| शहर | तारीख | पूर्वाह्न पूजा-समय | तिथि (स्थानीय) |
|---|---|---|---|
| बर्लिन CET/CEST | शुक्रवार, 3 सितंबर 2027 | 6:20 AM – 11:44 AM CEST | 2 सितंबर, 1:21 PM → 3 सितंबर, 10:50 AM CEST |
| फ्रैंकफर्ट CET/CEST | शुक्रवार, 3 सितंबर 2027 | 6:43 AM – 12:04 PM CEST | 2 सितंबर, 1:21 PM → 3 सितंबर, 10:50 AM CEST |
| म्यूनिख CET/CEST | शुक्रवार, 3 सितंबर 2027 | 6:34 AM – 11:53 AM CEST | 2 सितंबर, 1:21 PM → 3 सितंबर, 10:50 AM CEST |
समय स्थानीय (DST-सहित)। तिथि = उस शहर में पर्व-तिथि का आरंभ → अंत।
स्थानीय सूर्योदय पर तिथि (उदया तिथि)।
निर्जला व्रत का नियम — दिन-रात जल तक नहीं (कुछ परंपराएँ आचमन मानती हैं); एक बार रखा तो हर साल रखना पड़ता है (छोड़ना अशुभ माना गया — बीमार हों तो किसी और से उद्यापन/या फलाहार से); इसलिए पहला व्रत सोच-समझकर। पार्वती ने यही तप किया था।
पूजा शाम/प्रदोष में मुख्य और फिर रात के चारों प्रहर — शिव-पार्वती-गणेश की मिट्टी/रेत/काली मिट्टी की प्रतिमाएँ (हाथ से बनाई — «पार्थिव»), फुलेरा (फूलों की छत), सुहाग की 16 वस्तुएँ; कथा तीन बार; अगली सुबह प्रतिमाएँ जल में विसर्जित कर पारण।
छत्तीसगढ़ में «तीजा» — बेटियाँ मायके बुलाई जाती हैं, एक दिन पहले «करू भात» (करेले की सब्ज़ी-भात); बिहार-यूपी में नई बहू का पहला तीज मायके में; महाराष्ट्र में «हरतालिका» की एक-दिवसीय रात-पूजा; नेपाल में तीन दिन का «तीज» — दर, निर्जला, ऋषि पंचमी।
हाँ — शुक्रवार, 3 सितंबर 2027।
पूर्वाह्न पूजा-समय: 6:20 AM से 11:44 AM (CEST)। अन्य शहर ऊपर सारणी में।
हर पंक्ति उस शहर के स्थानीय समय में, DST-सहित (बर्लिन के लिए CET/CEST)।
हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया (सावन — हरी चूड़ी, झूले, उत्सव, फलाहार); हरतालिका भाद्रपद शुक्ल तृतीया (एक महीने बाद — 24 घंटे निर्जला, रात-जागरण, मिट्टी की प्रतिमाएँ, सबसे कठोर); कजरी तीज बीच में (भाद्रपद कृष्ण तृतीया)।
शास्त्रीय विधान निर्जला (आचमन कुल-रीत से मान्य); सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक। यह कठोर है — स्वस्थ स्त्रियाँ ही; गर्भवती, रोगी, दूध पिलाने वाली फल-जल से रखें; तबीयत बिगड़े तो जल-भोजन लें — व्रत पार्वती का तप है, प्राण-संकट नहीं।
लोक-परंपरा में हाँ — इसलिए पहला व्रत सोचकर; पर बीमारी/गर्भावस्था/शोक में छूट जाए तो फलाहार से रखें या घर की दूसरी स्त्री पूजा करे, बाद में उद्यापन — अशुभ कुछ नहीं होता, भाव मुख्य है।
सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक रात के चार बराबर भाग (~3 घंटे) — पहला प्रहर प्रदोष (मुख्य पूजा-कथा), फिर ~9, ~12, ~3 बजे — हर बार फूल-अक्षत-दीप-मंत्र-आरती-कथा; सहेलियों के साथ गीत-भजन से जागरण आसान; एक प्रहर भी न हो सके तो प्रदोष-पूजा और सुबह की पूजा पर्याप्त।