Nakshtra Takकुंडलीराशिफलपंचांगमिलानज्ञानग्रह-फलज्योतिषीStore
🪔 व्रत-त्योहार

🦚 कृष्ण जन्माष्टमी 2027

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी — श्रीकृष्ण का जन्म मध्य-रात्रि (निशीथ) में, रोहिणी नक्षत्र; दिन-भर व्रत, रात 12 बजे जन्म-आरती, पालना, धनिया-पंजीरी, माखन-मिश्री; अगले दिन दही-हांडी/नंदोत्सव।

कृष्ण जन्माष्टमी 2027 की तिथि
बुधवार, 25 अगस्त 2027
भाद्रपद · कृष्ण पक्ष · अष्टमी (विक्रम संवत 2084)
🌌 निशीथ काल12:01 AM – 12:45 AM
🪔 प्रदोष काल6:51 PM – 9:15 PM
🌇 सूर्यास्त6:51 PM
📿 तिथि-कालअष्टमी 24 अगस्त, 8:25 PM → 25 अगस्त, 7:20 PM
🌙 चंद्रोदय11:37 PM
⛔ राहुकाल (टालें)12:23 PM – 02:00 PM
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है — रक्षाबंधन के आठ दिन बाद। मथुरा के कारागार में देवकी-वसुदेव के घर, रोहिणी नक्षत्र में, मध्य-रात्रि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्म हुआ — इसलिए व्रत पूरे दिन और जन्म-आरती ठीक रात 12 बजे (निशीथ-काल, ऊपर समय)।

घर की स्त्रियाँ दिन-भर व्रत रखती हैं (फलाहार/निर्जला), शाम को झाँकी-पालना सजाती हैं, रात 12 बजे बाल-गोपाल (लड्डू गोपाल) को पंचामृत-स्नान, नए वस्त्र, पालने में झुलाकर जन्म-आरती करती हैं और धनिया-पंजीरी, माखन-मिश्री का भोग लगाती हैं; अगले दिन नंदोत्सव/दही-हांडी। स्मार्त (अष्टमी) और वैष्णव (रोहिणी-युक्त, अगला दिन) की तिथि कभी-कभी अलग होती है — नीचे समझाया है। नीचे इस साल की तिथि, निशीथ-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत।

महत्व — यह व्रत क्यों

जन्म-मुहूर्त: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी + रोहिणी नक्षत्र + मध्य-रात्रि + वृषभ का चंद्रमा — यह «जयंती-योग» जब पूरा मिले, दुर्लभ; स्मार्त-परंपरा (गृहस्थ) अष्टमी-तिथि जिस रात निशीथ में हो वह दिन, वैष्णव-संप्रदाय (मंदिर/इस्कॉन/ब्रज) रोहिणी-युक्त उदया-तिथि — इसलिए कई वर्षों में दो दिन: गृहस्थ पहला दिन, मंदिर दूसरा; ऊपर की तिथि स्मार्त-नियम से (निशीथ-व्यापिनी अष्टमी)।

व्रत अष्टमी को सूर्योदय से रात 12 बजे जन्म तक (या नवमी के सूर्योदय तक — कठोर रूप); पारण जन्म के बाद रात में या नवमी की सुबह — रोहिणी/अष्टमी समाप्ति के बाद। यह संतान-प्राप्ति व संतान के मंगल का व्रत भी माना गया — बाल-गोपाल की सेवा माँ-भाव से।

मथुरा-वृंदावन में जन्मभूमि-द्वारकाधीश-बाँके-बिहारी की मंगला-आरती (साल में इसी रात), महाराष्ट्र-गुजरात में दही-हांडी (गोविंदा), दक्षिण में गोकुलाष्टमी (कृष्ण के छोटे पैरों के छापे), ओडिशा-बंगाल में «जन्माष्टमी/नंद-उत्सव» — पूरा देश एक रात जागता है।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

यह घरेलू विधि है — दिन का व्रत व झाँकी-तैयारी, रात 12 बजे जन्म-आरती, अगले दिन नंदोत्सव व पारण।

  1. सुबह स्नान, संकल्प — «मैं श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी का व्रत परिवार-कल्याण/संतान-सुख हेतु करती हूँ, जन्म के बाद पारण करूँगी»; दिन में फलाहार या निर्जला (सामर्थ्य से); घर की सफ़ाई, मंदिर की सजावट।
  2. झाँकी: बाल-कृष्ण की लीलाएँ — मिट्टी/खिलौनों से गोकुल, यमुना, कंस-कारागार, गाय-ग्वाल; पालना (झूला) फूलों-लड़ी से; लड्डू गोपाल के लिए नए वस्त्र-मुकुट-बाँसुरी-मोर-पंख; कलश; पूजा-स्थान पर लाल/पीला कपड़ा।
  3. शाम (प्रदोष): बाल-गोपाल/कृष्ण-चित्र की पूजा — रोली-चंदन-अक्षत, तुलसी-दल, फूल-माला, धूप-दीप; भागवत (दशम स्कंध — जन्म-प्रसंग) या «कृष्ण-जन्म» कथा (नीचे), भजन-कीर्तन («नंद के आनंद भयो»); बच्चों को कृष्ण-राधा बनाना।
  4. रात 12 बजे (निशीथ — ऊपर समय) जन्म: शंख-घंटा-थाली; लड्डू गोपाल को पंचामृत (दूध-दही-घी-शहद-शक्कर) से स्नान, फिर गंगाजल; पोंछकर नए वस्त्र, मुकुट, तिलक, काजल की बिंदी; पालने में लिटाकर झुलाना — «जय कन्हैया लाल की»; जन्म-आरती «आरती कुंजबिहारी की»; भोग — धनिया-पंजीरी, माखन-मिश्री, पंचामृत, खीरा (खीरे को काटकर «नाल-छेदन» — कृष्ण को गर्भ से अलग करने का प्रतीक, कई घर), फल, मेवे।
  5. पारण: जन्म-आरती के बाद पंचामृत-पंजीरी से (गृहस्थ-रीत) या नवमी की सुबह अष्टमी/रोहिणी समाप्त होने पर; कठोर व्रती नवमी सूर्योदय के बाद; पहले प्रसाद, फिर हल्का भोजन।
  6. अगला दिन — नंदोत्सव/दही-हांडी: सुबह «नंद के घर आनंद» — गोकुल में नंद-यशोदा को बधाई की झाँकी, हल्दी-दही-मक्खन छिड़कना (मथुरा में «दधिकांदो»), मिठाई-बाँटना; दही-हांडी (महाराष्ट्र-गुजरात — गोविंदा-टोलियाँ); बाल-गोपाल को छप्पन भोग (हो सके तो)।
  7. व्रत-दिन: दिन में सोना नहीं, तामसिक नहीं, गाय की सेवा (चारा-गुड़), बच्चों को माखन-मिश्री; रात-जागरण के बाद अगले दिन विश्राम।
  8. संतान-कामना वाले: लड्डू गोपाल को इस रात घर लाकर माँ-भाव से सेवा का संकल्प (झूला, भोग, स्नान रोज़) — संतान गोपाल मंत्र।

पूजा-सामग्री की सूची

लड्डू गोपाल, पालना, पंचामृत, पंजीरी, माखन-मिश्री, खीरा — जन्माष्टमी की पहचान।

  • लड्डू गोपाल (बाल-कृष्ण की मूर्ति) या कृष्ण-चित्र/राधा-कृष्ण, पालना/झूला, चौकी, लाल-पीला कपड़ा
  • बाल-गोपाल के नए वस्त्र, मुकुट, मोर-पंख, बाँसुरी, कंगन, काजल, फूल-माला, वैजयंती-माला
  • पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद, शक्कर; गंगाजल, तुलसी-दल, केसर, इत्र
  • रोली, चंदन, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, मौली, कलश, नारियल, आम के पत्ते
  • भोग: धनिया-पंजीरी, माखन-मिश्री, खीरा (साबुत, डंठल सहित), फल (केला-सेब-अनार), मेवे, पेड़ा, खीर, छप्पन भोग (हो सके तो)
  • झाँकी: मिट्टी/खिलौने (गाय-ग्वाल-यमुना-कंस-वसुदेव), फूल-लड़ी, बिजली-लड़ी, रंगोली
  • दीपक, घी, धूप, कपूर, शंख, घंटी, आरती-थाली
  • भागवत (दशम स्कंध)/कृष्ण-जन्म कथा, भजन-पुस्तक; संतान गोपाल मंत्र
  • दही-हांडी: मिट्टी की हांडी, दही-माखन-मुरमुरे, रस्सी (नंदोत्सव)

🛍 पूजा-सामग्री व यंत्र देखें 🙏 पूजा बुक करें

📅 अपने शहर का पंचांग

सूर्योदय, चंद्रोदय, राहुकाल व चौघड़िया — आपके शहर के सटीक समय से, निःशुल्क।

पंचांग देखें →

व्रत-कथा

मथुरा के अत्याचारी राजा कंस को आकाशवाणी हुई — «तेरी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र तेरा वध करेगा»। कंस ने देवकी-वसुदेव को कारागार में डाला और छह पुत्रों को जन्मते ही मार डाला; सातवाँ (बलराम) योगमाया द्वारा रोहिणी के गर्भ में गया। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, मध्य-रात्रि — घनघोर वर्षा-अंधकार में देवकी के गर्भ से चतुर्भुज विष्णु प्रकट हुए, फिर बालक बने।

कारागार के ताले खुले, पहरेदार सोए; वसुदेव बालक को सूप में रखकर उफनती यमुना पार गए — शेषनाग ने फन से छाया की, यमुना ने चरण छूकर रास्ता दिया। गोकुल में नंद-यशोदा के घर यशोदा की नवजात कन्या (योगमाया) से बदलकर लौटे। कंस ने कन्या को पटका — वह आकाश में जाकर बोली «तेरा काल गोकुल में पल रहा है»। सुबह गोकुल में नंद-उत्सव — दही-माखन की बौछार।

वही बालक माखन-चोर, गोवर्धन-धारी, कालिया-मर्दन, रास-रचैया, कंस-हंता, गीता-उपदेशक — पूर्णावतार। जन्माष्टमी उस जन्म की रात है जिसने अंधकार में आशा दी — «यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति…»; इसीलिए यह रात जागरण, जन्म-आरती और आनंद की।

धनिया-पंजीरी, माखन-मिश्री, छप्पन भोग — कान्हा की रसोई

जन्माष्टमी का मुख्य प्रसाद धनिया-पंजीरी (जच्चा-प्रसूता को दिया जाने वाला पौष्टिक चूर्ण — माँ देवकी/यशोदा के लिए), माखन-मिश्री (माखनचोर का प्रिय), पंचामृत, खीरा; ब्रज में छप्पन भोग। व्रत में फलाहार (साबूदाना-कुट्टू-फल), पारण पंचामृत-पंजीरी से।

  • धनिया-पंजीरी: 1 कप सूखा धनिया पाउडर 2 चम्मच घी में हल्का भूनें; मखाने-बादाम-काजू-किशमिश, कद्दूकस नारियल, पिसी शक्कर/बूरा, इलायची — ठंडा; पहला भोग जन्म पर
  • माखन-मिश्री (सफ़ेद मक्खन + मिश्री + तुलसी), पंचामृत (दूध-दही-घी-शहद-शक्कर + तुलसी-केसर), खीरा (डंठल सहित — नाल-छेदन)
  • छप्पन भोग (ब्रज/मंदिर): खीर, रबड़ी, मालपुआ, लड्डू, पेड़ा, मठरी, कचौड़ी, पूड़ी-सब्ज़ी, चटनी, अचार, फल-मेवे… — घर पर 5-11 व्यंजन भी पर्याप्त
  • व्रत-भोजन: साबूदाना खिचड़ी/वड़ा, कुट्टू-सिंघाड़े की पूड़ी, आलू, दही, फल, मखाना-खीर, दूध-मेवे; सेंधा नमक
  • नंदोत्सव/दही-हांडी: दही-चूड़ा, माखन-मुरमुरे, मिठाई; महाराष्ट्र में गोपालकाला (दही-चिवड़ा-खीरा-अनार का मिश्रण); दक्षिण में सीडई-मुरुक्कू-वेल्ला अवल-अप्पम (गोकुलाष्टमी)

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

मथुरा की जन्म-रात, मुंबई की दही-हांडी, दक्षिण के छोटे पैर — कान्हा हर घर के।

ब्रज (मथुरा-वृंदावन-गोकुल-बरसाना): कृष्ण-जन्मभूमि (मथुरा) में रात 12 बजे जन्म-अभिषेक (दूध-दही-घी-शहद), द्वारकाधीश की झाँकी, बाँके-बिहारी की साल में एक बार की मंगला-आरती (भोर 2 बजे), गोकुल में अगले दिन नंदोत्सव-दधिकांदो (दही-हल्दी की कीचड़-होली); पूरे ब्रज में झाँकियाँ, रास-लीला मंडलियाँ; हज़ारों घरों में लड्डू गोपाल का जन्म।
उत्तर प्रदेश-बिहार-मध्य प्रदेश-राजस्थान: घर-घर झाँकी, रात 12 की आरती, पंजीरी-पंचामृत; बिहार-मिथिला में «कृष्णाष्टमी» पर बच्चों की कृष्ण-वेशभूषा, दही-चूड़ा; राजस्थान में नाथद्वारा (श्रीनाथजी) का जन्मोत्सव, जयपुर गोविंददेवजी; मप्र में उज्जैन-सांदीपनि आश्रम; दिल्ली-हरियाणा में इस्कॉन-बिड़ला मंदिर की झाँकी व लाखों भक्त।
महाराष्ट्र-गुजरात-गोवा (दही-हांडी): «गोकुळाष्टमी» — रात जन्म-कीर्तन; अगले दिन «दही-हांडी/गोविंदा» — ऊँची हांडी, मानव-पिरामिड, गोपालकाला-प्रसाद (मुंबई-ठाणे-पुणे); गुजरात में द्वारका-डाकोर के मंदिरों में जन्मोत्सव, «मटकी-फोड़», सूरत-बड़ौदा की झाँकियाँ; गोवा में «अष्टमी» पर घर-झाँकी।
तमिलनाडु-कर्नाटक-आंध्र-केरल: «गोकुलाष्टमी/श्री जयंती» — घर के द्वार से पूजा-कक्ष तक चावल-आटे से बाल-कृष्ण के छोटे पैरों के छापे (कृष्ण घर में आए), सीडई-मुरुक्कू-वेल्ला अवल-अप्पम-थट्टई का नैवेद्य, मक्खन; उडुपी (कर्नाटक) का कृष्ण-मठ व «मोसरु कुडिके» (दही-हांडी), विट्टल-पिंडी; केरल में गुरुवायूर का उत्सव, «उरियडी»; तमिल स्मार्त रोहिणी को «श्री जयंती»।
बंगाल-ओडिशा-असम-मणिपुर: «जन्माष्टमी» — नवद्वीप-मायापुर (इस्कॉन) का महा-उत्सव, बंगाल में «नंद-उत्सव» अगले दिन (दही-हल्दी); ओडिशा में पुरी-जगन्नाथ (कृष्ण ही जगन्नाथ) में जन्म-नीति; मणिपुर में «कृष्ण जन्म» पर रास-नृत्य; असम में «जन्माष्टमी» नामघरों में।
पंजाब-हरियाणा-दिल्ली-हिमाचल: मंदिरों में झाँकी-प्रतियोगिता, रात 12 की आरती, «कृष्ण-कन्हैया» झाँकियों में बच्चे; हरियाणा-कुरुक्षेत्र में गीता-स्थली पर उत्सव; हिमाचल में «जन्माष्टमी/भद्रपद अष्टमी» मंदिर-मेले; दिल्ली के लक्ष्मीनारायण (बिड़ला) व इस्कॉन में रात-भर भीड़।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • जन्म-आरती ठीक रात 12 बजे (निशीथ — ऊपर समय); पंचामृत-स्नान, नए वस्त्र, पालना
  • धनिया-पंजीरी व माखन-मिश्री का भोग; तुलसी ज़रूर (कृष्ण को प्रिय)
  • स्मार्त-वैष्णव तिथि-भेद हो तो घर में गृहस्थ-तिथि, मंदिर की अपनी — दोनों सही
  • अगले दिन नंदोत्सव — बधाई, मिठाई, गाय की सेवा; बच्चों को झाँकी में
  • पारण जन्म के बाद या नवमी सुबह — ऊपर तिथि-खिड़की

❌ क्या न करें

  • जन्म से पहले (रात 12 से पहले) व्रत नहीं खोलना; निर्जला गर्भवती/रोगी नहीं — फलाहार
  • बाल-गोपाल को तुलसी-रहित भोग नहीं; प्याज़-लहसुन-तामसिक भोजन नहीं
  • दही-हांडी में असुरक्षित पिरामिड/बच्चे ऊपर — दुर्घटनाएँ; नियम मानें
  • झाँकी-सजावट में प्लास्टिक-थर्मोकोल; रात-भर तेज़ लाउडस्पीकर पड़ोस में
  • व्रत-दिन बाल-नाख़ून, कलह, दिन में सोना

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जन्माष्टमी 2027 में कब है — एक दिन या दो?

ऊपर दी गई तिथि स्मार्त-नियम (जिस रात निशीथ में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी हो) से है — गृहस्थों के लिए; निशीथ-मुहूर्त (दिल्ली) भी वहीं। जिस साल अष्टमी और रोहिणी अलग दिन पड़ें, वैष्णव-मंदिर (इस्कॉन/ब्रज के कुछ) अगले दिन मनाते हैं — घर में ऊपर की तिथि, मंदिर-उत्सव उनकी घोषणा से; दोनों सही।

जन्म-आरती ठीक 12 बजे ही क्यों?

कृष्ण का जन्म मध्य-रात्रि (निशीथ-काल — रात का मध्य बिंदु, ऊपर सटीक समय) में हुआ; लोक-रीत में घड़ी के 12 बजे; निशीथ शहर के सूर्यास्त-सूर्योदय से 12:00-12:30 के बीच पड़ता है — ऊपर देखें।

व्रत का पारण कब?

गृहस्थ-रीत में रात 12 बजे जन्म-आरती के बाद पंचामृत-पंजीरी से; शास्त्रीय (कठोर) रीत में नवमी को सूर्योदय के बाद, अष्टमी/रोहिणी समाप्त होने पर — ऊपर तिथि-खिड़की। बीमार/गर्भवती फलाहार रखें।

खीरा क्यों काटते हैं?

जन्म के समय डंठल वाले खीरे को बीच से काटकर (सिक्के से) बाल-गोपाल को माँ के गर्भ (नाल) से अलग करने का प्रतीक — «नाल-छेदन»; खीरा गर्भ, डंठल नाल; उत्तर-भारतीय लोक-रीत; फिर खीरा प्रसाद।

संतान-प्राप्ति के लिए जन्माष्टमी?

जन्माष्टमी को लड्डू गोपाल घर लाकर माँ-भाव से सेवा (रोज़ स्नान, भोग, झूला) का संकल्प और संतान गोपाल मंत्र — संतान-सुख का उपाय माना गया; पौष/श्रावण पुत्रदा एकादशी भी; चिकित्सा साथ रखें।

दही-हांडी कब और क्यों?

जन्माष्टमी के अगले दिन (नंदोत्सव) — माखनचोर कृष्ण की ऊँची टँगी मटकी फोड़ने की लीला; महाराष्ट्र-गुजरात में गोविंदा-टोलियाँ मानव-पिरामिड से हांडी फोड़ती हैं, प्रसाद गोपालकाला; सुरक्षा-नियम (ऊँचाई, बच्चे) मानें।

🔔 याद दिलाएँ — हर व्रत से एक दिन पहले

अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।

संदेश Nakshtra Tak की ओर से आएगा; नंबर किसी और को नहीं दिया जाता।

📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें

यह भी पढ़ें: रक्षाबंधन (8 दिन पहले) · कजरी तीज (5 दिन पहले) · हरतालिका तीज (10 दिन बाद) · कृष्ण-आरती व भजन

⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व मंदिर की रीत सर्वोपरि है। स्मार्त-वैष्णव तिथि-भेद हो तो अपने पंडित/मंदिर से मिला लें; दही-हांडी में सुरक्षा सर्वोपरि।

🌐 Read this page in English · ← सभी व्रत-त्योहार · पूरा पर्व-कैलेंडर