🪔 दीपावली (लक्ष्मी पूजन) 2026
कार्तिक अमावस्या — घर-घर दीप, लक्ष्मी-गणेश पूजन प्रदोष व स्थिर लग्न में; पाँच दिन के दीपोत्सव का मुख्य दिन।
- धनतेरस (त्रयोदशी) — शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
- नरक चतुर्दशी / छोटी दीवाली — शनिवार, 7 नवंबर 2026
- दीपावली — लक्ष्मी पूजन (अमावस्या) — रविवार, 8 नवंबर 2026
- गोवर्धन पूजा / अन्नकूट — मंगलवार, 10 नवंबर 2026
- भाई दूज — बुधवार, 11 नवंबर 2026
दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है — साल का सबसे बड़ा पर्व। इस रात लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है, घर के हर कोने में दीये जलते हैं और मान्यता है कि माँ लक्ष्मी उसी घर में आती हैं जो साफ़, रोशन और प्रसन्न हो। श्रीराम इसी दिन चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे और अयोध्या दीपों से सजी थी।
पाँच दिन का दीपोत्सव — धनतेरस, नरक चतुर्दशी (छोटी दीवाली), दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज — इसकी पूरी तालिका ऊपर है। नीचे लक्ष्मी-पूजन का प्रदोष व निशीथ मुहूर्त, घर की पूजा-विधि, सामग्री, कथा, पकवान और अलग-अलग प्रदेशों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
अमावस्या की सबसे अँधेरी रात में दीप जलाना अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान की जीत का प्रतीक है। समुद्र-मंथन से इसी दिन लक्ष्मी प्रकट हुईं, इसलिए लक्ष्मी-पूजन; साथ में गणेश (बुद्धि), सरस्वती (विद्या) और कुबेर (कोष) की पूजा। व्यापारियों का नया वर्ष (बही-खाता) यहीं से शुरू होता है।
लक्ष्मी-पूजन का समय प्रदोष-काल है और उसमें भी स्थिर लग्न — वृषभ लग्न (दिल्ली में शाम लगभग 6:30-8:30) गृहस्थों के लिए सर्वोत्तम; तांत्रिक/विशेष साधना के लिए निशीथ काल (मध्य-रात्रि) और सिंह लग्न (रात लगभग 12:30-2:30)। स्थिर लग्न में पूजी लक्ष्मी घर में स्थिर रहती हैं — यही मान्यता है।
दीवाली की रात घर की स्त्री को «गृहलक्ष्मी» कहा जाता है — पूजा वही करवाती है, दीये वही जलाती है, और अहोई-करवा चौथ के करवे का जल वही घर में छिड़कती है। यह पर्व घर की स्त्री का ही है।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह गृहस्थ की घरेलू विधि है — दिन में सफ़ाई-सजावट, प्रदोष-काल में लक्ष्मी-गणेश पूजन, फिर दीपदान।
- सुबह स्नान; घर की अंतिम सफ़ाई; मुख्य द्वार पर रंगोली, तोरण (आम/अशोक के पत्ते-गेंदा), दोनों ओर लक्ष्मी-पद (दहलीज़ से भीतर की ओर), स्वस्तिक व शुभ-लाभ।
- शाम को पूजा-स्थान: उत्तर-पूर्व (ईशान) या पूर्व दिशा में चौकी पर लाल/पीला कपड़ा; बीच में लक्ष्मी-गणेश की नई मूर्ति (गणेश लक्ष्मी के दाएँ), साथ में कुबेर, सरस्वती का चित्र, कलश (जल-सुपारी-सिक्का-आम के पत्ते-नारियल), चाँदी/ताँबे का सिक्का, बही-खाता, तिजोरी की चाबी।
- प्रदोष-काल (ऊपर समय) में परिवार सहित बैठें; हाथ में जल-अक्षत-फूल लेकर संकल्प — «मैं परिवार की सुख-समृद्धि हेतु लक्ष्मी-गणेश का पूजन करती/करता हूँ।»
- पहले गणेश-पूजन (दूर्वा, मोदक/लड्डू, सिंदूर), फिर कलश-पूजन, फिर लक्ष्मी-पूजन — स्नान (जल-पंचामृत), वस्त्र, कमल/गुलाब-पुष्प, इत्र, रोली-अक्षत, खील-बताशे, मिठाई, फल, पान-सुपारी, लौंग-इलायची; «ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः» का जप या श्रीसूक्त/लक्ष्मी-चालीसा का पाठ।
- कुबेर-सरस्वती-बही-खाता और तिजोरी का पूजन; नए सिक्के-गहने पूजा में रखें। घर के औज़ार/वाहन पर भी रोली-अक्षत।
- आरती — «ॐ जय लक्ष्मी माता», फिर «जय गणेश देवा»; कपूर-आरती; परिवार के सब सदस्य पैर छूएँ, बड़े छोटों को आशीर्वाद और शगुन दें।
- दीपदान: पूजा के दीये से घर के सब दीये जलाएँ — द्वार पर सबसे पहले, फिर तुलसी, रसोई, जल-स्थान, छत, हर कमरा, बाहर की गली/नाली तक; एक बड़ा दीपक (या अखंड) रात-भर पूजा-स्थान पर। कुल दीयों की संख्या 11, 21, 51 या घर की रीत से।
- अहोई/करवा चौथ का करवा हो तो उसका जल घर में छिड़कें और अहोई माता का चित्र पोंछें। प्रसाद बाँटें, पड़ोसियों-सफ़ाईकर्मियों-काम करने वालों को मिठाई-शगुन दें।
- रात में लक्ष्मी-आगमन के लिए घर का मुख्य द्वार खुला/दीपों से रोशन रखें; अगली सुबह (गोवर्धन/प्रतिपदा) पूजा-स्थान की सफ़ाई और अन्नकूट।
पूजा-सामग्री की सूची
धनतेरस की सूची इसी में मिला लें — तीनों दिन की सामग्री एक साथ आती है।
- लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति (मिट्टी की, नई), कुबेर व सरस्वती का चित्र, लाल-पीला कपड़ा, चौकी
- कलश, आम के पत्ते, नारियल, सुपारी, सिक्का, मौली, गंगाजल
- मिट्टी के दीये (21/51), सरसों तेल, घी, रुई की बत्तियाँ, एक बड़ा दीपक/अखंड
- रोली, कुमकुम, हल्दी, चंदन, अक्षत, सिंदूर, इत्र, दूर्वा
- फूल — कमल (लक्ष्मी को प्रिय), गुलाब, गेंदा; फूल-माला, तोरण
- खील-बताशे, चीनी के खिलौने, मिठाई (लड्डू-बर्फ़ी), फल (सीताफल/अनार/सिंघाड़ा), पान-सुपारी, लौंग-इलायची
- पंचामृत (दूध-दही-घी-शहद-शक्कर), मोदक/लड्डू (गणेश जी को)
- नया सिक्का/गहना, बही-खाता, कलम, तिजोरी की चाबी
- रंगोली के रंग, लक्ष्मी-पद के छापे, स्वस्तिक-शुभ-लाभ के स्टिकर
- धूप, अगरबत्ती, कपूर, आरती-थाली, लक्ष्मी-चालीसा/श्रीसूक्त पुस्तक
- शगुन के लिफ़ाफ़े, बच्चों के लिए फुलझड़ी (सीमित)
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समुद्र-मंथन के समय क्षीरसागर से कार्तिक अमावस्या को माँ लक्ष्मी कमल पर विराजमान प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को वरमाला पहनाई — तभी से यह रात लक्ष्मी-पूजन की रात है। जो घर स्वच्छ, प्रकाशित और प्रसन्न हो, लक्ष्मी उसी में प्रवेश करती हैं — इसीलिए सफ़ाई, दीप और परिवार का साथ।
रामायण की कथा — श्रीराम, सीता और लक्ष्मण चौदह वर्ष के वनवास और रावण-विजय के बाद इसी अमावस्या को अयोध्या लौटे। अयोध्यावासियों ने घी के दीयों से पूरी नगरी सजा दी — अँधेरी अमावस्या पूनम-सी हो गई। तभी से हर घर अपने राम के लौटने की खुशी में दीये जलाता है।
एक लोक-कथा में एक निर्धन बुढ़िया दीवाली की रात सबके सो जाने के बाद भी दीप जलाकर लक्ष्मी-स्मरण करती रही। लक्ष्मी जी ने पूछा — «सब सो गए, तू क्यों जागी है?» बुढ़िया बोली — «आपकी प्रतीक्षा में।» लक्ष्मी उसके घर स्थिर हो गईं। सीख — दीवाली की रात कुछ देर जागकर लक्ष्मी-स्मरण और अगली सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना।
लक्ष्मी-भोग और दीवाली के पकवान
लक्ष्मी जी को सफ़ेद व मीठा प्रिय है — खील-बताशे और खीर हर घर का भोग हैं। पकवान धनतेरस से बनने शुरू होते हैं और भाई दूज तक चलते हैं।
- भोग: खील-बताशे, चीनी के खिलौने, खीर या सूजी का हलवा, बूंदी के लड्डू, अनार-सीताफल-सिंघाड़ा, पान
- गणेश जी को मोदक/लड्डू, कुबेर को सफ़ेद मिठाई; कई घरों में 5 या 11 तरह की मिठाई-पकवान (छप्पन भोग की छोटी झलक)
- उत्तर भारत के पकवान: गुझिया, शक्करपारे, मठरी, नमकपारे, बेसन के लड्डू, दही-भल्ले, पूड़ी-कद्दू/आलू की सब्ज़ी
- पूर्वांचल-बिहार: ठेकुआ, खाजा, अनरसा, चूड़ा-दही; बंगाल: नारियल के नाड़ू, संदेश; गुजरात-महाराष्ट्र: चकली, चिवड़ा, करंजी, अनारसे, लड्डू का «फराल»; दक्षिण: मुरुक्कू, मैसूर-पाक, अधिरसम
- मधुमेह-रोगी बुज़ुर्ग हों तो खोया-मिठाई कम, फल-मखाने ज़्यादा; नए बर्तन में पहला पकवान खीर
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
दीवाली सबकी है, पर हर प्रदेश की रात अलग दिखती है — लक्ष्मी पूजन कहीं, काली पूजा कहीं, तेल-स्नान कहीं।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- पूजा प्रदोष-काल में, स्थिर लग्न (शाम ~6:30-8:30) में — ऊपर समय देखें; परिवार साथ बैठे
- गणेश लक्ष्मी के दाएँ (आपके देखने में बाएँ); पूजा-चौकी उत्तर-पूर्व या पूर्व में
- द्वार का दीपक सबसे पहले और रात-भर; तुलसी-रसोई-जल-स्थान पर दीये ज़रूर
- प्रसाद और शगुन काम करने वालों-पड़ोसियों-सफ़ाईकर्मियों को भी — लक्ष्मी बाँटने से बढ़ती हैं
- अगली सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें, घर की सफ़ाई और अन्नकूट/गोवर्धन की तैयारी
❌ क्या न करें
- पूजा-रात कलह, नशा, जुए में घर का पैसा — लक्ष्मी ऐसे घर में नहीं ठहरतीं
- पटाखे बच्चों के हाथ अकेले न दें; दीयों के पास परदे-कपड़े नहीं; रात-भर वाले दीपक के पास कुछ ज्वलनशील नहीं
- लक्ष्मी-मूर्ति खड़ी नहीं, बैठी (कमलासन) लें — खड़ी लक्ष्मी चंचल मानी गई हैं
- पुरानी टूटी मूर्ति/चित्र पूजा में नहीं — विसर्जन करें; एक साल पुरानी मूर्ति को जल/पौधे में
- दीवाली की रात झाड़ू या कूड़ा बाहर नहीं फेंकते (सुबह दरिद्र-निकास के साथ); घर में अँधेरा कोना न रहे
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दीवाली 2026 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की कार्तिक अमावस्या (लक्ष्मी पूजन) है — पंचांग-गणना से; पाँचों दिन (धनतेरस से भाई दूज) की तालिका भी ऊपर है। यदि अमावस्या दो दिन प्रदोष को छुए तो जिस दिन प्रदोष-काल में अमावस्या हो और रात में भी रहे, वही लक्ष्मी-पूजन का दिन।
लक्ष्मी-पूजन का शुभ मुहूर्त क्या है?
प्रदोष-काल (सूर्यास्त से ~2 घंटे 24 मिनट, ऊपर सटीक समय) में वृषभ स्थिर लग्न — दिल्ली में शाम क़रीब 6:30-8:30; यही गृहस्थों के लिए सर्वोत्तम है। निशीथ काल (ऊपर) साधकों/व्यापारियों के लिए। स्थिर-लग्न का समय शहर के अनुसार 10-20 मिनट बदलता है।
दीवाली की पूजा में कौन-कौन से देवता?
गणेश (पहले), लक्ष्मी (मुख्य), कुबेर, सरस्वती, कलश (वरुण), और घर की रीत से काली/दुर्गा या कुल-देवी; बही-खाता, तिजोरी, औज़ार भी पूजे जाते हैं।
लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति कैसी हो और पुरानी का क्या करें?
मिट्टी की, बैठी हुई (कमल पर), गणेश लक्ष्मी के दाएँ; हर साल नई। पुरानी मूर्ति अगली दीवाली से पहले जल या पौधे की मिट्टी में विसर्जित करें, कूड़े में नहीं।
क्या दीवाली पर व्रत रखते हैं?
अनिवार्य नहीं; कई स्त्रियाँ अमावस्या को दिन में फलाहार रखकर लक्ष्मी-पूजा के बाद भोजन करती हैं। पूजा, दीपदान और परिवार का साथ मुख्य है।
बंगाल में दीवाली की रात काली पूजा क्यों?
कार्तिक अमावस्या की मध्य-रात्रि शक्ति-साधना की रात मानी गई है; बंगाल-असम में लक्ष्मी पूजा पहले (कोजागरी पूर्णिमा को) हो चुकी होती है, इसलिए अमावस्या माँ काली की। दोनों एक ही रात, अलग परंपरा।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। स्थिर-लग्न का समय शहर के अनुसार बदलता है — अपने शहर के पंचांग से मिला लें। पटाखों में सुरक्षा और स्थानीय नियमों का पालन करें।
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