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🪔 व्रत-त्योहार

👩‍👧‍👦 जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया / जितिया) 2026

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

आश्विन कृष्ण अष्टमी (पितृ-पक्ष के बीच) — माताओं का संतान की दीर्घायु के लिए 24 घंटे का निर्जला व्रत; सप्तमी को नहाय-खाय व रात «ओठगन», अष्टमी निर्जला व जीमूतवाहन-पूजा, नवमी को पारण; बिहार-झारखंड-यूपी-नेपाल का सबसे कठोर मातृ-व्रत।

जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया / जितिया) 2026 की तिथि
शनिवार, 3 अक्टूबर 2026
आश्विन · कृष्ण पक्ष · अष्टमी (विक्रम संवत 2083)
🌅 सूर्योदय6:15 AM
📿 तिथि-कालअष्टमी 3 अक्टूबर, 8:00 AM → 4 अक्टूबर, 5:52 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:46 AM – 12:34 PM
🪔 प्रदोष काल6:05 PM – 8:29 PM
⛔ राहुकाल (टालें)09:12 AM – 10:41 AM
अगले वर्ष — 2027: गुरुवार, 23 सितंबर 2027
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

जीवित्पुत्रिका (जिउतिया/जितिया) व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रखा जाता है — पितृ-पक्ष के ठीक बीच में, शारदीय नवरात्रि से लगभग एक सप्ताह पहले। माताएँ अपनी संतान (पुत्र-पुत्री दोनों — «जीवित्पुत्रिका» = पुत्र जीवित रहे) की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सफलता के लिए यह व्रत रखती हैं — करवा चौथ से भी कठोर: लगभग 24 घंटे निर्जला (न अन्न, न जल), सप्तमी की आधी रात के बाद से नवमी की सुबह तक।

तीन दिन का पर्व: सप्तमी को «नहाय-खाय» (स्नान, सात्विक भोजन — मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी, दही-चूड़ा) और रात/भोर में «ओठगन/सरगही» (व्रत से पहले अंतिम भोजन-जल), अष्टमी को निर्जला व्रत व शाम को जीमूतवाहन-चील-सियारिन की पूजा (कुश की मूर्ति, कथा, जिउतिया-धागा गले में), नवमी को सूर्योदय के बाद पारण (झोर-भात/मड़ुआ)। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल (मिथिला-तराई) की स्त्रियों का प्राण-व्रत। नीचे इस साल की तिथि, नहाय-खाय/पारण, विधि, सामग्री, कथा, पकवान और इलाक़ों की रीत।

महत्व — यह व्रत क्यों

व्रत का आधार गंधर्व-राजकुमार जीमूतवाहन की कथा — उन्होंने नागवंश के बालक शंखचूड़ की जगह स्वयं को गरुड़ को सौंप दिया, गरुड़ ने प्रसन्न होकर सब नागों को जीवन-दान दिया; तभी से माताएँ जीमूतवाहन की पूजा — «जैसे तुमने पराए बालक की रक्षा की, मेरी संतान की भी करना»; चील-सियारिन की उप-कथा से व्रत की निष्ठा का महत्त्व।

अष्टमी उदया-तिथि व प्रदोष-व्यापिनी — दोनों नियम प्रचलित; पंचांग-भेद से कभी दो दिन की उलझन; बिहार में परंपरा — «जिस दिन सूर्योदय के समय अष्टमी हो» (उदया) मुख्य; व्रत 24 घंटे इसलिए कि अष्टमी पूरी निर्जला जाए; ओठगन सप्तमी की रात/भोर (अष्टमी लगने से पहले) में; पारण नवमी में अष्टमी समाप्त होने के बाद (ऊपर तिथि-खिड़की)।

पितृ-पक्ष में पड़ने से पितरों का आशीर्वाद भी संतान पर — व्रत के दिन दादी-नानी की भी स्मृति; मड़ुआ (रागी), नोनी-साग, झिंगनी (तोरई), केराव (मटर) — नहाय-खाय व पारण का पारंपरिक पौष्टिक भोजन; जिउतिया का लाल-पीला धागा (सोने-चाँदी के जिउतिया-लॉकेट) गले में — साल-भर या अगले व्रत तक।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

यह घरेलू विधि है — तीन दिन: सप्तमी नहाय-खाय व ओठगन, अष्टमी निर्जला व जीमूतवाहन-पूजा, नवमी पारण।

  1. सप्तमी — नहाय-खाय: सुबह नदी/घर पर स्नान, घर की सफ़ाई, सात्विक भोजन एक बार (मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी-तरकारी, अरवा चावल, दही-चूड़ा — प्याज़-लहसुन नहीं); पितरों-दादी को भोजन का अंश (पितृ-पक्ष)।
  2. सप्तमी रात/भोर — ओठगन (सरगही): अष्टमी लगने से पहले (ऊपर तिथि-खिड़की — प्रायः रात 2-4 बजे) अंतिम भोजन-जल — दही-चूड़ा, फल, मिठाई, जल; कई घर सोने से पहले ही; इसके बाद कुछ नहीं — यहाँ से 24 घंटे निर्जला।
  3. अष्टमी — निर्जला व्रत: दिन-भर न अन्न, न जल; दिन में सोना नहीं (कठोर), कथा-भजन; शाम (प्रदोष) को पूजा — कुश/मिट्टी से जीमूतवाहन की मूर्ति (या चित्र), मिट्टी/गोबर से चील (चिल्ही) व सियारिन (सियारो), जल-भरा कलश/मिट्टी का घड़ा, जिउतिया-धागा (लाल-पीला, सोने-चाँदी की जिउतिया पिरोई)।
  4. पूजा: जीमूतवाहन को धूप-दीप-अक्षत-फूल, चील-सियारिन को खीर-पूड़ी/धान-गुड़ (सूखा), जिउतिया-धागे को हल्दी-सिंदूर; कथा (जीमूतवाहन + चील-सियारिन — नीचे) सुनना; «सूर्य-चील-सियारिन» की लोक-प्रार्थना; अंत में धागा गले में (माँ, और बच्चों को भी — कुछ घर)।
  5. व्रत-रात: जागरण/भजन (हो सके तो), जल नहीं; अत्यंत कमज़ोरी/चक्कर हो तो घूँट जल लें — प्राण से बड़ा व्रत नहीं (नीचे FAQ)।
  6. नवमी — पारण: सूर्योदय के बाद, अष्टमी समाप्त होने पर (ऊपर) — पहले जिउतिया-प्रसाद/जल, फिर भोजन — झोर-भात (चावल + मड़ुआ/झिंगनी/नोनी-साग की रसदार सब्ज़ी), दही-चूड़ा, केराव, खीर-पूड़ी; कई घर पारण में 5-7 प्रकार की सब्ज़ी; बच्चों को पहले खिलाना।
  7. जिउतिया-धागा: कम-से-कम अगले व्रत तक गले में; टूटे तो जल में; हर वर्ष नया धागा पूजा में; बेटी की शादी के बाद पहला जिउतिया मायके से (धागा-चूड़ी-कपड़े — «जिउतिया का सिंजारा»)।
  8. दान: नवमी को व्रत-प्रसाद व अन्न-वस्त्र ब्राह्मणी/ग़रीब स्त्री को; पितृ-पक्ष का तर्पण साथ (घर के पुरुष)।

पूजा-सामग्री की सूची

जिउतिया-धागा, कुश की जीमूतवाहन-मूर्ति, चील-सियारिन, मड़ुआ-नोनी-झिंगनी — जिउतिया की सूची।

  • जिउतिया-धागा (लाल-पीला सूत), सोने/चाँदी की जिउतिया (लॉकेट — हो सके तो), पुराने धागे (जल में डालने को)
  • कुश/मिट्टी (जीमूतवाहन-मूर्ति), मिट्टी/गोबर (चील-सियारिन), मिट्टी का घड़ा/कलश, जल, आम के पत्ते
  • धूप, दीपक, घी, अक्षत, हल्दी, सिंदूर, फूल, दूब, पान-सुपारी, मौली
  • नैवेद्य: खीर-पूड़ी, धान-गुड़/लावा (चील-सियारिन को सूखा), फल (केला-सेब-अमरूद), मिठाई
  • नहाय-खाय/पारण: मड़ुआ (रागी) आटा, नोनी-साग, झिंगनी (तोरई), केराव (सूखी मटर), अरवा चावल, दही-चूड़ा, गुड़, सरसों-तेल
  • ओठगन/सरगही: दही-चूड़ा, फल, मिठाई, जल (पर्याप्त), दूध
  • जिउतिया-कथा पुस्तक (जीमूतवाहन + चील-सियारिन), भजन
  • बेटी को सिंजारा: धागा, चूड़ी, साड़ी, मिठाई, फल

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व्रत-कथा

गंधर्व-राज शालिवाहन के पुत्र जीमूतवाहन धर्मात्मा थे; राज्य त्यागकर ससुराल (मलयवान) में रहते थे। एक दिन वन में एक वृद्धा को रोते देखा — «नागवंश ने गरुड़ से संधि की है कि रोज़ एक नाग उसे भोजन में देंगे; आज मेरे इकलौते बेटे शंखचूड़ की बारी है»। जीमूतवाहन ने कहा «मैं तुम्हारे पुत्र की जगह जाऊँगा» — लाल कपड़े में लिपटकर वध-शिला पर लेट गए; गरुड़ उन्हें उठा ले गए, पर बालक की जगह रोता-कराहता कोई नहीं — पूछा तो जीमूतवाहन ने सच बताया; गरुड़ प्रसन्न हुए — «आज से नागों का बलि नहीं लूँगा», मृत नागों को अमृत से जिलाया। माताएँ बोलीं — «जो जीमूतवाहन को पूजेगी, उसकी संतान को दीर्घायु» — जिउतिया व्रत।

चील-सियारिन: एक वन में पाकड़ के पेड़ पर चील और नीचे सियारिन रहती थीं; दोनों ने स्त्रियों को जिउतिया करते देखा और व्रत का संकल्प लिया। चील ने पूरी निष्ठा से निर्जला रखा; सियारिन भूख न सह सकी और रात में मुर्दे का माँस खा गई — व्रत खंडित। अगले जन्म में दोनों बहनें बनीं — चील शीलवती (राजा की पत्नी, सात पुत्र), सियारिन कपुरावती (मंत्री की पत्नी — जिसके सब बच्चे जन्मते ही मरे)। ईर्ष्या में कपुरावती ने बहन के सातों पुत्रों के सिर कटवाए — पर जीमूतवाहन की कृपा से सब जीवित, कटे सिर फलों में बदले; कपुरावती को पिछले जन्म की भूल याद आई, पछतावा, बहन ने क्षमा किया। सीख — व्रत निष्ठा से, बीच में टूटा व्रत फलहीन।

एक और लोक-कथा (मिथिला): राजा शालिवाहन की रानी को पुत्र-शोक, जीमूतवाहन-पूजा से पुत्र-रक्षा; और सतयुग की कथा जिसमें सूर्य-देव का पुत्र-दान — इसलिए व्रत में सूर्य-अर्घ्य भी (कुछ इलाक़े)। कहीं यह व्रत «जिउतिया के जीमूतवाहन» के साथ «पाकड़-चील-सियार» की पूजा तीन प्रतीकों में करते हैं — पेड़, चील, सियार।

मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, झिंगनी, दही-चूड़ा, झोर-भात — नहाय-खाय व पारण की रसोई

जिउतिया का भोजन बिहार-झारखंड की पारंपरिक पौष्टिक रसोई — नहाय-खाय व पारण में मड़ुआ (रागी — लौह-कैल्शियम), नोनी-साग (गैया-साग), झिंगनी (तोरई), केराव, अरवा चावल, दही-चूड़ा; ओठगन में दही-चूड़ा-मिठाई-फल; व्रत में कुछ नहीं। नीचे विधि-सहित।

  • मड़ुआ-रोटी (रागी-आटा गुनगुने पानी से गूँधकर तवे पर, घी), नोनी-साग की भुजिया (सरसों-तेल-लहसुन-रहित — व्रत-भोजन में प्याज़-लहसुन नहीं)
  • झिंगनी (तोरई) की सब्ज़ी/झोर, केराव (सूखी मटर) की घुघनी, अरवा चावल का भात, अरहर की दाल
  • दही-चूड़ा (ओठगन व पारण), गुड़, केला, खीर-पूड़ी (पूजा-नैवेद्य), ठेकुआ (कुछ घर)
  • पारण का झोर-भात: भात + तोरई/नोनी/कद्दू की रसदार सब्ज़ी + दही; 5-7 सब्ज़ी की परंपरा (कुछ घर)
  • यूपी (पूर्वांचल): जिउतिया पर पूड़ी-खीर-खीरा, ओठगन में दही-लाई; झारखंड: मड़ुआ-मार्चा, नोनी-साग; नेपाल-तराई: मड़ुआ-रोटी, माछ नहीं (व्रत-घर)
  • व्रत-दिन: कुछ नहीं (निर्जला); अत्यंत कमज़ोरी में घूँट जल; गर्भवती/रोगी माताएँ फलाहार-रूप

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

बिहार की चील-सियारिन, झारखंड का मड़ुआ, पूर्वांचल की जिउतिया-खीरा, नेपाल-तराई का जितिया — माताओं का प्राण-व्रत।

बिहार (मगध-मिथिला-भोजपुर): «जिउतिया/जितिया» — बिहार का सबसे बड़ा मातृ-व्रत; सप्तमी नहाय-खाय (मड़ुआ-नोनी-झिंगनी), रात ओठगन (दही-चूड़ा), अष्टमी निर्जला, शाम नदी/तालाब-किनारे या घर पर जीमूतवाहन (कुश) व चील-सियारिन (मिट्टी) की पूजा, कथा, जिउतिया-धागा; नवमी झोर-भात-पारण; मिथिला में «जितिया» पर मैथिल स्त्रियाँ अरिपन बनाती हैं, सोने की जिउतिया; भोजपुर में «जिउतिया के गीत» — «जिउतिया पाबन में…»।
झारखंड-छत्तीसगढ़: झारखंड (पलामू-संथाल परगना-राँची) में «जितिया» — मड़ुआ-रोटी, नोनी-साग, नदी-किनारे सामूहिक पूजा, जीमूतवाहन की मिट्टी-मूर्ति, आदिवासी-गैर-आदिवासी दोनों; छत्तीसगढ़ (सरगुजा-बिलासपुर) में «जिउतिया» पर माताएँ निर्जला, «खमहरिया» की परंपरा — पाकड़ की डाली, चील-सियार की पूजा; कहीं इसे «पुत्रदा अष्टमी» भी।
पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल-अवध): गोरखपुर-वाराणसी-आज़मगढ़-प्रयागराज में «जिउतिया» — सप्तमी नहाय-खाय, ओठगन में दही-लाई-खीरा, अष्टमी निर्जला, शाम तालाब-किनारे जीमूतवाहन-पूजा, जिउतिया (सोने/लाल धागे में चाँदी की जिउतिया), खीर-पूड़ी-खीरा (खीरा प्रसाद — पूर्वांचल की पहचान); नवमी पारण; अवध में «जीवित्पुत्रिका व्रत» मंदिरों में कथा-पाठ; लखनऊ-कानपुर के बिहारी-पूर्वांचली परिवारों में।
नेपाल (तराई-मिथिला-काठमांडू): «जितिया/जीतिया» — तराई (जनकपुर-वीरगंज-सप्तरी) की मैथिल-भोजपुरी-थारू माताओं का बड़ा पर्व, तीन दिन (नहाय-खाय, निर्जला, पारण), नदी/पोखर-किनारे जीमूतवाहन-पूजा, मड़ुआ-रोटी, बेटी को मायके से «जितिया» का उपहार; काठमांडू में प्रवासी मधेशी परिवार; नेपाल-सरकार की स्थानीय छुट्टी (मधेश प्रदेश)।
बंगाल-ओडिशा-असम: बंगाल में «जितिया/जीवित्पुत्रिका» सीमित — उत्तर-बंगाल व बिहार-सीमा (मालदा-पुरुलिया) में «जिउतिया»; ओडिशा में इसी अष्टमी को «दुतिया-ओसा/जीवित्पुत्रिका» कम, पर «पुअजिउँतिआ ओसा» (पुत्र-जीवन-ओसा) — माताएँ उपवास, चील-शृगाल की पूजा नहीं पर जीमूतवाहन-कथा; असम-दिल्ली-मुंबई के बिहारी परिवारों में घर-रीत से।
मध्य प्रदेश-राजस्थान-महाराष्ट्र: यहाँ जिउतिया मूल-रीत नहीं — बिहार-यूपी से आए परिवार रखते हैं; स्थानीय समकक्ष मातृ-व्रत: मप्र-राजस्थान में «अहोई अष्टमी» (कार्तिक कृष्ण अष्टमी — संतान-व्रत), महाराष्ट्र में «संकष्टी/जिवती-पूजा» (श्रावण के शुक्रवारों को जिवती-माता — संतान-रक्षा), गुजरात में «शीतला सातम»; जिउतिया व अहोई दोनों माताओं के संतान-व्रत — एक भाद्रपद-आश्विन, दूसरा कार्तिक।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • सप्तमी नहाय-खाय, अष्टमी लगने से पहले ओठगन (पर्याप्त जल-दही-चूड़ा-फल), अष्टमी निर्जला, नवमी सूर्योदय-बाद पारण (ऊपर तिथि-खिड़की)
  • जीमूतवाहन (कुश) + चील-सियारिन की पूजा, दोनों कथाएँ; जिउतिया-धागा गले में
  • पारण में पहले बच्चों को खिलाएँ; झोर-भात/मड़ुआ — पौष्टिक; प्रसाद बाँटें
  • पितृ-पक्ष का ध्यान — नहाय-खाय का अंश पितरों-दादी को; व्रत-दिन दान
  • बेटी को पहला जिउतिया-सिंजारा (धागा-चूड़ी-साड़ी) मायके से

❌ क्या न करें

  • अष्टमी लगने के बाद ओठगन/जल — व्रत खंडित माना जाता (सियारिन की कथा); पर प्राण-संकट में जल लें
  • गर्भवती, मधुमेही, हृदय-रोगी, स्तनपान कराने वाली माताएँ निर्जला न रखें — फलाहार-रूप, संकल्प वही
  • व्रत-भोजन (नहाय-खाय/पारण) में प्याज़-लहसुन-माँस-मछली; तामसिक
  • जिउतिया-धागा टूटने पर फेंकना — जल में डालें, नया पूजा करके पहनें
  • व्रत-दिन दिन में सोना (कठोर रूप), कलह, बच्चों को डाँटना — जिसके लिए व्रत, उसी से प्रेम

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जिउतिया 2026 में कब है — नहाय-खाय, निर्जला, पारण?

ऊपर इस साल की आश्विन कृष्ण अष्टमी (निर्जला-दिन) की तिथि व तिथि-खिड़की (दिल्ली) है — नहाय-खाय एक दिन पहले (सप्तमी), ओठगन अष्टमी लगने से पहले (तिथि-आरंभ ऊपर), पारण अगले दिन (नवमी) सूर्योदय के बाद अष्टमी समाप्त होने पर; बिहार में उदया-तिथि नियम — दो दिन की उलझन हो तो पंचांग/पंडित से मिलाएँ।

व्रत निर्जला 24 घंटे ही क्यों? पानी पी सकते हैं?

परंपरा में अष्टमी पूरी निर्जला (ओठगन से पारण तक); चील-सियारिन की कथा निष्ठा सिखाती है; पर प्राण से बड़ा कोई व्रत नहीं — गर्भवती, रोगी, स्तनपान कराने वाली, बुज़ुर्ग माताएँ जल/फल लें, संकल्प व पूजा वही — शास्त्र में «यथाशक्ति» व्रत; चक्कर/उल्टी हो तो तुरंत जल।

ओठगन (सरगही) कब करें?

अष्टमी-तिथि लगने से पहले — सप्तमी की रात सोने से पहले या भोर (प्रायः 2-4 बजे) उठकर दही-चूड़ा-फल-मिठाई-भरपूर जल; ऊपर तिथि-आरंभ देखें — उसके बाद कुछ नहीं; कई घर सूर्योदय से पहले तक मानते हैं (घर-रीत)।

जिउतिया-धागा क्या है, कब तक पहनें?

लाल-पीले सूत का धागा जिसमें सोने/चाँदी की छोटी «जिउतिया» (जीमूतवाहन-प्रतीक लॉकेट) पिरोई होती है — पूजा में चढ़ाकर माँ गले में पहनती है (बच्चों को भी — कुछ घर); अगले वर्ष के व्रत तक या कम-से-कम कुछ दिन; हर वर्ष नया, पुराना जल में; बेटी को पहला धागा मायके से।

बेटी के लिए भी यह व्रत है?

हाँ — नाम «पुत्रिका» पर व्रत सब संतान के लिए (पुत्र-पुत्री); आधुनिक घरों में माताएँ बेटी-बेटे दोनों के लिए, कहीं गोद-ली संतान/भतीजे-भाँजे के लिए भी; चील-सियारिन की कथा में «सात पुत्र» लोक-रूप है, भाव सब संतान।

अहोई अष्टमी और जिउतिया में अंतर?

दोनों माताओं के संतान-व्रत, दोनों कृष्ण अष्टमी — जिउतिया आश्विन (पितृ-पक्ष में, बिहार-यूपी-झारखंड-नेपाल, 24 घंटे निर्जला, जीमूतवाहन-पूजा), अहोई कार्तिक (करवा चौथ के 4 दिन बाद, उत्तर-पश्चिम भारत, तारा-दर्शन तक निर्जला, अहोई-माता-स्याहु की पूजा); कई पूर्वांचली-दिल्ली परिवार दोनों रखते हैं।

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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। निर्जला व्रत स्वास्थ्य देखकर रखें — गर्भावस्था, मधुमेह, हृदय-रोग, स्तनपान में जल-फल लें; चिकित्सक की सलाह मानें।

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