मंगल-राहु युति: फल, योग व उपाय
मंगल-राहु युति का मुख्य फल
मंगल अग्नि-तत्व का क्रूर ग्रह है (भाई, साहस, ऊर्जा, भूमि, रक्त, पराक्रम, विवाद का कारक), राहु वायु-तत्व का छाया-ग्रह (क्रूर) ग्रह (माया, विदेश, तकनीक, अचानक घटनाएँ, भ्रम, महत्वाकांक्षा का कारक) — युति में दोनों के कारकत्व घुल-मिलकर एक ही भाव के विषयों पर लगते हैं।
यह युति अंगारक योग कहलाती है। संक्षेप-सूत्र: मंगल की अग्नि को राहु का पंखा — दुस्साहस व जोखिम-प्रियता; दिशा मिले तो सेना-खेल-शल्य में विजय, न मिले तो क्रोध-दुर्घटना।
मैत्री और युति का भीतरी रसायन
नैसर्गिक मैत्री-विचार: मंगल राहु को सम मानता है और राहु मंगल को शत्रु। परस्पर वैर होने से युति में भीतरी खिंचाव रहता है — फल पाने में शेष कुंडली का सहयोग अधिक चाहिए।
किस भाव में हो — यही निर्णायक
युति का असली रंग भाव तय करता है — यही मंगल-राहु केंद्र-त्रिकोण में वरदान-रूप, त्रिक (6, 8, 12) में परीक्षा-रूप हो जाती है। अंश-निकटता जितनी अधिक, फल उतना गुँथा हुआ; और दोनों में जो ग्रह अंशों में आगे (बली) है, युति का नेतृत्व उसी के पास रहता है।
फल का समय: मंगल या राहु — किसी की भी महादशा-अंतर्दशा में युति सक्रिय होती है; दोनों की दशाएँ परस्पर अंतर्दशा में मिलें, तब इसका फल शिखर पर होता है।
सामान्य उपाय
मंगल: मंगल को बल/शांति देने हेतु मंगलवार व्रत, हनुमान-चालीसा पाठ, 'ॐ अंगारकाय नमः' जप तथा हनुमान-पूजन श्रेष्ठ है। रत्न मूँगा (Red Coral) ताँबे/सोने में, अनामिका में, मंगलवार धारण किया जाता है। मसूर-दाल, लाल वस्त्र व गुड़ का दान तथा क्रोध-प्रबंधन विशेष लाभकारी है; मांगलिक-दोष हेतु कुंभ-विवाह आदि परिहार शास्त्र-सम्मत हैं।
राहु: राहु को शांत करने हेतु 'ॐ रां राहवे नमः' जप, दुर्गा/भैरव-पूजन, सरस्वती-आराधना तथा शनिवार सेवा श्रेष्ठ है। रत्न गोमेद (Hessonite) चाँदी/पंचधातु में — तीव्र-प्रभावी, अतः बिना परामर्श न धारण करें। नीले-भूरे वस्त्र, तिल, नारियल व उड़द का दान, कोढ़ी/निर्धनों की सेवा तथा व्यसन-त्याग विशेष लाभकारी है।
रत्न-निर्णय युति में विशेष सावधानी माँगता है — दोनों ग्रहों के रत्न एक साथ प्रायः नहीं पहने जाते; कुंडली-परामर्श अनिवार्य।
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