🪙 धनतेरस (धनत्रयोदशी) 2026
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी — दीपोत्सव का पहला दिन; धन्वंतरि-जयंती, कुबेर-लक्ष्मी पूजन, नई ख़रीद और यम-दीपदान।
धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है — दीपावली से दो दिन पहले, पाँच दिन के दीपोत्सव (धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन, भाई दूज) का पहला दिन। इसी दिन समुद्र-मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए यह आरोग्य का पर्व भी है — राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस।
घरों में इस दिन बर्तन, सोना-चाँदी, झाड़ू, धनिया ख़रीदने; शाम को प्रदोष-काल में लक्ष्मी-कुबेर-धन्वंतरि की पूजा; और दक्षिण दिशा में यमराज के लिए दीपदान (यम-दीपक) की परंपरा है। नीचे इस साल की तिथि, प्रदोष-काल का पूजा-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा और अलग-अलग प्रदेशों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
धन + तेरस = त्रयोदशी को धन की पूजा। मान्यता है कि इस दिन ख़रीदी धातु/वस्तु तेरह गुना बढ़ती है — इसलिए बर्तन (विशेषकर पीतल-ताँबा-चाँदी), सोना और नया सामान लेने का चलन है। झाड़ू को लक्ष्मी का प्रतीक मानकर ख़रीदा जाता है और धनिया के बीज दीवाली के बाद बोए जाते हैं।
यम-दीपदान: कथा के अनुसार इस दिन घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के लिए दीपक जलाने से परिवार पर अकाल-मृत्यु का संकट टलता है — यह इस दिन की सबसे ज़रूरी घरेलू रीत है, जो ख़रीदारी की चमक में अक्सर छूट जाती है।
पूजा का समय प्रदोष-काल (सूर्यास्त के बाद लगभग 2 घंटे 24 मिनट) है, और इसमें भी स्थिर लग्न (वृषभ लग्न, दिल्ली में शाम लगभग 6:30-8:30 के बीच) श्रेष्ठ — स्थिर लग्न में की गई लक्ष्मी-पूजा से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं, ऐसी मान्यता है।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — दिन में ख़रीद और सफ़ाई, शाम को प्रदोष में पूजा और यम-दीपक।
- सुबह घर की सफ़ाई; मुख्य द्वार पर रंगोली, तोरण, स्वस्तिक और दोनों ओर लक्ष्मी-पद (पैरों के निशान) बनाएँ — दहलीज़ से पूजा-स्थान की ओर।
- दिन में ख़रीदारी — धातु का बर्तन (पीतल/ताँबा/चाँदी; ख़ाली नहीं लाते, उसमें चावल/शक्कर/जल भरकर घर लाएँ), सोना-चाँदी का सिक्का, नई झाड़ू, धनिया के बीज, दीये।
- शाम को पूजा-स्थान पर चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी-गणेश, कुबेर और भगवान धन्वंतरि का चित्र/मूर्ति रखें; ख़रीदा हुआ बर्तन-सिक्का सामने रखें, उस पर रोली-अक्षत।
- प्रदोष-काल (ऊपर समय) में पूजा: कलश-स्थापना, दीप-धूप, फूल, रोली-अक्षत, खील-बताशे, मिठाई, धनिया; «ॐ धन्वंतरये नमः», «ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कुबेराय नमः» व लक्ष्मी-मंत्र का जप; धन्वंतरि से आरोग्य और कुबेर-लक्ष्मी से धन की प्रार्थना।
- तिजोरी/बही-खाते/गल्ले की पूजा — रोली से स्वस्तिक, अक्षत, फूल; व्यापारी नई बही इसी दिन या दीवाली को शुरू करते हैं।
- यम-दीपदान: सूर्यास्त के बाद आटे या मिट्टी के चौमुखी दीपक में सरसों का तेल, चार बत्तियाँ; घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखें, अनाज (गेहूँ) की ढेरी पर; परिवार की स्त्री हाथ जोड़कर प्रार्थना करे — «मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह, त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम»। रात-भर जलने दें।
- घर के हर कोने, तुलसी-चौरा, रसोई, जल-स्थान और द्वार पर 13 (या 5-7) दीये जलाएँ — दीपोत्सव यहीं से शुरू होता है।
- आरती के बाद प्रसाद बाँटें; ख़रीदा बर्तन पहली बार दीवाली की पूजा में या अगले दिन रसोई में उपयोग करें।
पूजा-सामग्री की सूची
पूजा-सामग्री दीवाली के लिए भी साथ में ले लें — तीन दिन तक चलती है।
- लक्ष्मी-गणेश, कुबेर और धन्वंतरि जी का चित्र/मूर्ति, लाल कपड़ा, चौकी
- मिट्टी के दीये (13 या अधिक), सरसों का तेल, घी, रुई की बत्तियाँ
- यम-दीपक हेतु आटे/मिट्टी का चौमुखी दीपक + गेहूँ की ढेरी
- कलश, आम के पत्ते, नारियल, मौली, रोली, अक्षत, हल्दी, चंदन
- खील-बताशे, मिठाई (लड्डू/बर्फ़ी), फल, पान-सुपारी, लौंग-इलायची
- धनिया (साबुत) — पूजा में और दीवाली के बाद बोने को
- नया धातु-बर्तन / सिक्का / झाड़ू — ख़रीदा हुआ, पूजा में रखने को
- फूल-माला (गेंदा), कमल (मिले तो), गुलाब
- रंगोली के रंग, तोरण, लक्ष्मी-पद के छापे
- धूप-अगरबत्ती, कपूर, आरती-थाली, गंगाजल
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
राजा हिम के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्प-दंश से मृत्यु लिखी थी। नई दुल्हन ने उस रात पति को सोने नहीं दिया — कमरे के द्वार पर सोने-चाँदी के गहनों और सिक्कों का ढेर लगाया, चारों ओर दीपक जलाए और रात-भर गीत-कथा सुनाती रही।
यमराज सर्प का रूप लेकर आए, पर दीपों और गहनों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं; वे ढेर पर बैठकर रात-भर गीत सुनते रहे और भोर होते ही बिना दंश दिए लौट गए। इस तरह दीप-दान और जागरण से राजकुमार के प्राण बचे — तभी से त्रयोदशी को यम-दीपदान की परंपरा है, ताकि परिवार पर अकाल-मृत्यु न आए।
दूसरी कथा समुद्र-मंथन की है — देवताओं और असुरों के मंथन से इसी त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत-कलश लिए प्रकट हुए; वे आयुर्वेद के देवता हैं। कलश लिए प्रकट होने से ही इस दिन बर्तन (कलश) ख़रीदने की रीत जुड़ी है। दो दिन बाद अमावस्या को लक्ष्मी प्रकट हुईं — इसीलिए दीपावली।
धनतेरस का भोग और भोजन
धनतेरस पर व्रत अनिवार्य नहीं — यह पूजा-ख़रीद का दिन है; पर कई घरों में स्त्रियाँ प्रदोष-व्रत (त्रयोदशी) रखती हैं और पूजा के बाद फलाहार/भोजन करती हैं।
- भोग: खील-बताशे, सफ़ेद मिठाई (बर्फ़ी/पेड़ा), धनिया-गुड़ की पंजीरी (कई घरों में विशेष), नारियल, फल
- धन्वंतरि जी को: तुलसी-दल के साथ दूध/खीर या हल्दी-दूध का भोग — आरोग्य का प्रतीक
- दीवाली की मिठाइयाँ (गुझिया, शक्करपारे, नमकीन) कई घरों में धनतेरस से ही बनना शुरू
- प्रदोष-व्रत रखने वाली स्त्रियाँ दिन में फल-दूध, पूजा के बाद सात्विक भोजन
- नए बर्तन में पहला भोजन दीवाली के दिन बनाएँ — खीर या हलवा
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
धनतेरस पूरे देश में है, पर कहीं बर्तन, कहीं यम-दीपक, कहीं गाय-पूजा प्रमुख।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- पूजा प्रदोष-काल में (ऊपर समय), और हो सके तो स्थिर लग्न (शाम ~6:30-8:30) में
- यम-दीपक ज़रूर जलाएँ — दक्षिण दिशा, घर के बाहर, रात-भर
- बर्तन ख़ाली न लाएँ — चावल/शक्कर/जल भरकर घर में प्रवेश करें
- झाड़ू को पूजा में रखें, फिर सम्मान से उपयोग; धनिया के बीज दीवाली के बाद बोएँ
- आरोग्य के देवता धन्वंतरि को प्रणाम — घर के बीमार सदस्य के लिए विशेष प्रार्थना
❌ क्या न करें
- इस दिन उधार देना/लेना, काँच-प्लास्टिक व लोहे की ख़रीद (लोहा शनि का — परंपरा में वर्जित; स्टील पर मत भिन्न हैं)
- काले-नुकीले सामान, चाकू-कैंची ख़रीदना
- यम-दीपक पर पैर या उसे हिलाना; दक्षिण दिशा के अलावा कहीं और रखना
- ख़रीद के जुनून में क़र्ज़ लेकर सोना — धनतेरस श्रद्धा का दिन है, दिखावे का नहीं
- घर में गंदगी या कूड़ा — लक्ष्मी-आगमन से पहले सफ़ाई अनिवार्य
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
धनतेरस 2026 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी है — पंचांग-गणना से; प्रदोष-काल का पूजा-समय (दिल्ली) भी वहीं है। यदि त्रयोदशी दो दिन प्रदोष को छुए तो जिस दिन सूर्यास्त के बाद त्रयोदशी हो, वही धनतेरस।
धनतेरस की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
प्रदोष-काल — सूर्यास्त से लगभग 2 घंटे 24 मिनट तक (ऊपर सटीक समय)। इसमें वृषभ (स्थिर) लग्न — दिल्ली में शाम क़रीब 6:30-8:30 — सर्वश्रेष्ठ; लक्ष्मी स्थिर रहें, इसलिए स्थिर लग्न।
धनतेरस पर क्या ख़रीदें?
धातु का बर्तन (पीतल-ताँबा-चाँदी), सोना-चाँदी का सिक्का/गहना, नई झाड़ू, धनिया, दीये, रसोई का नया बर्तन। ख़रीद श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार — एक छोटा बर्तन या झाड़ू भी पर्याप्त है।
यम-दीपक कैसे और कब जलाएँ?
सूर्यास्त के बाद आटे/मिट्टी के चौमुखी दीपक में सरसों का तेल, चार बत्तियाँ; घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर, अनाज की ढेरी पर रखें; परिवार की स्त्री प्रार्थना करे और दीपक रात-भर जले।
क्या धनतेरस पर व्रत रखते हैं?
अनिवार्य नहीं; कई स्त्रियाँ त्रयोदशी का प्रदोष-व्रत रखती हैं — दिन में फल, प्रदोष-पूजा के बाद भोजन। धन्वंतरि-पूजा और यम-दीपक बिना व्रत के भी पूर्ण मान्य हैं।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। स्थिर-लग्न का समय शहर के अनुसार बदलता है — अपने शहर के पंचांग से मिला लें।
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