🎨 होली (होलिका दहन व धुलंडी) 2027
फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन, अगले दिन रंगों की होली — भद्रा-रहित प्रदोष का दहन-मुहूर्त, नई फ़सल की बालियाँ, गुझिया और गुलाल।
- होलिका दहन (फाल्गुन पूर्णिमा, प्रदोष) — रविवार, 21 मार्च 2027
- होली / धुलंडी / रंगवाली होली (दहन के अगले दिन) — सोमवार, 22 मार्च 2027
होली दो दिन का पर्व है — फाल्गुन पूर्णिमा की शाम होलिका दहन (छोटी होली) और अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंगों की होली (धुलंडी/धुलेंडी)। वसंत पंचमी से शुरू हुआ 40 दिन का फाग यहीं पूरा होता है; यह अधर्म पर भक्ति की जीत (प्रह्लाद-होलिका) और नई फ़सल (गेहूँ-जौ की बालियाँ भूनना) का उत्सव है।
घर की स्त्रियाँ होलिका दहन के दिन होली की पूजा करती हैं — गोबर के बड़कुल्ले/गुलरी की माला, कच्चा सूत, नई बालियाँ, गुझिया का भोग — और दहन की परिक्रमा; अगले दिन रंग, गुझिया-कांजी-ठंडाई और घर-घर मिलना। नीचे इस साल की दोनों तिथियाँ, भद्रा-रहित दहन-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, पकवान और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
होलिका दहन का नियम: प्रदोष-काल में, पूर्णिमा तिथि में और **भद्रा-रहित** समय में — भद्रा (विष्टि करण) में दहन वर्जित; भद्रा हो तो उसके बाद (या भद्रा-पुच्छ में)। इसीलिए हर साल का मुहूर्त अलग — ऊपर प्रदोष का समय दिया है; भद्रा का समय अपने शहर के पंचांग-पन्ने पर देखें।
होलाष्टक: होली से आठ दिन पहले (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा) मांगलिक कार्य वर्जित — विवाह, गृह-प्रवेश नहीं; होली के बाद चैत्र-नवरात्रि तक फिर मुहूर्त खुलते हैं।
नई फ़सल: दहन की आग में गेहूँ-जौ-चने की हरी बालियाँ भूनकर (होला) प्रसाद खाना और घर लाना — यही «होली» नाम का एक मूल; दहन की राख/अग्नि घर लाकर चूल्हा जलाना शुभ। बुराई (होलिका) जली, भक्ति (प्रह्लाद) बची — यह भाव।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — दिन में होली की पूजा-भोग, प्रदोष में भद्रा देखकर दहन-परिक्रमा; अगले दिन रंग।
- होलिका दहन के दिन सुबह: गोबर से बड़कुल्ले/गुलरी (छेद वाली छोटी टिकियाँ) बनाकर सुखाएँ और माला में पिरोएँ — 4-5 मालाएँ (पितरों, हनुमान, शीतला, घर-परिवार के नाम से); मोहल्ले की होली (लकड़ी-उपलों का ढेर, बीच में होलिका-प्रह्लाद का डंडा) पर जाकर या घर के आँगन में छोटी होली बनाएँ।
- दिन में/शाम से पहले होली-पूजा: होली के डंडे/ढेर पर रोली-अक्षत-फूल, कच्चा सूत (मौली) 3 या 7 बार लपेटते हुए परिक्रमा, जल का लोटा अर्पण, बड़कुल्ले की माला, गेहूँ-जौ की हरी बालियाँ, नारियल, गुझिया-मिठाई, गुलाल; «ॐ होलिकायै नमः», प्रह्लाद-नृसिंह का स्मरण — «असृक्पाभयसंत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः…»।
- दहन (प्रदोष-काल, भद्रा-रहित — ऊपर प्रदोष-समय; भद्रा पंचांग-पन्ने पर): मोहल्ले के बड़े/पंडित अग्नि दें; परिवार सहित 3/5/7 परिक्रमा, जल की धार, बड़कुल्ले-बालियाँ-नारियल अग्नि में; आग में गेहूँ-जौ-चने की बालियाँ भूनकर (होला) बाँटें।
- घर लौटकर दहन की थोड़ी अग्नि/राख लाएँ — नए चूल्हे/दीप के लिए शुभ; राख का तिलक (नज़र से रक्षा); रात में होली के गीत-फाग, ठंडाई।
- धुलंडी (अगला दिन): सुबह घर के बड़ों को गुलाल का टीका और पैर छूना, फिर रंग; गुझिया-कांजी-दही-बड़े; ठाकुर जी/बाँके-बिहारी को गुलाल; दोपहर बाद रंग धोकर नए कपड़े, शाम को मिलना-मिलाना (होली-मिलन)।
- स्त्रियाँ: दहन की अगली सुबह होली की राख से घर के द्वार पर छींटे (शुद्धि), शीतला माता को ठंडा भोग (कई इलाक़ों में होली के बाद शीतला अष्टमी/बसौड़ा); ब्रज में लट्ठमार-फूलों की होली इससे पहले के हफ़्ते।
- पितरों के नाम की बड़कुल्ले-माला और दान: होलिका दहन को अन्न-वस्त्र दान, नई फ़सल का पहला अंश देवता-पितर-गाय को।
- अगले दिन से चैत्र — कहीं-कहीं होली के 5 दिन बाद रंग पंचमी (महाराष्ट्र-मप्र) और 8 दिन बाद शीतला अष्टमी।
पूजा-सामग्री की सूची
गोबर के बड़कुल्ले और गेहूँ-जौ की हरी बालियाँ दहन के दिन की ख़ास चीज़ें; रंग-गुझिया अगले दिन।
- गोबर (बड़कुल्ले/गुलरी की मालाएँ), कच्चा सूत/मौली
- रोली, अक्षत, हल्दी, फूल, गुलाल, जल का लोटा
- गेहूँ-जौ-चने की हरी बालियाँ (होला), नारियल, सुपारी
- गुझिया/मिठाई (भोग), गुड़, कच्चे चावल
- लकड़ी-उपले (मोहल्ले की होली), होलिका-प्रह्लाद का डंडा/झंडा
- धुलंडी: हर्बल गुलाल-रंग, पिचकारी, पुराने कपड़े; ठंडाई, गुझिया, कांजी-बड़े, दही-बड़े, पापड़
- ठाकुर जी को गुलाल, नए वस्त्र; बड़ों के लिए गुलाल-थाली
- राख रखने को छोटा पात्र (घर लाने हेतु)
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
दैत्यराज हिरण्यकशिपु को वर था कि उसे न मनुष्य मार सके न पशु, न दिन न रात, न घर के भीतर न बाहर, न अस्त्र न शस्त्र। अहंकार में उसने अपनी ही पूजा का आदेश दिया, पर उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु-भक्त था। पिता ने प्रह्लाद को पहाड़ से गिरवाया, हाथी से कुचलवाया, विष दिया — भक्त हर बार बचा।
हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान था कि आग उसे न जलाए। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठी — पर भक्त «नारायण-नारायण» जपता रहा; वरदान का दुरुपयोग हुआ तो होलिका जल गई, प्रह्लाद निकल आया। फाल्गुन पूर्णिमा की वह रात — होलिका दहन: बुराई जली, भक्ति बची। फिर नृसिंह ने खंभे से प्रकट होकर संध्या-समय, दहलीज़ पर, गोद में, नखों से हिरण्यकशिपु का वध किया।
दूसरी कथा — शिव ने कामदेव को तीसरे नेत्र से भस्म किया (वसंत पंचमी के बाद), रति के विलाप पर होली के दिन कामदेव को «अनंग» रूप में पुनर्जीवन — इसलिए होली प्रेम-रंग का पर्व; ब्रज में राधा-कृष्ण की होली — कृष्ण ने साँवले होने की शिकायत पर माँ यशोदा के कहने पर राधा को रंग लगाया — रंगवाली होली की जड़।
गुझिया, कांजी, ठंडाई — होली की रसोई
होली की गुझिया (मावा-मेवा भरी, घी में तली) हफ़्ता-भर पहले बनती है; कांजी-बड़े (राई-पानी में उड़द के बड़े, 3-4 दिन पहले), दही-बड़े, पापड़, नमकीन, ठंडाई — दहन की शाम भोग, धुलंडी को मेहमानों के लिए।
- गुझिया (20): 2 कप मैदा + 4 चम्मच घी का मोयन; भरावन — 200 ग्राम मावा भूनकर, 100 ग्राम पिसी शक्कर, मेवे-नारियल-इलायची; साँचे में भरकर घी में धीमी आँच पर सुनहरी
- कांजी-बड़े: पानी में पिसी राई, काला नमक, हल्दी, हींग — 3-4 दिन धूप में; उड़द के छोटे बड़े डालकर 1 दिन
- ठंडाई (बादाम-सौंफ-खसखस-काली मिर्च-गुलाब-दूध), दही-बड़े, आलू-चिप्स, नमकपारे, शक्करपारे, मालपुआ
- होला: दहन की आग में भुनी गेहूँ-जौ-चने की बालियाँ — पहला प्रसाद; बिहार-पूर्वांचल में पुआ-पूड़ी-कढ़ी, मालपुआ; पंजाब में कांजी-गुझिया-पिन्नी; महाराष्ट्र में पूरनपोली-कटाची आमटी; गुजरात में धानी (भुने अनाज)-खजूर-गुझिया; बंगाल में दोल-यात्रा की मालपुआ-खीर
- शीतला-भोग (होली के 7-8 दिन बाद बसौड़ा): एक दिन पहले बना ठंडा भोजन — मीठे चावल, पूड़ी, दही, गुलगुले
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
ब्रज की लट्ठमार से बंगाल की दोल-यात्रा तक — एक पूर्णिमा, सौ रंग।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- दहन प्रदोष-काल में, भद्रा टालकर — भद्रा का समय अपने शहर के पंचांग-पन्ने पर देखें
- होली-पूजा में कच्चा सूत, बड़कुल्ले, नई बालियाँ, नारियल; परिक्रमा परिवार सहित
- बड़ों को पहले गुलाल-टीका, पैर छूकर; हर्बल/प्राकृतिक रंग
- दहन की बालियाँ (होला) व राख घर लाएँ — शुभ
- होलाष्टक में मांगलिक कार्य टालें; होली के बाद मुहूर्त
❌ क्या न करें
- भद्रा में होलिका दहन — वर्जित; दहन प्रदोष के बाद बहुत देर रात भी नहीं
- रासायनिक/पक्के रंग, गुब्बारे, ज़बरदस्ती रंग — नहीं; आँख-मुँह में रंग नहीं
- भाँग-शराब की अति, नशे में वाहन — होली की सबसे बड़ी दुर्घटना-वजह
- दहन में प्लास्टिक-टायर-रबर न जलाएँ; बच्चों को आग से दूर
- जानवरों (कुत्ते-गाय) पर रंग नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
होली 2027 में कब है — दहन और रंग?
ऊपर दोनों तिथियाँ हैं — फाल्गुन पूर्णिमा की शाम होलिका दहन (प्रदोष-काल, ऊपर समय) और अगले दिन रंगों की होली/धुलंडी; पंचांग-गणना से।
होलिका दहन का सही मुहूर्त कैसे तय होता है?
पूर्णिमा तिथि + प्रदोष-काल (सूर्यास्त से ~2 घंटे 24 मिनट) + भद्रा-रहित समय — तीनों साथ चाहिए। भद्रा प्रदोष में हो तो उसके ख़त्म होने के बाद (या भद्रा-पुच्छ में); पूर्णिमा अगले दिन प्रदोष तक न हो तो उसी रात। भद्रा का सटीक समय पंचांग-पन्ने (अपने शहर) पर।
होलाष्टक क्या है?
होली से पहले के आठ दिन (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा) — इनमें विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते; होली के बाद फिर शुरू।
बड़कुल्ले/गुलरी क्या हैं?
गोबर की छेद वाली छोटी टिकियाँ (सूखी) जिन्हें सूत में पिरोकर मालाएँ बनाई जाती हैं — पितरों, हनुमान जी, शीतला माता, घर के नाम से — और होलिका दहन में चढ़ाई जाती हैं; उत्तर भारत की स्त्रियों की रीत।
रंग पंचमी क्या है?
होली के पाँचवें दिन (चैत्र कृष्ण पंचमी) महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश में रंगों का मुख्य दिन — इंदौर-उज्जैन की «गेर», मुंबई-पुणे की रंगपंचमी; ब्रज में इस दिन तक फाग चलता है।
होली के बाद शीतला अष्टमी/बसौड़ा क्या है?
होली के 7-8 दिन बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी (या सप्तमी) — शीतला माता को एक दिन पहले बना ठंडा भोजन चढ़ाना, उस दिन चूल्हा न जलाना; बच्चों की चेचक-रक्षा का व्रत (पन्ना अलग है)।
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✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
यह भी पढ़ें: महाशिवरात्रि (15 दिन पहले) · शीतला अष्टमी / बसौड़ा (होली के बाद) · चैत्र नवरात्रि / गुड़ी पड़वा · भद्रा का समय (अपने शहर का पंचांग)
⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व मोहल्ले की रीत सर्वोपरि है। दहन का सटीक मुहूर्त भद्रा देखकर तय करें; रंग व आग में सुरक्षा सर्वोपरि।
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