी की गणगौर, रोज़ सुबह दूब-जल से पूजा और गीत, घुड़ला, अंतिम दिन सिर पर गणगौर लेकर तालाब पर विदाई। नीचे इस साल की तिथि, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।

महत्व — यह व्रत क्यों

गौरी (पार्वती) ने इसी तृतीया को शिव को पति-रूप में पाया — इसलिए गणगौर सुहाग व मनचाहे वर का व्रत; मान्यता है कि गणगौर को पति के सामने नहीं पूजा जाता और इस दिन गौरी को चढ़ा प्रसाद पति नहीं खाते (लोक-रीत)।

नई विवाहिता का पहला गणगौर मायके में — 16 दिन का व्रत, सोलह श्रृंगार, मेहंदी; कन्याएँ ईसर-गौर के जोड़े को घर-घर घुमाती हैं (गीत — «गोर-गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती»), घुड़ले (छिद्रों वाला मिट्टी का घड़ा, भीतर दीप) के साथ शाम को।

व्रत 16-18 दिन का — होली के दूसरे दिन से चैत्र शुक्ल तृतीया तक; सप्तमी-अष्टमी को «शीतला-सप्तमी/बसौड़ा» व घुड़ला-उत्सव (जोधपुर), तृतीया को विदाई — बड़ी गणगौर (जयपुर-उदयपुर की शाही सवारी)।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

यह राजस्थानी घरेलू विधि है — होली की राख से आरंभ, रोज़ की छोटी पूजा, अंतिम तीन दिन बड़ी पूजा और विदाई।

  1. आरंभ (होली के अगले दिन, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा): होलिका दहन की राख से (या मिट्टी से) ईसर-गौर के छोटे पिंड बनाकर पूजा-स्थान पर एक पटरे/परात में स्थापित करें; साथ में जौ-गेहूँ के जवारे; रोज़ सुबह स्नान कर दूब की सींकों से जल छिड़कना (झूला), हल्दी-मेहंदी-काजल का टीका, फूल-पत्ती, गीत — 16 दिन।
  2. रोज़ का नियम: सूर्योदय के बाद बिना खाए पूजा; गौरी को 16 चीज़ें (16 दूब, 16 बिंदी, 16 चूड़ी…) — «सोलह» का अंक सुहाग का; कन्याएँ मोहल्ले की सहेलियों के साथ; गीतों में ईसर-गौर की हँसी-ठिठोली।
  3. आठवें दिन (चैत्र कृष्ण अष्टमी — शीतला अष्टमी): घुड़ला — कन्याएँ छिद्रों वाले मिट्टी के घड़े में दीप रखकर सिर पर, शाम को घर-घर घूमती हैं, घी-गुड़-अनाज माँगती हैं (जोधपुर का घुड़ला-मेला)।
  4. अंतिम तीन दिन (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा-द्वितीया-तृतीया): बड़ी गणगौर — लकड़ी/मिट्टी की ईसर-गौर की मूर्तियाँ (या कागज़-चित्र), गौरी को लहँगा-चुनरी-गहने, ईसर को साफ़ा; सोलह श्रृंगार, मेहंदी; द्वितीया की रात «घुड़ला/रात-जागरण» और गौरी को «पिठौर» (आटे का लेप); तृतीया को सुबह अंतिम पूजा — कुंकुम-मेहंदी-काजल, 16 गूने (गौरी-भोग), जल का लोटा, दूब।
  5. तृतीया की पूजा में: कन्याएँ/सुहागिनें सिर पर कलश, गणगौर को गोद में; कथा (नीचे); पति के लिए दीर्घायु और कुँवारी के लिए वर का संकल्प; सास/बड़ी को «बाया» (गूने, मेहंदी, चूड़ी, मिठाई) और पैर छूना।
  6. विदाई (तृतीया की शाम): गीत गाते हुए गणगौर को सिर पर लेकर तालाब/बावड़ी/नदी; वहाँ अंतिम जल-अर्पण, गौरी को ससुराल (कैलाश) विदा — मूर्ति जल में विसर्जित या (लकड़ी की) घर लौटाकर अगले साल के लिए; जयपुर में त्रिपोलिया गेट से शाही सवारी, उदयपुर में गणगौर-घाट पर नौका-विदाई।
  7. व्रत खोलना: विदाई के बाद; 16 दिन का व्रत रखने वाली नई बहू को मायके से «गणगौर का बाया» — घेवर-फीणी, कपड़े; ससुराल में सुहागिनें उपहार।
  8. जो 16 दिन न रख सकें — अंतिम 3 दिन (या सिर्फ़ तृतीया) का व्रत भी मान्य; कन्याओं का व्रत विवाह तक हर वर्ष।

पूजा-सामग्री की सूची

गणगौर की मूर्ति (या राख-मिट्टी के पिंड), गौरी का श्रृंगार, दूब और 16 का सामान — मुख्य।

  • होली की राख/मिट्टी (ईसर-गौर के पिंड) या लकड़ी-मिट्टी की गणगौर-मूर्ति, ईसर की मूर्ति; परात/पटरा
  • दूब की सींकें (झूला/जल छिड़कने को), कलश, जल का लोटा
  • गौरी का श्रृंगार: लहँगा-चुनरी/साड़ी, चूड़ी (16), बिंदी (16), सिंदूर, काजल, मेहंदी, गहने; ईसर का साफ़ा-धोती
  • हल्दी, कुमकुम, रोली, अक्षत, फूल-पत्ती, आटे का पिठौर
  • जौ-गेहूँ के जवारे, गेहूँ के दाने (कथा में हाथ में)
  • घुड़ला: छिद्र वाला मिट्टी का घड़ा, दीपक
  • भोग: 16 गूने (आटे-गुड़ के), घेवर-फीणी, चूरमा-लड्डू, मेहंदी की मिठाई, खीर-पूड़ी, फल
  • बाया: घेवर, मेहंदी, चूड़ी, कपड़ा, दक्षिणा (सास/मायके-ससुराल)
  • गणगौर की कथा-पुस्तक/गीत

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व्रत-कथा

एक बार शिव-पार्वती (ईसर-गौर) नारद के साथ पृथ्वी पर विचरण करते एक गाँव पहुँचे — चैत्र शुक्ल तृतीया थी। गाँव की उच्च-कुल की स्त्रियाँ छप्पन भोग बनाने में लगी थीं, इसलिए देर से आईं; निर्धन स्त्रियाँ जो कुछ था — दूब, जल, हल्दी — लेकर पहले पहुँचीं और श्रद्धा से पूजा की। पार्वती ने प्रसन्न होकर अपना सुहाग-रस उन पर छिड़क दिया — उन्हें अखंड सौभाग्य मिला।

बाद में सजी-धजी स्त्रियाँ छप्पन भोग लेकर आईं; शिव ने पूछा — «सुहाग-रस तो बँट गया, इन्हें क्या दोगी?» पार्वती ने अपनी उँगली चीरकर रक्त छिड़का — «इसमें मेरा अंश है, जितनी बूँदें जिस पर पड़ीं, उतना सुहाग।» फिर पार्वती ने नदी-तट पर रेत का शिवलिंग बनाकर पूजा की — शिव प्रकट हुए और वर दिया कि इस दिन गौरी-पूजा करने वाली स्त्री को अखंड सौभाग्य मिलेगा। लौटकर शिव ने पार्वती से पूछा «देर क्यों?» — पार्वती ने कहा «भाई-भाभी से मिलकर आई» — इसी से गणगौर में मायके-ससुराल का भाव।

लोक-कथा (राजस्थान) — गौरी को ईसर के साथ ससुराल (कैलाश) जाना है; 16 दिन मायके (धरती) में रहकर तृतीया को विदा होती हैं — इसलिए विदाई में स्त्रियाँ रोती-गाती हैं जैसे बेटी की विदाई; और यही कारण कि गणगौर का प्रसाद पति नहीं खाता — वह गौरी के मायके का है।

गूने, घेवर, चूरमा — गणगौर की मारवाड़ी रसोई

गणगौर के भोग में 16 गूने (आटे की मीठी टिकियाँ/कचौरी जैसी), घेवर, फीणी, चूरमा — मायके से बाया में यही आते हैं; तृतीया को खीर-पूड़ी; 16 दिन व्रत में एक समय बिना नमक (कुछ घर) या फलाहार।

  • गूने (16): आटे में घी-गुड़/शक्कर-सौंफ का मोयन, छोटी मोटी टिकियाँ घी में तली — गौरी को 16 चढ़ाकर बाँटें
  • घेवर, फीणी (सर्दी-गर्मी की संधि की मिठाई), मालपुआ, चूरमा-लड्डू, मोहनथाल
  • तृतीया: खीर, पूड़ी, दाल-बाटी-चूरमा (राजस्थान), मालवा में आम-पना, दही-बड़े
  • 16 दिन: एक समय भोजन — बिना नमक (मीठा) कई घरों में; या फलाहार-दूध; कन्याएँ सुबह पूजा के बाद ही खाती हैं
  • प्रसाद: घर की स्त्रियाँ-कन्याएँ-पड़ोसिनें; पति/पुरुष को गौरी का प्रसाद नहीं (लोक-रीत)

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

गणगौर राजस्थान की आत्मा है; मालवा-निमाड़, गुजरात, बंगाल (गौरी-तृतीया) और तमिलनाडु में अपने रूप।

राजस्थान (जयपुर-उदयपुर-जोधपुर-बीकानेर-नाथद्वारा): जयपुर की शाही गणगौर — त्रिपोलिया गेट से हाथी-घोड़े-बैंड के साथ गौरी की सवारी, «घुमर»; उदयपुर में गणगौर-घाट (पिछोला) पर नावों की सवारी व मेवाड़ी विदाई; जोधपुर में घुड़ला-मेला (चैत्र कृष्ण अष्टमी) और «धींगा गणगौर» (बड़ी गणगौर के 15 दिन बाद, स्त्रियाँ पुरुष-वेश में); बीकानेर में गणगौर की चोप; नाथद्वारा में श्रीनाथजी के साथ गणगौर-झाँकी।
मध्य प्रदेश (मालवा-निमाड़): «गणगौर/रणुबाई» — निमाड़ में रणुबाई (गौरी) और धनियर राजा (ईसर) की जवारे-पूजा, 9 दिन का उत्सव, झालरिया गीत; मालवा में 16 दिन का व्रत, तृतीया को विसर्जन-मेला (इंदौर-उज्जैन-मंदसौर)।
गुजरात-हरियाणा-उत्तर प्रदेश: गुजरात में «गौरी व्रत/गोर्यो» (आषाढ़ में कन्याओं का 5 दिन का व्रत — अलग तिथि) और चैत्र में गणगौर राजस्थानी परिवारों में; हरियाणा-दिल्ली-यूपी की मारवाड़ी-अग्रवाल बहुओं में 16 दिन का गणगौर, तालाब/मंदिर पर विदाई।
बंगाल-ओडिशा: बंगाल में «गौरी तृतीया» नहीं, पर चैत्र में «नील पूजा/गाजन» (शिव-गौरी विवाह, चैत्र-संक्रांति के आस-पास) — स्त्रियाँ संतान के लिए नील-षष्ठी व्रत रखती हैं; ओडिशा में «गौरी-व्रत» कन्याओं का, «दंड-नाच» चैत्र में।
दक्षिण भारत: तमिलनाडु में चैत्र की तृतीया विशेष नहीं; गौरी-व्रत आषाढ़-श्रावण (केदार-गौरी, वरलक्ष्मी, गौरी हब्बा — भाद्रपद) में; कर्नाटक की «स्वर्ण गौरी व्रत» गणेश-चतुर्थी से एक दिन पहले — गौरी-पूजा का दक्षिणी रूप।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • आरंभ होली की राख से, रोज़ दूब-जल की पूजा — बीच में न छोड़ें
  • गौरी को 16-16 चीज़ें, सोलह श्रृंगार, मेहंदी — सुहाग का अंक
  • तृतीया की विदाई गीतों के साथ तालाब/नदी पर; मूर्ति सम्मान से विसर्जित/सँभालें
  • बाया सास/बड़ी को; नई बहू का पहला गणगौर मायके में
  • कन्याएँ विवाह तक हर साल — व्रत की परंपरा जारी

❌ क्या न करें

  • गणगौर की पूजा पति के सामने नहीं; गौरी का प्रसाद पति/पुरुष को नहीं (लोक-रीत)
  • 16 दिन में झूठ, कलह, काले वस्त्र, दिन में सोना — वर्जित
  • विसर्जन में प्लास्टिक-रंग वाली मूर्ति जल में नहीं — मिट्टी की, या लकड़ी की घर लौटाएँ
  • घुड़ले की आग/दीप से बच्चियों को सावधान
  • मायके न जा सकें तो व्रत छोड़ें नहीं — ससुराल में भी मान्य

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गणगौर 2027 में कब है?

ऊपर दी गई तिथि इस साल की चैत्र शुक्ल तृतीया (बड़ी गणगौर/विदाई-दिन) है — पंचांग-गणना से; 16 दिन का व्रत होली के अगले दिन से शुरू होता है (इस साल होली की तिथि होली-पन्ने पर)।

गणगौर का व्रत कितने दिन का है?

पूरा व्रत होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से चैत्र शुक्ल तृतीया तक 16-18 दिन; न रख सकें तो अंतिम तीन दिन (प्रतिपदा-द्वितीया-तृतीया) या सिर्फ़ तृतीया — दोनों मान्य।

कौन रखे — कुँवारी या विवाहित?

दोनों — कन्याएँ मनचाहे वर के लिए (विवाह तक हर साल), विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु-सौभाग्य के लिए; नई बहू का पहला गणगौर मायके में विशेष, 16 दिन।

ईसर-गौर क्या हैं और होली की राख से क्यों?

ईसर = ईश्वर (शिव), गौर = गौरी (पार्वती); होलिका दहन की राख से उनके छोटे पिंड बनाकर व्रत आरंभ होता है — बुराई की राख से सृजन का प्रतीक; बाद में लकड़ी/मिट्टी की मूर्तियाँ सजाई जाती हैं।

घुड़ला क्या है?

छिद्रों वाला मिट्टी का घड़ा जिसके भीतर दीप रखकर कन्याएँ सिर पर लेकर शाम को घर-घर घूमती हैं (चैत्र कृष्ण अष्टमी से तृतीया तक, विशेषकर जोधपुर) — घी-गुड़ माँगती हैं; घुड़ला ख़ान की लोक-कथा से जुड़ा।

गणगौर का प्रसाद पति क्यों नहीं खाते?

लोक-मान्यता — गणगौर गौरी का «मायका» है, विदाई बेटी की-सी; पति (ससुराल-पक्ष) को गौरी का प्रसाद न देना और पति के सामने पूजा न करना उसी भाव का हिस्सा है। कई आधुनिक घर इसे नहीं मानते — अपनी रीत।

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⚠️ यह विवरण राजस्थान-मालवा की पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है।

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