| शहर | तारीख | पूजा-समय | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| टोरंटो Eastern Time (EST/EDT) | मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | — | 13 अप्रैल, 3:39 PM → 14 अप्रैल, 2:43 PM EDT |
| ब्रैम्पटन Eastern Time (EST/EDT) | मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | — | 13 अप्रैल, 3:39 PM → 14 अप्रैल, 2:43 PM EDT |
| वैंकूवर Pacific Time (PST/PDT) | मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | — | 13 अप्रैल, 12:39 PM → 14 अप्रैल, 11:43 AM PDT |
| कैलगरी Mountain Time (MST/MDT) | मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | — | 13 अप्रैल, 1:39 PM → 14 अप्रैल, 12:43 PM MDT |
| एडमंटन Mountain Time (MST/MDT) | मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | — | 13 अप्रैल, 1:39 PM → 14 अप्रैल, 12:43 PM MDT |
| मॉन्ट्रियल Eastern Time (EST/EDT) | मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 | — | 13 अप्रैल, 3:39 PM → 14 अप्रैल, 2:43 PM EDT |
समय स्थानीय (DST-सहित)। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
खगोल: सूर्य निरयण मेष में — वैदिक सौर-वर्ष का आरंभ (महाविषुव — कभी दिन-रात बराबर का बिंदु, अयनांश से अब 14 अप्रैल के आसपास); सौर पंचांग (तमिल, मलयालम, बंगाली, असमिया, ओडिया, पंजाबी-नानकशाही, नेपाली विक्रम-सौर) सब यहीं से गिनते हैं; संक्रांति सूर्यास्त के बाद हो तो पर्व अगले दिन (14) — ऊपर तिथि इसी नियम से।
बैसाखी 1699: गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा-पंथ की स्थापना की (पंज-प्यारे) — सिखों के लिए धार्मिक नववर्ष-सा; 1919 जलियाँवाला बाग़ भी बैसाखी को; किसानों की रबी-कटाई का उत्सव — «जट्टा आई बैसाखी»; हरिद्वार-ऋषिकेश में मेष-संक्रांति का गंगा-स्नान (सतयुग-आरंभ की मान्यता), गंगा-अवतरण से जुड़ा गंगा-सप्तमी अलग।
विषु: सुबह सबसे पहले «कणि» (कृष्ण-प्रतिमा, कोन्ना (अमलतास) के पीले फूल, चावल, फल, सोना-सिक्के, दर्पण, दीप — उरुली में) देखना = साल-भर समृद्धि; बड़ों से कैनीट्टम (सिक्के); बिहू: गाय की पूजा (गोरु बिहू — कटाई के बाद), नया साल (मानुह बिहू — बड़ों को गमोसा), बिहू-गीत-नृत्य (ढोल-पेपा), पीठा; पुथांडु: कणि (तमिल), मांगा-पचड़ी (छह रस), पंचांग-श्रवण; पोहेला बोइशाख: हालखाता (नया बही-खाता), प्रभात-फेरी (कोलकाता), पंता-भात (बांग्लादेश)।
हाँ — मंगलवार, 14 अप्रैल 2026।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में, DST-सहित (टोरंटो के लिए Eastern Time (EST/EDT))।
1699 की बैसाखी को गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में पंज-प्यारों को अमृत छकाकर खालसा-पंथ की स्थापना की — इसलिए सिखों के लिए बैसाखी खालसा-सिरजना दिवस (नानकशाही कैलेंडर में वैसाख-1); गुरुद्वारों में नगर-कीर्तन, अखंड-पाठ, लंगर; साथ ही रबी-कटाई का किसान-पर्व — दोनों एक दिन।
«कणि» = साल का पहला दर्शन — विषु की भोर में आँख खोलते ही शुभ-वस्तुएँ देखना ताकि साल शुभ हो; रात को उरुली (पीतल-थाल) में कच्चा चावल, कोन्ना (अमलतास) के पीले फूल, खीरा-कटहल-आम-केला-नारियल, सोने का गहना, सिक्के, दर्पण (जिसमें कणि व अपना चेहरा), नया कपड़ा, ग्रंथ, जलता निलविलक्कु — कृष्ण/गुरुवायूरप्पन की मूर्ति के सामने; भोर में घर की बड़ी स्त्री पहले देखती है, फिर सबको आँख बंद कराकर लाती है; फिर कैनीट्टम (सिक्के)।
बोहाग/रोंगाली बिहू: 1 गोरु बिहू (चैत्र-संक्रांति — गाय-बैल को नहलाना-पूजना), 2 मानुह बिहू (मेष-संक्रांति — नववर्ष, स्नान, नए कपड़े, गमोसा-प्रणाम, पीठा), 3 गोसाईं बिहू (घर-देवता/नामघर), 4 तातोर बिहू (करघा-वस्त्र), 5 नांगोलोर बिहू (हल-औज़ार), 6 घरोसिया-जीबोर बिहू (पालतू पशु), 7 चेरा बिहू (समापन) — क्रम-नाम इलाक़े से बदलते; पूरे सात दिन बिहू-नृत्य-हुसोरी।
तमिल पुथांडु व केरल-विषु की पचड़ी में कच्चा आम (खट्टा), नीम-फूल (कड़वा), गुड़ (मीठा), मिर्च (तीखा), नमक (नमकीन), इमली/कच्चा केला (कसैला) — छह स्वाद = जीवन के सुख-दुःख-सब का स्वीकार; नए साल के पहले कौर में — उगादी-पचड़ी (तेलुगु-कन्नड़) भी यही भाव (नीम-गुड़)।
🙏 गुरुजी (आचार्य आदित्य धर द्विवेदी) से सीधी बात