🪷 पितृ-पक्ष (श्राद्ध) व सर्व पितृ अमावस्या 2026
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक 16 दिन — पितरों का श्राद्ध-तर्पण-पिंडदान; जिस तिथि को देहांत, उसी तिथि पर श्राद्ध; सर्व पितृ अमावस्या (महालय) पर सबका; कौआ-गाय-कुत्ते को ग्रास, ब्राह्मण-भोजन; गया-श्राद्ध।
- पूर्णिमा श्राद्ध — पितृ-पक्ष आरंभ — शनिवार, 26 सितंबर 2026
- सर्व पितृ अमावस्या (महालय) — पितृ-पक्ष समापन — शनिवार, 10 अक्टूबर 2026
पितृ-पक्ष (महालय/श्राद्ध-पक्ष/कनागत) भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (अनंत चतुर्दशी के अगले दिन) से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के 16 दिन हैं — ठीक शारदीय नवरात्रि से पहले। इन दिनों पितर (दिवंगत पूर्वज — माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, तीन पीढ़ियाँ) पितृलोक से धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से श्राद्ध (श्रद्धा से अर्पण) — तर्पण (जल-तिल), पिंडदान (चावल-जौ के पिंड), ब्राह्मण-भोजन, कौआ-गाय-कुत्ते को ग्रास — की अपेक्षा करते हैं।
नियम: जिस पितर का देहांत जिस तिथि को हुआ (शुक्ल/कृष्ण कोई भी पक्ष), पितृ-पक्ष की उसी तिथि (प्रतिपदा…चतुर्दशी) को उनका श्राद्ध; सुहागिन स्त्रियों का नवमी (मातृ-नवमी) को, संन्यासियों का द्वादशी, शस्त्र/दुर्घटना-मृत्यु का चतुर्दशी, और जिनकी तिथि ज्ञात नहीं/सबका — सर्व पितृ अमावस्या (महालय अमावस्या) को; ऊपर इस साल की अमावस्या व पक्ष-आरंभ की तिथि। घर की स्त्रियाँ श्राद्ध-भोजन (खीर-पूड़ी, पितरों की प्रिय वस्तु) बनाती हैं, पहला ग्रास कौए-गाय-कुत्ते को, ब्राह्मण/बेटी-दामाद को भोजन; पूरे पक्ष में शुभ-कार्य नहीं। नीचे विधि, सामग्री, कथा, श्राद्ध-भोजन और इलाक़ों की रीत।
महत्व — यह व्रत क्यों
ऋण-सिद्धांत: मनुष्य पर देव-ऋषि-पितृ तीन ऋण; पितृ-ऋण संतान-परंपरा व श्राद्ध से चुकता; गरुड़/मार्कंडेय-पुराण, मनुस्मृति में श्राद्ध का विधान — «पितरों की तृप्ति से आयु, संतान, धन, विद्या, स्वर्ग»; श्राद्ध न करने से पितृ-दोष (कुंडली में सूर्य-राहु/केतु/शनि के योग) — संतान-बाधा, रोग, कलह — माना जाता है; पितृ-पक्ष उसकी शांति का श्रेष्ठ काल।
श्राद्ध का समय: अपराह्न (दोपहर 12-1:30 — कुतुप-रौहिण मुहूर्त, ऊपर अपराह्न) श्रेष्ठ; दिशा दक्षिण (पितर-दिशा), जनेऊ दाहिने कंधे पर (अपसव्य), तिल-कुशा-जल, चावल-जौ-तिल के पिंड; कौआ यम का दूत, गाय-कुत्ता-चींटी-देवता — पंच-बलि (पंचग्रास) श्राद्ध का हिस्सा; ब्राह्मण/बेटी-दामाद/भांजा को भोजन = पितरों का भोजन।
गया (बिहार) — विष्णुपद पर पिंडदान पितृ-पक्ष का सबसे बड़ा तीर्थ (पितृपक्ष मेला, 17 दिन), फिर हरिद्वार (नारायणी-शिला), प्रयाग, काशी (पिशाच-मोचन), सिद्धपुर (गुजरात — मातृ-गया), बद्रीनाथ (ब्रह्म-कपाल), रामेश्वरम्, नासिक-त्र्यंबक (पंचवटी), पुष्कर, लोहार्गल; बंगाल में महालय-अमावस्या को «महालया» — दुर्गा का आगमन (आकाशवाणी का «महिषासुरमर्दिनी»), तर्पण गंगा-घाटों पर।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — तिथि-श्राद्ध का सरल घर-रूप (तर्पण, पंचबलि, ब्राह्मण-भोजन), अमावस्या का सर्व-पितृ-श्राद्ध; पंडित हो तो पूर्ण-विधि उनके साथ।
- पक्ष-आरंभ (पूर्णिमा/प्रतिपदा): घर की सफ़ाई, दक्षिण दिशा में पितरों का चित्र/स्थान — जल, दीपक, फूल, तुलसी; संकल्प — «इस पितृ-पक्ष में (नाम) गोत्र के पितरों का श्राद्ध-तर्पण»; पूरे पक्ष रोज़ सुबह तर्पण (हो सके तो) — तांबे के लोटे में जल-तिल-कुशा, दक्षिण मुख, अंगूठे की ओर से जल छोड़ना (पितृ-तीर्थ), «(नाम) गोत्र (पितर-नाम) तृप्यताम्» तीन बार।
- तिथि-श्राद्ध (जिस दिन पितर की मृत्यु-तिथि): सुबह स्नान, घर के पुरुष (बेटा/पोता — न हों तो बेटी/पत्नी भी कर सकते हैं, नीचे FAQ) दक्षिण मुख; पितरों का आवाहन — कुशा का आसन, तिल-जल-जौ; ब्राह्मण (या पितर-प्रतीक) को पाद्य-अर्घ्य; पिंडदान — पके चावल-जौ-तिल-घी-शहद के 3 (या 1) पिंड — पिता-दादा-परदादा; पितृ-सूक्त/गजेंद्र-मोक्ष/गीता-7 पाठ।
- पंचबलि (पंचग्रास): श्राद्ध-भोजन के पाँच ग्रास पत्ते पर — गाय (गो-बलि), कुत्ता (श्वान), कौआ (काक — छत/खुले में रखें, कौआ आए तो पितर तृप्त), चींटी (पिपीलिका — आटा-चीनी), देवता (अग्नि — घी-भोजन का अंश); पहले ये, फिर ब्राह्मण, फिर परिवार।
- ब्राह्मण-भोजन: 1-3 ब्राह्मण (या बेटी-दामाद/भांजा/बहन — पितर-तुल्य) को श्राद्ध-भोजन (खीर-पूड़ी-सब्ज़ी-पितर की प्रिय वस्तु), दक्षिणा, वस्त्र-छाता-जूते-अन्न का दान; भोजन कराते समय मौन, पंखा नहीं झलना (कुछ रीत), भोजन के बाद तिल-जल से विदा — «पितरः प्रीयन्ताम्»।
- स्त्रियाँ: श्राद्ध का भोजन स्नान करके, चुपचाप, बिना चखे (पितर पहले); लहसुन-प्याज़-मसूर-बैंगन नहीं; तुलसी-केले के पत्ते; सास/माँ/दादी की मृत्यु-तिथि या मातृ-नवमी पर सुहागिन-ब्राह्मणी/बेटी को भोजन-सुहाग-सामग्री।
- सर्व पितृ अमावस्या (महालय): जिनकी तिथि ज्ञात नहीं, सब पितर, विवाहित बेटियाँ, गुरु, मित्र, अकाल-मृत्यु वाले — सबका श्राद्ध-तर्पण; अपराह्न में पिंडदान, पंचबलि, ब्राह्मण-भोजन, दान (अन्न-वस्त्र-छाता-जूते-गाय); शाम दक्षिण में दीपक — पितरों की विदाई «पुनरागमनाय»; अगले दिन प्रतिपदा से नवरात्रि — घट-स्थापना।
- पितृ-दोष-शांति: अमावस्या को पीपल में जल-दूध-तिल, «ॐ पितृभ्यः नमः» 108, गीता-7/पितृ-सूक्त, गाय-कुत्ते-कौए को रोज़ ग्रास, ग़रीब को भोजन; गया-श्राद्ध का संकल्प (सामर्थ्य से); कुंडली में दोष हो या न हो — पितृ-पक्ष का श्राद्ध सबके लिए।
- पूरे पक्ष: विवाह-सगाई-गृह-प्रवेश-नई ख़रीद (गहने-वाहन-घर — लोक-रीत, शास्त्र में केवल शुभ-संस्कार वर्जित) नहीं; बाल-नाख़ून-दाढ़ी न कटवाना (पुरुष — कई घर), ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, पितरों का स्मरण, दान।
पूजा-सामग्री की सूची
कुशा, तिल, जौ, तांबे का लोटा, पिंड-सामग्री, श्राद्ध-भोजन, दान — पितृ-पक्ष की सूची।
- कुशा (आसन व अँगूठी — पवित्री), काले तिल, जौ, तांबे का लोटा/थाली, जल, गंगाजल, दक्षिण-दिशा का आसन
- पिंड: पके चावल/जौ का आटा, तिल, घी, शहद, दूध, गुड़ — 3 पिंड (पिता-पितामह-प्रपितामह) या 1 सर्व-पितृ
- पितरों का चित्र/स्थान, दीपक (सरसों/तिल-तेल), फूल (सफ़ेद — चमेली/कमल, लाल नहीं), तुलसी, चंदन, धूप
- श्राद्ध-भोजन: खीर (चावल-दूध), पूड़ी, कद्दू/तोरई/अरबी की सब्ज़ी, चना/उड़द-दाल (तिथि से), कढ़ी, रायता, पितर की प्रिय वस्तु; केले के पत्ते/पत्तल
- पंचबलि: 5 पत्ते (गाय-कुत्ता-कौआ-चींटी-देवता), आटा-चीनी (चींटी), घी
- ब्राह्मण-दक्षिणा, दान: अन्न (चावल-गेहूँ), वस्त्र (धोती-साड़ी), छाता, जूते-चप्पल, बर्तन, तिल-गुड़, गाय-चारा; यमराज-प्रीति के लिए काला तिल-लोहा (कुछ रीत)
- जनेऊ (अपसव्य के लिए), पितृ-सूक्त/गीता/गरुड़-पुराण (श्राद्ध-अध्याय), पंडित न हो तो सरल श्राद्ध-पुस्तक
- पीपल-सेवा: जल-दूध-तिल, दीपक; गया-श्राद्ध का संकल्प-सामग्री (हो सके तो)
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कर्ण की कथा: दानवीर कर्ण मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुँचे — वहाँ भोजन में सोना-चाँदी-रत्न मिले, अन्न नहीं; पूछा तो इंद्र बोले «तुमने जीवन-भर सोना दान किया, पर पितरों को अन्न-जल कभी नहीं दिया — इसलिए अन्न नहीं»; कर्ण को 16 दिन धरती पर लौटने का अवसर मिला — उन्होंने पितरों का श्राद्ध-तर्पण, अन्न-जल दान किया — वही 16 दिन पितृ-पक्ष (महालय) कहलाए। सीख — अन्न-जल का दान, पितरों की तृप्ति सोने से बड़ी।
गरुड़-पुराण (प्रेत-कल्प): विष्णु गरुड़ को बताते हैं — जो श्राद्ध करता है, उसके पितर संतुष्ट होकर आयु-संतान-धन-विद्या-स्वर्ग का आशीर्वाद देते हैं; जो नहीं करता, उसके पितर भूखे-प्यासे शाप देकर लौटते हैं — «पितृ-पक्ष में पितर वायु-रूप में द्वार पर आते हैं और सूर्यास्त तक श्राद्ध की प्रतीक्षा करते हैं»। रामायण में राम-सीता-लक्ष्मण ने गया में दशरथ का पिंडदान किया — सीता ने फल्गु-रेत का पिंड दिया, दशरथ प्रकट हुए; गवाह (फल्गु, गाय, वट, ब्राह्मण) झूठे — सीता के शाप से फल्गु भूमिगत, वट अमर (अक्षय-वट)।
भीष्म-पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध का विधान बताया (अनुशासन-पर्व) — «श्रद्धा से दिया एक जल-अंजलि भी पितरों को तृप्त करता है, अश्रद्धा से दिया छप्पन भोग भी नहीं»; इसीलिए नाम «श्राद्ध» = श्रद्धा से; कौआ का महत्त्व — यम का दूत, जिसे ग्रास मिलने से पितर तृप्त; अमावस्या को सब पितर लौटते हैं — «महालय» = महान आलय (घर) की ओर।
खीर-पूड़ी, कद्दू-तोरई, उड़द-दाल, पितरों की प्रिय वस्तु — श्राद्ध की रसोई
श्राद्ध-भोजन सात्विक व पितरों की रुचि का — खीर (चावल-दूध — पितरों को सबसे प्रिय), पूड़ी, मौसमी सब्ज़ी (कद्दू-तोरई-अरबी-भिंडी), उड़द/चना-दाल, कढ़ी, रायता, अचार, लड्डू; पिता की प्रिय मिठाई/पकवान ज़रूर; लहसुन-प्याज़-मसूर-बैंगन-चना (कुछ रीत)-बासी नहीं; स्त्रियाँ स्नान करके बनाएँ, पहले पंचबलि, फिर ब्राह्मण, फिर घर।
- खीर (चावल-दूध-केसर — पितरों का मुख्य भोग), पूड़ी (घी), हलवा/लड्डू (बेसन/तिल)
- सब्ज़ी: कद्दू (सीताफल), तोरई, अरबी, भिंडी, आलू-टमाटर, लौकी — मौसमी; उड़द-दाल/चना-दाल के बड़े, कढ़ी-पकौड़ी, रायता (खीरा/बूँदी), अचार-चटनी
- पंचबलि-ग्रास: हर पत्ते पर खीर-पूड़ी-सब्ज़ी का अंश; कौए का ग्रास छत/खुले में, गाय का गो-शाला, कुत्ते को, चींटी को आटा-चीनी
- पितर-विशेष: जो उन्हें प्रिय था — मालपुआ, गुलाबजामुन, आम, पान, चाय (आधुनिक घरों में) — श्रद्धा से; बंगाल में महालया पर माछ नहीं (श्राद्ध-घर), पायेस-लुची
- दक्षिण: श्राद्ध-सद्य (केरल), पितृ-तर्पण के बाद सादा भोजन — चावल-सांबर-अवियल-पायसम, वड़ा (उड़द — पितृ-प्रिय), केला; महाराष्ट्र: खीर-पूड़ी-भाजी, अळू-वड़ी, «पितृ-पंधरवडा» का नैवेद्य
- वर्जित: लहसुन-प्याज़, मसूर, बैंगन (कुछ), चना/सत्तू (कुछ रीत), बासी, माँस-मछली-मद्य, बाहर का/डिब्बा-बंद
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
गया का पिंडदान, बंगाल की महालया-तर्पण, गुजरात का सिद्धपुर, दक्षिण का मासिक-तर्पण, उत्तर का कनागत — पितरों की 16 दिन की रीतें।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- पितर की मृत्यु-तिथि पर श्राद्ध (अपराह्न — ऊपर समय), न पता हो तो अमावस्या; रोज़ तर्पण (हो सके तो)
- पंचबलि — कौआ-गाय-कुत्ता-चींटी-देवता; ब्राह्मण/बेटी-दामाद/भांजे को भोजन-दक्षिणा
- खीर-पूड़ी व पितर की प्रिय वस्तु; स्त्रियाँ स्नान कर सात्विक बनाएँ, पहले पितर
- अन्न-वस्त्र-छाता-जूते-गाय-चारा का दान; पीपल-सेवा; गया-श्राद्ध का संकल्प (सामर्थ्य)
- श्रद्धा से — एक अंजलि जल भी पर्याप्त; बेटी/पत्नी भी श्राद्ध कर सकती हैं (पुरुष न हों)
❌ क्या न करें
- पितृ-पक्ष में विवाह-सगाई-गृह-प्रवेश-नया व्यापार; नई ख़रीद (लोक-रीत — शास्त्र में केवल शुभ-संस्कार वर्जित)
- श्राद्ध-भोजन में लहसुन-प्याज़-मसूर-बैंगन-बासी-बाहर का; माँस-मद्य; श्राद्ध का भोजन खड़े होकर/चखकर
- कौआ-गाय-कुत्ते को भगाना, अपमान; भिक्षुक-अतिथि को खाली लौटाना (पितर रूप में आते — लोक-भाव)
- पुरुष बाल-दाढ़ी-नाख़ून (कई घर), तेल-मालिश, नए वस्त्र; रात्रि-श्राद्ध (सूर्यास्त के बाद श्राद्ध नहीं)
- पितरों की निंदा, कलह, झूठ; श्राद्ध का दिखावा — श्रद्धा नहीं तो फल नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पितृ-पक्ष 2026 में कब से कब तक है?
ऊपर इस साल की सर्व पितृ अमावस्या (समापन) व पूर्णिमा-श्राद्ध (आरंभ — अनंत चतुर्दशी के अगले दिन) की तिथियाँ हैं — 15-16 दिन; बीच की तिथियाँ (प्रतिपदा…चतुर्दशी) पंचांग से — जिस तिथि को पितर का देहांत, उसी दिन श्राद्ध; तिथि-क्षय/वृद्धि से कभी दो तिथियाँ एक दिन — पंडित/पंचांग से मिलाएँ।
श्राद्ध किस तिथि को करें अगर मृत्यु-तिथि पता नहीं?
सर्व पितृ अमावस्या (महालय) को — सब पितरों, अज्ञात-तिथि, विवाहित बेटियों, अकाल-मृत्यु (दुर्घटना — चतुर्दशी भी), गुरु-मित्र-सब का; सुहागिन स्त्रियों का मातृ-नवमी को भी; तिथि पता हो तो उसी दिन और अमावस्या को भी सर्व-श्राद्ध।
स्त्री/बेटी श्राद्ध कर सकती है?
हाँ — पुत्र न हो तो पत्नी, बेटी, पोती, बहू, भाई-भतीजा कर सकते हैं (धर्म-सिंधु/गरुड़-पुराण में पुत्र-हीन के लिए); सीता ने दशरथ का पिंडदान गया में किया; आधुनिक पंडित बेटियों को गया में पिंडदान कराते हैं; श्रद्धा मुख्य, लिंग नहीं।
पितृ-पक्ष में नई चीज़ ख़रीदना/शुभ-कार्य क्यों नहीं?
शास्त्र में केवल शुभ-संस्कार (विवाह-मुंडन-यज्ञोपवीत-गृह-प्रवेश) वर्जित — क्योंकि यह पितरों का काल है, उत्सव का नहीं; नई ख़रीद (गहने-वाहन-घर) की मनाही लोक-रीत है — कुछ पंडित कहते हैं पितर आशीर्वाद देते हैं, ख़रीद शुभ; अपने घर की रीत मानें; नवरात्रि से सब खुल जाता है।
कौआ न आए तो?
कौआ यम का दूत, ग्रास लेने से पितर तृप्त — लोक-भाव; न आए तो ग्रास छत/खुले में रखकर प्रतीक्षा, «काकाय नमः» — फिर गाय/कुत्ते को दे दें; शास्त्र में पंचबलि का भाव «सब जीवों को भोजन» है — कौआ न मिले तो चिड़िया/कोई पक्षी; पितर नाराज़ नहीं होते, श्रद्धा देखी जाती है।
पितृ-दोष क्या है और पितृ-पक्ष में उपाय?
कुंडली में सूर्य-राहु/केतु/शनि के कुछ योग (9वें भाव/सूर्य पीड़ित) को पितृ-दोष कहते हैं — संतान-विलंब, रोग, कलह का लोक-कारण; उपाय — पितृ-पक्ष में तिथि-श्राद्ध व अमावस्या-श्राद्ध, पीपल-सेवा, गीता-7/पितृ-सूक्त, गाय-कौए-कुत्ते को रोज़ ग्रास, ग़रीब-भोजन, गया/त्र्यंबक में नारायण-बलि (पंडित से); कुंडली-जाँच (दोष-रिपोर्ट) से पहले पुष्टि; श्रद्धा से श्राद्ध सबसे बड़ा उपाय।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार, गोत्र-परंपरा व पंडित की रीत सर्वोपरि है। तिथि-श्राद्ध की सटीक तिथि पंचांग से मिलाएँ; पितृ-दोष ज्योतिष-मान्यता है, चिकित्सा का विकल्प नहीं।
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