🌟 अहोई अष्टमी 2026
कार्तिक कृष्ण अष्टमी — माताओं का निर्जला व्रत संतान की लंबी आयु व सुख के लिए; शाम को तारों को अर्घ्य देकर खोला जाता है।
अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रखा जाने वाला माताओं का व्रत है — करवा चौथ के तीन-चार दिन बाद और दीपावली से आठ दिन पहले। इस दिन माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख के लिए सूर्योदय से तारे निकलने तक निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा व कथा के बाद तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।
दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र (आठ कोनों वाली आकृति — अष्टमी की आठ कोठरियाँ — साथ में स्याहू/सेह और उसके बच्चे) बनाना, चाँदी की अहोई (स्याहू) और मोती की माला, करवा चौथ का करवा — ये इस व्रत की पहचान हैं। नीचे इस साल की तिथि, तारा-दर्शन का समय, विधि, सामग्री, कथा और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
अहोई का अर्थ «अनहोनी को टालने वाली» है — यह व्रत संतान पर आने वाले संकट को टालने और निःसंतान को संतान-सुख देने वाला माना गया है। जिनकी संतान नहीं है, वे भी संतान-कामना से यह व्रत रखती हैं — मथुरा के राधाकुंड में इस रात स्नान की विशेष मान्यता है।
करवा चौथ पति के लिए, अहोई संतान के लिए — दोनों कार्तिक कृष्ण पक्ष में तीन-चार दिन के अंतर पर हैं, इसलिए उत्तर भारत में इन्हें जोड़े में रखा जाता है और करवा चौथ का करवा अहोई तक सँभालकर रखा जाता है।
व्रत सूर्योदय से तारे दिखने तक है — करवा चौथ की तरह चंद्रोदय तक नहीं। इस रात चंद्रमा देर से (लगभग मध्य-रात्रि) निकलता है; कुछ परिवार चंद्रमा को भी अर्घ्य देते हैं, पर सामान्य नियम तारों का है। ऊपर सूर्यास्त के समय से लगभग 35-45 मिनट बाद तारे स्पष्ट दिखने लगते हैं।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह उत्तर-भारतीय घरेलू विधि है — दीवार की अहोई, करवे, कथा, तारों को अर्घ्य।
- सुबह स्नान करके संकल्प लें — «मैं अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य व सुख के लिए अहोई अष्टमी का व्रत करती हूँ।» दिन में अन्न-जल नहीं (अस्वस्थ हों तो फल-जल के साथ)।
- दिन में पूजा-स्थान की दीवार पर गेरू या हल्दी से अहोई माता का चित्र बनाएँ — आठ कोष्ठक/कोने, बीच में माता, साथ में सेह (स्याहू) और उसके सात बच्चे; या बाज़ार का अहोई-चित्र/कैलेंडर लगाएँ।
- चित्र के नीचे लकड़ी की चौकी पर जल से भरा कलश रखें, उस पर मौली बाँधें; करवा चौथ वाला करवा (जल भरकर, ऊपर सींक) पास रखें — यह जल दीवाली पर घर में छिड़का जाता है।
- चाँदी की अहोई (स्याहू) व दो मोती (हर साल दो मोती बढ़ते हैं) की माला बनाकर या पिछले साल की माला निकालकर कलावे में पिरोएँ; पूजा में चढ़ाएँ और बाद में गले में पहनें/धरोहर की तरह रखें।
- शाम को सूर्यास्त से पहले (प्रदोष-काल में) थाली सजाएँ — दीपक, रोली, अक्षत, फूल, हलवा-पूड़ी, 8 पूड़ी + 8 मठरी/पुए, दूध-भात, फल, सिंघाड़े, मूली — और परिवार की स्त्रियाँ मिलकर अहोई माता की कथा सुनें (कथा नीचे)। कथा के समय हाथ में 7 अनाज (गेहूँ) के दाने रखें।
- कथा के बाद अहोई माता की आरती; हाथ के गेहूँ के दाने व बाया (हलवा-पूड़ी, दक्षिणा, कपड़े) सास/जेठानी को देकर पैर छूएँ।
- तारे निकलने पर (सूर्यास्त के लगभग 35-45 मिनट बाद) छत/आँगन में कलश या लोटे के जल से तारों को अर्घ्य दें; कुछ परिवार चंद्रोदय (देर रात) पर चंद्रमा को भी अर्घ्य देते हैं — अपनी रीत मानें।
- अर्घ्य के बाद जल पीकर व्रत खोलें; पहले संतान को भोजन कराएँ, फिर स्वयं। अहोई का चित्र दीपावली तक दीवार पर रहता है और उसी की पूजा दीवाली के दिन भी की जाती है।
पूजा-सामग्री की सूची
करवा चौथ का करवा और पिछले साल की चाँदी की माला सँभालकर रखी हो तो काम आसान है।
- अहोई माता का चित्र (गेरू/हल्दी से बनाया या बाज़ार का कैलेंडर)
- चाँदी की अहोई (स्याहू) + 2 मोती + लाल कलावा/मौली (माला के लिए)
- कलश (जल भरा) और करवा (करवा चौथ वाला), सींक
- लकड़ी की चौकी, लाल कपड़ा
- दीपक, घी, धूप, रोली, अक्षत, हल्दी, फूल
- 8 पूड़ी + 8 मठरी/पुए (अष्टमी की गिनती), हलवा, दूध-भात
- फल — सिंघाड़ा, केला, सेब; मूली (कई घरों में विशेष)
- गेहूँ के 7 दाने (कथा में हाथ में रखने को)
- बाया का सामान — हलवा-पूड़ी, दक्षिणा, कपड़ा/चूड़ी (सास के लिए)
- अर्घ्य के लिए ताँबे/स्टील का लोटा, गंगाजल
- अहोई माता की कथा-पुस्तक/आरती
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
एक साहूकारनी के सात बेटे थे। कार्तिक में घर लीपने के लिए वह जंगल से मिट्टी लेने गई। मिट्टी खोदते समय उसकी खुरपी से एक सेह (साही/स्याहू) का बच्चा मर गया। साहूकारनी को दुख हुआ, पर वह मिट्टी लेकर लौट आई।
उसके बाद एक-एक करके उसके सातों बेटे साल-भर में मर गए। दुखी होकर उसने पंडितों-पड़ोसिनों से पूछा; एक बुज़ुर्ग स्त्री ने कहा — «तुमसे अनजाने में स्याहू के बच्चे की हत्या हुई है; कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता और स्याहू का चित्र बनाकर, उनकी पूजा और क्षमा-याचना करो, संतान का व्रत रखो।»
साहूकारनी ने उस अष्टमी को दीवार पर स्याहू और उसके बच्चों का चित्र बनाया, निर्जला व्रत रखा, कथा कही और तारों को अर्घ्य दिया। अहोई माता प्रसन्न हुईं — स्याहू माता ने भी क्षमा किया — और उसके सातों बेटे जीवित हो उठे। तभी से माताएँ संतान की रक्षा के लिए अहोई अष्टमी का व्रत करती हैं।
कथा के अंत में सब स्त्रियाँ कहती हैं — «जैसे साहूकारनी को उसके पुत्र मिले, वैसे सबको मिलें; अहोई माता सबकी संतान की रक्षा करें।» हाथ में रखे गेहूँ के दाने सास को दिए जाते हैं।
व्रत का भोजन और अहोई का भोग
अहोई का व्रत निर्जला है पर करवा चौथ से छोटा — सूर्यास्त के बाद तारे दिखते ही खुल जाता है। भोग में अष्टमी की गिनती (आठ) रखने की रीत है।
- भोग: 8 पूड़ी + 8 मठरी या 8 पुए (गेहूँ के आटे-गुड़ के), सूजी का हलवा, दूध-भात (दूध में पके चावल), फल
- व्रत खोलने पर: पहले अर्घ्य का जल, फिर हलवा-पूड़ी; कई परिवार इस दिन मूली और सिंघाड़ा ज़रूर खाते हैं
- बाया: हलवा-पूड़ी की थाली, फल, दक्षिणा, साड़ी/चूड़ी — कथा के बाद सास या घर की बड़ी को
- बच्चों को कथा के बाद पुए/मठरी और खील-बताशे — «अहोई का प्रसाद»
- गर्भवती या दूध पिलाने वाली माताएँ फल-जल के साथ व्रत रखें — निर्जला की ज़िद नहीं
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
अहोई मुख्यतः उत्तर भारत का व्रत है, पर हर घर की अहोई अलग दिखती है।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- अहोई का चित्र दीवाली तक दीवार पर रहने दें — दीवाली पर उसी की पूजा और करवे का जल घर में छिड़कें
- चाँदी की माला में हर साल दो मोती जोड़ें — यह संतान-वृद्धि का प्रतीक है
- तारे साफ़ दिखने पर ही अर्घ्य दें (सूर्यास्त के 35-45 मिनट बाद)
- कथा परिवार की सब माताएँ साथ सुनें; बाया सास को अवश्य
- व्रत खोलने पर पहले बच्चों को खिलाएँ
❌ क्या न करें
- इस दिन मिट्टी खोदना, खुरपी चलाना — कथा के कारण वर्जित माना जाता है
- दिन में सोना, कैंची-सुई, किसी बच्चे को डाँटना-मारना
- काले कपड़े न पहनें
- अस्वस्थ/गर्भवती निर्जला न रखें — फल-जल मान्य
- तारों की जगह किसी बल्ब/फ़ोटो को अर्घ्य न दें
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अहोई अष्टमी 2026 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की अहोई अष्टमी है — कार्तिक कृष्ण अष्टमी, पंचांग-गणना से; सूर्यास्त व चंद्रोदय (दिल्ली) का समय भी वहीं है।
अहोई का व्रत तारों से खुलता है या चंद्रमा से?
सामान्य नियम तारों का है — सूर्यास्त के लगभग 35-45 मिनट बाद तारे दिखते ही अर्घ्य देकर व्रत खुलता है। चंद्रमा इस रात देर से (ऊपर चंद्रोदय देखें) निकलता है; जिन घरों में चंद्र-अर्घ्य की रीत हो, वे उतनी देर रुकती हैं।
अहोई माता कौन हैं?
अहोई माता पार्वती का ही मातृ-रूप हैं — «अनहोनी टालने वाली»; कथा में स्याहू (सेह) माता भी साथ पूजी जाती हैं, जिनके बच्चों की अनजाने हत्या से व्रत की शुरुआत हुई।
क्या निःसंतान स्त्री यह व्रत रख सकती है?
हाँ, संतान-कामना से यह व्रत विशेष माना गया है; मथुरा के राधाकुंड में अहोई की आधी रात स्नान की मान्यता भी इसी से जुड़ी है।
चाँदी की अहोई और मोती क्या हैं?
अहोई माता का चाँदी का छोटा प्रतीक (स्याहू) और मोती — पहले साल दो मोती, हर साल दो जोड़ते जाते हैं; पूजा में चढ़ाकर माला बच्चों की रक्षा-प्रतीक के रूप में सँभाली जाती है।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। स्वास्थ्य-संबंधी स्थिति में चिकित्सक की सलाह लें।
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