🌅 छठ पूजा (सूर्य षष्ठी) 2026
कार्तिक शुक्ल षष्ठी — चार दिन का महापर्व: नहाय-खाय, खरना, डूबते सूर्य को संध्या-अर्घ्य और उगते सूर्य को उषा-अर्घ्य; 36 घंटे निर्जला।
- नहाय-खाय (चतुर्थी) — शुक्रवार, 13 नवंबर 2026
- खरना / लोहंडा (पंचमी) — शनिवार, 14 नवंबर 2026
- संध्या अर्घ्य — षष्ठी (डूबते सूर्य को) — रविवार, 15 नवंबर 2026
- उषा अर्घ्य व पारण — सप्तमी (उगते सूर्य को) — सोमवार, 16 नवंबर 2026
छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को — दीपावली के छह दिन बाद — मनाया जाने वाला सूर्य-उपासना का सबसे कठोर और पवित्र व्रत है। यह चार दिन चलता है: चतुर्थी को नहाय-खाय, पंचमी को खरना, षष्ठी की शाम डूबते सूर्य को अर्घ्य और सप्तमी की भोर उगते सूर्य को अर्घ्य — बीच में लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत।
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई का यह लोक-महापर्व अब पूरे देश और विदेश में मनाया जाता है। व्रती (परवैतिन) प्रायः घर की माँ होती हैं; पूरा परिवार-मोहल्ला घाट पर साथ रहता है। नीचे इस साल की चारों तिथियाँ, सूर्योदय-सूर्यास्त (अर्घ्य) का समय, विधि, सूप-दउरा की सामग्री, ठेकुआ-खरना की रसोई, कथा और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
छठ में सूर्य देव और छठी मैया (षष्ठी देवी — ब्रह्मा की मानस-पुत्री, संतान की रक्षक) की पूजा होती है। मान्यता है कि छठ का व्रत संतान-सुख, परिवार के आरोग्य और सौभाग्य के लिए सबसे फलदायी है — और यह उन गिने-चुने पर्वों में है जहाँ डूबते सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है, यानी उतार में भी कृतज्ञता।
इसमें कोई पंडित, मूर्ति, मंदिर नहीं — सिर्फ़ जल, सूर्य, बाँस का सूप-दउरा, मिट्टी का चूल्हा, गेहूँ-गुड़-घी का ठेकुआ और लोकगीत। शुद्धता का नियम कड़ा है: चार दिन लहसुन-प्याज़ नहीं, नया चूल्हा, ज़मीन पर सोना, हाथ से बना प्रसाद।
ऊपर दी तिथियाँ इंजन-गणना से हैं — षष्ठी (संध्या अर्घ्य) पंचांग से और बाक़ी तीन दिन उसी के सापेक्ष; सप्तमी का उषा-अर्घ्य उसी शहर के सूर्योदय पर होता है, इसलिए अपने शहर का सूर्योदय पंचांग-पन्ने से ज़रूर मिला लें (दिल्ली से पटना में सूर्योदय क़रीब 35-40 मिनट पहले होता है)।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
चार दिन की यह विधि बिहार-पूर्वांचल की मानक रीत है; कठोर है, इसलिए परिवार का साथ ज़रूरी।
- दिन 1 — नहाय-खाय (चतुर्थी): व्रती सुबह नदी/तालाब या घर में स्नान, घर की धुलाई-लिपाई; दोपहर में नए/मिट्टी के चूल्हे पर एक बार का सात्विक भोजन — कद्दू (लौकी) की सब्ज़ी, चने की दाल, अरवा चावल, सेंधा नमक, घी — पहले सूर्य को भोग, फिर व्रती, फिर परिवार। इसी दिन से लहसुन-प्याज़-मांस बंद।
- दिन 2 — खरना/लोहंडा (पंचमी): व्रती पूरे दिन निर्जला; शाम को सूर्यास्त के बाद मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से गुड़-चावल की खीर (रसियाव), घी लगी रोटी और केला बनाकर छठी मैया को भोग; व्रती एकांत में प्रसाद खाती है (शोर हुआ तो वहीं रुक जाती है), फिर सबको प्रसाद। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू।
- दिन 3 — संध्या अर्घ्य (षष्ठी): दिन में ठेकुआ, कसार (चावल के लड्डू), फल, नारियल, गन्ना, हल्दी-अदरक की गाँठ, सिंघाड़ा, केला का घवद, नींबू (डाभ), सुथनी, मूली आदि बाँस के सूप और दउरा (टोकरी) में सजाएँ; दउरा घर का पुरुष सिर पर उठाकर घाट ले जाता है।
- घाट पर मिट्टी की सूर्य-वेदी/कोसी (हाथी वाला मिट्टी का दीप-स्तंभ, मन्नत पूरी होने पर) सजाएँ; सूर्यास्त (ऊपर समय) से पहले व्रती जल में कमर तक खड़ी होकर सूप उठाए; परिवार के लोग दूध-जल से डूबते सूर्य को अर्घ्य दें — «ॐ घृणि सूर्याय नमः» या छठ के गीत; सूप की पाँच/सात परिक्रमा।
- रात में घाट या घर पर जागरण, कोसी भरना (मन्नत वालों के लिए — गन्नों के मंडप में मिट्टी के 12/24 दीये), छठ के लोकगीत — «केलवा के पात पर उगेलन सूरज मल झुके-झुके», «काँच ही बाँस के बहँगिया»।
- दिन 4 — उषा अर्घ्य व पारण (सप्तमी): भोर में (ब्रह्म मुहूर्त में) वही सूप-दउरा लेकर घाट; सूर्योदय (ऊपर समय) पर उगते सूर्य को अर्घ्य; व्रती जल से निकलकर बड़ों के पैर छूए, प्रसाद (ठेकुआ) बाँटे।
- पारण: घाट से लौटकर व्रती छठी मैया को प्रणाम कर अदरक-गुड़/ठेकुआ-जल से 36 घंटे का व्रत खोले; फिर हल्का भोजन। सूप का प्रसाद मोहल्ले-रिश्तेदारों में बाँटना अनिवार्य — छठ का प्रसाद माँगकर खाना भी शुभ माना जाता है।
- व्रत का संकल्प प्रायः मन्नत या परिवार की परंपरा से लिया जाता है और फिर हर साल निभाया जाता है; कोई साल छूटे तो किसी और परवैतिन से सूप उठवाकर पूजा पूरी की जाती है।
पूजा-सामग्री की सूची
छठ की सामग्री लंबी है — नहाय-खाय से पहले सूची देखकर सब जुटा लें; हर चीज़ साफ़-नई हो।
- बाँस का सूप (2-3), बाँस का दउरा/टोकरी (1-2), पीतल का सूप (हो तो)
- ठेकुआ के लिए गेहूँ का आटा, गुड़, घी, सौंफ, नारियल-कतरन; कसार के लिए चावल का आटा-गुड़
- खरना: अरवा चावल, गुड़, दूध, गेहूँ का आटा (रोटी), आम की लकड़ी, मिट्टी का चूल्हा
- नहाय-खाय: कद्दू/लौकी, चना दाल, अरवा चावल, सेंधा नमक, घी
- फल: केला (पूरा घवद), नारियल (पानी वाला), सेब, संतरा, नाशपाती, सिंघाड़ा, सुथनी, नींबू-डाभ, गन्ना (पत्तों सहित 5-7)
- हल्दी और अदरक की गाँठ (पौधे सहित), मूली, सहजन (कहीं-कहीं), पान-सुपारी
- मिट्टी के दीये, घी/सरसों तेल, धूप, अगरबत्ती, कपूर
- सिंदूर (व्रती नाक से माँग तक लंबा सिंदूर लगाती हैं), रोली, अक्षत, फूल, फूल-माला
- पीतल/ताँबे का लोटा (अर्घ्य को), दूध, गंगाजल
- नए वस्त्र — व्रती के लिए बिना सिली साड़ी (पीली/लाल), पुरुषों के लिए धोती
- कोसी (मन्नत हो तो): मिट्टी का हाथी-दीप, 12/24 दीये, गन्ने का मंडप
- गेहूँ/चावल धोकर-सुखाकर पिसवाया हुआ (बाज़ार का पिसा आटा नहीं — शुद्धता), चटाई/कंबल (ज़मीन पर सोने को)
🛍 पूजा-सामग्री व यंत्र देखें 🙏 पूजा बुक करें
सूर्योदय, चंद्रोदय, राहुकाल व चौघड़िया — आपके शहर के सटीक समय से, निःशुल्क।
पंचांग देखें →व्रत-कथा
राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी निःसंतान थे। महर्षि कश्यप के यज्ञ से रानी को पुत्र हुआ, पर वह मृत जन्मा। शोक में राजा प्राण त्यागने चले तो आकाश से एक देवी प्रकट हुईं — «मैं षष्ठी देवी हूँ, ब्रह्मा की मानस-पुत्री, संतान की रक्षक; मेरी पूजा करो।» राजा-रानी ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उनकी पूजा की और पुत्र जीवित हो उठा — तभी से छठी मैया की पूजा है।
रामायण की कथा — अयोध्या लौटने के बाद राम-सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव का व्रत रखा और सरयू-तट पर डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य दिया; सीता ने मुनि मुद्गल के आश्रम में छह दिन सूर्य की उपासना की। इसी से छठ को «सूर्य षष्ठी» कहते हैं।
महाभारत की कथा — सूर्य-पुत्र कर्ण रोज़ कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे और याचकों को दान करते थे; अंग-प्रदेश (आज का भागलपुर-मुंगेर) के राजा कर्ण से ही बिहार में सूर्य-अर्घ्य की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। द्रौपदी ने भी पांडवों का राज्य लौटाने के लिए छठ का व्रत किया था।
छठ की रसोई — नहाय-खाय, खरना का रसियाव, ठेकुआ
छठ का हर प्रसाद हाथ से, मिट्टी/नए चूल्हे पर, शुद्धता से बनता है — गेहूँ धोकर-सुखाकर घर में पिसवाया जाता है, गुड़ ही मिठास है। ठेकुआ इस पर्व की पहचान है — गेहूँ का आटा, पिघला गुड़, घी, सौंफ-नारियल गूँथकर साँचे में दबाकर घी में तला।
- नहाय-खाय: कद्दू-भात — लौकी की सब्ज़ी (सेंधा नमक, घी), चने की दाल, अरवा चावल; व्रती एक बार, परिवार बाद में
- खरना: रसियाव (गुड़-चावल-दूध की खीर), घी लगी रोटी, केला — सूर्यास्त के बाद, आम की लकड़ी की आग पर; व्रती एकांत में
- ठेकुआ (20 के लिए): 1 किलो गेहूँ का आटा, 500-600 ग्राम गुड़ (पानी में घोलकर), 100 ग्राम घी (मोयन), 1 चम्मच सौंफ, नारियल-कतरन — कड़ा गूँथें, साँचे में दबाएँ, धीमी आँच पर घी में सुनहरा तलें
- कसार/लड्डू: भुने चावल के आटे में गुड़-घी-सौंफ मिलाकर लड्डू; कुछ घरों में पिरुकिया (गुझिया)
- पारण: अदरक-गुड़ या ठेकुआ-जल से व्रत खोलें, फिर हल्का — खिचड़ी/दाल-भात; तुरंत भारी भोजन नहीं
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
छठ की जड़ बिहार-पूर्वांचल-तराई में है; जहाँ-जहाँ बिहारी गए, छठ साथ गया।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- अर्घ्य ठीक सूर्यास्त/सूर्योदय के समय — ऊपर दिल्ली का समय, अपने शहर का पंचांग से मिलाएँ
- चार दिन कड़ी शुद्धता — नया चूल्हा, हाथ का प्रसाद, लहसुन-प्याज़-मांस बंद, ज़मीन पर सोना
- सूप में गन्ना, केला का घवद, हल्दी-अदरक की गाँठ, नारियल, ठेकुआ अनिवार्य
- व्रती को जल में पैर जमाकर, सहारे के साथ खड़ा रखें — घाट फिसलन भरे होते हैं
- प्रसाद खुले हाथ बाँटें; माँगकर खाना भी शुभ
❌ क्या न करें
- प्रसाद को जूठा/अशुद्ध हाथ न लगे; सूप ज़मीन पर सीधा न रखें (चटाई/कपड़ा)
- व्रती के सामने ऊँची आवाज़, खरना के प्रसाद के समय शोर — प्रसाद रुक जाता है
- घाट पर गहरे पानी में न जाएँ; बच्चों को अकेला न छोड़ें; पटाखे घाट पर नहीं
- बाज़ार का पिसा आटा, पैकेट-मिठाई — छठ में परंपरा-विरुद्ध
- बीमार/गर्भवती व्रती 36 घंटे निर्जला की ज़िद न करें — परिवार की दूसरी स्त्री या पुरुष व्रत उठा सकते हैं (पुरुष भी छठ करते हैं)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छठ पूजा 2026 में कब है?
ऊपर चारों दिन की तालिका है — नहाय-खाय (चतुर्थी), खरना (पंचमी), संध्या अर्घ्य (षष्ठी) और उषा अर्घ्य-पारण (सप्तमी); षष्ठी पंचांग-गणना से, बाक़ी तीन उसी के सापेक्ष।
छठ के अर्घ्य का समय क्या है?
संध्या अर्घ्य षष्ठी के सूर्यास्त पर और उषा अर्घ्य सप्तमी के सूर्योदय पर — ऊपर दिल्ली का समय है। पटना में सूर्योदय-सूर्यास्त दिल्ली से लगभग 35-40 मिनट पहले, लखनऊ में 15-20 मिनट पहले, मुंबई में 25-30 मिनट बाद — अपने शहर का समय पंचांग-पन्ने पर देखें।
छठी मैया कौन हैं?
षष्ठी देवी — ब्रह्मा की मानस-पुत्री और सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं; बालकों की रक्षक देवी। छठ में सूर्य और छठी मैया दोनों की पूजा है।
क्या पुरुष छठ का व्रत रख सकते हैं?
हाँ — छठ में स्त्री-पुरुष दोनों व्रती होते हैं; बिहार में बहुत-से पुरुष परवैत हैं। मन्नत और शुद्धता का नियम सबके लिए एक है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों?
छठ उन इने-गिने पर्वों में है जहाँ अस्त होते सूर्य की भी पूजा है — सिखाता है कि उतार में भी कृतज्ञ रहो; शाम का अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा और सुबह का उषा को समर्पित माना जाता है।
ठेकुआ कैसे बनता है?
गेहूँ का आटा, पिघला गुड़, घी का मोयन, सौंफ-नारियल कड़ा गूँथकर लकड़ी के साँचे में दबाएँ और धीमी आँच पर घी में सुनहरा तलें — ऊपर भोग-खंड में मात्रा दी है। बाज़ार का आटा नहीं, घर में धोकर-सुखाकर पिसवाया आटा।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
यह भी पढ़ें: दीपावली (6 दिन पहले) · भाई दूज · अपने शहर का सूर्योदय-सूर्यास्त · सूर्य-मंत्र व आरती
⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। अर्घ्य का समय शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त पर निर्भर है — अपने शहर का पंचांग देखें। घाट पर सुरक्षा सर्वोपरि।
🌐 Read this page in English · ← सभी व्रत-त्योहार · पूरा पर्व-कैलेंडर