🌾 बैसाखी / विषु / बिहू / पुथांडु (मेष संक्रांति — सौर नववर्ष) 2027
13-14 अप्रैल — सूर्य का मेष में प्रवेश; पंजाब की बैसाखी (फ़सल-खालसा), केरल का विषु (विषुक्कणि), असम का बोहाग बिहू, तमिल पुथांडु, बंगाल का पोहेला बोइशाख, ओडिशा का महा-विषुव (पणा) संक्रांति, बिहार-नेपाल का सतुआनी/जुड़-शीतल; गंगा-स्नान, नया अन्न।
हर साल 13-14 अप्रैल को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है — मेष संक्रांति; यह भारत के सौर पंचांग का नववर्ष है और आधे देश का सबसे बड़ा फ़सल-पर्व: पंजाब-हरियाणा में **बैसाखी** (रबी-कटाई, 1699 में खालसा-पंथ की स्थापना), केरल में **विषु** (विषुक्कणि — सुबह आँख खोलते ही शुभ-दर्शन, कैनीट्टम), असम में **बोहाग (रोंगाली) बिहू** (सात दिन — गोरु, मानुह, गोसाईं बिहू), तमिलनाडु में **पुथांडु** (चित्तिरै 1), बंगाल में **पोहेला बोइशाख** (हालखाता), ओडिशा में **महा-विषुव/पणा संक्रांति**, बिहार-मिथिला-नेपाल में **सतुआनी/जुड़-शीतल**, नेपाल में **नववर्ष (बैसाख 1)**, हिमाचल में **बिशु**, उत्तराखंड में **बिखौती**।
घर की स्त्रियाँ इस दिन नया अन्न (गेहूँ-सत्तू-आम-पणा) बनाती हैं, गंगा/नदी-स्नान, सूर्य-अर्घ्य, दान (सत्तू-जल-घड़ा — गर्मी का दान), नए कपड़े; बैसाखी पर भाँगड़ा-गिद्दा व गुरुद्वारा, विषु पर विषुक्कणि-सद्या-पटाखे, बिहू पर पीठा-लारू व बिहू-नृत्य। ऊपर इस साल की मेष संक्रांति की तिथि (संक्रांति-काल के अनुसार 13 या 14 अप्रैल); नीचे हर प्रदेश की विधि, सामग्री, कथा, पकवान।
महत्व — यह व्रत क्यों
खगोल: सूर्य निरयण मेष में — वैदिक सौर-वर्ष का आरंभ (महाविषुव — कभी दिन-रात बराबर का बिंदु, अयनांश से अब 14 अप्रैल के आसपास); सौर पंचांग (तमिल, मलयालम, बंगाली, असमिया, ओडिया, पंजाबी-नानकशाही, नेपाली विक्रम-सौर) सब यहीं से गिनते हैं; संक्रांति सूर्यास्त के बाद हो तो पर्व अगले दिन (14) — ऊपर तिथि इसी नियम से।
बैसाखी 1699: गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा-पंथ की स्थापना की (पंज-प्यारे) — सिखों के लिए धार्मिक नववर्ष-सा; 1919 जलियाँवाला बाग़ भी बैसाखी को; किसानों की रबी-कटाई का उत्सव — «जट्टा आई बैसाखी»; हरिद्वार-ऋषिकेश में मेष-संक्रांति का गंगा-स्नान (सतयुग-आरंभ की मान्यता), गंगा-अवतरण से जुड़ा गंगा-सप्तमी अलग।
विषु: सुबह सबसे पहले «कणि» (कृष्ण-प्रतिमा, कोन्ना (अमलतास) के पीले फूल, चावल, फल, सोना-सिक्के, दर्पण, दीप — उरुली में) देखना = साल-भर समृद्धि; बड़ों से कैनीट्टम (सिक्के); बिहू: गाय की पूजा (गोरु बिहू — कटाई के बाद), नया साल (मानुह बिहू — बड़ों को गमोसा), बिहू-गीत-नृत्य (ढोल-पेपा), पीठा; पुथांडु: कणि (तमिल), मांगा-पचड़ी (छह रस), पंचांग-श्रवण; पोहेला बोइशाख: हालखाता (नया बही-खाता), प्रभात-फेरी (कोलकाता), पंता-भात (बांग्लादेश)।
पूजा-विधि (चरण-दर-चरण)
यह सौर-नववर्ष की घरेलू विधि है — सब प्रदेशों के साझा अंग (स्नान-सूर्य-नया अन्न-दान) पहले, फिर बैसाखी/विषु/बिहू/पुथांडु/पोहेला-बोइशाख/सतुआनी की अपनी रीत।
- साझा: ब्रह्म-मुहूर्त/सूर्योदय पर स्नान (नदी — गंगा-हरिद्वार, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, महानदी — या घर पर गंगाजल), सूर्य-अर्घ्य (जल-लाल फूल-अक्षत, «ॐ घृणि सूर्याय नमः»), नए/साफ़ वस्त्र; घर के मंदिर में कुल-देवता/विष्णु-सूर्य पूजा, नया पंचांग/कैलेंडर स्थापन (पंचांग-श्रवण — वर्ष-फल पढ़ना); पितरों को जल; दान — सत्तू, जल-घड़ा, पंखा, छाता, गुड़, चना (गर्मी-आरंभ का दान), अन्न-वस्त्र।
- बैसाखी (पंजाब-हरियाणा-दिल्ली): सुबह गुरुद्वारा — कीर्तन, अरदास, लंगर (खालसा-सिरजना दिवस — निशान साहिब बदलना, नगर-कीर्तन); खेतों में कटी फ़सल का पहला गट्ठर, «जट्टा आई बैसाखी» — भाँगड़ा-गिद्दा, ढोल, मेले (तलवंडी साबो, आनंदपुर); घर में खीर-कड़ाह प्रसाद-पीली सब्ज़ी (मीठे चावल), सरसों का साग-मक्की (अंतिम), लस्सी; हिंदू-परिवार सूर्य-पूजा, गंगा-स्नान, नई फ़सल का गेहूँ भगवान को।
- विषु (केरल): पिछली रात विषुक्कणि सजाना — उरुली (पीतल-थाल) में कच्चा चावल, कोन्ना-फूल (कणिक्कोन्ना — अमलतास), खीरा-कटहल-आम-केला, सोने का आभूषण, सिक्के, दर्पण (वाल्कण्णाड़ि), नया कपड़ा, ग्रंथ, निलविलक्कु — कृष्ण/गुरुवायूरप्पन की मूर्ति के सामने; सुबह घर की बड़ी स्त्री सबसे पहले कणि देखती है, फिर एक-एक को आँखें बंद कराकर कणि के सामने लाती है (पहला दर्शन); कैनीट्टम — बड़े छोटों को सिक्के; विषु-सद्या (विषुक्कट्टा, मांगा-पचड़ी — छह रस), पटाखे (विषुप्पड़क्कम), गाय-पक्षियों को कणि का अंश; शबरीमला-गुरुवायूर में विषुक्कणि-दर्शन।
- बोहाग/रोंगाली बिहू (असम): चैत्र-संक्रांति (13 अप्रैल — बिहू-1) «गोरु बिहू» — गाय-बैल को नदी में नहलाना, हल्दी-उड़द-लौकी-बैंगन से, नई रस्सी, «लाउ खा, बेंगेना खा…» गीत; मेष-संक्रांति (14 — बिहू-2) «मानुह बिहू» — स्नान, नए कपड़े, बड़ों को गमोसा-प्रणाम (बिहुवान), पीठा (तिल-नारियल), लारू, दही-चिड़ा; तीसरा «गोसाईं बिहू» — घर के देवता, नामघर; सात दिन बिहू-नृत्य (ढोल-पेपा-गगना), हुसोरी (घर-घर गीत-आशीर्वाद), मुकोली बिहू; बिहू-मंच।
- पुथांडु (तमिलनाडु): पिछली रात «कणि» — थाल में फल (आम-कटहल-केला), फूल, सुपारी, सोना-चाँदी, दर्पण, नया पंचांग; सुबह कणि-दर्शन, स्नान, मंदिर, «पंचांग-पड़नम» (वर्ष-फल श्रवण), मांगा-पचड़ी (कच्चा आम-नीम-गुड़-मिर्च-नमक-इमली — छह रस = जीवन के छह स्वाद), वड़ई-पायसम, मदुरै-मीनाक्षी में चित्तिरै-तिरुविळा आरंभ; तमिल नववर्ष «इनिय पुत्ताण्डु नल्वाळ्त्तुक्कळ्»।
- पोहेला बोइशाख (बंगाल-त्रिपुरा-बांग्लादेश): सुबह प्रभात-फेरी (रवीन्द्र-संगीत «एसो हे बोइशाख»), नए कपड़े (लाल-सफ़ेद साड़ी), लक्ष्मी-गणेश पूजा व **हालखाता** — व्यापारी नया बही-खाता (स्वस्तिक-सिंदूर), ग्राहकों को मिठाई-कैलेंडर; घर में पायेस-लुची-मिष्टि, कालीघाट-दक्षिणेश्वर; बांग्लादेश में मंगल-शोभायात्रा (ढाका), पंता-इलिश; «शुभो नोबोबोर्षो»।
- पणा/महा-विषुव संक्रांति (ओडिशा): «पणा» (बेल-दही-गुड़-दूध-केले का शरबत) बनाकर तुलसी-चौरा पर घड़ा टाँगना (बसुंधरा-थेकी — बूँद-बूँद पौधे को जल — गर्मी में), छतुआ (सत्तू) दान, हनुमान-जयंती (ओडिशा में इसी दिन), झामु-यात्रा (अग्नि-पथ), नया ओडिया वर्ष; सतुआनी/जुड़-शीतल (बिहार-मिथिला-नेपाल-तराई): सत्तू-गुड़-आम की चटनी-टिकोरा, «जुड़-शीतल» पर बड़े बच्चों के सिर पर बासी जल (शीतलता-आशीर्वाद), पेड़-पौधों को जल, घर की लिपाई; नेपाल में नववर्ष (बैसाख 1) — भक्तपुर बिस्केट-जात्रा, स्नान-दान।
- उत्तराखंड-हिमाचल-कश्मीर: बिखौती (उत्तराखंड — मेले, गंगा-अलकनंदा स्नान, नया अन्न), बिशु/बैसाखी (हिमाचल — देव-मेले), नवरेह (कश्मीरी पंडित — चैत्र में, सौर से अलग); तेलुगु-कन्नड़ में उगादी चैत्र-शुक्ल-प्रतिपदा (चंद्र) पर — इस पन्ने का नहीं; सब जगह सत्तू-जल-आम का नया अन्न।
पूजा-सामग्री की सूची
स्नान-सूर्य-दान की सामग्री + विषुक्कणि की उरुली + बिहू का गमोसा-पीठा + बैसाखी की कड़ाह — प्रदेश-अनुसार सूची।
- साझा: गंगाजल, सूर्य-अर्घ्य का लोटा, लाल फूल-अक्षत, नया पंचांग/कैलेंडर, नए वस्त्र, दान — सत्तू, जल-घड़ा (मिट्टी), पंखा, छाता, गुड़-चना, अन्न
- बैसाखी: कड़ाह-प्रसाद (आटा-घी-चीनी), पीले चावल (केसर), खीर, लस्सी, नई फ़सल का गेहूँ; गुरुद्वारा-सेवा; भाँगड़ा-ढोल
- विषुक्कणि: उरुली/पीतल-थाल, कच्चा चावल, कोन्ना (अमलतास) फूल, खीरा-कटहल-आम-केला-नारियल, सोना (आभूषण), सिक्के, दर्पण (वाल्कण्णाड़ि), नया मुंडु/कसवु, ग्रंथ, निलविलक्कु, कृष्ण-मूर्ति; कैनीट्टम के सिक्के; पटाखे; सद्या-सामग्री, मांगा-पचड़ी (आम-गुड़-नीम-मिर्च)
- बिहू: गमोसा (लाल-सफ़ेद बुना अंगोछा — बड़ों/अतिथियों को), पीठा (तिल-पीठा, नारियल-पीठा, घिला), लारू (नारियल-तिल लड्डू), दही-चिड़ा-गुड़, गाय के लिए हल्दी-उड़द-लौकी-बैंगन-नई रस्सी (गोरु बिहू), ढोल-पेपा-गगना-ताल, मेखेला-चादर
- पुथांडु: कणि-थाल (फल-फूल-सुपारी-सोना-दर्पण-पंचांग), मांगा-पचड़ी (कच्चा आम, नीम-फूल, गुड़, मिर्च, नमक, इमली), वड़ई, पायसम, नया पंचांग
- पोहेला बोइशाख: नया बही-खाता (हालखाता — लाल कपड़ा), स्वस्तिक-सिंदूर, लक्ष्मी-गणेश, मिठाई-कैलेंडर (ग्राहकों को), पायेस-लुची, लाल-सफ़ेद साड़ी
- पणा संक्रांति/सतुआनी: बेल-दही-गुड़-दूध-केला (पणा), मिट्टी का घड़ा (बसुंधरा-थेकी — तुलसी पर), छतुआ/सत्तू, आम-टिकोरा-चटनी, गुड़; जुड़-शीतल का बासी जल
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बैसाखी 1699: गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में सभा बुलाई और तलवार लेकर «एक सिर चाहिए» कहा — पाँच ने बारी-बारी सिर दिया (दया राम, धरम दास, हिम्मत राय, मोहकम चंद, साहिब चंद) — तंबू से जीवित लौटे, गुरु ने अमृत (खंडे-बाटे का पाहुल) छकाकर «पंज प्यारे» व खालसा-पंथ की स्थापना की, «सिंह» नाम, पाँच ककार; फिर स्वयं उनसे अमृत लिया — «आपे गुर चेला»; इसलिए बैसाखी खालसा-सिरजना दिवस। 1919 में इसी दिन जलियाँवाला बाग़ (अमृतसर) का नरसंहार — स्मृति-दिवस भी।
विषु: कृष्ण ने नरकासुर का वध किया/राम ने रावण-वध कर सूर्य को पूर्व से उगने दिया (लोक-मान्यताएँ) — विषु के दिन सूर्य ठीक पूर्व में (विषुव); विषुक्कणि की परंपरा — साल का पहला दर्शन शुभ हो तो पूरा साल शुभ; कोन्ना (कणिक्कोन्ना) श्रीकृष्ण को प्रिय — अप्रैल में खिलता पीला अमलतास «केरल का स्वर्ण»; कैनीट्टम = बड़ों का आशीर्वाद-धन।
बिहू व सूर्य/कृषि: बोहाग बिहू असम की कृषि-ऋतु का आरंभ — गाय की पूजा (गोरु बिहू) क्योंकि वही खेत-जीवन का आधार; मेष-संक्रांति को महाविषुव — सूर्य विषुवत् रेखा पर, दिन-रात बराबर (प्राचीन गणना); ओडिशा का पणा संक्रांति = हनुमान-जयंती (ओडिया परंपरा) व बसुंधरा-थेकी — धरती-माँ (बसुंधरा) को गर्मी में जल-अर्पण; सतुआनी का सत्तू — नई फ़सल का पहला अन्न सूर्य-पितरों को, फिर स्वयं (ठंडक); जुड़-शीतल — बड़े जल-छिड़ककर «शीतल रहो» का आशीर्वाद।
कड़ाह-पीले चावल, विषु-सद्या-मांगा-पचड़ी, बिहू-पीठा-लारू, पणा-सत्तू, पंता-इलिश — सौर-नववर्ष की थालियाँ
मेष संक्रांति पर हर प्रदेश का «नया अन्न» — पंजाब में नई गेहूँ की कड़ाह-खीर, केरल में विषु-सद्या व मांगा-पचड़ी (छह रस — जीवन के सब स्वाद), असम में पीठा-लारू-दही-चिड़ा, तमिलनाडु में पुथांडु-सद्या, बंगाल में पायेस-लुची, ओडिशा में पणा-छतुआ, बिहार-नेपाल में सत्तू-आम; गर्मी-आरंभ — ठंडी, कच्ची, सत्तू-दही-बेल की चीज़ें।
- बैसाखी: कड़ाह-प्रसाद (आटा-घी-चीनी बराबर), पीले मीठे चावल (केसर-किशमिश), खीर, छोले-भटूरे/पूड़ी, लस्सी, सरसों-साग (आख़िरी), नई गेहूँ की रोटी-गुड़
- विषु: विषुक्कट्टा (चावल-नारियल-दूध की भाप-पकवान — पहला व्यंजन), मांगा-पचड़ी/वेप्पम्पू-पचड़ी (कच्चा आम-नीम-गुड़-मिर्च — छह रस), विषु-सद्या (परिप्पु-सांबर-अवियल-थोरन-कालन-एरिश्शेरी-पायसम), कटहल-आम के व्यंजन (चक्का-प्रधमन), पप्पड़म-केला
- बिहू: पीठा — तिल-पीठा (चावल-आटे की रोल में तिल-गुड़), नारियल-पीठा, घिला-पीठा, सुंगा-पीठा (बाँस में); लारू (नारियल/तिल के लड्डू), दही-चिड़ा-गुड़, मुरमुरे, बोरा-चावल, मासोर-टेंगा (मछली — कुछ घर), बिहू-भोज
- पुथांडु: मांगा-पचड़ी (कच्चा आम + नीम-फूल + गुड़ + मिर्च + नमक + इमली — मीठा-कड़वा-खट्टा-तीखा-नमकीन-कसैला), वड़ई, पायसम, पोली, चावल-सांबर-रसम-अवियल; कटहल-आम
- पोहेला बोइशाख: पायेस, लुची-आलूर दम, संदेश-रसगुल्ला-मिष्टि दोई, माछ (बंगाल में उत्सव-भोज), बांग्लादेश में पंता-भात (बासी चावल-पानी) + इलिश + भर्ता
- पणा संक्रांति/सतुआनी/जुड़-शीतल: पणा (बेल-दही-गुड़-दूध-केला-काली मिर्च), छतुआ/सत्तू (जौ-चना — गुड़/नमक-प्याज़ से), आम की चटनी-टिकोरा, बासी भात-दही (जुड़-शीतल — बासी खाना ठंडक), खीर; नेपाल: सेल-रोटी, दही-चिउरा
अलग-अलग इलाक़ों की रीत
एक ही सूर्य-संक्रांति, आठ नाम — पंजाब का ढोल, केरल की कणि, असम का गमोसा, बंगाल का हालखाता, ओडिशा का पणा, बिहार का सत्तू, तमिल का पचड़ी, नेपाल का नववर्ष।
दादी-नानी से सुनी रीत, कथा, गीत या पकवान — 2-4 पंक्तियाँ; हम पढ़कर आपके इलाक़े के नाम से इसी पन्ने पर जोड़ेंगे (फ़ोन दिखेगा नहीं — सिर्फ़ पूछने के लिए)।
✅ मिल गई — पढ़कर 1-2 दिन में इसी पन्ने पर जोड़ेंगे। धन्यवाद!कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ भेज रहे…क्या करें, क्या न करें
✅ क्या करें
- संक्रांति-दिन नदी/घर-स्नान, सूर्य-अर्घ्य, नया पंचांग, नए वस्त्र; बड़ों से आशीर्वाद (कैनीट्टम/गमोसा/शगुन)
- नया अन्न पहले भगवान-पितरों को — गेहूँ/सत्तू/चावल; गर्मी का दान — सत्तू, जल-घड़ा, पंखा, छाता
- अपने प्रदेश की रीत — विषुक्कणि भोर में सबसे पहले, गोरु बिहू पर गाय-पूजा, हालखाता पर लक्ष्मी-गणेश, पणा-थेकी तुलसी पर
- गुरुद्वारा/मंदिर-सेवा, लंगर-सद्या में ग़रीब को भोजन; बिहू-भाँगड़ा-नृत्य में परिवार
- फ़सल-किसान का सम्मान — नई फ़सल के लिए कृतज्ञता
❌ क्या न करें
- संक्रांति-काल के आसपास (पुण्य-काल) झगड़ा-झूठ-ऋण-लेन (लोक-मान्यता); विषु पर कणि से पहले कुछ और देखना
- पटाखे (विषु) व नृत्य-मेलों में असुरक्षा-नशा; गाय-बैल को कष्ट (बिहू पर तो उनका सम्मान)
- बासी/माँस पूजा-थाली में (उत्सव-भोज अलग); पंचांग-कैलेंडर का अनादर
- मेष-संक्रांति को «चंद्र-नववर्ष» (उगादी/गुड़ी पड़वा/नवसंवत्सर) से मिलाना — वे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के, यह सौर
- गर्मी में दान-भूल — सत्तू-जल-घड़ा-छाता इस दिन का मुख्य पुण्य
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बैसाखी/विषु/बिहू 2027 में कब है — 13 या 14 अप्रैल?
ऊपर इस साल की मेष संक्रांति की तिथि है — सूर्य के मेष-प्रवेश का क्षण यदि सूर्यास्त के बाद हो तो पर्व अगले दिन (प्रायः 14 अप्रैल; कभी 13); बैसाखी-विषु-पुथांडु-पोहेला बोइशाख-पणा संक्रांति एक ही दिन; बोहाग बिहू का गोरु बिहू एक दिन पहले (चैत्र-संक्रांति) और मानुह बिहू मेष-संक्रांति को; जुड़-शीतल सतुआनी के अगले दिन; अपने प्रदेश का पंचांग मिला लें।
बैसाखी और खालसा का क्या संबंध?
1699 की बैसाखी को गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में पंज-प्यारों को अमृत छकाकर खालसा-पंथ की स्थापना की — इसलिए सिखों के लिए बैसाखी खालसा-सिरजना दिवस (नानकशाही कैलेंडर में वैसाख-1); गुरुद्वारों में नगर-कीर्तन, अखंड-पाठ, लंगर; साथ ही रबी-कटाई का किसान-पर्व — दोनों एक दिन।
विषुक्कणि क्या है और कैसे सजाएँ?
«कणि» = साल का पहला दर्शन — विषु की भोर में आँख खोलते ही शुभ-वस्तुएँ देखना ताकि साल शुभ हो; रात को उरुली (पीतल-थाल) में कच्चा चावल, कोन्ना (अमलतास) के पीले फूल, खीरा-कटहल-आम-केला-नारियल, सोने का गहना, सिक्के, दर्पण (जिसमें कणि व अपना चेहरा), नया कपड़ा, ग्रंथ, जलता निलविलक्कु — कृष्ण/गुरुवायूरप्पन की मूर्ति के सामने; भोर में घर की बड़ी स्त्री पहले देखती है, फिर सबको आँख बंद कराकर लाती है; फिर कैनीट्टम (सिक्के)।
बिहू के सात दिन कौन-से हैं?
बोहाग/रोंगाली बिहू: 1 गोरु बिहू (चैत्र-संक्रांति — गाय-बैल को नहलाना-पूजना), 2 मानुह बिहू (मेष-संक्रांति — नववर्ष, स्नान, नए कपड़े, गमोसा-प्रणाम, पीठा), 3 गोसाईं बिहू (घर-देवता/नामघर), 4 तातोर बिहू (करघा-वस्त्र), 5 नांगोलोर बिहू (हल-औज़ार), 6 घरोसिया-जीबोर बिहू (पालतू पशु), 7 चेरा बिहू (समापन) — क्रम-नाम इलाक़े से बदलते; पूरे सात दिन बिहू-नृत्य-हुसोरी।
मांगा-पचड़ी में छह रस क्यों?
तमिल पुथांडु व केरल-विषु की पचड़ी में कच्चा आम (खट्टा), नीम-फूल (कड़वा), गुड़ (मीठा), मिर्च (तीखा), नमक (नमकीन), इमली/कच्चा केला (कसैला) — छह स्वाद = जीवन के सुख-दुःख-सब का स्वीकार; नए साल के पहले कौर में — उगादी-पचड़ी (तेलुगु-कन्नड़) भी यही भाव (नीम-गुड़)।
हालखाता क्या है?
बंगाल के व्यापारियों का पोहेला बोइशाख पर नया बही-खाता (लाल कपड़े में बँधा «हालखाता») — लक्ष्मी-गणेश पूजा के साथ पहला पन्ना स्वस्तिक-सिंदूर से, पुराने उधार का हिसाब बंद, ग्राहकों को दुकान पर बुलाकर मिठाई-कैलेंडर; कालीघाट-दक्षिणेश्वर में खाता-पूजा; उत्तर-भारत की दीवाली-चोपड़ा-पूजा का बंगाली रूप।
अपना WhatsApp नंबर लिखिए — हर बड़े व्रत-त्योहार से एक दिन पहले तिथि, मुहूर्त और सामग्री-सूची का संदेश मिलेगा। मुफ़्त, कभी भी बंद कर सकती हैं।
✅ दर्ज हो गया — अगले व्रत से एक दिन पहले संदेश आएगा।कुछ गड़बड़ हुई — फिर कोशिश करें।⏳ दर्ज हो रहा…📲 सहेलियों-परिवार को WhatsApp पर भेजें
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⚠️ यह विवरण विभिन्न प्रदेशों की पारंपरिक रीत व लोक-मान्यता पर आधारित है; अपने कुल-परिवार व इलाक़े की रीत सर्वोपरि है। संक्रांति-तिथि (13/14 अप्रैल) संक्रांति-क्षण व प्रादेशिक पंचांग से — अपने प्रदेश का पंचांग मिला लें।
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