👩👧👦 जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया / जितिया) 2026
आश्विन कृष्ण अष्टमी (पितृ-पक्ष के बीच) — माताओं का संतान की दीर्घायु के लिए 24 घंटे का निर्जला व्रत; सप्तमी को नहाय-खाय व रात «ओठगन», अष्टमी निर्जला व जीमूतवाहन-पूजा, नवमी को पारण; बिहार-झारखंड-यूपी-नेपाल का सबसे कठोर मातृ-व्रत।
जीवित्पुत्रिका (जिउतिया/जितिया) व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रखा जाता है — पितृ-पक्ष के ठीक बीच में, शारदीय नवरात्रि से लगभग एक सप्ताह पहले। माताएँ अपनी संतान (पुत्र-पुत्री दोनों — «जीवित्पुत्रिका» = पुत्र जीवित रहे) की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सफलता के लिए यह व्रत रखती हैं — करवा चौथ से भी कठोर: लगभग 24 घंटे निर्जला (न अन्न, न जल), सप्तमी की आधी रात के बाद से नवमी की सुबह तक।
तीन दिन का पर्व: सप्तमी को «नहाय-खाय» (स्नान, सात्विक भोजन — मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी, दही-चूड़ा) और रात/भोर में «ओठगन/सरगही» (व्रत से पहले अंतिम भोजन-जल), अष्टमी को निर्जला व्रत व शाम को जीमूतवाहन-चील-सियारिन की पूजा (कुश की मूर्ति, कथा, जिउतिया-धागा गले में), नवमी को सूर्योदय के बाद पारण (झोर-भात/मड़ुआ)। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल (मिथिला-तराई) की स्त्रियों का प्राण-व्रत। नीचे इस साल की तिथि, नहाय-खाय/पारण, विधि, सामग्री, कथा, पकवान और इलाक़ों की रीत।
महत्व — यह व्रत क्यों
व्रत का आधार गंधर्व-राजकुमार जीमूतवाहन की कथा — उन्होंने नागवंश के बालक शंखचूड़ की जगह स्वयं को गरुड़ को सौंप दिया, गरुड़ ने प्रसन्न होकर सब नागों को जीवन-दान दिया; तभी से माताएँ जीमूतवाहन की पूजा — «जैसे तुमने पराए बालक की रक्षा की, मेरी संतान की भी करना»; चील-सियारिन की उप-कथा से व्रत की निष्ठा का महत्त्व।
अष्टमी उदया-तिथि व प्रदोष-व्यापिनी — दोनों नियम प्रचलित; पंचांग-भेद से कभी दो दिन की उलझन; बिहार में परंपरा — «जिस दिन सूर्योदय के समय अष्टमी हो» (उदया) मुख्य; व्रत 24 घंटे इसलिए कि अष्टमी पूरी निर्जला जाए; ओठगन सप्तमी की रात/भोर (अष्टमी लगने से पहले) में; पारण नवमी में अष्टमी समाप्त होने के बाद (ऊपर तिथि-खिड़की)।
पितृ-पक्ष में पड़ने से पितरों का आशीर्वाद भी संतान पर — व्रत के दिन दादी-नानी की भी स्मृति; मड़ुआ (रागी), नोनी-साग, झिंगनी (तोरई), केराव (मटर) — नहाय-खाय व पारण का पारंपरिक पौष्टिक भोजन; जिउतिया का लाल-पीला धागा (सोने-चाँदी के जिउतिया-लॉकेट) गले में — साल-भर या अगले व्रत तक।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — तीन दिन: सप्तमी नहाय-खाय व ओठगन, अष्टमी निर्जला व जीमूतवाहन-पूजा, नवमी पारण।
- सप्तमी — नहाय-खाय: सुबह नदी/घर पर स्नान, घर की सफ़ाई, सात्विक भोजन एक बार (मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी-तरकारी, अरवा चावल, दही-चूड़ा — प्याज़-लहसुन नहीं); पितरों-दादी को भोजन का अंश (पितृ-पक्ष)।
- सप्तमी रात/भोर — ओठगन (सरगही): अष्टमी लगने से पहले (ऊपर तिथि-खिड़की — प्रायः रात 2-4 बजे) अंतिम भोजन-जल — दही-चूड़ा, फल, मिठाई, जल; कई घर सोने से पहले ही; इसके बाद कुछ नहीं — यहाँ से 24 घंटे निर्जला।
- अष्टमी — निर्जला व्रत: दिन-भर न अन्न, न जल; दिन में सोना नहीं (कठोर), कथा-भजन; शाम (प्रदोष) को पूजा — कुश/मिट्टी से जीमूतवाहन की मूर्ति (या चित्र), मिट्टी/गोबर से चील (चिल्ही) व सियारिन (सियारो), जल-भरा कलश/मिट्टी का घड़ा, जिउतिया-धागा (लाल-पीला, सोने-चाँदी की जिउतिया पिरोई)।
- पूजा: जीमूतवाहन को धूप-दीप-अक्षत-फूल, चील-सियारिन को खीर-पूड़ी/धान-गुड़ (सूखा), जिउतिया-धागे को हल्दी-सिंदूर; कथा (जीमूतवाहन + चील-सियारिन — नीचे) सुनना; «सूर्य-चील-सियारिन» की लोक-प्रार्थना; अंत में धागा गले में (माँ, और बच्चों को भी — कुछ घर)।
- व्रत-रात: जागरण/भजन (हो सके तो), जल नहीं; अत्यंत कमज़ोरी/चक्कर हो तो घूँट जल लें — प्राण से बड़ा व्रत नहीं (नीचे FAQ)।
- नवमी — पारण: सूर्योदय के बाद, अष्टमी समाप्त होने पर (ऊपर) — पहले जिउतिया-प्रसाद/जल, फिर भोजन — झोर-भात (चावल + मड़ुआ/झिंगनी/नोनी-साग की रसदार सब्ज़ी), दही-चूड़ा, केराव, खीर-पूड़ी; कई घर पारण में 5-7 प्रकार की सब्ज़ी; बच्चों को पहले खिलाना।
- जिउतिया-धागा: कम-से-कम अगले व्रत तक गले में; टूटे तो जल में; हर वर्ष नया धागा पूजा में; बेटी की शादी के बाद पहला जिउतिया मायके से (धागा-चूड़ी-कपड़े — «जिउतिया का सिंजारा»)।
- दान: नवमी को व्रत-प्रसाद व अन्न-वस्त्र ब्राह्मणी/ग़रीब स्त्री को; पितृ-पक्ष का तर्पण साथ (घर के पुरुष)।
पूजा-सामग्री की सूची
जिउतिया-धागा, कुश की जीमूतवाहन-मूर्ति, चील-सियारिन, मड़ुआ-नोनी-झिंगनी — जिउतिया की सूची।
- जिउतिया-धागा (लाल-पीला सूत), सोने/चाँदी की जिउतिया (लॉकेट — हो सके तो), पुराने धागे (जल में डालने को)
- कुश/मिट्टी (जीमूतवाहन-मूर्ति), मिट्टी/गोबर (चील-सियारिन), मिट्टी का घड़ा/कलश, जल, आम के पत्ते
- धूप, दीपक, घी, अक्षत, हल्दी, सिंदूर, फूल, दूब, पान-सुपारी, मौली
- नैवेद्य: खीर-पूड़ी, धान-गुड़/लावा (चील-सियारिन को सूखा), फल (केला-सेब-अमरूद), मिठाई
- नहाय-खाय/पारण: मड़ुआ (रागी) आटा, नोनी-साग, झिंगनी (तोरई), केराव (सूखी मटर), अरवा चावल, दही-चूड़ा, गुड़, सरसों-तेल
- ओठगन/सरगही: दही-चूड़ा, फल, मिठाई, जल (पर्याप्त), दूध
- जिउतिया-कथा पुस्तक (जीमूतवाहन + चील-सियारिन), भजन
- बेटी को सिंजारा: धागा, चूड़ी, साड़ी, मिठाई, फल
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
गंधर्व-राज शालिवाहन के पुत्र जीमूतवाहन धर्मात्मा थे; राज्य त्यागकर ससुराल (मलयवान) में रहते थे। एक दिन वन में एक वृद्धा को रोते देखा — «नागवंश ने गरुड़ से संधि की है कि रोज़ एक नाग उसे भोजन में देंगे; आज मेरे इकलौते बेटे शंखचूड़ की बारी है»। जीमूतवाहन ने कहा «मैं तुम्हारे पुत्र की जगह जाऊँगा» — लाल कपड़े में लिपटकर वध-शिला पर लेट गए; गरुड़ उन्हें उठा ले गए, पर बालक की जगह रोता-कराहता कोई नहीं — पूछा तो जीमूतवाहन ने सच बताया; गरुड़ प्रसन्न हुए — «आज से नागों का बलि नहीं लूँगा», मृत नागों को अमृत से जिलाया। माताएँ बोलीं — «जो जीमूतवाहन को पूजेगी, उसकी संतान को दीर्घायु» — जिउतिया व्रत।
चील-सियारिन: एक वन में पाकड़ के पेड़ पर चील और नीचे सियारिन रहती थीं; दोनों ने स्त्रियों को जिउतिया करते देखा और व्रत का संकल्प लिया। चील ने पूरी निष्ठा से निर्जला रखा; सियारिन भूख न सह सकी और रात में मुर्दे का माँस खा गई — व्रत खंडित। अगले जन्म में दोनों बहनें बनीं — चील शीलवती (राजा की पत्नी, सात पुत्र), सियारिन कपुरावती (मंत्री की पत्नी — जिसके सब बच्चे जन्मते ही मरे)। ईर्ष्या में कपुरावती ने बहन के सातों पुत्रों के सिर कटवाए — पर जीमूतवाहन की कृपा से सब जीवित, कटे सिर फलों में बदले; कपुरावती को पिछले जन्म की भूल याद आई, पछतावा, बहन ने क्षमा किया। सीख — व्रत निष्ठा से, बीच में टूटा व्रत फलहीन।
एक और लोक-कथा (मिथिला): राजा शालिवाहन की रानी को पुत्र-शोक, जीमूतवाहन-पूजा से पुत्र-रक्षा; और सतयुग की कथा जिसमें सूर्य-देव का पुत्र-दान — इसलिए व्रत में सूर्य-अर्घ्य भी (कुछ इलाक़े)। कहीं यह व्रत «जिउतिया के जीमूतवाहन» के साथ «पाकड़-चील-सियार» की पूजा तीन प्रतीकों में करते हैं — पेड़, चील, सियार।
मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी, दही-चूड़ा, झोर-भात — नहाय-खाय व पारण की रसोई
जिउतिया का भोजन बिहार-झारखंड की पारंपरिक पौष्टिक रसोई — नहाय-खाय व पारण में मड़ुआ (रागी — लौह-कैल्शियम), नोनी-साग (गैया-साग), झिंगनी (तोरई), केराव, अरवा चावल, दही-चूड़ा; ओठगन में दही-चूड़ा-मिठाई-फल; व्रत में कुछ नहीं। नीचे विधि-सहित।
- मड़ुआ-रोटी (रागी-आटा गुनगुने पानी से गूँधकर तवे पर, घी), नोनी-साग की भुजिया (सरसों-तेल-लहसुन-रहित — व्रत-भोजन में प्याज़-लहसुन नहीं)
- झिंगनी (तोरई) की सब्ज़ी/झोर, केराव (सूखी मटर) की घुघनी, अरवा चावल का भात, अरहर की दाल
- दही-चूड़ा (ओठगन व पारण), गुड़, केला, खीर-पूड़ी (पूजा-नैवेद्य), ठेकुआ (कुछ घर)
- पारण का झोर-भात: भात + तोरई/नोनी/कद्दू की रसदार सब्ज़ी + दही; 5-7 सब्ज़ी की परंपरा (कुछ घर)
- यूपी (पूर्वांचल): जिउतिया पर पूड़ी-खीर-खीरा, ओठगन में दही-लाई; झारखंड: मड़ुआ-मार्चा, नोनी-साग; नेपाल-तराई: मड़ुआ-रोटी, माछ नहीं (व्रत-घर)
- व्रत-दिन: कुछ नहीं (निर्जला); अत्यंत कमज़ोरी में घूँट जल; गर्भवती/रोगी माताएँ फलाहार-रूप
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
बिहार की चील-सियारिन, झारखंड का मड़ुआ, पूर्वांचल की जिउतिया-खीरा, नेपाल-तराई का जितिया — माताओं का प्राण-व्रत।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- सप्तमी नहाय-खाय, अष्टमी लगने से पहले ओठगन (पर्याप्त जल-दही-चूड़ा-फल), अष्टमी निर्जला, नवमी सूर्योदय-बाद पारण (ऊपर तिथि-खिड़की)
- जीमूतवाहन (कुश) + चील-सियारिन की पूजा, दोनों कथाएँ; जिउतिया-धागा गले में
- पारण में पहले बच्चों को खिलाएँ; झोर-भात/मड़ुआ — पौष्टिक; प्रसाद बाँटें
- पितृ-पक्ष का ध्यान — नहाय-खाय का अंश पितरों-दादी को; व्रत-दिन दान
- बेटी को पहला जिउतिया-सिंजारा (धागा-चूड़ी-साड़ी) मायके से
❌ क्या न करें
- अष्टमी लगने के बाद ओठगन/जल — व्रत खंडित माना जाता (सियारिन की कथा); पर प्राण-संकट में जल लें
- गर्भवती, मधुमेही, हृदय-रोगी, स्तनपान कराने वाली माताएँ निर्जला न रखें — फलाहार-रूप, संकल्प वही
- व्रत-भोजन (नहाय-खाय/पारण) में प्याज़-लहसुन-माँस-मछली; तामसिक
- जिउतिया-धागा टूटने पर फेंकना — जल में डालें, नया पूजा करके पहनें
- व्रत-दिन दिन में सोना (कठोर रूप), कलह, बच्चों को डाँटना — जिसके लिए व्रत, उसी से प्रेम
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जिउतिया 2026 में कब है — नहाय-खाय, निर्जला, पारण?
ऊपर इस साल की आश्विन कृष्ण अष्टमी (निर्जला-दिन) की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) है — नहाय-खाय एक दिन पहले (सप्तमी), ओठगन अष्टमी लगने से पहले (तिथि-आरंभ ऊपर), पारण अगले दिन (नवमी) सूर्योदय के बाद अष्टमी समाप्त होने पर; बिहार में उदया-तिथि नियम — दो दिन की उलझन हो तो पंचांग/पंडित से मिलाएँ।
व्रत निर्जला 24 घंटे ही क्यों? पानी पी सकते हैं?
परंपरा में अष्टमी पूरी निर्जला (ओठगन से पारण तक); चील-सियारिन की कथा निष्ठा सिखाती है; पर प्राण से बड़ा कोई व्रत नहीं — गर्भवती, रोगी, स्तनपान कराने वाली, बुज़ुर्ग माताएँ जल/फल लें, संकल्प व पूजा वही — शास्त्र में «यथाशक्ति» व्रत; चक्कर/उल्टी हो तो तुरंत जल।
ओठगन (सरगही) कब करें?
अष्टमी-तिथि लगने से पहले — सप्तमी की रात सोने से पहले या भोर (प्रायः 2-4 बजे) उठकर दही-चूड़ा-फल-मिठाई-भरपूर जल; ऊपर तिथि-आरंभ देखें — उसके बाद कुछ नहीं; कई घर सूर्योदय से पहले तक मानते हैं (घर-रीत)।
जिउतिया-धागा क्या है, कब तक पहनें?
लाल-पीले सूत का धागा जिसमें सोने/चाँदी की छोटी «जिउतिया» (जीमूतवाहन-प्रतीक लॉकेट) पिरोई होती है — पूजा में चढ़ाकर माँ गले में पहनती है (बच्चों को भी — कुछ घर); अगले वर्ष के व्रत तक या कम-से-कम कुछ दिन; हर वर्ष नया, पुराना जल में; बेटी को पहला धागा मायके से।
बेटी के लिए भी यह व्रत है?
हाँ — नाम «पुत्रिका» पर व्रत सब संतान के लिए (पुत्र-पुत्री); आधुनिक घरों में माताएँ बेटी-बेटे दोनों के लिए, कहीं गोद-ली संतान/भतीजे-भाँजे के लिए भी; चील-सियारिन की कथा में «सात पुत्र» लोक-रूप है, भाव सब संतान।
अहोई अष्टमी और जिउतिया में अंतर?
दोनों माताओं के संतान-व्रत, दोनों कृष्ण अष्टमी — जिउतिया आश्विन (पितृ-पक्ष में, बिहार-यूपी-झारखंड-नेपाल, 24 घंटे निर्जला, जीमूतवाहन-पूजा), अहोई कार्तिक (करवा चौथ के 4 दिन बाद, उत्तर-पश्चिम भारत, तारा-दर्शन तक निर्जला, अहोई-माता-स्याहु की पूजा); कई पूर्वांचली-दिल्ली परिवार दोनों रखते हैं।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। निर्जला व्रत स्वास्थ्य देखकर रखें — गर्भावस्था, मधुमेह, हृदय-रोग, स्तनपान में जल-फल लें; चिकित्सक की सलाह मानें।
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