केतु महादशा में शनि अंतर्दशा: फल, अवधि व उपाय
केतु महादशा में शनि अंतर्दशा — अवधि व स्वरूप
विंशोत्तरी क्रम में केतु की महादशा 7 वर्ष चलती है — यह काल मोक्ष, अध्यात्म, वैराग्य, रहस्य, गुप्त-विद्या, अंतर्ज्ञान के विषयों का अध्याय है। इसके भीतर शनि की अंतर्दशा 1 वर्ष 1 माह 9 दिन की होती है (सूत्र: 7×19÷120 वर्ष) — इस अवधि में अध्याय वही रहता है, पर विषय शनि (कर्म, न्याय, आयु, अनुशासन, सेवक, दुःख, तेल-लोहा) तय करता है।
महादशा-स्वामी केतु के अध्याय में शनि अपने कारकत्व — कर्म, न्याय, आयु, अनुशासन, सेवक, दुःख, तेल-लोहा — के विषय सामने लाता है। सम-सम्बन्ध से फल मिश्रित रहता है — निर्णायक भूमिका कुंडली में दोनों की स्थिति की है।
फल कैसे पढ़ें — असली नियम
फल ग्रह के नाम से नहीं, आपकी कुंडली में उसकी स्थिति से तय होता है: शनि जिन भावों का स्वामी है, जहाँ बैठा है और जिस नक्षत्र में है — अंतर्दशा उन्हीं विषयों को छूती है; केतु की महादशा उसे अपना संदर्भ (अध्याय) देती है।
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इस अवधि के सामान्य उपाय
शनि (अंतर्दशा-स्वामी): शनि को शांत/बल देने हेतु शनिवार व्रत, हनुमान-चालीसा, 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' जप तथा शनि-देव/हनुमान-पूजन श्रेष्ठ है। रत्न नीलम (Blue Sapphire) पंचधातु/चाँदी में, मध्यमा में धारण — पर यह तीव्र-प्रभावी है, अतः बिना परीक्षण/परामर्श न धारण करें। तेल, लोहा, काली वस्तुएँ व उड़द का दान, तथा गरीब-सेवक-वृद्धों की सेवा विशेष लाभकारी है।
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