🌳 वट सावित्री व्रत 2027
ज्येष्ठ अमावस्या (कहीं पूर्णिमा) — सुहागिनों का व्रत: बरगद की परिक्रमा, कच्चा सूत, सावित्री-सत्यवान की कथा, पति की दीर्घायु; शनि जयंती भी इसी दिन।
वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को रखा जाता है — उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान) में अमावस्या को और महाराष्ट्र-गुजरात-दक्षिण में ज्येष्ठ पूर्णिमा को (वट पूर्णिमा — 15 दिन बाद)। यह सुहागिनों का व्रत है — पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए, सावित्री की तरह जिसने यमराज से पति सत्यवान के प्राण लौटा लिए थे।
इस दिन स्त्रियाँ सोलह श्रृंगार करके बरगद (वट) के पेड़ की पूजा करती हैं — जड़ में जल, तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए 7/11/108 परिक्रमा, कथा, बरगद के फल/पत्ते का प्रसाद; इसी दिन शनि जयंती भी है। नीचे इस साल की तिथि, पूजा-मुहूर्त, विधि, सामग्री, सावित्री-सत्यवान की कथा, भोग और इलाक़ों की रीत दी गई है।
महत्व — यह व्रत क्यों
वट (बरगद) में ब्रह्मा (जड़), विष्णु (तना), महेश (शाखाएँ) का वास माना गया — अक्षय-वट अमर है; सावित्री ने वट के नीचे ही मरणासन्न सत्यवान का सिर गोद में लिया और यम से पति के प्राण माँगे — इसलिए वट की परिक्रमा और सूत से «बाँधना» (पति-जीवन का रक्षा-सूत्र)।
व्रत तीन दिन (त्रयोदशी से अमावस्या) का भी रखा जाता है — त्रयोदशी को संकल्प, चतुर्दशी-अमावस्या को उपवास; सामान्यतः अमावस्या का एक दिन — निर्जला या फलाहार, पूजा-कथा के बाद पति के हाथ से जल/फल।
ज्येष्ठ अमावस्या = शनि जयंती (शनि का जन्म) — इसलिए काले तिल-तेल का शनि-दान और शनि-मंदिर में तेल भी इसी दिन; ज्येष्ठ की गर्मी में वट की छाया, जल और पंखे का दान।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह उत्तर-भारतीय घरेलू विधि है — सुबह श्रृंगार व बाँस की टोकरी में सामग्री, बरगद के नीचे पूजा-परिक्रमा-कथा, घर लौटकर पति से आशीर्वाद।
- त्रयोदशी की रात (या अमावस्या की भोर) संकल्प — «मैं पति की दीर्घायु व अखंड सौभाग्य हेतु वट सावित्री व्रत करती हूँ»; अमावस्या को ब्रह्म-मुहूर्त में स्नान, सोलह श्रृंगार, लाल/पीली साड़ी, मेहंदी, चूड़ी, सिंदूर (नई बहू का पहला व्रत मायके/ससुराल की रीत से)।
- बाँस की टोकरी/दो टोकरियाँ: एक में सावित्री-सत्यवान-यम की मूर्ति (मिट्टी/चित्र) या ब्रह्मा-सावित्री, दूसरी में पूजा-सामग्री; टोकरी सिर पर लेकर सहेलियों-सुहागिनों के साथ बरगद के पेड़ के नीचे (मंदिर-परिसर/गाँव का वट) पूजा-स्थान।
- वट की जड़ में जल-दूध, रोली-अक्षत-हल्दी-कुमकुम, फूल, धूप-दीप; तने पर कच्चा सूत/मौली लपेटते हुए परिक्रमा — 7 (या 11/21/108) बार, हर फेरे में «ॐ वटाय नमः»/सावित्री-स्मरण; परिक्रमा के बाद सूत को हाथ जोड़कर प्रणाम।
- भोग: भीगे चने (काले/सफ़ेद), पूड़ी, आम, खरबूज़ा, बरगद के फल, गुड़, पुए/मालपुए, सत्तू; पंखे से वट को हवा करना (गर्मी — सत्यवान को सावित्री ने पंखा किया था); हाथ में 11-21 भीगे चने लेकर कथा सुनें।
- सावित्री-सत्यवान की कथा (नीचे) — सुहागिनें मिलकर; कथा के चने सास/बड़ी सुहागिन को देकर पैर छूएँ, बाया (पूड़ी-पुए-चने-फल-वस्त्र-दक्षिणा); वट के पत्ते/फल का प्रसाद सहेजें।
- घर लौटकर पति को तिलक करके प्रणाम, पति के हाथ से जल व चना/फल लेकर व्रत खोलें (निर्जला वाली); बरगद का पत्ता सिर में/ पूजा-स्थान में रखें; कच्चा सूत का टुकड़ा तिजोरी में।
- शनि जयंती (उसी दिन): काले तिल, सरसों तेल, काले वस्त्र, लोहा — शनि-मंदिर/ज़रूरतमंद को; पीपल पर तेल-दीप शाम को; «ॐ शं शनैश्चराय नमः»।
- जो बरगद तक न जा सकें — घर में गमले की/चित्र की वट-शाखा या मिट्टी का वट बनाकर वही विधि; दक्षिण-महाराष्ट्र की रीत (वट पूर्णिमा) 15 दिन बाद उसी विधि से।
पूजा-सामग्री की सूची
बाँस की टोकरी, कच्चा सूत और भीगे चने — इस व्रत की पहचान; बाक़ी सुहाग-सामग्री।
- बाँस की 2 टोकरियाँ (एक में सावित्री-सत्यवान/ब्रह्मा-सावित्री की मूर्ति, दूसरी में सामग्री), लाल कपड़ा
- कच्चा सूत (सफ़ेद/लाल), मौली/कलावा — परिक्रमा को
- भीगे चने (काले/सफ़ेद, 11-21 हाथ में), गुड़, पूड़ी, पुए/मालपुए, सत्तू
- फल — आम, खरबूज़ा, केला, लीची; बरगद के फल (मिलें तो)
- रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, मेहंदी, चूड़ी, बिंदी (सुहाग-सामग्री — वट को व सास को)
- जल-दूध का लोटा, फूल-माला, धूप, दीपक (घी), कपूर, हाथ-पंखा
- बाया: पूड़ी-पुए-चने, फल, कपड़ा (साड़ी/ब्लाउज़), दक्षिणा — सास के लिए
- शनि जयंती: काले तिल, सरसों तेल, काला कपड़ा, लोहे की वस्तु (दान)
- वट सावित्री कथा-पुस्तक
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पंचांग देखें →व्रत-कथा
मद्र-देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने वन में राज्य-हीन, अंधे राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति चुना। नारद ने बताया — सत्यवान की आयु एक वर्ष है। सावित्री अडिग रही, विवाह हुआ, वह वन में सास-ससुर की सेवा करती रही। वर्ष पूरा होने से तीन दिन पहले उसने निर्जला व्रत (त्रयोदशी से) लिया।
अंतिम दिन (ज्येष्ठ अमावस्या) सत्यवान लकड़ी काटने वन गया, सावित्री साथ; वट के नीचे सत्यवान का सिर चकराया, सावित्री ने गोद में लिया — यमराज आए, प्राण ले चले। सावित्री पीछे-पीछे चली; यम ने लौटने को कहा, उसने धर्म-ज्ञान से यम को प्रसन्न किया; यम ने वर दिए — ससुर की आँखें, राज्य, पिता को सौ पुत्र; अंत में सावित्री ने माँगा «सत्यवान से सौ पुत्र» — यम ने «तथास्तु» कहा और तब समझे — पति के बिना असंभव; यम ने सत्यवान के प्राण लौटाए।
वट के नीचे सत्यवान जागा; लौटे तो ससुर की आँखें व राज्य लौट आया था। तभी से सुहागिनें ज्येष्ठ अमावस्या को वट-पूजा और सावित्री का स्मरण करती हैं — पतिव्रता की बुद्धि और धैर्य से मृत्यु भी लौटती है। (महाभारत, वन-पर्व — मार्कंडेय ने युधिष्ठिर को सुनाई।)
भीगे चने, पुए, आम — वट सावित्री का भोग
ज्येष्ठ की गर्मी में भोग ठंडा-सादा: भीगे चने (कथा के), पूड़ी-पुए, आम-खरबूज़ा, सत्तू-शरबत; व्रत निर्जला/फलाहार; पारण पति के हाथ से जल-चना।
- भीगे चने: काले/सफ़ेद चने रात-भर भिगोकर, गुड़ के साथ — कथा में हाथ में, सास को, प्रसाद-रूप में; कई घर 11 चने पानी के साथ निगलकर व्रत खोलती हैं (लोक-रीत)
- पुए/मालपुए (आटा-गुड़-सौंफ, घी में), पूड़ी, खीर; बिहार-पूर्वांचल में «पुआ-पूड़ी», महाराष्ट्र (वट पूर्णिमा) में आम-नारियल-भीगे चने
- फल: आम, खरबूज़ा, लीची, केला; बरगद के फल (पके) का प्रसाद
- व्रत के दिन: निर्जला (सामर्थ्य) या फल-दूध; गर्भवती/रोगी फलाहार ज़रूर; पारण — पति के हाथ से जल, चना, फल; फिर हल्का भोजन
- शनि जयंती: काले तिल-गुड़ के लड्डू, उड़द-खिचड़ी का दान
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
उत्तर में अमावस्या का वट सावित्री, पश्चिम-दक्षिण में पूर्णिमा का वट पूर्णिमा — कथा एक।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- सोलह श्रृंगार, सुहाग की सब वस्तुएँ वट व सास को — व्रत का सार सौभाग्य
- बरगद की परिक्रमा कच्चे सूत से, कम-से-कम 7; पंखे से हवा
- कथा सुहागिनों के साथ; भीगे चने हाथ में, सास को बाया
- पारण पति के हाथ से जल-चना — निर्जला हो तो गर्मी में जल्दी
- शनि जयंती का तिल-तेल दान; वट के नीचे जल-प्याऊ
❌ क्या न करें
- बरगद की डाल-पत्ते तोड़ना — पूजा में गिरे पत्ते/फल लें
- ज्येष्ठ की गर्मी में निर्जला की ज़िद — गर्भवती/रोगी/बुज़ुर्ग फल-जल के साथ
- व्रत-दिन कलह, काले-सफ़ेद वस्त्र (शनि-दान का काला कपड़ा अलग बात)
- कच्चा सूत प्लास्टिक/नायलॉन नहीं — सूती
- मूर्तियाँ-पूजा-सामग्री वट के नीचे कूड़े-सी न छोड़ें — जल/मिट्टी में
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
वट सावित्री व्रत 2027 में कब है?
ऊपर दी गई तिथि इस साल की ज्येष्ठ अमावस्या है (उत्तर-भारतीय परंपरा) — पंचांग-गणना से; अमावस्या तिथि की अवधि व पूजा-मुहूर्त (दिल्ली) भी वहीं। महाराष्ट्र-गुजरात-दक्षिण में ज्येष्ठ पूर्णिमा (15 दिन बाद) को वट पूर्णिमा।
अमावस्या को या पूर्णिमा को — कौन सही?
दोनों शास्त्र-सम्मत — स्कंद-भविष्य पुराण में अमावस्या (उत्तर भारत), निर्णयामृत आदि में पूर्णिमा (महाराष्ट्र-दक्षिण); कथा-विधि एक; अपने कुल-प्रदेश की रीत मानें।
बरगद न मिले तो?
घर में गमले का बरगद/बोनसाई, या बरगद की एक डाल (गिरी हुई/मंदिर से) लाकर, या चित्र/मिट्टी का वट — वही विधि; सूत लपेटकर परिक्रमा उसी के चारों ओर।
कच्चा सूत क्यों लपेटते हैं?
सावित्री ने पति के प्राण यम से लौटाए — सूत का बंधन पति-जीवन की रक्षा का प्रतीक है («रक्षा-सूत्र»), वट अमर है; परिक्रमा 7 फेरे विवाह के सात फेरों की स्मृति।
नई बहू पहला व्रत कहाँ रखे?
लोक-रीत में पहला वट सावित्री ससुराल में सास के साथ (सास को बाया), कुछ इलाक़ों (मिथिला) में मायके से बाया आता है; जहाँ रहें वहीं व्रत मान्य — कथा और वट-पूजा मुख्य।
वट सावित्री पर शनि जयंती का क्या करें?
ज्येष्ठ अमावस्या शनि का जन्मदिन — काले तिल, सरसों तेल, काला वस्त्र, लोहा, उड़द का दान; शाम को पीपल पर तेल-दीप; साढ़ेसाती/ढैया वालों के लिए विशेष। कुंडली-पन्ने पर अपनी शनि-स्थिति देखें।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण पारंपरिक विधि व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व प्रदेश की रीत सर्वोपरि है। ज्येष्ठ की गर्मी में निर्जला व्रत स्वास्थ्य देखकर।
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