🐄 गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) 2026
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा — दीवाली का अगला दिन; गोबर का गोवर्धन, गाय-बैल की पूजा, 56 भोग का अन्नकूट और परिक्रमा।
गोवर्धन पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को — दीपावली के अगले दिन — मनाई जाती है। इस दिन श्रीकृष्ण ने इंद्र के अहंकार को तोड़ने के लिए गोवर्धन पर्वत को उँगली पर उठाकर ब्रजवासियों और गायों की रक्षा की थी। तभी से घर-आँगन में गोबर का गोवर्धन बनाकर, गाय-बैल को सजाकर पूजा और अन्नकूट (छप्पन भोग) की परंपरा है।
यह किसान और गृहिणी का पर्व है — प्रकृति, गाय, अन्न और पर्वत का धन्यवाद। मथुरा-वृंदावन-गोवर्धन में इस दिन 21 किलोमीटर की गोवर्धन-परिक्रमा और मंदिरों में अन्नकूट का विशाल भोग लगता है। नीचे इस साल की तिथि, पूजा-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, अन्नकूट की रसोई और प्रदेशों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
गोवर्धन-लीला की सीख यह है कि अहंकारी सत्ता (इंद्र) की नहीं, प्रकृति (पर्वत, गाय, वन) की पूजा करो — वही अन्न, जल, छाया देती है। इसीलिए इस दिन गाय-बैल का श्रृंगार और गोबर के गोवर्धन की पूजा है।
अन्नकूट का अर्थ है «अन्न का पर्वत» — नई फ़सल की सब्ज़ियों, अनाज, मिठाइयों से 56 (या जितने बन सकें) व्यंजन बनाकर ठाकुर जी (कृष्ण) को भोग लगाना और फिर सबको प्रसाद बाँटना — यह घर की स्त्रियों की सामूहिक रसोई का सबसे बड़ा दिन है।
इसी दिन बलि-प्रतिपदा (राजा बलि की पूजा) और गुजरात में नया साल (बेस्तु वर्ष) है; कई घरों में दीवाली की अगली सुबह इसी दिन दरिद्र-निकास (सूप बजाना) भी होता है। यदि अमावस्या दोपहर तक चले तो गोवर्धन पूजा एक दिन आगे भी हो सकती है — ऊपर की तिथि पंचांग से है।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — सुबह गोबर का गोवर्धन, दिन में गाय-पूजा, शाम को अन्नकूट-भोग और परिक्रमा।
- सुबह स्नान करके घर के आँगन/द्वार पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएँ — लेटे हुए पुरुष-सी आकृति या ढेर के रूप में; उसे फूल, खील-बताशे, दीये, हरी घास, गन्ने के टुकड़ों और छोटे झंडों से सजाएँ; बीच में श्रीकृष्ण की मूर्ति/चित्र या मिट्टी का ग्वाल-बाल रखें।
- गाय-बैल (या गौशाला की गाय) को नहलाकर सींगों पर तेल-रंग, गले में फूल-माला, माथे पर हल्दी-रोली का टीका; उन्हें गुड़-चना-हरा चारा खिलाएँ — गाय गोवर्धन-लीला की केंद्र हैं।
- पूजा-मुहूर्त (सुबह प्रतिपदा में, या अभिजित — ऊपर समय) में गोवर्धन-आकृति की पूजा: रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य; «गोवर्धन धराधार गोकुल त्राण-कारक, विष्णु-बाहु-कृतोच्छ्राय गवां कोटि प्रदो भव» का पाठ या «श्री गोवर्धन महाराज की जय».
- अन्नकूट: दिन में रसोई में नई फ़सल की सब्ज़ियाँ (मिली-जुली सब्ज़ी — «अन्नकूट की सब्ज़ी»), कढ़ी-चावल, पूड़ी, बाजरे/मक्का की रोटी, खीर, हलवा, लड्डू, मालपुआ, फल, मेवे — जितने व्यंजन बन सकें (परंपरा में 56); उन्हें थालियों/पत्तलों में पर्वत-सा सजाकर ठाकुर जी के सामने रखें।
- शाम को (गोधूलि बेला में) ठाकुर जी और गोवर्धन को अन्नकूट का भोग लगाएँ, आरती करें — «आरती कुंजबिहारी की»; दीपक जलाएँ।
- परिवार सहित गोवर्धन की सात परिक्रमा करें — हाथ में जल का लोटा, जल की धार गिराते हुए (ब्रज में यही रीत), «गोवर्धन महाराज की जय» बोलते हुए; बच्चे-बुज़ुर्ग सब।
- भोग लगा अन्नकूट-प्रसाद परिवार, पड़ोसियों, गौशाला और ज़रूरतमंदों में बाँटें — इस दिन प्रसाद किसी को न लौटाएँ।
- गोबर का गोवर्धन अगले दिन सूखने पर उपले बनाकर या खेत/पौधे में डाल दें — कूड़े में नहीं।
पूजा-सामग्री की सूची
गोबर, गन्ना और नई सब्ज़ियाँ एक दिन पहले जुटा लें — दीवाली के अगले दिन बाज़ार बंद रहते हैं।
- गाय का गोबर (गोवर्धन-आकृति के लिए), हरी घास/दूब
- श्रीकृष्ण की मूर्ति/चित्र, मिट्टी के ग्वाल-बाल-गाय के खिलौने (मिलें तो)
- गन्ने के टुकड़े, छोटे झंडे, फूल, फूल-माला (गेंदा)
- रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, मौली, चंदन
- दीये, घी/तेल, धूप, अगरबत्ती, कपूर
- खील-बताशे, मिठाई, फल, मेवे, माखन-मिश्री (कृष्ण को प्रिय)
- अन्नकूट की सब्ज़ियाँ (मिली-जुली 10-15 प्रकार), अनाज, कढ़ी-चावल, पूड़ी, खीर, लड्डू का सामान
- पत्तल/थालियाँ भोग सजाने को, तुलसी-दल
- गाय-बैल के लिए गुड़, चना, हरा चारा, माला, सींग-रंग
- परिक्रमा के लिए जल का लोटा, आरती-थाली
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
ब्रज में हर साल इंद्र की पूजा होती थी ताकि वर्षा हो। बालक कृष्ण ने नंद बाबा और ब्रजवासियों से कहा — «वर्षा इंद्र नहीं, प्रकृति का नियम देता है; हमें अपना अन्न देने वाले गोवर्धन पर्वत, हमारी गायों और वनों की पूजा करनी चाहिए।» ब्रजवासियों ने उस साल इंद्र की जगह गोवर्धन की पूजा की और छप्पन भोग चढ़ाए।
इंद्र क्रोध से पागल हो गए और ब्रज पर मूसलाधार वर्षा-प्रलय भेज दिया। तब सात वर्ष के कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उँगली पर उठा लिया; सात दिन-सात रात सारा ब्रज, गायें-बछड़े, ग्वाल-बाल उसके नीचे सुरक्षित रहे। इंद्र का अहंकार टूटा, उन्होंने क्षमा माँगी और कृष्ण को «गोविंद» (गायों के स्वामी) नाम मिला।
सात दिन कृष्ण ने कुछ नहीं खाया — इसलिए आठवें दिन ब्रजवासियों ने उन्हें 56 भोग (आठ पहर × सात दिन) अर्पित किए; यही अन्नकूट है। तभी से हर कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन-पूजा और अन्नकूट की परंपरा चली।
अन्नकूट की रसोई — 56 भोग और गोवर्धन की सब्ज़ी
अन्नकूट में घर में जो भी बन सके — सब ठाकुर जी को। सबसे ख़ास है «अन्नकूट की सब्ज़ी» — मौसम की 10-15 सब्ज़ियाँ (आलू, गोभी, मटर, बैंगन, मूली, गाजर, कद्दू, लौकी, टिंडा, सेम, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला, पालक-मेथी) एक साथ, बिना प्याज़-लहसुन, घी-हींग-जीरा-हल्दी-धनिया-गरम मसाले में।
- अन्नकूट की मिली-जुली सब्ज़ी + कढ़ी + चावल + पूड़ी/बाजरे की रोटी — यह चार चीज़ें अनिवार्य मानी जाती हैं
- मीठा: खीर, मालपुआ, बूंदी के लड्डू, मोहनभोग/हलवा, गुझिया, माखन-मिश्री, पेड़ा
- नमकीन: दही-बड़ा, कचौड़ी, पकौड़ी, चटनी, अचार, पापड़, रायता
- फल-मेवे: सेब, केला, अनार, सिंघाड़ा, बादाम-काजू-किशमिश; पान-सुपारी-लौंग-इलायची
- पहला भोग ठाकुर जी को गोधूलि-बेला में तुलसी-दल के साथ; फिर गाय को, फिर परिवार-पड़ोस को — अन्नकूट-प्रसाद जितना बँटे, उतना शुभ
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
ब्रज में परिक्रमा, गुजरात में नया साल, पहाड़ों में बलि-पूजा — एक ही प्रतिपदा के कई रूप।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- गोवर्धन-आकृति गाय के ताज़े गोबर से, सजावट प्राकृतिक (फूल-घास-गन्ना)
- गाय-बैल को इस दिन विशेष सम्मान — नहलाना, सजाना, गुड़-चारा; गौशाला को दान
- अन्नकूट-प्रसाद खुले हाथ बाँटें — पड़ोसी, ज़रूरतमंद, गौशाला
- परिक्रमा जल की धार के साथ, सात बार, पूरे परिवार के साथ
- यदि अमावस्या दोपहर तक हो तो स्थानीय पंचांग से गोवर्धन-तिथि मिला लें
❌ क्या न करें
- गोवर्धन-आकृति पर पैर या उसे लाँघना नहीं; कूड़े में नहीं फेंकना
- अन्नकूट में प्याज़-लहसुन नहीं; भोग बिना लगाए खाना नहीं
- इस दिन गाय-बैल से काम कराना, उन्हें मारना-डाँटना — वर्जित
- प्रसाद लौटाना या फेंकना — अन्न का अपमान
- दीवाली की थकान में गाय-पूजा छोड़ देना — यही इस दिन का मूल है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गोवर्धन पूजा 2026 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा है — पंचांग-गणना से, दिल्ली की उदया-तिथि पर; अमावस्या अगर दोपहर तक चले तो कुछ पंचांग गोवर्धन-पूजा को अगले दिन रखते हैं — अपने स्थानीय पंचांग से मिला लें।
गोवर्धन पूजा का शुभ समय क्या है?
प्रतिपदा तिथि में सुबह (सूर्योदय के बाद) या अभिजित मुहूर्त में गोवर्धन-पूजा; अन्नकूट का भोग शाम को गोधूलि-बेला में — ऊपर दोनों समय (दिल्ली) दिए हैं।
अन्नकूट में 56 भोग ही क्यों?
कथा के अनुसार कृष्ण ने गोवर्धन उठाए सात दिन में आठ पहर × सात दिन = 56 बार भोजन नहीं किया, इसलिए 56 भोग। घर में जितने बन सकें उतने बनाएँ — भाव मुख्य है, गिनती नहीं।
गोबर न मिले तो गोवर्धन कैसे बनाएँ?
मिट्टी, आटे या गोबर के उपले से भी प्रतीक बना सकते हैं; या गोवर्धन-चित्र/गोवर्धन-शिला (मथुरा से लाई) की पूजा। शहरों में गौशाला से थोड़ा गोबर मिल जाता है।
गोवर्धन पूजा और बलि-प्रतिपदा एक ही दिन क्यों?
दोनों कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को हैं — उत्तर-पश्चिम भारत में गोवर्धन-अन्नकूट और महाराष्ट्र-दक्षिण में राजा बलि का धरती पर आगमन; गुजरात में यही नया साल है।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
यह भी पढ़ें: दीपावली (एक दिन पहले) · भाई दूज (अगला दिन) · छठ पूजा · कृष्ण-आरती
⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। प्रतिपदा की तिथि अमावस्या की अवधि से एक दिन बदल सकती है — स्थानीय पंचांग से मिला लें।
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