सूर्य-गुरु युति: फल, योग व उपाय
सूर्य-गुरु युति का मुख्य फल
सूर्य अग्नि-तत्व का क्रूर (तेजस्वी) ग्रह है (आत्मा, पिता, राजा/सरकार, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, नेतृत्व का कारक), गुरु आकाश-तत्व का परम शुभ ग्रह (ज्ञान, धर्म, गुरु, संतान, धन, भाग्य, विवेक का कारक) — युति में दोनों के कारकत्व घुल-मिलकर एक ही भाव के विषयों पर लगते हैं।
यह युति गुरु-आदित्य युति कहलाती है। संक्षेप-सूत्र: धर्म व सत्ता का मेल — नीतिवान नेतृत्व, गुरु-कृपा से यश; गुरु अस्त हो तो शुभ-कार्यों (विवाह आदि) के मुहूर्त-विचार में सावधानी।
मैत्री और युति का भीतरी रसायन
नैसर्गिक मैत्री-विचार: सूर्य गुरु को मित्र मानता है और गुरु सूर्य को मित्र। दोनों ओर मैत्री होने से यह युति सहज-सहयोगी है।
अस्त (combust) का विचार
सूर्य के अति-निकट (कुछ अंशों के भीतर) आने पर गुरु अस्त हो जाता है — उसका फल क्षीण/भीतरी हो जाता है। युति पढ़ते समय अंश-दूरी अवश्य देखें: दूर की युति और निकट-अस्त युति के फल में बड़ा अंतर है।
किस भाव में हो — यही निर्णायक
युति का असली रंग भाव तय करता है — यही सूर्य-गुरु केंद्र-त्रिकोण में वरदान-रूप, त्रिक (6, 8, 12) में परीक्षा-रूप हो जाती है। अंश-निकटता जितनी अधिक, फल उतना गुँथा हुआ; और दोनों में जो ग्रह अंशों में आगे (बली) है, युति का नेतृत्व उसी के पास रहता है।
फल का समय: सूर्य या गुरु — किसी की भी महादशा-अंतर्दशा में युति सक्रिय होती है; दोनों की दशाएँ परस्पर अंतर्दशा में मिलें, तब इसका फल शिखर पर होता है।
सामान्य उपाय
सूर्य: सूर्य को बल देने हेतु प्रातः सूर्योदय पर जल-अर्घ्य (ताँबे के लोटे से), 'ॐ सूर्याय नमः' या आदित्य-हृदय-स्तोत्र का पाठ, रविवार व्रत तथा पिता व गुरुजनों का सम्मान श्रेष्ठ उपाय हैं। रत्न माणिक्य (Ruby) सोने में, अनामिका में, रविवार प्रातः धारण किया जाता है — पर कुंडली-परीक्षण के बाद ही। गुड़-गेहूँ का दान व सूर्य-नमस्कार भी लाभकारी है।
गुरु: गुरु को बल देने हेतु गुरुवार व्रत, 'ॐ गुरवे नमः' या बृहस्पति-स्तोत्र, विष्णु-पूजन तथा गुरुजनों-ब्राह्मणों का सम्मान श्रेष्ठ है। रत्न पुखराज (Yellow Sapphire) सोने में, तर्जनी में, गुरुवार धारण किया जाता है। पीली वस्तुएँ (चना-दाल, हल्दी, केसर) का दान, ज्ञान-दान तथा धर्म-ग्रंथों का अध्ययन विशेष लाभकारी है।
रत्न-निर्णय युति में विशेष सावधानी माँगता है — दोनों ग्रहों के रत्न एक साथ प्रायः नहीं पहने जाते; कुंडली-परामर्श अनिवार्य।
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