🌊 गंगा दशहरा (व निर्जला एकादशी) 2027
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी — गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का दिन; दस पापों का नाश करने वाला गंगा-स्नान, दस दीप, दस दान; अगले दिन साल की सबसे कठिन निर्जला एकादशी।
- गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) — रविवार, 13 जून 2027
- निर्जला (भीमसेनी) एकादशी — अगला दिन — सोमवार, 14 जून 2027
गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है — वट सावित्री के दस दिन बाद, जून की भीषण गर्मी में। इसी दिन भगीरथ की तपस्या से गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरीं और शिव की जटाओं से होकर बहीं; «दशहरा» = दस (प्रकार के) पापों को हरने वाली — इस दिन गंगा-स्नान, दस दीप, दस वस्तुओं का दान।
ठीक अगले दिन ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी — निर्जला (भीमसेनी) एकादशी — साल की 24 एकादशियों का सार, बिना जल के व्रत; जो पूरे साल एकादशी न रख सके, यह एक रख ले। स्त्रियाँ दोनों दिन जल-दान (घड़े, प्याऊ, शरबत), पंखा-छाता-खरबूज़ा का दान करती हैं। नीचे इस साल की दोनों तिथियाँ, स्नान-मुहूर्त, विधि, सामग्री, कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
गंगावतरण — ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, हस्त नक्षत्र, बुधवार, व्यतीपात योग, गर-करण, आनंद-योग, कन्या का चंद्रमा, वृषभ का सूर्य — इन दस योगों में गंगा उतरीं (दशहरा-योग); इस दिन गंगा-स्नान से दस पाप (तीन कायिक, चार वाचिक, तीन मानसिक) नष्ट होते हैं — इसलिए दस दीप, दस फल, दस ब्राह्मण, दस डुबकी।
निर्जला एकादशी — व्यास जी ने भीम को बताया: एक यह एकादशी बिना जल रखो, सब एकादशियों का फल; सूर्योदय से अगले सूर्योदय (पारण) तक जल भी नहीं — इसलिए जल-दान (घड़ा, सुराही, शरबत) इस दिन का सबसे बड़ा पुण्य; ज्येष्ठ की गर्मी में व्रत कठिन — सामर्थ्य देखकर।
गंगा दशहरा से पहले के दस दिन (प्रतिपदा से दशमी) «गंगा-दशहरा-स्नान»; हरिद्वार-प्रयाग-वाराणसी-गढ़मुक्तेश्वर में मेले; घर पर गंगाजल से स्नान और «गंगा-स्तोत्र/गंगा-लहरी» मान्य; बिना गंगा-तट के भी नदी-तालाब-घर।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह घरेलू विधि है — दशमी को भोर-स्नान, दस दीप-दान, गंगा-पूजा; एकादशी को निर्जला व्रत और जल-दान, द्वादशी को पारण।
- दशमी को ब्रह्म-मुहूर्त (ऊपर समय) में गंगा/नदी/तालाब या घर में गंगाजल मिले जल से स्नान — दस डुबकी (या दस बार जल सिर पर), «ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः»; सूर्य को अर्घ्य।
- गंगा-पूजा: गंगा जी का चित्र/कलश में गंगाजल; रोली-चंदन-अक्षत, दस फूल (कमल/गेंदा), दस फल, दस दीप (आटे/मिट्टी के — घाट पर बहाएँ या घर के जल-पात्र में), धूप; शिव को (जटा से गंगा) जल-बेलपत्र; गंगा-स्तोत्र/«गंगा-लहरी»/गंगा-आरती «ॐ जय गंगे माता»।
- दस दान (दशहरा-दान): दस प्रकार की वस्तुएँ — जल-घड़ा, पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, खरबूज़ा-ककड़ी, अन्न, गुड़, वस्त्र, दक्षिणा — दस ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को (या दस-दस की संख्या में); प्याऊ लगाना; गौ-सेवा।
- व्रत (दशमी): फलाहार/एक समय; शाम को घाट/तुलसी-चौरे पर दस दीप; गंगा-कथा (नीचे) सुनें; पितरों को गंगाजल-तर्पण (पितृ-तृप्ति) — गंगा दशहरा पितरों के लिए भी।
- एकादशी — निर्जला: दशमी की शाम से जल त्यागें (अंतिम बार पूजा के बाद); एकादशी को सूर्योदय से पहले स्नान, संकल्प «निर्जला एकादशी का व्रत बिना जल»; विष्णु-पूजा (तुलसी, पीले फूल, पंचामृत), «ॐ नमो भगवते वासुदेवाय», विष्णु-सहस्रनाम; दिन-भर जल नहीं (आचमन/कुल्ला मान्य); ठंडी जगह विश्राम, भजन।
- एकादशी का दान: जल-भरे घड़े (मिट्टी के, ढक्कन-आम के पत्ते सहित), शरबत/छाछ की प्याऊ, पंखा, छाता, खरबूज़ा, सत्तू, तिल-जल — «जल-दान» सर्वोपरि; गाय को हरा चारा-पानी; पक्षियों के सकोरे।
- रात्रि-जागरण (कर सकें तो) — विष्णु-भजन; द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि-वासर बीतने पर पारण — पहले तुलसी-जल, फिर ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को भोजन-जल, फिर स्वयं (हल्का — खिचड़ी/दलिया)।
- गर्भवती, रोगी, बुज़ुर्ग: निर्जला नहीं — फल-जल के साथ एकादशी; भाव मुख्य। गंगा दशहरा पर घाट की भीड़-गर्मी में सावधानी।
पूजा-सामग्री की सूची
गंगाजल, दस दीप, दस फल और जल-दान के घड़े — दोनों दिनों की मुख्य सामग्री।
- गंगाजल, ताँबे का लोटा, कलश (गंगा-पूजा), गंगा जी का चित्र, शिव-चित्र/शिवलिंग
- दस दीप (आटे/मिट्टी), घी/तेल, रुई; दस फूल (कमल/गेंदा), दस फल (आम-खरबूज़ा-केला), रोली, चंदन, अक्षत, बेलपत्र, तुलसी
- दस दान: घड़ा/सुराही (10 या जितना संभव), पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, खरबूज़ा-ककड़ी, अन्न, गुड़, वस्त्र, दक्षिणा
- निर्जला एकादशी: विष्णु-लक्ष्मी चित्र, पीले फूल, तुलसी, पंचामृत, मिट्टी के घड़े (जल-दान), आम के पत्ते-ढक्कन, शरबत/छाछ, पक्षियों के सकोरे
- दीपक, धूप, कपूर, आरती-थाली; गंगा-स्तोत्र/गंगा-आरती, एकादशी-कथा पुस्तक
- पारण (द्वादशी): तुलसी-जल, खिचड़ी/दलिया, ब्राह्मण-भोजन का सामान
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अयोध्या के राजा सगर के 60,000 पुत्र कपिल मुनि के शाप से भस्म हुए; उनकी मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाना था। अंशुमान, दिलीप — पीढ़ियों की तपस्या; अंत में भगीरथ ने ब्रह्मा को प्रसन्न किया; गंगा के वेग को धरती न सह पाती, इसलिए शिव ने जटाओं में गंगा को रोका और एक धारा छोड़ी — ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा हरिद्वार से बहीं, सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ, गंगा «भागीरथी» कहलाईं। तभी से गंगा दशहरा — गंगा का पृथ्वी-अवतरण।
दशहरा = दस पापों का हरण — स्कंद-पुराण में इस दिन दस योगों में स्नान-दान से तीन कायिक (हिंसा, चोरी, परस्त्री), चार वाचिक (झूठ, कटु, चुगली, व्यर्थ), तीन मानसिक (परधन-लोभ, अनिष्ट-चिंतन, नास्तिकता) पाप नष्ट; इसलिए दस की संख्या।
निर्जला एकादशी — भीम भोजन-प्रिय थे, हर एकादशी का व्रत न रख पाते; व्यास जी ने कहा — ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को बिना जल एक व्रत रखो, सब 24 एकादशियों का फल मिलेगा; भीम ने रखा, मूर्छित हुए पर व्रत पूरा किया — इसलिए «भीमसेनी एकादशी»; पद्म-पुराण में इसका फल तीर्थ-दान-यज्ञ से अधिक।
दशहरे का सत्तू-आम और एकादशी का जल-दान
जून की गर्मी — गंगा दशहरा को सत्तू-शरबत, आम, खरबूज़ा, खीर; निर्जला एकादशी को स्वयं जल भी नहीं, पर दूसरों को घड़ा-शरबत-छाछ — यही भोग। द्वादशी को पारण हल्का।
- गंगा दशहरा: सत्तू (चना-जौ) का शरबत/लड्डू, आम-रस, खरबूज़ा-ककड़ी, खीर (दशहरा-भोग), पूड़ी-आलू; घाट पर बेल-शरबत की प्याऊ
- दस फल गंगा को — आम, केला, खरबूज़ा, लीची, जामुन, ककड़ी, बेल, सेब, अनार, नारियल — फिर बाँटें
- निर्जला एकादशी: व्रती को कुछ नहीं (आचमन मात्र); दान — मिट्टी के घड़े में ठंडा जल + आम के पत्ते, नींबू-शरबत, छाछ, बेल-शरबत की प्याऊ, खरबूज़ा, सत्तू, पंखा; पक्षियों को जल-दाना
- पारण (द्वादशी): तुलसी-जल, नारियल-पानी, खिचड़ी/मूँग-दलिया, दही, फल — धीरे-धीरे; भारी-तला नहीं
- गर्भवती/रोगी: एकादशी को फल-दूध-नारियल-पानी; निर्जला नहीं
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
गंगा-तट के प्रदेशों का पर्व, पर जल-दान और निर्जला एकादशी पूरे देश में।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- दशमी को भोर-स्नान दस डुबकी/गंगाजल; दस दीप, दस फल, दस दान
- जल-दान दोनों दिन — घड़ा, प्याऊ, शरबत, छाछ: गर्मी का सबसे बड़ा पुण्य
- निर्जला एकादशी सामर्थ्य से; न हो सके तो फल-जल के साथ — भाव मुख्य
- पारण द्वादशी में हरि-वासर के बाद; पहले दान-भोजन
- पितरों को गंगाजल-तर्पण; गंगा-द्वार-पत्र घर के द्वार पर
❌ क्या न करें
- गंगा/नदी में साबुन-प्लास्टिक-पूजा-कूड़ा नहीं — दीप पत्तल में, फूल-प्रसाद घाट के गमले/जल-कुंड में
- घाट पर गहरे पानी-तेज़ धारा में नहीं; बच्चों-बुज़ुर्गों को अकेला नहीं; दोपहर की धूप से बचें
- निर्जला में गर्भवती-रोगी-बुज़ुर्ग-बच्चे नहीं; चक्कर-उल्टी हो तो तुरंत जल — व्रत भंग नहीं, प्राण-रक्षा धर्म है
- एकादशी को चावल-अनाज; द्वादशी बीतने पर पारण नहीं
- जल-दान का घड़ा गंदा/पुराना नहीं — नया मिट्टी का, ढका हुआ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गंगा दशहरा 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की ज्येष्ठ शुक्ल दशमी है — पंचांग-गणना से; निर्जला एकादशी (अगला दिन) भी तालिका में; भोर-स्नान (ब्रह्म-मुहूर्त) व अभिजित का दिल्ली-समय वहीं।
गंगा दशहरा और दशहरा (विजयादशमी) एक ही?
नहीं — गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (जून) का गंगा-अवतरण पर्व है; विजयादशमी (दशहरा) आश्विन शुक्ल दशमी (अक्टूबर) — राम-रावण/दुर्गा-महिषासुर; नाम मिलते हैं, पर्व अलग।
निर्जला एकादशी कैसे रखें — सचमुच बिना पानी?
शास्त्र-विधान सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक जल-त्याग (आचमन/कुल्ला मान्य); ज्येष्ठ की गर्मी में यह कठिन है — स्वस्थ वयस्क ही रखें, ठंडी जगह रहें, परिश्रम न करें; गर्भवती-रोगी-बुज़ुर्ग फल-जल के साथ। चक्कर आए तो जल लें — व्रत का फल श्रद्धा से है, कष्ट से नहीं।
गंगा-दशहरा द्वार-पत्र क्या है?
उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में गंगा दशहरा को घर के मुख्य द्वार पर गंगा जी के चित्र-मंत्र वाला काग़ज़ («गंगा-दशहरा पत्र») लगाने की रीत — बिजली गिरने, आँधी और अग्नि से रक्षा की मान्यता; पंडित/बाज़ार से मिलता है, साल-भर लगा रहता है।
दस दान क्या-क्या?
दस प्रकार की वस्तुएँ या दस-दस की संख्या — जल-घड़ा, पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू, खरबूज़ा, अन्न, गुड़, वस्त्र, दक्षिणा; दस ब्राह्मण/ज़रूरतमंद; दस दीप, दस फल गंगा को। सामर्थ्य न हो तो एक घड़ा-जल भी पर्याप्त।
गंगा-तट दूर हो तो गंगा दशहरा कैसे मनाएँ?
घर में गंगाजल की कुछ बूँदें स्नान-जल में डालकर दस बार सिर पर जल, गंगा-चित्र/कलश की पूजा, घर के जल-पात्र में दस दीप, गंगा-आरती, जल-दान — पूर्ण मान्य; किसी भी नदी-तालाब में स्नान भी गंगा-स्मरण से फलदायी।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार की रीत सर्वोपरि है। निर्जला व्रत केवल स्वस्थ वयस्क, गर्मी में सावधानी; घाट पर सुरक्षा और गंगा की स्वच्छता सर्वोपरि।
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