| शहर | तारीख | घटस्थापना मुहूर्त (प्रातःकाल) | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| सिडनी AEST/AEDT | रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | 6:20 AM – 8:53 AM AEDT | 11 अक्टूबर, 3:05 AM → 12 अक्टूबर, 3:02 AM AEDT |
| मेलबर्न AEST/AEDT | रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | 6:41 AM – 9:15 AM AEDT | 11 अक्टूबर, 2:56 AM → 12 अक्टूबर, 3:02 AM AEDT |
| ब्रिस्बेन AEST | रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | 5:17 AM – 7:48 AM AEST | 11 अक्टूबर, 2:02 AM → 12 अक्टूबर, 2:02 AM AEST |
| पर्थ AWST | रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | 5:42 AM – 8:15 AM AWST | 10 अक्टूबर, 11:57 PM → 12 अक्टूबर, 12:02 AM AWST |
| एडिलेड ACST/ACDT | रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | 6:39 AM – 9:12 AM ACDT | 11 अक्टूबर, 2:24 AM → 12 अक्टूबर, 2:32 AM ACDT |
समय स्थानीय (DST-सहित)। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
| दुर्गा अष्टमी | सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 |
| महानवमी | सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 |
| विजयादशमी (दशहरा) | बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 |
अन्य शहरों में एक दिन का अंतर हो सकता है; शहर-वार तारीखें उस पर्व के पन्ने पर।
स्थानीय सूर्योदय पर प्रतिपदा (उदया तिथि); घटस्थापना दिन के पहले भाग में।
पुराणों के अनुसार माँ दुर्गा ने नौ दिन के युद्ध के बाद दसवें दिन महिषासुर का वध किया था — इसीलिए दशमी «विजया» है। रामायण में भगवान राम ने रावण-वध से पहले इन्हीं नौ दिनों में शक्ति की आराधना की थी। यह ऋतु-परिवर्तन का भी समय है, इसलिए व्रत-संयम शरीर के लिए भी हितकर माना गया है।
नौ दिन नौ देवियाँ: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। हर दिन का अपना रंग, भोग और मंत्र होता है; पर घर में सरल पूजा — दीप, फूल, चुनरी, भोग और दुर्गा-सप्तशती या दुर्गा-चालीसा का पाठ — पर्याप्त है।
ऊपर दी तिथियाँ इंजन-गणना से हैं। ध्यान रखें: तिथि-क्षय या वृद्धि होने पर नवरात्रि कभी 8 और कभी 10 दिन की भी हो जाती है — तब बीच के दिन (द्वितीया-सप्तमी) एक दिन आगे-पीछे हो सकते हैं; अष्टमी, नवमी और दशमी की तिथियाँ ऊपर सीधे पंचांग से हैं, वे पक्की हैं।
हाँ — रविवार, 11 अक्टूबर 2026।
घटस्थापना मुहूर्त (प्रातःकाल): 6:20 AM से 8:53 AM (AEDT)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में, DST-सहित (सिडनी के लिए AEST/AEDT)।
दोनों मान्य हैं — पंजाब-दिल्ली में अष्टमी (कंजक) और पूर्वी उत्तर प्रदेश-बिहार में नवमी ज़्यादा प्रचलित। अपने घर की रीत अपनाएँ; कन्याएँ 2 से 10 वर्ष की और साथ में एक बालक हो।
नवमी को हवन-कन्या-पूजन के बाद या दशमी को सुबह पूजा करके — अपनी परंपरा के अनुसार। पहले माँ को भोग, फिर कन्याओं को, फिर स्वयं।
पहला और आख़िरी दिन (जोड़े का व्रत), या सिर्फ़ अष्टमी का व्रत भी शास्त्र-सम्मत है। श्रद्धा और नियम मुख्य हैं, दिनों की गिनती नहीं।
जब एक तिथि सूर्योदय-से-सूर्योदय के बीच पूरी घट जाती है (तिथि-क्षय) तो एक दिन कम, और जब एक ही तिथि दो सूर्योदय छू ले (तिथि-वृद्धि) तो एक दिन ज़्यादा हो जाता है। ऊपर अष्टमी-नवमी-दशमी की तिथियाँ सीधे पंचांग से हैं, इसलिए सही हैं।