📿 गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) व्रत कथा
कथा
पराशर ऋषि और सत्यवती (मत्स्यगंधा) के पुत्र कृष्ण द्वैपायन का जन्म यमुना के द्वीप पर आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ — जन्मते ही तप को चले। कलियुग में मनुष्य की स्मृति-आयु कम होगी, इसलिए उन्होंने एक वेद को चार (ऋक्-यजु-साम-अथर्व) में बाँटा — «वेदव्यास»; शिष्य पैल, वैशंपायन, जैमिनि, सुमंतु को एक-एक वेद; 18 पुराण, ब्रह्मसूत्र, और गणेश की लेखनी से महाभारत — जिसमें गीता।
उनके पुत्र शुकदेव ने भागवत परीक्षित को सुनाई; व्यासजी आज भी चिरंजीवी माने जाते हैं, बद्रीनाथ के पास व्यास-गुफ़ा में। जो भी शास्त्र-ज्ञान आज तक बहा, वह व्यास से — «व्यासोच्छिष्टं जगत् सर्वम्» (सारा ज्ञान व्यास का जूठन है)। इसलिए हर कथा-वाचक की गद्दी «व्यासपीठ» और यह पूर्णिमा «व्यास पूर्णिमा»।
एकलव्य-द्रोण, आरुणि-धौम्य, कबीर-रामानंद, विवेकानंद-रामकृष्ण — गुरु-शिष्य की कथाएँ इस दिन सुनाई जाती हैं; बुद्ध ने इसी पूर्णिमा को सारनाथ में पाँच भिक्षुओं को चार आर्य-सत्य का प्रथम उपदेश दिया (धर्मचक्र-प्रवर्तन); शिव ने आदियोगी-रूप में सप्तर्षियों को योग सिखाया — गुरु-तत्त्व की उत्पत्ति का दिन।
कथा का महत्व — यह व्रत क्यों
«गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः» — गुरु अज्ञान-अंधकार हटाने वाला (गु = अंधकार, रु = हटाना); आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु-पूजन का फल गुरु-कृपा से ज्ञान, विद्या, आध्यात्मिक-प्रगति; व्यास-पूजन के साथ शुकदेव, शंकराचार्य, अपने गुरु-परंपरा (गुरु-मंडल) का पूजन।
शिव प्रथम गुरु (आदियोगी) — इसी पूर्णिमा को सप्तर्षियों को योग-विद्या दी (योग-परंपरा); गुरु-मंत्र की दीक्षा लेने, नया अध्ययन/साधना आरंभ करने, विद्यार्थियों के लिए गुरु-वंदन और शिक्षकों के सम्मान का दिन; बच्चे शिक्षकों को फूल-कार्ड, विद्यालयों में गुरु-वंदना।
पूर्णिमा-व्रत (दिन-भर फलाहार, शाम चंद्र-दर्शन के बाद पारण), सत्यनारायण-कथा; इसी पूर्णिमा से संतों का चातुर्मास (कार्तिक पूर्णिमा तक — प्रवचन-सत्संग एक स्थान पर); कोकिला-व्रत (आषाढ़ पूर्णिमा — सती की कथा; कुछ इलाक़े); बंगाल-ओडिशा में «गुरु पूर्णिमा/ऋषि-पूजा»; नेपाल में «गुरु पूर्णिमा/शिक्षक-दिवस» की छुट्टी।
कथा सुनने का नियम
- कथा पूजा के बाद और आरती से पहले सुनी/पढ़ी जाती है — पूरा परिवार साथ बैठे।
- व्रत रखने वाला शांत मन से सुने; दीपक जलता रहे और हाथ में थोड़े अक्षत-फूल रखें।
- कथा पूरी होने पर फूल देव-चरणों में चढ़ाकर प्रणाम करें; प्रसाद सबमें बाँटें।
📿 गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) की पूजा-विधि (चरण-दर-चरण) →
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गुरु पूर्णिमा {Y} में कब है?
ऊपर इस साल की आषाढ़ पूर्णिमा की तिथि, पूजा-मुहूर्त व चंद्रोदय (दिल्ली) दिए हैं — सुबह गुरु-पूजन, शाम पूर्णिमा-व्रत की चंद्र-अर्घ्य/सत्यनारायण-कथा; पूर्णिमा दो दिन में बँटे तो उदया-तिथि वाला दिन गुरु-पूजन का।
गुरु न हो तो किसे पूजें?
व्यासजी (सब गुरुओं के गुरु), शिव-दत्तात्रेय (आदि-गुरु), अपने इष्ट, माता-पिता (प्रथम गुरु), विद्या-गुरु/शिक्षक; या जिसकी शिक्षा से जीवन बदला — पुस्तक-लेखक तक; गुरु-तत्त्व को प्रणाम — «गुरुर्ब्रह्मा…» श्लोक पर्याप्त।
गुरु-दक्षिणा क्या दें?
सामर्थ्य से — फल-वस्त्र-पुष्प-दक्षिणा; पर असली दक्षिणा गुरु के बताए मार्ग पर चलना, एक नियम/त्याग का संकल्प, गुरु-कार्य में सेवा; गुरु न हों तो पुस्तक-दान, किसी ग़रीब छात्र की फ़ीस/कॉपी-कलम — विद्या-दान गुरु-दक्षिणा ही है।
क्या इस दिन दीक्षा लेना शुभ है?
हाँ — गुरु-पूर्णिमा दीक्षा (गुरु-मंत्र), नया अध्ययन, साधना-आरंभ, संगीत/कला का पहला पाठ, रुद्राक्ष-धारण के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन; आश्रमों में सामूहिक दीक्षा होती है; अभिजित मुहूर्त (ऊपर) उत्तम।
चातुर्मास क्या है?
देवशयनी एकादशी/गुरु पूर्णिमा से देवउठनी/कार्तिक पूर्णिमा तक के चार मास — विष्णु का शयन, विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं; साधु-संत एक स्थान पर रहकर प्रवचन; गृहस्थ कोई एक नियम (सात्विक भोजन, गीता-पाठ, ब्रह्मचर्य, दान) रखते हैं; जैन-बौद्ध में भी (वर्षावास)।
बृहस्पति-ग्रह (गुरु) के लिए इस दिन क्या करें?
कुंडली में गुरु कमज़ोर/अशुभ हो — गुरु पूर्णिमा को पीले वस्त्र-चना-केसर-हल्दी-पुस्तक दान, «ॐ बृं बृहस्पतये नमः» जप, केले के पेड़ को जल, बड़ों-गुरुजनों की सेवा; गुरुवार-व्रत का संकल्प भी आज से; पुखराज पंडित की सलाह से।
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