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🪔 व्रत-त्योहार

🌼 ललिता सप्तमी 2027

✍️ ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी · 🔎 अंतिम समीक्षा: · 🧮 गणना-पद्धति

भाद्रपद शुक्ल सप्तमी — राधाष्टमी से एक दिन पहले: राधा की प्रधान सखी ललिता (अष्टसखी) का जन्मोत्सव (ऊँचागाँव, बरसाना); साथ ही उत्तर-बिहार-बंगाल में «ललही/ललिता सप्तमी» का स्त्री-व्रत — संतान-सुख, सौभाग्य; तिथि, विधि, कथा व रीत।

ललिता सप्तमी 2027 की तिथि
मंगलवार, 7 सितंबर 2027
भाद्रपद · शुक्ल पक्ष · सप्तमी (विक्रम संवत 2084)
🌅 सूर्योदय6:02 AM
⭐ अभिजित मुहूर्त11:55 AM – 12:43 PM
📿 तिथि-कालसप्तमी 6 सितंबर, 10:58 AM → 7 सितंबर, 11:28 AM
🪔 प्रदोष काल6:36 PM – 9:00 PM
⛔ राहुकाल (टालें)03:27 PM – 05:01 PM
समय दिल्ली (IST) के, Swiss Ephemeris-गणना, उदया-तिथि नियम। चंद्रोदय/सूर्योदय हर शहर में अलग होता है —

**ललिता सप्तमी** भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को — राधाष्टमी के ठीक एक दिन पहले — राधारानी की प्रधान सखी **ललिता देवी** (अष्टसखियों में प्रथम, राधा से एक दिन बड़ी) के प्राकट्य का उत्सव है। बरसाना के पास ऊँचागाँव (ललिता का जन्म-गाँव) व वृंदावन-बरसाना के मंदिरों में इस दिन ललिता-सखी का अभिषेक-श्रृंगार, राधाष्टमी की तैयारी और «ललिता-राधा» की झाँकियाँ होती हैं; गौड़ीय-वैष्णव व इस्कॉन में «ललिता सप्तमी» का उपवास व कीर्तन।

घरों में यह दिन राधाष्टमी की पूर्व-संध्या है — सुहागिनें ललिता-राधा की पूजा, सोलह श्रृंगार, सखी-भाव के भजन; पूर्वांचल-बिहार-बंगाल के कुछ इलाक़ों में भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को «ललिता/ललही सप्तमी» का स्त्री-व्रत (संतान-सुख, सौभाग्य) भी है — अलग-अलग नाम, एक तिथि। ऊपर तिथि-मुहूर्त; नीचे विधि, सामग्री, ललिता-कथा, भोग, इलाक़ों की रीत व सवाल।

महत्व — यह व्रत क्यों

ललिता सखी: राधा की अष्टसखियों (ललिता, विशाखा, चित्रा, इंदुलेखा, चंपकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या, सुदेवी) में प्रधान — राधा-कृष्ण की लीला की संयोजिका, «सखी-भाव» की आदर्श; वैष्णव-मत में ललिता की कृपा बिना राधा-कृष्ण की सेवा नहीं मिलती; भाद्रपद शुक्ल सप्तमी, ऊँचागाँव (बरसाना से 4 किमी) में जन्म।

राधाष्टमी की पूर्व-संध्या: ललिता राधा से एक दिन बड़ी (लोक-मान्यता) — इसलिए राधाष्टमी से एक दिन पहले उनका जन्मोत्सव; ब्रज में दोनों दिन एक उत्सव-श्रृंखला; गौड़ीय मठों में इस दिन उपवास (एकादशी-सा) व राधाष्टमी की तैयारी।

स्त्री-व्रत (ललिता/ललही सप्तमी): पूर्वांचल-बिहार-बंगाल में सुहागिनें सप्तमी को ललिता देवी (शक्ति-रूपा/सखी-रूपा) की पूजा — संतान-सुख, सौभाग्य, राधा-कृपा; कुछ स्थानों पर इसे «संतान सप्तमी» से जोड़ा जाता है (भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को «संतान सप्तमी/मुक्ताभरण सप्तमी» — शिव-पार्वती पूजा, संतान-रक्षा का व्रत, गुजरात-महाराष्ट्र-UP)।

सप्तमी-देवी: सप्तमी सूर्य की तिथि — कुछ घर इस दिन सूर्य-अर्घ्य व शिव-पार्वती-पूजा जोड़ते हैं; ललिता त्रिपुरसुंदरी (ललिता महात्रिपुरसुंदरी) का नाम-साम्य — पर यह ललिता-सखी का पर्व है; ललिता-पंचमी (आश्विन) देवी का, अलग।

पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)

ललिता सप्तमी की घरेलू विधि — सुबह पूजा-संकल्प, दिन में फलाहार/एक समय, शाम ललिता-राधा-कृष्ण की आरती व राधाष्टमी की तैयारी; संतान सप्तमी की रीत हो तो शिव-पार्वती-पूजा साथ।

  1. सुबह: स्नान, स्वच्छ वस्त्र (गुलाबी/पीला/हरा); पूजा-स्थान पर राधा-कृष्ण की मूर्ति/चित्र, बगल में ललिता सखी का चित्र (हो तो — राधा के बाईं ओर) या अष्टसखी-चित्र; कलश, फूलों की सजावट।
  2. संकल्प: «मैं (नाम) ललिता सप्तमी का व्रत (सखी-भाव/संतान-सुख/सौभाग्य) हेतु रखती हूँ; कल राधाष्टमी» — जल छोड़ें।
  3. ललिता-पूजा: ललिता सखी को गुलाबी-पीले वस्त्र, फूल-माला (चमेली-गुलाब), चंदन-केसर, सोलह श्रृंगार-सामग्री (चूड़ी-बिंदी-सिंदूर-मेहँदी — सुहागिनें), इत्र; «ॐ श्री ललितायै नमः» / «ललिता-सखी की जय»; राधा-कृष्ण को माखन-मिश्री-फल; ललिता-अष्टक/अष्टसखी-स्तुति (हो सके तो)।
  4. सखी-भाव: राधा-कृष्ण की सेवा में सहायक बनने की प्रार्थना — «ललिते! राधा-माधव की सेवा में जगह दो»; भजन-कीर्तन («ललिता-सखी की जय», «राधे-राधे»); घर की कन्याएँ-सहेलियाँ साथ बैठकर पूजा (सखी-मंडल की रीत)।
  5. संतान सप्तमी (जहाँ रीत हो): शिव-पार्वती की पूजा — दूध-भात/खीर-पूरी का भोग, संतान के नाम का कच्चा सूत/धागा (मुक्ता-भरण) हाथ में बाँधना, कथा (राजा नहुष-चंद्रमुखी), सूर्य-अर्घ्य; व्रत निराहार/फलाहार, एक समय नमक-रहित।
  6. भोग: माखन-मिश्री, खीर, फल, पेड़ा, मालपुआ (कुछ), पंचामृत, तुलसी-दल (कृष्ण); ललिता-सखी को गुलाब-चमेली व मिठाई; आरती (राधा-कृष्ण + ललिता-सखी की जय)।
  7. शाम: संध्या-आरती, दीप, कीर्तन; राधाष्टमी की तैयारी — कल के अभिषेक की सामग्री, राधा के नए वस्त्र, अरबी-पूरी; फलाहार; पारण अगले दिन (राधाष्टमी का व्रत जोड़ना हो तो दो-दिन व्रत — सामर्थ्य से)।
  8. ब्रज-यात्रा (संभव हो): ऊँचागाँव के ललिता-मंदिर व बरसाना में दर्शन, ललिता-कुंड; न हो तो घर पर वही भाव से सखी-पूजा।

पूजा-सामग्री की सूची

ललिता सखी व राधा-कृष्ण की पूजा, सोलह श्रृंगार, माखन-मिश्री-खीर — ललिता सप्तमी की सादी सूची; संतान सप्तमी की रीत हो तो कच्चा सूत-दूध-भात।

  • राधा-कृष्ण की मूर्ति/चित्र, ललिता सखी/अष्टसखी का चित्र (हो तो), चौकी, गुलाबी-पीला कपड़ा, कलश, फूल-सजावट
  • श्रृंगार: गुलाबी-पीले वस्त्र, चमेली-गुलाब की माला, चंदन-केसर, सुहाग-सामग्री (चूड़ी-बिंदी-सिंदूर-मेहँदी-आलता), इत्र-गुलाब-जल
  • पूजन: रोली, अक्षत, धूप, घी-दीप, कपूर, आरती-थाली, घंटी, पान-सुपारी, तुलसी-दल (कृष्ण), पंचामृत
  • भोग: माखन-मिश्री, खीर, पेड़ा, मालपुआ, फल (केला-सेब-अनार), मेवा; ललिता-सखी को गुलाब-जल की मिठाई/लड्डू
  • पाठ: ललिता-अष्टक/अष्टसखी-स्तुति, राधा-कृपा-कटाक्ष स्तोत्र, भजन-पुस्तिका, «राधे-राधे» माला (तुलसी)
  • संतान सप्तमी (जहाँ रीत): शिव-पार्वती चित्र, कच्चा सूत/धागा (संतान की संख्या से गाँठ), दूध-भात/खीर-पूरी, सूर्य-अर्घ्य का लोटा, कथा-पुस्तिका
  • कल के लिए (राधाष्टमी): अभिषेक-सामग्री, राधा के नए वस्त्र, अरबी, पूरी-खीर की सामग्री

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व्रत-कथा

ललिता-सखी की कथा: गोलोक में ललिता राधा की सबसे प्रिय सखी — राधा की सेवा, श्रृंगार, संदेश और मान-लीला की सूत्रधार; कृष्ण से राधा की ओर से मान करने वाली, राधा से एक दिन बड़ी। ब्रज-अवतार में वे भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को ऊँचागाँव (बरसाना के पास) में विशोक व शारदा (लोक-नाम) की पुत्री रूप में प्रकट हुईं; अगले दिन राधा का जन्म — इसलिए दोनों उत्सव साथ। रूप-गोस्वामी (राधा-कृष्ण-गणोद्देश-दीपिका) में ललिता का वर्णन — गौर-वर्ण, मयूर-पंख जैसा वस्त्र, स्वभाव में तेज-वाक्पटु, राधा के हर सुख-दुःख की साथी; वैष्णव-साधना में «ललिता की दासी» बनना राधा-सेवा का द्वार।

लोक-कथा (ललिता-कुंड): एक बार राधा को कृष्ण से मान (रूठना) हुआ; ललिता ने कृष्ण को समझाया कि राधा का मान भी प्रेम है, और युगल को मिलाया — तभी से ललिता «युगल-मिलन» की सखी; ऊँचागाँव का ललिता-कुंड उसी लीला का स्थान माना जाता है; सुहागिनें ललिता से दांपत्य में मेल-मिलाप की प्रार्थना करती हैं।

संतान सप्तमी की कथा (जहाँ यह व्रत जुड़ा है): राजा नहुष व रानी चंद्रमुखी निःसंतान थे; ब्राह्मणी रूपवती से भाद्रपद शुक्ल सप्तमी के संतान-सप्तमी व्रत (शिव-पार्वती पूजा, कच्चे सूत का मुक्ताभरण, दूध-भात-खीर) की विधि जानी — पर व्रत पूरा न कर सकीं; अगले जन्म में देवी की कृपा से विधि याद आई, व्रत किया और संतान-सुख पाया — इसलिए माताएँ संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं।

माखन-मिश्री, खीर, पेड़ा, फल; संतान सप्तमी में दूध-भात/खीर-पूरी (नमक-रहित)

ललिता सप्तमी का भोग सादा-वैष्णव — माखन-मिश्री, खीर, पेड़ा, फल, पंचामृत; व्रती दिन में फलाहार या एक समय (राधाष्टमी की तरह); संतान सप्तमी की रीत में दूध-भात/खीर-पूरी का नमक-रहित एक समय भोजन; प्याज़-लहसुन-माँस नहीं।

  • भोग: माखन-मिश्री, चावल-खीर, पेड़ा, मालपुआ (कुछ घर), पंचामृत, तुलसी-दल (कृष्ण), फल (केला-सेब-अनार), मेवा; ललिता-सखी को गुलाब-जल की बर्फ़ी/लड्डू
  • फलाहार (व्रती): फल, दूध, साबूदाना, मखाना-खीर, सिंघाड़े का हलवा; या एक समय सात्विक भोजन — घर की रीत
  • संतान सप्तमी (रीत हो तो): दूध-भात (चावल-दूध-चीनी) या खीर-पूरी — नमक-रहित एक समय; प्रसाद बच्चों को पहले
  • कल की तैयारी: अरबी की सब्ज़ी-पूरी, खीर, मालपुआ (राधाष्टमी)
  • वर्जित: प्याज़-लहसुन-माँस-मद्य, बासी भोग, व्रती को अन्न (फलाहार-रीत में)

अलग-अलग इलाक़ों की रीत

ब्रज का ललिता-सखी उत्सव, गौड़ीय-वैष्णव व इस्कॉन का उपवास, पूर्वांचल-बिहार-बंगाल का स्त्री-व्रत और गुजरात-महाराष्ट्र की संतान सप्तमी — एक तिथि, कई रीत।

ऊँचागाँव-बरसाना-वृंदावन (ब्रज): ऊँचागाँव के ललिता-मंदिर व ललिता-कुंड पर जन्मोत्सव — अभिषेक, बधाई, झाँकी; बरसाना में लाड़लीजी के साथ ललिता-सखी का श्रृंगार, राधाष्टमी की पूर्व-संध्या का मेला; वृंदावन में अष्टसखी-मंदिर, राधावल्लभ-राधारमण में ललिता-सप्तमी की झाँकी; भक्त दोनों दिन ब्रज में रहते हैं।
बंगाल-ओडिशा (गौड़ीय-वैष्णव, इस्कॉन): «ललिता सप्तमी» का उपवास (एकादशी-सा, अन्न-त्याग), मायापुर-नवद्वीप में ललिता-सखी का अभिषेक व कीर्तन, «ललिता-राधा» भजन; ओडिशा में जगन्नाथ-मंदिर की सखी-परंपरा; अगले दिन राधाष्टमी का महोत्सव — दो-दिवसीय पर्व।
पूर्वांचल-बिहार (ललही/ललिता सप्तमी): कुछ इलाक़ों में भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को सुहागिनों का «ललिता/ललही सप्तमी» व्रत — देवी-पूजा, सोलह श्रृंगार, संतान-सुख की कामना, खीर-पूरी; ध्यान रहे — भाद्रपद कृष्ण षष्ठी की «ललही छठ» (हल षष्ठी) अलग पर्व है, नाम-साम्य से भ्रम न हो।
गुजरात-महाराष्ट्र-UP (संतान सप्तमी): भाद्रपद शुक्ल सप्तमी = «संतान सप्तमी / मुक्ताभरण सप्तमी» — शिव-पार्वती-पूजा, संतान के नाम से कच्चा सूत हाथ में, दूध-भात/खीर-पूरी नमक-रहित, नहुष-चंद्रमुखी की कथा; गुजरात में «संतान सातम» (ऋषि पंचमी के बाद), महाराष्ट्र में «मुक्ताभरण व्रत»; माताएँ संतान-रक्षा हेतु।
दक्षिण भारत: इस्कॉन/हरे-कृष्ण मंदिरों में ललिता-सप्तमी व राधाष्टमी का दो-दिवसीय उत्सव; परंपरागत घरों में यह तिथि कम प्रचलित — राधाष्टमी अधिक; कुछ स्थानों पर सप्तमी को सूर्य-पूजा।
🙏 आपके घर की रीत इससे अलग है? यहाँ लिखिए

दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।

हर भेजी रीत पहले पढ़ी जाती है — अश्लील/विज्ञापन/ग़लत बात नहीं जुड़ती।

क्या करें, क्या न करें

✅ क्या करें

  • राधाष्टमी से एक दिन पहले ललिता-सखी व राधा-कृष्ण की पूजा, सोलह श्रृंगार, सखी-भाव के भजन; कल की तैयारी
  • व्रत सामर्थ्य से — फलाहार/एक समय; गौड़ीय-रीत में अन्न-त्याग; दोनों दिन (ललिता+राधाष्टमी) रखें तो पारण राधाष्टमी के अगले दिन
  • संतान सप्तमी की रीत हो तो शिव-पार्वती-पूजा, कच्चा सूत, दूध-भात, कथा — संतान के नाम से
  • सुहागिनें/कन्याएँ ललिता से दांपत्य-मेल व मनचाहे साथी की प्रार्थना; सहेलियों के साथ सामूहिक पूजा (सखी-मंडल)
  • बीमार/गर्भवती: पूजा-भजन भर; बच्चों को प्रसाद पहले

❌ क्या न करें

  • ललिता सप्तमी (भाद्रपद शुक्ल 7, ललिता-सखी) को ललिता-पंचमी (आश्विन शुक्ल 5, देवी त्रिपुरसुंदरी) या ललही छठ (भाद्रपद कृष्ण 6, हल षष्ठी) समझना — तीनों अलग
  • प्याज़-लहसुन-माँस-मद्य; राधा-कृष्ण को बासी भोग; पूजा में कलह (सखी-भाव मेल का है)
  • दो-दिन के व्रत की कठोरता बीमार/गर्भवती पर; बच्चों को भूखा रखना
  • ललिता-सखी की उपेक्षा कर केवल राधा-कृष्ण — वैष्णव-मत में सखी-कृपा पहले
  • संतान सप्तमी का कच्चा सूत बिना संकल्प/नाम के; धागा टूटे तो घबराना — नया बाँधें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ललिता सप्तमी 2027 में कब है?

भाद्रपद शुक्ल सप्तमी — ऊपर तिथि (दिल्ली), राधाष्टमी से ठीक एक दिन पहले; तिथि-खिड़की ऊपर; पूजा सुबह-दोपहर (अभिजित), आरती शाम।

ललिता कौन हैं?

राधारानी की प्रधान सखी — अष्टसखियों में प्रथम, राधा से एक दिन बड़ी, राधा-कृष्ण की लीला की संयोजिका; ऊँचागाँव (बरसाना) उनका जन्म-स्थान; वैष्णव-साधना में ललिता की कृपा राधा-कृष्ण-सेवा का द्वार।

ललिता सप्तमी और राधाष्टमी साथ कैसे मनाएँ?

सप्तमी को ललिता-सखी व राधा-कृष्ण की पूजा, फलाहार, कल की तैयारी; अष्टमी को मध्याह्न अभिषेक, अरबी-पूरी-खीर, राधा-श्रृंगार; दोनों दिन व्रत रखें तो पारण अष्टमी के अगले दिन — सामर्थ्य से; ब्रज में दोनों दिन का मेला।

ललिता सप्तमी, ललिता पंचमी और ललही छठ में अंतर?

ललिता सप्तमी — भाद्रपद शुक्ल 7, राधा की सखी ललिता का जन्म; ललिता पंचमी — आश्विन शुक्ल 5 (नवरात्रि), देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी (उपांग ललिता व्रत); ललही छठ — भाद्रपद कृष्ण 6, हल षष्ठी (बलराम, संतान-व्रत); नाम मिलते-जुलते, पर्व अलग।

संतान सप्तमी क्या है — इसी दिन?

हाँ — भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को गुजरात-महाराष्ट्र-UP में «संतान सप्तमी/मुक्ताभरण सप्तमी»: शिव-पार्वती-पूजा, संतान के नाम का कच्चा सूत हाथ में, दूध-भात/खीर-पूरी नमक-रहित, नहुष-चंद्रमुखी कथा — माताओं का संतान-रक्षा व्रत; जिस घर की रीत हो वह साथ करें।

व्रत में क्या खाएँ?

फलाहार/एक समय सात्विक (माखन-मिश्री, खीर, फल); गौड़ीय-रीत में अन्न-त्याग (एकादशी-सा); संतान सप्तमी में दूध-भात/खीर-पूरी नमक-रहित; प्याज़-लहसुन-माँस नहीं।

पुरुष/बच्चे भी?

हाँ — वैष्णव-परंपरा में सब; बच्चों को ललिता-राधा के भजन-प्रसाद में जोड़ें; व्रत की कठोरता नहीं।

🔔 याद दिलाएँ — हर व्रत से एक दिन पहले

अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।

संदेश Nakshtra Tak की ओर से आएगा; नंबर किसी और को नहीं दिया जाता।

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⚠️ यह विवरण वैष्णव-परंपरा व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार, संप्रदाय व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। तिथि दिल्ली (IST) की उदया-तिथि से; नाम-साम्य वाले पर्व (ललिता पंचमी, ललही छठ) अलग हैं; स्वास्थ्य-स्थिति में व्रत न रखें।

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