भृगु समुद्र — फलादेश के पीछे छिपा कारण — 101 फलादेश व्याख्यान

भृगु समुद्र

फलादेश के पीछे छिपा कारण — 101 फलादेश व्याख्यान

फल तो हर पुस्तक बताती है; यह पुस्तक बताती है कि वह फल क्यों होता है। बारह लग्नों की प्रकृति, भावों के त्रिकोण, हर ग्रह की कार्य-प्रणाली और हर दशा के व्याख्यान — ताकि सूत्र रटने की जगह कुंडली का तर्क समझ में आए।

44अध्याय648पृष्ठ101व्याख्यानहिन्दीभाषा
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✍️ लेखक: ज्योतिषाचार्य आदित्य धर द्विवेदी — 15+ वर्ष का वैदिक ज्योतिष अनुभव, Nakshtra Tak के संस्थापक। लेखक-परिचय →

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पुस्तक में क्या है — 6 खंड

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भृगु समुद्र — नमूना पृष्ठ 1भृगु समुद्र — नमूना पृष्ठ 2भृगु समुद्र — नमूना पृष्ठ 3भृगु समुद्र — नमूना पृष्ठ 4भृगु समुद्र — नमूना पृष्ठ 5भृगु समुद्र — नमूना पृष्ठ 6

इस पुस्तक की ख़ास बात

हर लग्न की प्रकृति — मेष से मीन तक बारहों लग्न/राशियों का व्याख्यान (अध्याय 1–12): कालपुरुष में स्थान, तत्व-स्वभाव-गुण, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष वर्गीकरण, पूर्वजन्म का संकेत, इस जन्म का मुख्य कर्म, मनोवैज्ञानिक संरचना, कार्य-शैली, धन के प्रति दृष्टिकोण, रोग-संभावनाएँ, आध्यात्मिक पाठ और शुभ रंग, दिन व दिशा।

भाव और चारों त्रिकोण — द्वादश भाव के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष त्रिकोण का अलग-अलग व्याख्यान (अध्याय 13–17), ताकि भावों को समूह में पढ़ना आए।

नवग्रहों की कार्य-प्रणाली — सूर्य से केतु तक हर ग्रह (अध्याय 18–26): उस ग्रह को लग्न मानकर पूरी कुंडली पढ़ना, फलादेश में राशि, नक्षत्र व नक्षत्र-स्वामी, युति, दृष्टि, नवांश-वर्गोत्तम और दशा-अंतर्दशा-गोचर का महत्व, और हर ग्रह के स्वर्णिम सूत्र; साथ में ग्रहों की समस्या का समाधान और अशुभ फल के कारण (27–28)।

दशा के व्याख्यान — नौ ग्रहों की दशा पर अलग-अलग व्याख्यान (अध्याय 29–37), फिर कारक-मारक-बाधक, भाव-भावेश नियम, ग्रह की दशा के बाद व्यक्ति का अनुभव और «किस भाव की दशा ने क्या सिखाया» (38–41)।

युति और राशि-भाव फल — सूर्य-चंद्र से शनि-केतु तक दो-ग्रह युतियाँ, बहु-ग्रह युति, और अंत में सभी बारह राशियों का सभी भावों में फलादेश (अध्याय 42–44)।

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यह पुस्तक किसके लिए

  • जो कुंडली पढ़ना जानते हैं और अब फल का «कारण» समझना चाहते हैं
  • अभ्यास करने वाले ज्योतिषी — फलादेश को तर्क के साथ समझाने के लिए
  • «ज्योतिष समुद्र» के पाठक — सूत्रों के पीछे का व्याख्यान

पूरी विषय-सूची (44 अध्याय)

अध्याय 1–12 · बारह लग्न/राशियों की आत्मा — मेष से मीन
  1. 1मेष लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 15
  2. 2वृषभ लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 19
  3. 3मिथुन लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 24
  4. 4कर्क लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 30
  5. 5सिंह लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 35
  6. 6कन्या लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 40
  7. 7तुला लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 46
  8. 8वृश्चिक लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 52
  9. 9धनु लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 58
  10. 10मकर लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 64
  11. 11कुम्भ लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 70
  12. 12मीन लग्न/राशि व्याख्यानपृष्ठ 76
अध्याय 13–17 · द्वादश भाव और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष त्रिकोण
  1. 13द्वादश भाव व्याख्यानपृष्ठ 82
  2. 14धर्म त्रिकोण भाव व्याख्यानपृष्ठ 102
  3. 15अर्थ त्रिकोण भाव व्याख्यानपृष्ठ 116
  4. 16काम त्रिकोण भाव व्याख्यानपृष्ठ 129
  5. 17मोक्ष त्रिकोण भाव व्याख्यानपृष्ठ 142
अध्याय 18–28 · नवग्रहों की कार्य-प्रणाली, समस्या का समाधान और अशुभ फल का कारण
  1. 18सूर्य ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 155
  2. 19चन्द्र ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 187
  3. 20मंगल ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 213
  4. 21बुध ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 235
  5. 22बृहस्पति ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 255
  6. 23शुक्र ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 276
  7. 24शनि ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 295
  8. 25राहु ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 314
  9. 26केतु ग्रह कार्य प्रणाली व्याख्यानपृष्ठ 332
  10. 27ग्रहों की समस्या का समाधान-व्याख्यानपृष्ठ 348
  11. 28ग्रहों के अशुभ फल का कारण-व्याख्यानपृष्ठ 360
अध्याय 29–37 · नवग्रहों की दशा के व्याख्यान
  1. 29सूर्य दशा के 47 व्याख्यानपृष्ठ 376
  2. 30चन्द्र दशा के 53 व्याख्यानपृष्ठ 386
  3. 31मंगल दशा के 55 व्याख्यानपृष्ठ 395
  4. 32बुध दशा के 55 व्याख्यानपृष्ठ 405
  5. 33बृहस्पति दशा के 55 व्याख्यानपृष्ठ 414
  6. 34शुक्र दशा के 55 व्याख्यानपृष्ठ 423
  7. 35शनि दशा के 55 व्याख्यानपृष्ठ 432
  8. 36राहु दशा के 55 व्याख्यानपृष्ठ 441
  9. 37केतु दशा के 55 व्याख्यानपृष्ठ 451
अध्याय 38–41 · कारक-मारक-बाधक, भाव-भावेश नियम और दशा का अनुभव
  1. 38कारक, मारक, बाधक व्याख्यानपृष्ठ 460
  2. 39भाव-भावेश नियम व्याख्यानपृष्ठ 500
  3. 40ग्रहों की दशा के बाद व्यक्ति का अनुभवपृष्ठ 511
  4. 41किस भाव की दशा ने क्या सिखायापृष्ठ 524
अध्याय 42–44 · युतियाँ और बारह राशियों का बारह भावों में फल
  1. 42दो ग्रह युति व्याख्यानपृष्ठ 542
  2. 43बहु ग्रह युति व्याख्यानपृष्ठ 591
  3. 44सभी बारह राशियों का सभी भावों में फलादेशपृष्ठ 596

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भृगु समुद्र पुस्तक में क्या है?

44 अध्याय और 648 पृष्ठ: बारह लग्न/राशियों का व्याख्यान, द्वादश भाव व चारों त्रिकोण, नवग्रहों की कार्य-प्रणाली, हर ग्रह की दशा के व्याख्यान, कारक-मारक-बाधक, भाव-भावेश नियम, दो व बहु-ग्रह युति और सभी बारह राशियों का सभी भावों में फलादेश।

क्या यह भृगु संहिता है?

नहीं। यह भृगु संहिता का अनुवाद नहीं है; यह आचार्य आदित्य धर द्विवेदी के फलादेश-व्याख्यानों का संग्रह है, जो लग्न, भाव, ग्रह, दशा और युति के फल के पीछे का कारण समझाता है।

ज्योतिष समुद्र और भृगु समुद्र में क्या अंतर है?

«ज्योतिष समुद्र» (202 अध्याय) फलित ज्योतिष का पूरा सूत्र-संग्रह है: नींव से वर्ग कुंडली, दशा, गोचर और उपाय तक। «भृगु समुद्र» उन्हीं फलों के पीछे का कारण व्याख्यान-रूप में समझाता है। दोनों साथ पढ़ने पर सूत्र भी मिलते हैं और तर्क भी।

क्या शुरुआती पाठक इसे पढ़ सकते हैं?

भाषा सरल हिन्दी है, पर ग्रह, राशि और भाव की बुनियादी जानकारी हो तो यह पुस्तक ज़्यादा काम आएगी। बिल्कुल शुरुआत से सीखना हो तो «ज्योतिष समुद्र» साथ लें; तीनों पुस्तकों का combo भी है।

पुस्तक किस भाषा में है?

पुस्तक हिन्दी में है।

ऑर्डर कैसे करें, डाक-ख़र्च कितना है?

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