🥣 शीतला अष्टमी (बसौड़ा / बसोड़ा) 2027
चैत्र कृष्ण अष्टमी — होली के आठ दिन बाद; शीतला माता को एक दिन पहले बना ठंडा भोजन, उस दिन चूल्हा नहीं जलता; बच्चों को चेचक-बुख़ार से रक्षा का माताओं का व्रत।
शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है — रंगों की होली के आठ दिन बाद (कई इलाक़ों में सप्तमी को — शीतला सप्तमी)। इसे बसौड़ा/बसोड़ा कहते हैं क्योंकि इस दिन «बासी» (एक दिन पहले बना, ठंडा) भोजन खाया और चढ़ाया जाता है — उस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता।
शीतला माता चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी और मौसमी बुख़ार की देवी हैं; गर्मी की शुरुआत में माताएँ बच्चों की रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं — शीतला-मंदिर/जल-स्थान पर ठंडे भोजन का भोग, ठंडे जल से पूजा, हल्दी-मेहंदी। नीचे इस साल की तिथि, पूजा-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, बासी भोग की रसोई और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
«शीतला» = ठंडक देने वाली — गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू (सफ़ाई), सूप (हवा), नीम-पत्र (औषधि), कलश (ठंडा जल): यह पूरा रूप गर्मी की बीमारियों से बचाव का संकेत है — सफ़ाई, ठंडक, नीम। इसीलिए पूजा में नीम, ठंडा जल और बासी (बिना आग का) भोजन।
बसौड़ा: पूजा से एक दिन पहले (सप्तमी को) सब भोजन बनाकर रख लिया जाता है; अष्टमी को चूल्हा-अग्नि की पूजा होती है पर जलाया नहीं जाता — यह ऋतु-परिवर्तन पर एक दिन शरीर को ठंडा भोजन देने की आयुर्वेदिक रीत भी है (इसके बाद बासी भोजन बंद)।
राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा में सबसे प्रबल; बंगाल में शीतला-पूजा अलग तिथियों पर। यह घर की स्त्रियों का — विशेषकर माताओं का — व्रत है; नई बहू का पहला बसौड़ा मायके से।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — सप्तमी की शाम भोजन बनाना, अष्टमी को भोर में शीतला-पूजा व बासी भोग, दिन-भर चूल्हा बंद।
- सप्तमी (एक दिन पहले) की शाम: सब भोजन बना लें — मीठे चावल (गुड़/शक्कर), पूड़ी, गुलगुले/मालपुए, बेसन की सब्ज़ी, दही, राबड़ी, कढ़ी, पकौड़ी, ठंडे शरबत का सामान; रसोई साफ़ करके चूल्हा ठंडा; रात को चूल्हे की पूजा (रोली-चावल-फूल)।
- अष्टमी को भोर में (सूर्योदय से पहले/ब्रह्म-मुहूर्त — ऊपर समय) ठंडे जल से स्नान; बिना चूल्हा जलाए घर की सफ़ाई; संकल्प — «मैं बच्चों/परिवार की आरोग्य-रक्षा हेतु शीतला अष्टमी का व्रत करती हूँ।»
- थाली में बासी भोजन (हर चीज़ थोड़ी-थोड़ी), ठंडा जल का लोटा, हल्दी-मेहंदी, रोली, चावल, फूल, नीम की टहनी, सूप/झाड़ू (प्रतीक), दीपक (जलाना नहीं — कई जगह बिना दीप); मोहल्ले के शीतला-मंदिर या जल-स्थान (कुआँ-तालाब-नल के पास) या घर के पूजा-स्थान पर पूजा।
- शीतला माता (चित्र/पत्थर/मंदिर) को ठंडा जल, हल्दी-मेहंदी (हाथ की छाप), रोली-चावल, फूल, नीम-पत्र; बासी भोग चढ़ाएँ; «ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः» / शीतला-स्तोत्र («वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्»); शीतला माता की कथा (नीचे) सुनें।
- पूजा के जल/हल्दी-मेहंदी से घर के मुख्य द्वार पर छापे (हाथ की छाप) और बच्चों के माथे पर टीका — नज़र-रोग से रक्षा; पूजा का ठंडा जल घर में छिड़कें।
- दिन-भर बासी भोजन ही — सबसे पहले बच्चों को, फिर बड़े; चूल्हा-गैस नहीं जलेगा (चाय भी नहीं — कई घर ठंडा दूध/शरबत)।
- दान: ठंडा भोजन, मीठे चावल, कपड़ा — ज़रूरतमंद/मंदिर; गधे (शीतला का वाहन) को रोटी-चना जहाँ संभव; झाड़ू-सूप का दान भी।
- अगले दिन (नवमी) चूल्हा जलाकर पहले शीतला माता को गर्म भोग (हलवा) फिर सामान्य भोजन — बसौड़ा समाप्त; इसके बाद बासी खाना बंद।
पूजा-सामग्री की सूची
सब कुछ एक दिन पहले तैयार — पूजा के दिन आग नहीं।
- बासी भोग: मीठे चावल (गुड़-चावल/ओलिया), पूड़ी, गुलगुले/मालपुए, कढ़ी-पकौड़ी, बेसन-सब्ज़ी, दही, राबड़ी, चने की दाल — सप्तमी को बना हुआ
- ठंडे जल का लोटा (ताँबे/मिट्टी का), गंगाजल
- हल्दी, मेहंदी (घोल — हाथ की छाप), रोली, कच्चे चावल, फूल
- नीम की टहनी/पत्ते, सूप (छोटा) और झाड़ू (प्रतीक/दान)
- शीतला माता का चित्र/मूर्ति (या मंदिर/जल-स्थान का पत्थर), चुनरी
- ठंडा शरबत/दूध, ठंडाई (उस दिन गर्म कुछ नहीं)
- दान: कपड़ा, भोजन, झाड़ू-सूप; गधे-गाय के लिए रोटी-चना
- शीतला-स्तोत्र/कथा पुस्तक
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
एक गाँव में हर घर बसौड़ा मनाता था, पर एक बुढ़िया ने चूल्हा जलाकर गर्म खाना बनाया। शीतला माता वृद्धा-रूप में गाँव में आईं — बुढ़िया का घर आग से जल गया, उसके बच्चे बुख़ार-चेचक से तपने लगे। बुढ़िया रोती हुई दूसरे घरों में गई — वहाँ ठंडा भोजन और ठंडा जल था; माता ने कहा «मैं शीतला हूँ, मुझे ठंडक चाहिए; तूने आग जलाई तो तेरा घर जला।»
बुढ़िया ने क्षमा माँगी, ठंडे जल और बासी भोजन (दही-मीठे चावल) से माता को शीतल किया; माता प्रसन्न हुईं, बच्चे स्वस्थ हुए, घर बसा। तभी से चैत्र कृष्ण अष्टमी को चूल्हा न जलाकर ठंडा भोजन चढ़ाने की रीत — बसौड़ा; और सीख — गर्मी के मौसम में ठंडक-सफ़ाई से बीमारी दूर।
स्कंद-पुराण में शीतला माता ब्रह्मा की पुत्री और ज्वरासुर (बुख़ार का दैत्य) को वश में करने वाली हैं — गधे पर बैठी, झाड़ू-सूप-कलश-नीम लिए, वे ज्वर-चेचक को शांत करती हैं; इसीलिए «शीतला-सप्तमी/अष्टमी» का व्रत बच्चों की रक्षा का व्रत।
बसौड़ा — एक दिन पहले बनी ठंडी रसोई
सब सप्तमी की शाम बनाकर ढककर रखें; अष्टमी को बिना गर्म किए भोग व भोजन। मीठे चावल (ओलिया) और गुलगुले इस दिन की पहचान; राजस्थान में «ठंडा खाना» की पूरी थाली।
- मीठे चावल/ओलिया: चावल को गुड़-पानी (या शक्कर) में पकाकर, घी-इलायची-मेवे; ठंडा — शीतला का मुख्य भोग
- गुलगुले (आटा-गुड़-सौंफ के तले गोले), मालपुए, पूड़ी, बेसन की सब्ज़ी/गट्टे, कढ़ी-पकौड़ी, दही, राबड़ी, चने की दाल
- राजस्थान: ठंडा «बासी-ओड़ा» — दही-चावल, बाजरे की रोटी-गुड़, राबड़ी, पचकुटा; गुजरात: ठंडी पूरी-शाक, ढेबरा
- उत्तर प्रदेश-हरियाणा: गुलगुले, मीठे चावल, पूड़ी-कढ़ी, दही-बूरा; मध्य प्रदेश: ठंडा पोहा-दही, मीठी रोटी
- अगले दिन: गर्म हलवा पहले माता को, फिर परिवार — बसौड़ा-समापन
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
बसौड़ा उत्तर-पश्चिम भारत की रीत; बंगाल-दक्षिण में शीतला/मारियम्मन की पूजा अलग ढंग से।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- सब भोजन सप्तमी को बना लें — अष्टमी को चूल्हा/गैस नहीं
- पूजा भोर में, ठंडे जल से; नीम व हल्दी-मेहंदी ज़रूर
- बासी भोग पहले माता को, फिर बच्चों को, फिर बड़ों को
- हाथ की छाप द्वार पर, टीका बच्चों को — रक्षा का प्रतीक
- घर-रसोई-आस-पास की सफ़ाई — यही शीतला का असली संदेश; बच्चों का टीकाकरण (चेचक-खसरा) समय पर
❌ क्या न करें
- अष्टमी को आग नहीं — चाय-दूध भी गर्म नहीं (ठंडा लें)
- बासी भोजन बहुत गर्म मौसम में ख़राब हो सकता है — ढककर, ठंडी जगह; दही-राबड़ी सुबह जाँच लें; बच्चों-बुज़ुर्गों को संदिग्ध चीज़ नहीं
- इस दिन के बाद बासी खाना बंद — गर्मी-भर ताज़ा
- बुख़ार-चेचक में व्रत को इलाज का विकल्प न मानें — डॉक्टर व टीकाकरण
- गधे/पशु को मारना-सताना — शीतला का वाहन
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शीतला अष्टमी 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की चैत्र कृष्ण अष्टमी है — पंचांग-गणना से; भोर की पूजा का समय (सूर्योदय/ब्रह्म-मुहूर्त) भी वहीं। कई परिवार सप्तमी (एक दिन पहले) को मनाते हैं — अपनी रीत मानें।
बसौड़ा क्या है और उस दिन खाना क्यों नहीं बनता?
«बासी» भोजन का दिन — सब कुछ एक दिन पहले बनाकर अष्टमी को बिना आग जलाए ठंडा खाया-चढ़ाया जाता है; शीतला माता को ठंडक प्रिय है (कथा), और ऋतु-परिवर्तन पर एक दिन ठंडा भोजन आयुर्वेदिक रीत भी।
शीतला सप्तमी और अष्टमी में क्या अंतर?
दोनों एक ही पर्व — राजस्थान-गुजरात के कई इलाक़े सप्तमी को, उत्तर प्रदेश-हरियाणा अष्टमी को; भोजन सप्तमी/षष्ठी की शाम बनता है। गुजरात में श्रावण की «शीतला सातम» अलग पर्व है (जन्माष्टमी से पहले)।
शीतला माता कौन हैं?
चेचक-खसरा-बुख़ार की देवी (स्कंद-पुराण), गधे पर सवार, झाड़ू-सूप-कलश-नीम धारण किए — सफ़ाई, ठंडक और औषधि का प्रतीक; ज्वरासुर को वश में करने वाली; माताएँ बच्चों की रक्षा के लिए पूजती हैं।
क्या गैस-चूल्हा बिल्कुल नहीं जला सकते?
परंपरा में नहीं — पूरा दिन ठंडा; बुज़ुर्ग/रोगी/शिशु की ज़रूरत (दूध गर्म करना, दवा) हो तो ज़रूरत भर जला लें — माता ठंडक चाहती हैं, कष्ट नहीं।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। बच्चों का टीकाकरण और बीमारी का इलाज चिकित्सक से — व्रत उसका विकल्प नहीं; बासी भोजन की सुरक्षा का ध्यान रखें।
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